काव्य: गीतांजलि राठौड़

गीतांजलि राठौड़
आख़िरी फ़ोन

माँ… मैं अब फोन रखती हूँ
वे आने वाले हैं, अगर तुमसे
बात करते हुए देख लिया तो,
वे हो जायेंगे और ज्यादा नाराज़
लेकिन माँ तुम पिताजी से बात करना 
कि एकबार मुझे घर ले आएँ, इन्हें
बार-बार दहेज़ कहाँ से देते रहेंगे 
 मैं आप दोनों पर बोझ नहीं बनूंगी माँ…!
अच्छा सुनो माँ वह आ गए

शायद नया कुता लायेंगे उसकी
रस्सी साथ लाये हैं!
रखती हूँ माँ, कल फिर बात होगी!

दूसरे दिन अख़बार में ख़बर
नवविवाहिता फाँसी के फंदे से झूली!
***


हमें भी सबसे पहले इंसान ही मानो

न हमें देवी बनाओ 
न ही हमें डायन बताओ
न हमें वस्तु मानो
न ही हमें जुए में हारो
न ही हमें युद्ध में जीतो
न ही उपहार में देओ
हम भी इंसान हैं हमें भी सबसे पहले इंसान ही मानो।
***


सपने

तुम बेशक छीन सकते हो
इक औरत से उसके सपने 
लेकिन … तुम उस से 
सपने देखने का हक़ 
नहीं छीन सकते!
वह रोयेगी, गिड़गिड़ाएगी
एकबार टूट भी जायेगी,
पर फिर खड़ी होगी… 
तुम्हारे सामने अपने 
नये सपने, नये हक़
नई दुनिया लेकर 
पूरी ताक़त से!
तुम बेशक उसे देख सकते हो
उसकी दुनिया में
उसके सपनों में!
***

परिचय: डॉ. गीतांजलि राठौड़
जन्म: 10 जुलाई,1986 (लाडनूं, नागौर (मारवाड़) राजस्थान
शिक्षा: पी. एच्. डी. (बाजारवाद का समाज पर प्रभाव: एक अध्ययन) जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय, लाडनूं, राजस्थान
एम.फिल.: रचनात्मक कार्यक्रम : सिद्धांत एवं व्यवहार (बाबा आमटे एवं आनंद वन के विशेष संदर्भ में), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र।
नेट. जे. आर. एफ.: यू. जी. सी. दिल्ली।
विभिन्न साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में कविता एवं आलेख इत्यादि निरंतर प्रकाशन
सम्पर्क : गाँव: अजीतपुरा, पो. कुदन, जिला: सीकर (राजस्थान)
https://www.facebook.com/Dr.GeetanjaliRathore


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