ऐसी कैसी नींद: मूल्य शोषण से प्रतिरोध करती कविताएँ

ज्ञानेश्वरी सी


भारत एक ऐसा देश है जो अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं मूल्यों के कारण पूरे विश्व में अव्वल माना जाता है। भारतीय संस्कृति एवं मानवीय मूल्य हमेशा से ही विदेशों के लिए प्रशंसा एवं अनुकरण का पात्र रहा है। जिस संस्कृति एवं मूल्यों के बलबूते हम भारतीयों को गर्व महसूस होता था, वर्तमान समय में वही संस्कृति एवं मूल्य अपनी अस्मिता एवं वर्चस्व खो रहे हैं। उनका नामो-निशान ही जैसे मिट-सा गया है। हमारा जीवन अन्याय, अत्याचार, असमानता, असफलता, अवसाद, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा, असंतोष, अराजकता, आदर्श विहीनता आदि से घिरा हुआ है। मनुष्यता का पुट भी नहीं है। मनुष्य जानवर जैसा व्यवहार करने लगा है और हर व्यक्ति एक दूसरे का दुश्मन बना बैठा है। व्यक्ति एवं समाज में ऐसी सांप्रदायिकता, जातीयता आदि पर आधारित हिंसा की कुत्सित भावनाओं एवं समस्याओं का मूल कारण नैतिक मूल्यों का ह्यास एवं अवमूल्यन की भावना है जिससे मानव के नैतिक एवं चारित्रिक पतन हो जाता है। नैतिक मूल्यों की कोई पूर्ण सूची तो हम नहीं बना सकते क्योंकि एक ही समाज में बदलते समय के अनुसार नैतिक मूल्य भी बदलते हुए पाए जाते हैं। फिर भी हम उन गुणों को नैतिक मूल्य के अंतर्गत रख सकते हैं जो कि एक व्यक्ति के और साथ ही साथ समाज के सर्वांगीण विकास और कल्याण में योगदान दें। ये मूल्य मनुष्य के संतृप्त जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है और यही मनुष्य को जानवर से ऊपर एक मानवीय श्रेणी प्रदान करता है। लेकिन निर्भाग्य की बात यह है कि आधुनिक समाज में ये गुण लुप्त होते जा रहे हैं और जंगलीपन सबके ऊपर हावी हो रहा है। ऐसी भयानक विडंबना से गुज़र रही वर्तमान सामाजिक स्थिति का सच्चा, यथार्थ और  सरस प्रस्तुति श्री भगवत रावत ने ‘ऐसी कैसी नींद’ नामक कविता संग्रह में किया है।

श्री भगवत रावत वर्तमान हिंदी साहित्य जगत के जानेमाने कवि हैं। उनका जन्म 13 सितंबर 1939 को मध्यप्रदेश के टेहरका गाँव में हुआ था। उन्होंने 300 से अधिक कविताएँ, अनेक लेख, समीक्षाएँ तथा आलोचनात्मक गद्य भी लिखे है। 2004 में प्रकाशित ‘ऐसी कैसी नींद’ नामक कविता संग्रह में 50 से अधिक कविताएँ संग्रहीत हैं। इन कविताओं में कवि ने वर्तमान समाज में मौजूद मूल्यहीनता को खुलकर दर्शाया है। 

वर्तमान समाज में किसी तरह का रिश्ता या बंधन नहीं है। न दोस्ती, न प्यार और न ही मानवता। सब स्वार्थी बन गए हैं और सब रिश्ते खोखले हो गए हैं। ‘बच्चों के लिए एक कथा’ नामक कविता में कवि पुराने गाँव, दोस्ती, आपसी प्यार, रिश्ते आदि को याद कर रहे हैं जो आज गुम हो गयी हैं। घर के बरतनों की तरह आपस में लड़ाई-झगड़े, कहा-सुनी होने पर भी किस तरह लोग आपस में खुशियाँ बाँटते थे, किस तरह बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे के घरों में आते-जाते रहते थे जबकि आज के ज़माने में दोस्ती तो क्या अपने पड़ोसियों के बारे में भी लोग अनजान होते हैं। उन्हें सिर्फ अपनी फिक्र होती है और किसी की नहीं। कवि के ही शब्दों में – 
वह कोई सतयुग नहीं था
उनमें भी लड़ाई-झगड़ा, कहा-सुनी होती थी
घरों में बरतन थे
आपस में टकराते थे
लेकिन वो एक दूसरे के दोस्त रहे आते थे
ऐसा भी होता कि वे
बरसों एक दूसरे से मिल नहीं पाते
दुनिया जहान घूमकर जब वे वापस आते
तो एक दूसरे से मिलकर
बच्चों की तरह ही हँसते-ठिलठिलाते थे

याने कि ऐसा प्यार भरा व्यवहार आज सिर्फ बच्चों में ही देख सकते हैं। इसलिए कवि कहते हैं कि ज़माना इतना बदल गया है कि अब ये सब बच्चों को सुनानेवाली कहानी की तरह मात्र बनकर रह गयी है। ‘पल पल के हिसाब वाले इन दिनों’ नामक कविता में भी कवि ने कभी न मिटनेवाले बचपन की यारी को एक बार फिर से जीने की कोशिश की है।

वर्तमान समाज के खान-पान और रहन-सहन में आए बदलाव पर व्यंग्य करते हुए ‘शाकाहारी मांसाहारी’ कविता में रावत जी ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मांस खाते-खाते शाकाहारी मानव आज किस तरह जानवर जैसा व्यवहार करने लगा है। ऐसे लोग चावल, गेहूँ और सब्ज़ियों को हाथ तक नहीं लगाते। चाकू-चम्मच से खाना खानेवाले इनके मन में शिकायतों का अंबार होता है। वे मनुष्य और मनुष्यता को भी कच्चा चबा जाते हैं और हम जैसे लोग सबकुछ चुपचाप सहते रहते हैं। कवि लिखते हैं –
रही मांसाहारियों की बात
तो सबसे पहले सोचे उनके बारे में
जो मनुष्य और मनुष्यता को 
खड़े-खड़े
कच्चा चबा जाते हैं
और दुनिया के मसीहा कहे जाते हैं
हम उन्हें ऐसा करते केवल देखते रहते हैं
और शायद यह सोचकर खुश होते हैं
कि यह कहर हम पर नहीं टूटा
कवि बता रहे हैं कि हमारी बदलती हुई आदतें, हमारे बदलते व्यवहार, खान-पान, रीति-रिवाज़ सबकुछ हमारे नष्ट होते संस्कारों और मूल्यों की ओर इशारा करते हैं। और जो लोग ये समझते हैं वे सबकुछ चुपचाप सहने के लिए बाध्य रह जाते हैं।

आज फैशन का बोलबाला चल रहा है। सबकी, विशेषकर नई पीढ़ी की ज़िंदगी फैशन पर ही टिकी हुई है। रावत जी ‘मनुष्य’ नामक कविता में वर्तमान फैशनबल मानव पर करारा व्यंग्य कस रहे हैं। नाखून छँटवाकर, दाढ़ी बनाकर, इस्तरी के कपड़े पहनकर, पालिश लगाए जूते-चप्पल पहनकर, सज-सँवरकर घूमनेवाले लोग जो अपने आप को मानव बनाने के लिए इतना सबकुछ करते हैं, वे केवल नाममात्र के मानव हैं क्योंकि उनके अंदर मनुष्यता का अंश लेशमात्र भी नहीं है। मुसीबत में पड़े लोगों की सहायता करने को भी वे तैयार नहीं होते हैं। अपने ऐशो-आराम में उनका कायापलट हो जाता है कि अपने मुसीबत वाले दिनों को जब वे कच्चा मनुष्य बनकर जी रहे थे, वह भी वे भूल जाते हैं। 
मनुष्य दिखते भर रहने के लिए हम
करते हैं न जाने क्या-क्या उपाय

इस प्रकार अपनी प्रगति पर, पैसे पर घमंड दिखानेवाले वर्तमान समाज को चेतावनी दे रहे हैं रावत जी ‘बैलगाड़ी’ कविता में। वर्तमान समाज तेज़ रफ्तार से आगे चल रही है और मानव भी स्वार्थ पूर्ति के लिए तेज़ी से आगे दौड़ रहा है। कवि बता रहे हैं कि 
एक दिन अपनी ही चमक-दमक की 
रफ्तार में परेशान सारे के सारे वाहनों के लिए
पृथ्वी पर जगह नहीं रह जाएगी
तब न जाने क्यों लगता है मुझे
अपनी स्वाभाविक गति से चलती हुई
पूरी विनम्रता से 
सभ्यता के सारे पाप ढोती हुई
कहीं न कहीं
एक बैलगाड़ी ज़रूर नज़र आएगी।

यहाँ पर बैलगाड़ी को कवि ने सभ्यता, संस्कृति एवं मूल्यों के प्रतीक के रूप में लिया है। कवि यही संदेश देना चाहते हैं कि मानव ज़िंदगी का मूल आधार हमारी संस्कृति और मूल्य हैं। उससे कटकर हम ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ पाएँगे।

समाज के लिए कुछ किए बिना सिर्फ बातों से अपने आपको बड़ा सिद्ध करने में उद्यत आज की नई पीढ़ी को ‘आत्मस्वीकार की शालीन विनम्रता’ नामक कविता द्वारा कवि अपनी नसीहत देते हैं। वे कहते हैं कि भाषा और शब्दों के प्रयोग से स्थान हासिल करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि भाषा और शब्द के अर्थ कभी भी बदल सकता है और सच्चाई का खुलासा हो सकता है –
शब्द देर तक किसी का लिहाज़ा नहीं करते
अर्थ ही उनमें देर तक बँधा नहीं रहता
कितने दिन अपने आपको
इस तरह छिपाओगे

साथ ही कवि उन्हें जाग उठने की प्रेरणा भी देते हैं और कहते हैं कि
उठो, और कुछ दिन
जीवन के बीहड़ में वास करो
अपने ही निर्जन में कहीं खामोशी से
एक वृक्ष रोपो
और जब तक वह बाहर निकलकर
औरों को छाया देने लायक हो जाए
किसी से कुछ मत बोलो

आगे कवि बताते हैं कि जिस बदबूदार गंदी सीलन भरी गली को तुम पीछे छोड़कर गए थे, उस गली में फिर से एक बार कदम रखने पर तुम्हें अपने अंदर खुद के होने का अहसास शायद हो जाएगा। तभी तुम उनके लिए कुछ कर पाओगे और तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा।

वर्तमान समाज का सबसे बड़ा अभिशाप है बुढ़ापे का अकेलापन। बचपन से लेकर हर एक पल जिस प्यार भरे संपूर्ण परिवार का सपना देखा था, जिन लोगों को अपना मानकर अपने दिल में बसाया था, वो सब एक पल में पराए हो जाते हैं और पकी उम्र में लोग किस प्रकार अकेले हो जाते हैं इसका चित्रण ‘ऐसी कैसी नींद’ कविता में है। कवि लिखते हैं – 
पकी उम्र तक आते-आते  इस जीवन का मर्म जानकर
रिश्तों को पहले से भी ज़्यादा घना-घना होना था
इतना घोर अकेलापन क्या बात हो गयी
कुछ तो था जो बहुत ज़रूरी कहीं खो गया

कवि को समझ नहीं आता कि ऐसा कैसे हो गया। इतना सँभालकर चलने पर भी ज़िंदगी में यह अकेलापन अचानक कैसे आ टपका। वह लिखते हैं कि उनके सामने भाषा भी इतनी अवश हो जाती है कि उनकी खामोशी में जो रोने की आवाज़ है वह किसी तक पहुँच नहीं पा रही है। कवि अंत में पूछ रहे हैं कि  जिस दुनिया को मैंने अपने हाथों से रचा था, उसे कौन चुराकर ले गया है और मुझे ऐसी कैसी नींद लग गई कि उसका पता ही नहीं चला।

वर्तमान समाज को गौर से देखेंगे तो हमें पता चलेगा कि सब कहीं अराजकता और आतंक का माहौल है और हर आदमी अपने ही अंदर सिमटकर रहने को विवश है। दुनिया में अव्वल आने की होड़ में सारी दुनिया से वह अलग रह जाता है । एक ओर तो वह अपनी सुरक्षा के बारे में सोचकर हमेशा आतंकित रहता है तो दूसरी ओर अपनी भागादौडी में वह हँसना-जीना भी भूल जाता है। उसके अंदर का सारा नैतिक बोध और मानवता ही खत्म हो जाता है। इसी को कवि ने ‘इतनी बड़ी मृत्यु’ और ‘सुरक्षित होने के आतंक में’ नामक कविता में लिखा है। 

‘सुनहु पवनसुत रहिन हमारी’ नामक कविता में धर्म के नाम पर होनेवाले पाखंड पर कवि ने व्यंग्य किया है। चारों ओर बनते मंदिर और वहाँ धर्म के नाम पर होनेवाले शोर-शराबों से मानवता का धर्म नष्ट हो रहा है और मनुष्य अपने अंदर सिमटने के लिए मजबूर हो जाता है। ‘कलियुग में जब’ कविता में कवि स्पष्ट रूप से हमें उपदेश दे रहे हैं कि वर्तमान समाज में जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, सब ढोंग है। धर्म के नाम पर, मनुष्यता के नाम पर, सह्मदयता और उदारता के नाम पर हमें छला जा रहा है। ये जो भावुक, सह्मदय, उदार, गुणग्राहक, कलावंत चेहरे हम देख रहे हैं, उनके पीछे या तो कोई जघन्य अपराध छिपा है या फिर हमें ठगने का नया हथियार बनाया जा रहा है। कवि के ही शब्दों में –
दोस्तों, चेहरे पर मूँछें ही सबकुछ नहीं कहतीं
चेहरों पर पुती कुटिल शराफत
और हिंसक विनम्र मुद्रा से ही
पता लगा लेना चाहिए
कि हिटलर अभी मरा नहीं ज़िंदा है
और बाकायदा वापस आ रहा है

कवि सबको इत्तला करना चाहते हैं कि हम सब लोग गहरे संकट से घिरे हुए हैं और वह संकट दिन ब दिन गहराता जा रहा है। वर्तमान परिस्थिति में जहाँ सब कहीं हंगामा मचा हुआ है, शायद ये कविताएँ बहुत ही अर्थपूर्ण सिद्ध होती है।
‘मानो न मानो’ कविता में कवि नई सदी का पर्दाफाश करते हैं। इस सदी की हालत इतनी बिगड़ गई है कि पुरस्कारों के अति के कारण साहित्य और भाषा मनुष्य से बहुत दूर हो चुके हैं, मनुष्यता का आँकड़ा शून्य से भी नीचे उतर गया है। आतंक के हथियार बन चुके धर्म एवं स्वार्थियों की निजी संपत्ति बन चुकी राजनीति आदि पर भी प्रकाश डाला है। कवि कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जबकि बाज़ार में सिर्फ बेचनेवाले बचेंगे और खरीदने के लिए कोई नहीं बचेगा। अर्थात संसार की सारी चीज़ें बिकाऊ बन जाएँगी और नैतिकता का कोई मूल्य नहीं बचेगा। और अंत में कवि का कहना है –
तब जो बेचा या खरीदा नहीं जा सकेगा
वही होगा अर्थवान
जो पड़ा रहा किसी धागे के टुकड़े सा
किसी कोने में चुपचाप
वही उठेगा और दुनिया की फटी चादर
सिलेगा।

रावत जी इस बात को लेकर आश्वस्त होते हैं कि उनका जन्म भारत के मध्यप्रदेश के एक हिंदू परिवार में हुआ। क्योंकि यहाँ पर बोसनिया नहीं है, सोमालिया के भूखे-नंगे बच्चे नहीं है और फ़िलस्तीनियों की तरह हम दर-दर के मारे नहीं है। कवि सोचते हैं – 
मैं मुसलमान नहीं हूँ
इन दिनों खुश होने के लिए 
यह क्या
कोई कम बात है।

धार्मिक अराजकता एवं संघर्षों से भरे वर्तमान सामाजिक वातावरण को ‘इन दिनों’ कविता की ये पंक्तियाँ खूब दर्शा रहा है।
इस प्रकार हम देख सकते है कि ‘ऐसी कैसी नींद’ नामक इस कविता संग्रह में भगवत रावत जी ने सरल और सपाट शैली में वर्तमान सामाजिक परिस्थिति का, मूल्य शोषण का, मानवता के ह्यास का बहुत ही सच्चे और यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया है। साथ ही वर्तमान पीढ़ी को जिंदगी की सच्चाई, जो कि आज नष्ट होती जा रही है, से रूबरू कराने का और उन्हें संस्कृति और मूल्यों की ओर वापस ले जाने का प्रयास भी किया है।
***

डॉ. ज्ञानेश्वरी सी
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, नेहरू आर्ट्स एंड सयन्स कॉलेज, काँजंगाड़, कासरगोड़, केरल-671314

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