जीवन के विविध रंगों का विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करती लघुकथाओं का संकलन: समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ

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पुस्तक: समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ  (लघुकथा संग्रह)
सम्पादक: त्रिलोकसिंह ठकुरेला
ISBN: 978.93.85593.89.5
पृष्ठ: 144
मूल्य: ₹ 200.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2016
प्रकाशक: राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर (राजस्थान)


 रेलवे में सीनियर सेक्शन इंजीनियर के पद पर कार्यरत और हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाले, विद्वान साहित्यकार श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने अपनी लेखनी से कई कृतियों का सृजन करके हिन्दी साहित्य में श्रीवृद्धि की है। वहीं उन्होंने समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ (लघुकथा संकलन) का सम्पादन करके यह सिद्ध कर दिया है कि वह पत्रकारिता और सम्पादन कला में भी निपुण हैं।

समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँमें उन्होंने 11 लघुकथाकारों (प्रो. रूपदेवगुण, मुरलीधर वैष्णव, गोविन्द शर्माप्रभात दुबे, रमेश मनोहरा, किशनलाल शर्मा, डॉ. राम कुमार घोटड़, ज्योति जैन, नदीम अहमद नदीम, पंकज शर्मा और वह स्वयं त्रिलोक सिंह ठकुरेला) की उत्कृष्ट 11-11 लघुकथाएँ यानि कुल 121 लघुकथाएँ समाहित की हैं।

दिनेश पाठक ‘शशि’

प्रो. रूपदेवगुण की लघुकथा लक्ष्मी’ उन धनिकों पर व्यंग्य है जो अपनी धन सम्पदा के आगे विद्वानों का भी महत्व नहीं समझते तो लघुकथा आँखों के सामने’, समान अनुशासन की मांग करती है।

मुरलीधर वैष्णव जी की लघुकथा चुग्गा’ में एक ऐसे भाई का चरित्र उद्घाटित किया गया है जो माता-पिता की सम्पत्ति में बहन के हक को मारने के लिए राखी बंधवाने के बहाने बहन से हकनामे पर अंगूठा लगवा लेता है।

वैष्णव जी की ही लघुकथा गांधारी’ उन आधुनिक माँओं के गाल पर तमाचा है जो माँ के कर्त्तव्यों को न निभाकर गांधारी की तरह अपनी आँखों पर पट्टी बांधे रहती हैं और जब दुर्योधन की तरह ही उनकी संतति भी कुमार्गगामी हो जाती है तो फिर पछताती हैं।

गोविन्द शर्मा जी की लघुकथा नया जवाब’ में एक छात्रानेत्रहीन पति मिलने पर क्या करोगी के उत्तर में जो कहती है वह सकारात्मक सोच का अद्भुत उदाहरण कहा जा सकता है। वह कहती है कि मैं अपने पति को अपनी एक आँख दे दूंगी।

रमेश मनोहरा जी की लघुकथा ‘एक जैसे’ पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाती है तो किशनलाल शर्मा जी की वारिस और स्वार्थी रिश्तेदोनों लघुकथाएँ मनुष्य की स्वार्थपरता की ओर इशारा कर रही हैं।

कुछ सामाजिक दुर्बलताओं और सर्वहारा वर्ग की चारित्रिक श्रेष्ठता को रामकुमार घोटड़ की लघुकथा ‘कुत्तापना’ बहुत ही सहज तरीके से अभिव्यक्त कर रही है।

सोशल मीडिया ने जहाँ मनुष्य की बहुत सारी जरूरतों की पूर्ति की है वहीं उसने सामाजिक विकृतियाँ भी उत्पन्न की हैं। सुश्री ज्योति जैन की लघुकथा चैटिंग’ बहुत ही सुन्दर तरीके से इस बात की पुष्टि करती नजर आती है।

चाटुकार इतिहासकारों ने देश पर बलिदान होने वाले शहीदों के नामों का उल्लेख इतिहास में करना उचित नहीं समझा फलस्वरूप आम जनता के बीच उनके नाम को पहचानने वालों की गिनती भी न के बराबर है। इसी ओर इशारा करती नदीम अहमद नदीम की लघुकथा है ये कौन थे?’

किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं किन्तु आपसी मतभेद नहीं होना चाहिए इसी बात को बहुत ही सुन्दर रूप में स्पष्ट करती एक उत्कृष्ट लघुकथा है संकलन के सम्पादक त्रिलोकसिंह ठकुरेला जी की आस्था’, तो इन्हीं की एक और उत्कृष्ट लघुकथा इस संकलन में है जो माँ के महत्व को प्रतिपादित करती है और बताती है कि जहाँ माँ का सम्मान नहीं वहाँ ईश्वर भी निवास नहीं करता। वह लघुकथा है अंतर्ध्यान

भ्रष्टाचारी व्यक्ति कितना भी छुपकर काम करे पर उसकी अन्तरात्मा सब जानती है और उसे धिक्कारती भी है। पंकज शर्मा जी की लघुकथा ‘थप्पड़’ बहुत कम शब्दों में भ्रष्टाचारी के थप्पड़ मारती नजर आती है।

कुल मिलाकर लघुकथा संकलन समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ की अधिकांश लघुकथाएँ अपनी मार्मिकता से पाठक के हृदय पर अपना प्रभाव छोड़ने में पूर्ण सक्षम हैं तथा उसे चिंतन करने पर विवश करती प्रतीत होती हैं। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लघुकथा के सभी मापदण्डों का पालन करते हुए सकारात्मक सोच की उत्कृष्ट लघुकथाओं का संकलन है समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ । मुद्रण त्रुटिहीन एवं साफ-सुथरा और आकर्षक है पूरी पुस्तक में संपादक त्रिलोकसिंह ठकुरेला का श्रम स्पष्ट परिलक्षित होता है।


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