असगर वजाहत के नाटक ‘ईश्वर-अल्लाह’ के संदर्भ में ‘धर्म और शिक्षा’

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत


कोई भी साहित्यकार अपने समय की परिस्थितियों से अपना रूपाकार पाता है,किंतु उसका लेखन उस समय का उसके द्वारा देखा गया प्रतिबिंब मात्र नहीं होता। वह उसके समय और परिस्थितियों की व्याख्या करता है। एक साधारण मनुष्य समाज में जो देखता है सिर्फ उसको ही सच मानकर उसकी व्याख्या करता है, किंतु एक साहित्यकार समाज में जो भी देखता है उसके पीछे छिपे हुये बिंबों और परिस्थितियों को समझकर उसकी व्याख्या करता है। यही एक साधारण मनुष्य और साहित्यकार में अंतर होता है। ठीक इसी तरह असगर वजाहत ने भी आधुनिक समाज में पनप रही परिस्थितियों और विषमताओं को सूक्ष्मता से जानकर उनकी व्याख्या अपने साहित्य के द्वारा की है। असग़र वजाहत बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार हैं। अपने लिए जिस भी विधा को उन्होंने अपने लिए चुना वहाँ हमेशा पहले दर्जे की रचना संभव हुई। असग़र वजाहत एक सफल नाटककार, कहानीकार उपन्यासकार, आलोचक, पत्रकार और निर्देशक हैं। असग़र वजाहत ने साहित्यिक धरातल और साहित्येतर धरातल पर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

असगर वजाहत का नाटक ‘ईश्वर-अल्लाह’ 19वीं सदी के प्रख्यात सूफी हज़रत ग़ौस अली शाह क़लन्दर के जीवन से प्रेरित होकर लिखा गया है। सूफी परम्पराओं में एक परम्परा प्रचलित थी जिसको ‘तज़किरा’ कहा जाता है। इस परंपरा के अंतर्गत सूफी अपने जीवन के अनके पहलुओं जैसे- परिवार का इतिहास और वंशावली (शजरा), शिक्षा-दीक्षा, गुरु-परम्परा, अपनी मान्यताएँ और जीवन में घटित घटनाएँ और अपने अनुभवों का बख़ान अपने शिष्यों (शागिर्दों) के बीच बैठकर किया करते थे। शिष्य उनकी बताई गयी बातों और जानकारियों आदि को लिख लिया करते थे। यह एक संग्रह का रूप ले लेता था जिसको बाद में प्रायः प्रकाशित किया जाता था। इसी तरह सूफी हज़रत ग़ौस अली शाह क़लन्दर क़ादरी पर आधारित एक संकलन उनके शिष्य मौलाना गुल हसन शाह क़ादरी ने संग्रहीत किया है। इस संग्रह को ख़ज़ान-ए-इल्मो-अदब, अल्करीम मार्केट, उर्दू बाज़ार, लाहौर ने सन् 2000 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था। यह नाटक ‘ईश्वर अल्लाह’, ‘तज़किर-ए-ग़ौसिया’ से प्रेरित ज़रूर है लेकिन इस नाटक में कुछ प्रसंग ऐसे भी सम्मिलित हैं जिनको दूसरे सूफी-संतों के जीवन से जोड़ा जाता है। इसीलिए इस नाटक में मुख्य पात्र का नाम काल्पनिक है और दूसरे ऐतिहासिक पात्रों के नाम भी बदल दिये गये हैं। इस नाटक के प्रमुख पात्र सूफ़ी बरक़तउल्ला ‘सूफ़ी’, अलीमुल्लाह, अहमद, पंडित गनेशी राम पाण्डे, पंडिताइन, सावित्री, शहर काज़ी, महंत श्रीनाथ महाराज, घाट का पण्डा आदि हैं। यह नाटक भले ही सूफ़ी के ‘तज़किरा’ की पृष्टभूमि पर आधारित हो लेकिन यह वर्तमान समय के समाज के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक परिवेश को उद्घाटित करने वाला प्रासंगिक नाटक है।

मनुष्य, समाज, शिक्षा और धर्म ये सब संसार के ऐसे तत्व हैं जो अनंत काल से एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं। ये सभी जानते है कि समाज का निर्माण मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और स्वयं की सुरक्षा के लिए किया था । लेकिन मनुष्य की शिक्षा का प्रारम्भ उससे भी कई सदी पहले हो गया था। इसका उदाहरण है पाषाण काल की गुफाओं में मिली कलाकृतियाँ जो इस ओर इशारा करती है कि मनुष्य कलाकृतियों के द्वारा अपनी भावनाओं को प्रकट करता था। अब अगर बात करे धर्म की तो मनुष्य ने समाज के गठन के बाद कुछ परम्पराएँ और रीति-रिवाज बनाए जो बाद में धर्म के रूप में स्थापित हो गए। लेकिन इन परम्पराओं और रीति-रिवाजों से पूर्व मनुष्य प्रकृति का उपासक था। प्रकृति के सभी तत्वों की उपासना करता था। संसार के सभी धर्मों की शिक्षा और सिद्धांत का आधारशिला मानवता और मानव-कल्याण रहा है। हर धर्म के प्रवर्तकों ने संसार को मनुष्यता, शांति, प्रेम, सोहार्द आदि का पाठ पढ़ाया। "धर्म वस्तुतः जीने का एक तरीका है। वह विश्वासों से अधिक जीने की प्रक्रिया पर आधारित है।"  किन्तु जब से समाज में सत्ता जैसे संस्था समाज में स्थापित हुई, तब से धर्म और उसकी शिक्षा और सिद्धांतों में बदलाव आने लगा। क्योंकि सत्ता ने मनुष्य को मनुष्य से राजनीति करना सीखा दिया था। जिसका असर समाज के सामाजिक और धार्मिक ढाँचे पर सबसे अधिक पड़ा। इस सत्ता के कारण समाज में वर्ण-व्यवस्था और वर्ग-व्यवस्था ने जन्म लिया। इन व्यवस्थाओं ने समाज को कई हिस्सों में बाँट दिया। पहले जो धार्मिक शिक्षाएँ मानवता, प्रेम, समानता का पाठ पढ़ाती थी, उन्हीं शिक्षाओं का रूप सत्ता और राजनीति के कारण परिवर्तित हो गया। इस परिवर्तन ने धर्मांधों को तो बहुत लाभ पहुँचाया, किंतु आम जनमानस का जीवन नरकीय हो गया। वर्तमान समय में परिवर्तित हुई शिक्षाओं का असर समाज पर इतना गहरा हुआ है कि समाज विघटन, सांप्रदायिकता, द्वेष, घृणा जैसे अवगुणों की भट्टी में जलकर राख होने के द्वार पर खड़ा है। असगर वजाहत ने इन सभी परिस्थितियों और विषमताओं गहन विश्लेषण कर के ‘ईश्वर अल्लाह’ नाटक की पृस्ठभूमि तैयार की है। नाटककार ने नाटक के संवादों के द्वारा समाज को एक नई दिशा प्रदान की है और विचार करने पर विवश कर दिया है।  

"अलीमुल्लाह: बेटा कहो बिस्मिल्लाहे रहमाने रहीम 
बरक़तउल्ला: बिस्मिल्लाहे रहमाने रहीम इसका क्या मतलब हुआ अब्बाजान
अलीमुल्लाह: बेटा इसका मतलब हुआ शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से जो रहम और करम करने वाला है।
बरक़तउल्ला: रहम का क्या मतलब हुआ अब्बाजान?
अलीमुल्लाह: रहम मतलब दयालु, दया करने वाला, लोगों पर दया करने वाला सब पर दया करने वाला अच्छा अब क़लम हाथ में पकड़ो और लिखो अल्लाह। 
अलीमुल्लाह: वाह! बहुत अच्छा लिखा है तुमने अलिफ़ से अल्लाह।
बरक़तउल्ला: अल्लाह का क्या मतलब है अब्बा?
अलीमुल्लाह: बेटा जिसने हम सबको बनाया है जो सब पर रहम करता है। जो सबका पालनहार है। जो न तो दिखाई देता है और न उसे छू सकते हैं। वो जो चाहे वह कर सकता है। 

गनेशी: (आवाज़ देते हैं) दया राम, दया राम इधर आओ। 
गनेशी: आज तुम्हारा विद्यारंभ संस्कार होगा। अपना हाथ इधर लाओ।  
(गनेशी दया राम के हाथ में कल़म दे कर कहते हैं।)
गनेशी: पाटी पर ॐ लिखो बेटा दया राम।
(गनेशी दया राम का हाथ पकड़ कर पाटी पर ॐ लिखवाते हैं।)
बरक़तउल्ला: ॐ का क्या मतलब है पिताजी?
गनेशी: बेटा जिसने हम सबको बनाया है जो सब पर कृपा करता है। जो सबका पालनहार है। जो न तो दिखाई देता है और न उसे छू सकते हैं वो जो चाहे वह कर सकता है।” 

इस संवाद के द्वारा हम देख सकते है कि दोनों धर्मों में एक जैसी ही शिक्षा विद्यमान है। दोनों ही धर्म एक ही निराकार ब्रह्म और अल्लाह की उपासना करने के लिए मनुष्य को संदेश देते हैं। ब्रह्म और अल्लाह नाम भले अलग-अलग हैं लेकिन संदेश एक ही है। "धर्म वह है जिसके आधार पर मनुष्य अधिक से अधिक लोकोपकार कर सके। धर्म वह है जिससे हृदय और मस्तिष्क का पूरा विकास हो। दया धर्म है, प्रेम धर्म है, सहनशीलता धर्म है, उदारता धर्म है, उत्साह धर्म है, त्याग धर्म है।"  लेकिन आज हमारे समाज में भगवान और अल्लाह के नाम पर इतना द्वेष, घृणा और आक्रोश उत्पन्न हो चुका है कि भगवान और अल्लाह जैसे पवित्र नामों को लोगों ने हिंसा का प्रतीक बना दिया है। इस बात को समझने के लिए नाटक के पात्र बरकतुल्लाह का यह कथन देखिये – 
"बरकतुल्लाह: कु़रान शरीफ में उसे नूरन अल नूर मतलब रौशनियों की रौशनी कहा गया है। गीता में उसे ज्योतिषामपितज्ज्योति मतलब रौशनियों की रौशनी कहा गया। कु़रान और गीता दोनों ही कहते हैं कि वह लोगों को अंधेरे से रौशनी की तरफ लाता है। क्यों न लायेगा, क्योंकि वही सत्य है, वही अल्लाहावल हक़को - यानी सत्य है। और ये भी है कि सारा जगत् उससे घिरा हुआ है। ये गीता भी मानती है और कु़रान शरीफ भी कहता है-इन्नहू-बेकुल्ले शै इम्मुहीत।" 

इस संवाद से यह बात सामने आती है कि हर धर्म ग्रंथ का उपदेश और संदेश एक ही होता है। सारे धर्म और धर्मग्रंथ एक परमेश्वर की ओर इशारा करते हैं। लेकिन कपटी और स्वार्थी मनुष्य ने अपने स्वार्थ और राजनीति के लिए समाज में धर्मग्रन्थों की गलत व्याख्याएँ करके समाज को विभाजित कर दिया है। ये व्याख्याएँ इतनी ज्वलनशील होती हैं कि सारा समाज ज्वलनशील हुआ जा रहा है। यह कपट और छल आज का नहीं है, बल्कि सदियों से चलता चला आ रहा है। इस कपट और छल ने समाज को अंध विश्वासी बना दिया। "अंधविश्वास धर्म की जान है, उस धर्म की जो भित्ति पर है और जिसे आज लोग धर्म मानते है।"  

असगर वजाहत ने अपने इस नाटक में कुरान और गीता के माध्यम से इस कपट और छल को बेनकाब किया है। लेकिन दुर्भाग्य आज हमारे धर्मों का स्वरूप बदल चुका है। आज धर्मों में पाखंडों, आडंबरों, रूढ़ियों और कुरुतियों का समावेश हो चुका है। मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए धर्मों को गढ़ दिया है। मनुष्य ने मनुष्य को गढ़े हुए धर्मों के आधार पर एक-दूसरे के सामने शत्रु की भांति खड़ा कर दिया है। "धर्म सामाजिक – सांस्कृतिक नियमों, व्यवस्थाओं एवं परंपराओं का निर्माता है अतः इनमें किसी विकृति के आने पर दोनों इनके निराकरण के लिए धर्म का आश्रय लेते हैं।"

आज धर्म के नाम पर धर्म के अस्तित्व और धर्म की सुरक्षा के नाम पर मनुष्य मनुष्य का खून बहाने के लिए तैयार खड़ा है। गढ़े हुए धर्म के पंजों ने समाज की आँखें फोड़ दी है जिसके कारण अब समाज धर्म में निहित मानवता के सिद्धांत को नहीं देख पा रहा है। इसी प्रवृत्ति का चित्रण करते हुए असगर वजाहत ने धर्म और उसकी शिक्षाओं के महत्व को समाज को समझने का प्रयास ‘ईश्वर-अल्लाह’ नाटक के द्वारा किया है। यह नाटक समकालीन समाज के लिए एक मशाल की भांति काम करेगा जो समाज को अधर्म, पाखंड और अंधविश्वास के अंधकार से निकाल कर लाएगा।   

संदर्भ
[1] हिन्दू धर्म जीवन में सनातन की खोज- विद्यानिवास मिश्र, पृ-19 
[2] ईश्वर अल्लाह- असगर वजाहत, पृ-16,17
[3] धर्म के नाम पर- चतुरसेन शास्त्री, पृ-14,15  
[4] ईश्वर अल्लाह- असगर वजाहत, पृ-18
[5] धर्म के नाम पर- चतुरसेन शास्त्री, पृ- 26
[6] भारतेन्दु एवं बंकिमचंद्र- रूपा गुप्ता, पृ- 127

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