आनंदप्रकाश जैन, जिन्होंने हिंदी बाल साहित्य को आधुनिक बनाया: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
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आनंदप्रकाश जैन सही मायनों में आधुनिक बाल साहित्य के युगांतकारी लेखक और संपादक हैं। हिंदी में बाल साहित्य तो बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही लिखा जा रहा था और कुछ आगे चलते ही उसने खूब रफ्तार पकड़ी। हिंदी के बड़े से बड़े दिग्गजों की कलम का स्पर्श उसे मिला, गुणी संपादकों की सदाशयता का प्रसाद भी। पर अब भी उसे पुरानी लीक वाली उपदेशात्मकता, गुजरे जमाने के झूठे आदर्शों के बोझ और घिसे-पिटे कलेवर से मुक्त होना था, ताकि वह बच्चों के और नजदीक आ सके और उन्हें आनंदित करे। बच्चे अपने लिए लिखी गई रचनाओं का किसी मजेदार खेल-खिलौने की तरह मजा लें, और खेल-खेल में ही बहुत कुछ सीखें। आगे चलकर रूढ़ियों से मुक्त, उदार और सहृदय इनसान बनें।
मगर सदियों पुरानी लोककथाओं के जमाने से बनी हुई कथारूढ़ियों को हिलाना आसान नहीं था। इसके लिए किसी बहुत बड़े कद के जिद्दी और दृढ़संकल्पशील नायक की जरूरत थी। युग किसी आनंदप्रकाश जैन की प्रतीक्षा कर रहा था, लेकिन वे अभी नए अंदाज में लिखी गई अपनी रोमांचक ऐतिहासिक कथाओं से हिंदी जगत में हलचल मचाने में लगे थे। छठे दशक में उन्हें ‘पराग’ के संपादन का अवसर मिला, तो हिंदी बाल साहित्य में यह समय एक मानी में ऐतिहासिक समय बन गया। आनंद जी अब पूरी एकाग्रता से बाल साहित्य की ओर मुड़े और ‘पराग’ को उन्होंने रोचकता और नटखटपन से भरा वह चुस्त कलेवर दिया कि उसे बेहिचक हिंदी में बच्चों की पहली आधुनिक पत्रिका कहा जा सकता है।

आनंदप्रकाश जैन
‘पराग’ हिंदी में बाल साहित्य की ऐसी पहली पत्रिका थी, जिसे बच्चों की दोस्त पत्रिका कहा जा सकता है। उसमें लेखक किसी ऊँचे सिंहासन पर बैठकर बच्चों को उपदेश की डोज नहीं पिलाते थे। बल्कि उसमें छपने वाली कहानियाँ ऐसी थीं, जो मानो बच्चों के साथ खेल-खेल में लिखी जाती थीं, और उनमें बच्चों की ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

कहना न होगा कि छठे दशक में ‘पराग’ के इस रूप के साथ ही हिंदी बाल साहित्य का कल्पांतर शुरू हुआ, और बहुत जल्दी ही वह परिवर्तन नजर आने लगा, जिसे शायद कई दशकों की दरकार थी। पर आनंद जी की असाधारण सृजनात्मक ऊर्जा और उत्साह ने उसे कुछ ही वर्षों में संभव कर दिखाया और इसका असर पूरे बाल साहित्य पर नजर आने लगा। बच्चे अब बेचारे नहीं रहे कि उन पर अपनी मनमर्जी से कोई भी कुछ भी लादता रहे, बल्कि यह बात सबको समझ में आने लगी कि बच्चों के मन, हालात और उनके समय से जुड़ी कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास, नाटक, जीवनियाँ, संस्मरण और विज्ञान फंतासी कथाएँ ही सच में बाल साहित्य हैं। जिस बाल सहित्य में बच्चों की जीवंत भागेदारी न हो, उसे बाल साहित्य कहना तो असल में बच्चों के साथ एक भौंडा मजाक है।

बाल साहित्य की धारणा और कलेवर में यह एक ऐतिहासिक बदलाव था। बाल साहित्य अब सही मायनों में आधुनिक हुआ था, और इसके सूत्रधार थे आनंदप्रकाश जैन। वे सिर्फ ‘पराग’ के संपादक ही नहीं थे, बल्कि ‘पराग’ का संपादन करते हुए जिन्होंने सिखाया कि किसी बाल पत्रिका का संपादन असल में होता कैसे है। जो अब तक नहीं हुआ था, वह उन्होंने किया, खूब जोश-खरोश से किया, और सच में हिंदी बाल साहित्य में एक युगांतर लाकर दिखा दिया। आज बच्चों का जो साहित्य हम लिखते-पढ़ते हैं, उसके सच्चे सार्थवाह आनंद जी ही थे, जिनके लिए आज भी कृतज्ञता से हमारा सिर झुक जाता है। उन्होंने सन् साठ में जो देख लिया था, उसे हम इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में कहीं अधिक अच्छी तरह से महसूस कर रहे हैं। शायद हर भगीरथ आने वाले समय के लिए ही इतनी विकट तपस्या करता है, और एक असंभव सी लगती जिद पूरी कर दिखाता है।

पुत्रियों मंजु व रश्मि सहित श्री जैन और वृंदावनलाल वर्मा झांसी किले पर

आनंद जी का मानना था कि बाल साहित्य को बदलते वक्त के अनुसार खुद को ढालना चाहिए। साथ ही उसमें युग के अनुरूप नए विचार और चेतना भी आनी चाहिए। नए जमाने का नया यथार्थ आना चाहिए। हालाँकि आधुनिक चेतना के साथ ही वे इस बात के भी हामी थे कि बच्चों को पुराने इतिहास की रोचक जानकारी देने वाली ऐतिहासिक कहानियाँ और नाटक भी लिखे जाएँ, जिससे बाल पाठकों के भीतर वीरता, साहस और कुछ बनने की प्रेरणा उत्पन्न हो। इसी तरह वे बाल साहित्य में यथार्थ के साथ-साथ कल्पना और फंतासी से जुड़ी रचनाओं के भी हामी थे। हाँ, उनका मानना था कि बच्चों के लिए ऐसी रचनाएँ लिखी जानी चाहिए, जो उन्हें अंधविश्वासों से बचाएँ और प्रगति की राह पर ले जाएँ।

इसके साथ ही आनंदप्रकाश जैन किशोर साहित्य के भी जबरदस्त पक्षधर थे। वे इस बात से दुखी थे कि बाल साहित्य में छोटे बच्चों के अनुरूप रचनाएँ तो मिल जाती हैं, पर हिंदी में किशोर साहित्य के बारे में कोई सोच ही नहीं रहा। बाद के वर्षों में उन्होंने ‘पराग’ को किशोर पत्रिका का रूप देने की कोशिश की। हालाँकि ‘पराग’ का यह रूप लोकप्रिय नहीं हो सका। आनंद जी दृढ़ विचारों के व्यक्ति थे और इस जिद पर अड़े थे कि ‘पराग’ पत्रिका का यह किशोरोपयोगी रूप ही चलता रहना चाहिए। अंततः उन्हें ‘पराग’ की संपादकी छोड़नी पड़ी, जबकि वे ‘पराग’ के सबसे सफल संपादक थे जिनके नाम का सिक्का चलता था। पर जब विचारों की बात आई तो उन्होंने जरा भी झुकना मंजूर नहीं किया। इससे उनके व्यक्तित्व की निर्भयता और दृढ़ता का पता चलता है।

चंद्रगुप्त विद्यालंकार, मोहन राकेश और धर्मवीर भारती के साथ आनंद्प्रकाश जैन


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केवल साहित्य ही नहीं, अपने निजी जीवन में भी आनंद जी दुस्साहसी थे और आगे बढ़कर उन्होंने बहुत सी रूढ़ियों को तोड़ा। एक बड़े जमींदार के बेटे होने पर भी उन्होंने तय किया कि वे अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जिएँगे, भले ही उन्हें कितने ही खतरे क्यों न उठाने पड़ें। पढ़ने की गहरी तड़प मन में थी, और जहाँ से जो कुछ मिला, वे पढ़ डालते। बहुत जल्दी उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। सिर्फ लिखा ही नहीं, बचपन में ही तय कर लिया कि बड़े होकर वे लेखक बनेंगे। एक लेखक की जिंदगी जिएँगे, और लेखक भी ऐसा-वैसा नहीं, खासा विद्रोही लेखक। रूढ़ियों पर जमकर प्रहार करने वाला, समाज को नई दिशा देने वाला।

हाईस्कूल पास करते-करते स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने का पक्का निश्चय कर लिया। आततायी अंग्रेजों का मुकाबला करना था, सो कहीं से एक कट्टे का इंतजाम कर लिया। साथ ही क्रांति और देशभक्ति से भरी रचनाएँ लिखते। बहुत सा क्रांतिकारी साहित्य पढ़ा भी। शाहपुर में पिता की विशाल आलीशान हवेली छोड़कर, शहर में एक छोटा सा कमरा किराए पर लेकर रहते। वहीं क्रांति की योजनाएँ मन में पकतीं, ताकि अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़कर भारत को आजाद किया जा सके। पुलिस ने कहीं से इस किशोर क्रांतिकारी की टोह लगा ली और पकड़कर ले गई। उस समय का लिखा हुआ बहुत सा साहित्य जब्त कर लिया गया, जो फिर कभी वापस नहीं मिल सका। पर जो कुछ उनके भीतर मचल रहा था और आगे चलकर आनंदप्रकाश जैन को हिंदी का एक बड़ा और शिखर साहित्यकार बनाने वाला था, उस तड़प, उस बेचैन प्रतिभा को भला कौन चुरा सकता था? दो साल की जेल की सजा सुनाई गई, पर वहाँ भी अवसर पाते ही लिखा। लिखना केवल लिखना नहीं था, उस किशोर अवस्था में ही लिखना उनका जुनून बन चुका था।

जेल से बाहर आने के बाद जिंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी डगर और जीवन की कठोर सच्चाइयाँ सामने थीं। और आनंद जी रास्ता पाने के लिए मचल रहे थे। कुछ समय बाद अपनी पसंद से उन्होंने विवाह किया और जिंदगी की अलग डगर शुरू की तो एक काँटों भरी जिंदगी सामने थी। एक लेखक की जिंदगी। ऐसा लेखक जिसने अपने विद्रोही तेवरों से परिवार की सारी सुख-सुविधाओं और दौलत को ठुकरा दिया था और जान-बूझकर अर्थाभाव और अभावों भरी जिंदगी को मोल लिया था। विवाह होने पर उन्होंने और भी तेजी से दीवानावार लिखना शुरू कर दिया। जितनी बड़ी पारिवारिक मुसीबतें, उतनी ही तेजी से टाइपराइटर पर उँगलियाँ नाचतीं। जैसे मन ही मन उन्होंने तय कर लिया हो कि वे एक लेखक हैं तो बस, लिख-लिखकर ही पारिवारिक जरूरतों और हर आने वाले संकट का सामना करेंगे। उन्होंने उपन्यास की शक्ल में विज्ञान फंतासी कथाएँ लिखीं। एक नहीं, पूरी सीरीज। हर उपन्यास के मुश्किल से दस-बीस रुपए मिलते, पर क्या परवाह? एक उपन्यास पूरा होता तो वे फौरन अगला लिखना शुरू कर देते। उनके भीतर यथार्थ और कल्पना के सहमेल से निर्मित ऐसी अंतहीन सृजनात्मक ऊर्जा थी, कि जितना-जितना वे लिखते, उतना-उतना ही लिखने की ललक बढ़ती जाती थी। जीवन की खुरदरी सच्चाइयाँ सामने थीं, गृहस्थी की रोजमर्रा की जरूरतें खुद में कम न थीं, पर लेखन का रोमांच इससे भला कम कैसे हो जाता!

एक ओर पति-पत्नी का अलबेला प्रेम और सिर पर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ, दूसरी ओर आनंद जी का निरंतर लिखना। पत्नी चंद्रकांता ने घर की सारी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ-साथ आर्थिक मुश्किलों को सुलझाने में हाथ बँटाने का फैसला किया। तो अब जिस पुरानी-धुरानी मेज पर पड़ा आनंद जी का टाइपराइटर उनकी कल्पनापूर्ण उँगलियों की थाप से जाने कहाँ-कहाँ की थाह ले रहा था, वहीं बगल में रद्दी अखबारों और लेई भी रखी जाने लगी। चंद्रकांता जी उसी गति से लिफाफे बनाने में लीन हो जातीं, ताकि उन्हें बेचकर थोड़ा-बहुत गुजारा हो सके। इससे आनंद जी के सिर पर से गृहस्थी का बोझ थोड़ा हलका हुआ, और उन्हें शब्दों के आकाश में उड़ान भरने के लिए कहीं अधिक मुक्त पंख मिल गए।

उस समय आनंद जी की कहानियाँ ‘सरिता’ में निरंतर छपती थीं। उसी दौर में लिखी गई उनकी बहुचर्चित कहानी लिखी, ‘भैंस’। इसमें हिंदू-मुसलिम सौहार्द के बहुत बारीक रेशे थे, जिन्हें आनंद जी ने बचपन से ही बहुत करीब से देखा था। एक कद्दावर पठान, एक गँवई ठाट वाला जाट चौधरी, पर इनसानियत के कोमल रेशों ने उन्हें भावनात्मक रूप से बहुत करीब ला दिया था। इसमें पठान की नन्ही सी अल्हड़ बच्ची शौकत की भी बड़ी भूमिका है, जो कहानी के केंद्र में है और जिसका गजब का चरित्रांकन आनंद जी ने किया है। उस समय ‘सरिता’ पत्रिका में आनंद जी की रचनाएँ न सिर्फ सम्मानपूर्वक छपती थीं, बल्कि विश्वनाथ जी का संपादकीय विभाग को निर्देश था कि आनंद जी की कहनियाँ जब छपें तो उन पर लाल कलम न लगाई जाए। ‘भैंस’ कहानी भी ‘सरिता’ में प्रकाशनार्थ भेजी गई, पर संपादक के खेदसहित वहाँ से वापस लौट आई। इस पर आनंद जी को थोड़ा अफसोस हुआ, क्योंकि ‘सरिता’ पत्रिका अग्रिम पारिश्रमिक देती थी, जिससे घर का थोड़ा खर्च चल जाता था।

कुछ समय बाद उन्होंने ‘भैंस’ कहानी को ‘धर्मयुग’ में भेज दिया। उस समय इलाचंद्र जोशी ‘धर्मयुग’ के संपादक थे। उस समय ‘धर्मयुग’ में एक कहानी प्रतियोगिता चल रही थी। आनंद जी के पास इलाचंद्र जोशी का पत्र आया, “अगर आप कहें तो इस कहानी को ‘धर्मयुग’ की कहानी प्रतियोगिता में शामिल कर लें।” आनंद जी ने इसके लिए प्रसन्नता से स्वीकृति दे दी। मन में थोड़ी उम्मीद जागी, कुछ और नहीं तो शायद तीसरा पुरस्कार तो मिल ही जाएगा। शायद कुछ दिन गृहस्थी ठीक से चल जाए। पर कुछ समय बाद जो परिणाम आया, वह चौंकाने वाला था। कड़ी धूप और लूओं में सुखद हवा के झोंके की तरह! ‘भैंस’ कहानी को ‘धर्मयुग’ कहानी प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला था। इस प्रतियोगिता के लिए हिंदी के एक से एक दिग्गज साहित्यिकों ने कहानियाँ भेजी थीं, पर एक नए उभरते हुए कथाकार ने अपनी सृजनात्मक आब से सबको पीछे छोड़ दिया था।

कहना न होगा कि इसी सृजनात्मक प्रतिभा ने आनंद जी को ‘पराग’ के संपादक की कुर्सी तक पहुँचा दिया। वे केवल हाईस्कूल पास थे। आजादी की लड़ाई में जेल और बहुत सी अन्य बाधाओं के कारण उनकी आगे की पढ़ाई छूट ही गई। पर वे इतनी बड़ी प्रतिभा के धनी थे कि ऐसी कोई चीज उनके लिए रुकावट बन ही नहीं सकती थी। एक विचित्र बात यह भी थी कि आनंद जी उस समय बड़ों के लेखक माने जाते थे। खासकर उनके ऐतिहासिक कहानी-उपन्यासों की धूम थी, और इस क्षेत्र में उनका नाम वृंदावनलाल वर्मा के बाद लिया जाने लगा था। पर बच्चों के लिए तो अब तक उन्होंने कुछ विशेष लिखा नहीं था। इसलिए बहुतों को हैरानी हुई कि आनंद जी भला ‘पराग’ का संपादन कैसे कर पाएँगे?

पर चुनौतियों को स्वीकार करना आनंदप्रकाश जैन को आता था। लिहाजा इन सारी आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए, कुछ अरसे बाद ही ‘पराग’ पत्रिका को उन्होंने नए जमाने के बाल साहित्य की सबसे प्रमुख और प्रतिनिधि पत्रिका के रूप में ढाल दिया, बच्चे जिसे पढ़ने के लिए दीवाने थे। इतना ही नहीं, आनंद जी जल्दी ही अपनी नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा के साथ हिंदी बाल साहित्य के बड़े लेखक और दिग्दर्शक के रूप में भी उभरकर सामने आए, जिन्हें हिंदी बाल साहित्य को एक ऐतिहासिक मोड़ देना था।


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आनंदप्रकाश जैन जितने बड़े संपादक थे, उतने ही बड़े और सचेत रचनाकार भी। उन्होंने बाल साहित्य की प्रायः हर विधा में लिखा और हर जगह अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ी। खासकर बच्चों के लिए लिखी गई उनकी कहानियों में यथार्थ जीवन के ही अक्स अलग-अलग रूपों में आते हैं। वे बच्चों के आसपास के परिवेश से ही कहानी उठाते हैं और उनमें बाल मन व उनकी चंचल वृत्तियों की ऐसी स्वाभाविक छाप नजर आती है कि बच्चे उनकी कहानियाँ ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं।

इस लिहाज से ‘बाल भारती’ के अगस्त 1950 अंक में छपी ‘चाट’ आनंद जी की दिलचस्प बाल कहानी है। इस कहानी के केंद्र में एक बच्चा राजा बाबू है, जिसे घर से जेबखर्च के रूप में रोज इकन्नी मिलती है, मगर उसे तरह-तरह की चीजें खाने का शौक है। एक इकन्नी में भला वह सब कैसे आ जाता जो वह खाना चाहता था? स्कूल जाते समय रास्ते में रोजाना वह एक चाट वाले के खोमचे की ओर ललचाई नजरों से देखा करता था। एक दिन चाट वाले ने एक पत्ता चाट लगाकर उसे दे दिया और कहा, “पैसे बाद में दे देना।” अब तो राजा बाबू को रोज-रोज चाट खाने की आदत पड़ गई। चाट वाले ने पैसे माँगे तो उसने उधर से जाना ही छोड़ दिया।

पर एक दिन राजा बाबू स्कूल से घर पहुँचा तो उसने देखा कि चाट वाला भी वहाँ खड़ा है। उसकी शक्ल देखकर वह उलटे पैरों वापस दौड़ा। भूख तो लगी ही थी। रास्ते में कहीं गरम पूरियाँ सिक रही थीं, कहीं बढ़िया केले नजर आए। पर उसके पास जो पैसे थे, वे तो खर्च हो चुके थे। तो अब वह क्या करे? उसे ध्यान आया कि स्कूल की बगिया में अमरूद के कई पेड़ हैं। वह झट स्कूल पहुँचा और अमरूद के पेड़ पर चढ़कर खूब अमरूद खाए। कच्चे अमरूद, ऊपर से ढेर सारा पानी उसने पी लिया। पेट में जोर का दर्द उठा। घर जाते हुए रास्ते में कहीं बैठा और बेहोश हो गया। पता नहीं किसने उसे घर पहुँचाया। पर होश में आने पर राजा बाबू ने देखा कि वह घर पर अपनी चारपाई पर लेटा है और माँ पूछ रही है, “अब कैसा जी है राजा बेटा?” इस पर राजा बाबू की आँखों से आँसू चू पड़े। शायद अपनी गलती उसे समझ में आ गई थी।

यह आनंद जी के एकदम शुरुआती दौर की कहानी है। एकदम सीधी-सादी भावनात्मक कहानी, कुछ-कुछ सीख देने वाली। हालाँकि उसमें बाल मन की बड़ी स्वाभाविक झाँकी है। पर आगे चलकर बाल कहानियों की उनकी शैली में एक और खासियत जुड़ जाती है। यह है कहानी को रसपूर्ण और अंत तक नाटकीयता बनाए रखना। उनकी एक बड़ी सुंदर कहानी है, ‘कहानी में कहानी’। योगेंद्रकुमार लल्ला द्वारा संपादित ‘मेला’ में प्रकाशित ‘कहानी में कहानी’ वैसे तो ऐतिहासिक कथा है, पर यह कहानी जिस तरह बच्चों से बातचीत के माध्यम से आगे बढ़ती है, इसमें और भी बहुत सारे संदर्भ शामिल हो गए हैं, जिससे यह ऐतिहासिक कथा बहुत मोहक रूप ले लेती है। कहानी की शुरुआत ही लाजवाब है और किस्सागोई का अंदाज लिए हुए है—
“बहुत दिन हुए, एक कहानी कहने वाला हुआ था, उसका नाम ‘मैं’ यानी ‘हम’ था।  एक दिन मैं अपनी ससुराल गया। ससुराल के बच्चों-कच्चों ने मुझे घेर लिया। उन्हें पता लग गया था कि मैं कहानियाँ सुनाता हूँ। उनमें जासूसों जैसी बुद्धि और पराक्रम वाले बच्चे भी थे। उन्होंने चिल्लपों मचानी शुरू की—कहानी सुनाओ, कहानी सुनाओ...!”
बच्चों की उस भीड़ में एक चाणक्य जैसा लगने वाला बड़ा तेजतर्रार चुटियाधारी बच्चा था। एक बच्चा बीरबल की तरह चतुर था। ये दोनों बच्चे कहानी की शुरुआत से लेकर अंत तक सवालों की बौछार करते हैं और मजे की बात यह है कि इससे कहानी में व्यवधान पड़ने के बजाय, उलटा रस आ जाता है। साथ ही इससे कहानी भी एक नए शिल्प में ढल जाती है, जिसमें अतीत के साथ-साथ वर्तमान भी उपस्थित रहता है।

‘कहानी में कहानी’ का कथानायक है गुजरात का वीर और प्रतापी राजा सिद्धराज जयसिंह। उसने मालवा की राजधानी धारानगरी पर आक्रमण किया। उसे भेदकर अंदर नहीं जा पाया तो बाहर ही घेरकर बैठ गया। बारह बरस तक यह घेरा चलता रहा, पर धारानगरी के फाटक नहीं खुले। तब सिद्धराज ने तरकीब लगाई, हाथी यशपटह को माथे से टक्कर मारकर फाटक को तोड़ने के लिए ललकारा गया। आखिर फाटक तो टूटा, पर साथ ही फाटक पर लगी नुकीली कीलों से बुरी तरह चोटिल होकर हाथी यशपटह भी मारा गया। सिद्धराज ने हजारों सैनिकों के साथ धारानगरी में प्रवेश किया, राजा यशोवर्मा को जंजीरों से जकड़ दिया गया। अपने प्रिय हाथी यशपटह की मौत का बदला लेने के लिए राजा सिद्धराज ने प्रतिज्ञा की थी कि वह राजा यशोवर्मा की खाल उतरवा लेगा। पर राजसभा में जंजीरों से जकड़े राजा यशोवर्मा ने सिद्धराज के सवालों के जवाब इतनी निर्भीकता से दिए कि राजा सिद्धराज उसकी वीरता से बहुत प्रभावित हुआ। यशोवर्मा को मुक्त कर दिया गया। हाँ, सिद्धराज ने उसके पैरों की थोड़ी सी खाल उतरवा ली, ताकि उसकी प्रतिज्ञा पूरी हो जाए।

कहानी का अंत इतना रोमांचक है कि वे बच्चे भी जो अपने चतुराई भरे प्रश्नों से बीच-बीच में व्यवधान डाल रहे थे, अंत में कहानी के साथ बहते हैं और कहानी पूरी होते पर आनंद से भर उठते हैं।

बच्चों के लिए लिखी गई हजारों कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं। ऐतिहासिक कथाएँ भी। आनंद जी की ‘कहानी में कहानी’ पढ़कर मैंने बार-बार भीतरी कोठरी में रखे बाल कहानियों के इस विशाल पिटारे को हिलाया-डुलाया। पर किसी कहानी में इतिहास कथा को इस तरह खेल-खेल में आगे बढ़ाया गया हो, मुझे याद नहीं पड़ा। और मजे की बात यह, कि उसके बाद भी कहानी का जादू मन पर तारी हो जाता है।

‘मेला’ पत्रिका में ही आनंद जी की एक और मजेदार कहानी प्रकाशित हुई थी, ‘हिरनकसप और परल्हाद’। किस्सा कुल मिलाकर यह कि होली का हँसी-दिल्लगी का समय है। ऐसे में बच्चों को हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कहानी सुनने को मिली तो वे झट से इसी कथा के आधार पर नाटक खेलने का फैसला कर लेते हैं। आधी-अधूरी तैयारी। वेश और बाकी साजोसामान भी बस यों ही सा। और तो और, वे हिरण्यकशिपु और प्रहलाद का ठीक से नाम भी नहीं ले पाते। हिरण्यकशिपु उनके देसी और अटपटे अंदाज में हिरनकसप और प्रह्लाद परल्हाद बन गया। पर इससे क्या? नाटक खेलना है तो खेलना है।

मोहल्ले के सब बच्चे आनन-फानन में नाटक की तैयारी में जुट जाते हैं। वे हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा को मौजूदा संदर्भों में इतने मजेदार रूप में पेश करते हैं कि देखने वाले दर्शकों का हँसते-हँसते पेट में दर्द हो जाता है। सच तो यह है कि किसी पौराणिक कथा को ज्यादा गंभीर बनाने के बजाय, बच्चों की कच्ची-पक्की समझ और अटपटी गतिविधियों से जोड़ दिया जाए, तो उसमें जैसे रस का झरना फूट पड़ता है। यही हिरनकसप और परल्हाद वाले किस्से में हुआ, जिसमें कहानी और नाटक एक-दूसरे में मिल गए से लगते हैं। बच्चों को छूट मिले तो वे क्या कमाल कर सकते हैं, यह भी इस कहानी को पढ़कर पता चलता है, जो पूरी तरह से आनंद जी के अपने रंग और अंदाज की कहानी है।

आनंद जी की ‘लोहे की गोलियाँ’ और ‘छब छे पैला काम’ भी ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें बच्चे ललककर पढ़ते हैं। एक-दूसरे से होड़ लेती ये दोंनों कहानियाँ इतनी रोचक हैं कि पहली पंक्ति पढ़ते ही कहानी का जादू मन में नक्श हो जाता है और आप कहानी पूरी किए उसे छोड़ नहीं सकते। इनमें ‘लोहे की गोलियाँ’ ‘पराग’ के मार्च 1988 अंक में छपी थी। कहानी में एक हलवाई के मोटे बच्चे भोंपू का किस्सा है जिसे घर में इतना खिलाया-पिलाया जाता है कि क्लास में अचानक ही उसकी ‘पूँ...!’ की लंबी ध्वनि ने सभी का ध्यान आकर्षित किया, और हर तरफ तेज हलचल मच जाती है। भोंपू के पास बैठे सब लड़के-लड़कियाँ उठकर खड़े हो गए। मास्टर जी को बड़ी देर में समझ में आया कि क्लास में यह करतब करने वाला असल में भोंपू है। डाँट-डपट के दौरान उसने फिर से यही लंबी पूँ की ध्वनि निकाली, तो उसे फौरन घर जाने का फरमान सुना दिया गया।

अलबत्ता भोंपू की इस अब बीमारी के कारण वैद्य जी समझ गए कि यह जरूरत से ज्यादा और ठूँस-ठूँसकर खाने का कमाल है। तो आखिर वर्जिश के लिए वे उसे लोहे की गोलियाँ देते हैं, जिन्हें फर्श पर बिखराकर एक-एक को चुनना था, ताकि उसकी चर्बी थोड़ी छँटे। सचमुच भोंपू पर इसका असर पड़ा, और हॉस्टल जाने के बाद तो वह एकदम चुस्त, छरहरा होकर लौटा। अम्माँ उसमें आए बदलाव को देखकर हैरान थी। पर उससे भी ज्यादा हैरानी उसे तब हुई, जब भोंपू ने वे गोलियाँ देते हुए अम्माँ से भी उन्हें आजमाने के लिए कहा। गुस्से में वे गोलियाँ फर्श पर बिखर जाती हैं, और तमाम गुलगपाड़े के बाद कहानी एक हास्यमय सिचुएशन पर खत्म होती है।

‘पराग’ के अगस्त 1983 अंक में छपी ‘छब से पैला काम’ में बच्चे हैं, अपनी पूरी मस्ती में, पर वे थोड़े होशियार बच्चे हैं जिन पर आज के बदलते वक्त और जमाने का भी असर है। लिहाजा वे भी समाज में बच्चों की उपेक्षा देखकर तय करते हैं कि वे इसे खत्म करने के लिए एक पार्टी बनाएँगे। उसमें बच्चों की माँगें रखी जाएँगी, ताकि उन्हें और अधिकार मिलें और कोई उनकी उपेक्षा न करे। इस बच्चा पार्टी की कई माँगें, कई नारे हैं और एक मजेदार घोषणा-पत्र भी। पर छब से पैला काम इलेक्शन लड़ना है, क्योंकि उसके बिना तो आजकल कुछ नहीं होता। आजकल हर राजनीतिक पार्टी का पहला और सबसे जरूरी काम इलेक्शन लड़ना है। तो फिर बच्चा पार्टी भी इलेक्शन क्यों न लड़े? और वे पार्टी के घोषणा-पत्र में यह बात भी जोड़ देते हैं कि “संसार के बच्चो, एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए अपने बचपन के अलावा कुछ भी नहीं है, और पाने के लिए...!” इसके बाद ‘बच्चा पार्टी जिंदाबाद!’ के जोशीले माहौल में कहानी खत्म होती है।

सच ही ‘छब छे पैला काम’ खेल-खेल में लिखी गई बड़ी प्यारी कहानी है, जिसे पढ़कर पता चलता है कि बच्चों से आनंद जी की दोस्ती कितनी गहरी थी और वे उसे कहानी लिखते समय कितने रंगों में ढाल सकते थे।

यह गौर करने की बात है कि आनंदप्रकाश जैन अपनी बाल कहानियों में अलग से कोई संदेश डालने की जरूरत नहीं समझते। पर कहानी इतने सधे हुए ढंग से आगे बढ़ती है और उसमें चरित्र का विकास इतना स्वाभाविक होता है कि जो कुछ वह कहना चाहते हैं, वह बिना कहे ही पाठक तक पहुँच जाता है। यही शायद किसी बड़े और उस्ताद कथाकार की पहचान भी है।


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आनंदप्रकाश जैन एक उस्ताद किस्सागो हैं तो भला वे उपन्यास की ओर क्यों न आते? उन्होंने बाल पाठकों के लिए बड़े दिलचस्प उपन्यास लिखे हैं, जिनमें बच्चों की बड़ी सक्रिय उपस्थिति है और वही उसके केंद्र में भी हैं। खासकर डाकुओं के आत्मसमर्पण को लेकर लिखा गया उनका बाल उपन्यास ‘भूलना मत काका’ (1979) बहुत चर्चित हुआ था। यों भी यह आनंद जी का सर्वश्रेष्ठ बाल उपन्यास है, जिसमें गहन भावनात्मकता के साथ-साथ बच्चों के हास्य-विनोद की एक चटुल धारा निरंतर चलती है। साथ ही, बच्चों और डाकुओं का चरित्रांकन हो या कथानक का उतार-चढ़ाव, उसमें बड़ी नाटकीयता है। उपन्यास ग्वालियर के पास एक छोटे से कसबे शिवाजीगंज के एक स्कूल में पढ़ने वाले दो बच्चों जग्गू और नीलू पर केंद्रित है। सच पूछा जाए तो ये बच्चे ही उसके सच्चे नायक भी हैं, जो उपन्यास को एक बड़े और निर्णायक मोड़ तक ले जाते हैं। दोनों में आपस में बड़ी दोस्ती है। ये दोनों खूब शरारतें करते हैं, एक-दूसरे को चिढ़ाते भी हैं, पर समय आने पर लोगों की मदद करने में सबसे आगे हैं।

एक दिन मुँह पर मुँड़ासा बाँधे एक डाकू क्लास में आया और दोनों बच्चों जग्गू और नीलू को अपने साथ जंगल में ले गया, ताकि उनके घर वालों से फिरौती की रकम वसूल की जा सके। जंगल में डाकुओं का अड्डा है, और वहीं डाकुओं का रोबीला सरदार भी है, जो बच्चों को बड़े प्यार से अपने साथ रखता है, ताकि उन्हें जरा भी तकलीफ न हो। जग्गू और नीलू भी डाकुओं के सरदार को प्यार से ‘काका’ कहकर बुलाते हैं। उधर जग्गू और नीलू के गायब होने पर उनके घर पर भी हड़कंप मच जाता है। बड़ी तेजी से ढुँढ़ाई शुरू होती है। डाकुओं को जंगल में घेर लिया जाता है। डाकू एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते हैं, ताकि पुलिस को चकमा दे सकें। जग्गू और नीलू बड़े बेमालूम तरीके से पुलिस दल की मदद करते हैं। डाकुओं को घेर लिया जाता है। अब आर-पार की लड़ाई की तैयारी है। पर जग्गू और नीलू को बिल्कुल पसंद नहीं है कि पुलिस उनके काका को मारे। पुलिस भी यह नहीं चाहती।

अंत में काका आत्मसमर्पण करने को तैयार हो जाते हैं, और इसका श्रेय प्यारे और समझदार बच्चों जग्गू और नीलू को ही जाता है। कहीं-कहीं इसे पढ़ते हुए राजकपूर की फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के भावुक कर देने वाले दृश्य याद आते हैं। आनंद जी ने कथा का ताना-बाना इतने खूबसूरत ढंग से गढ़ा है कि मन एक साथ कई तरह की भावनाओं में बहता है। जग्गू और नीलू के मासूम बेफिक्री भरे चरित्र जानदार हैं, साथ ही डाकुओं के सरदार का रोबीला, पर अंदर स्नेह से छल-छल करता चरित्र भी भुलाए नहीं भूलता।

हास्यपूर्ण शैली में लिखा गया ‘महाबली का भ्रम’ भी आनंद जी का बड़ा रोचक और पठनीय बाल उपन्यास है। पांडुपुत्र भीम की कथा में सहज हास्य के ऐसे बढ़िया प्रसंग खोज लेना आनंद जी के ही बस की बात थी। महाबली भीम भोजनभट्ट थे, यह तो सभी जानते हैं। पर उपन्यास में इसे भी खासे नाटकीय अंदाज में पेश किया गया है। भीम को भूख बहुत लगती थी, पर वे ज्यादा खा-खाकर बीमार न पड़ जाएँ, इसकी चिंता उनके भाई युधिष्ठिर को हर वक्त परेशान करती थी। उधर भीम को हमेशा लगता कि उनके पेट में चूहे कूद रहे हैं। भूख उनकी कमजोरी थी। बढ़िया पकवान भी। इसका फायदा दुर्योधन ने उठाया। उसने एक दिन भीम को ललचाया कि तुम्हें बहुत बढ़िया व्यंजन खाने को मिलेंगे, आ जाओ। भीम गए तो दुर्योधन ने उन्हें विष मिले पकवान खिलाए और बाँध-बूँधकर नदी में फिंकवा दिया। पर भीम तो भीम थे। वे वहाँ से भी बचकर आ गए।

‘महाबली का भ्रम’ में भीम की वीरता के बहुत प्रसंग हैं। पर इन वीरतापूर्ण घटनाओं में भी हास्य के प्रसंगों के लिए काफी गुंजाइश आनंद जी ने ढूँढ़ ली है। लिहाजा उपन्यास में भोजनभट्ट भीम की ऐसी-ऐसी हास्यपूर्ण छवियाँ सामने आती हैं कि पढ़ते-पढ़ते पेट में बल पड़ जाते हैं। सच ही किसी पौराणिक कथा का ऐसा दिलचस्प रूपांतरण पहले कभी देखने को नहीं मिला।

आनंद जी का ‘ताऊ तिलकू की कहानी’ (1962) भी कम रोचक नहीं है। उपन्यास बड़े ही मजेदार कठपुतलीनुमा चित्रों के साथ ‘पराग’ (अक्तूबर 1962 से जनवरी 1963 तक) में धारावाहिक रूप से छपा था, और बच्चों ने खासे उत्साह और दीवानगी के साथ इसका स्वागत किया था। शायद इसलिए कि बाल साहित्य में ऐसी प्रस्तुति पहली और अनोखी थी। उपन्यास में ग्राम्य हास्य की बड़ी अद्भुत छवियाँ हैं। ताऊ तिलकू धुर गाँव के बड़े ठाठदार आदमी हैं। शुद्ध घी-दूध पीने वाले ताऊ में जान है, सो पैरों से मीलों दूर चल लेते हैं और बहुत लंबी यात्रा करनी हो तो उनकी बैलगाड़ी जिंदाबाद! उनका छोटा भाई कप्तान बंबई में है, जो अभी कुछ अरसा पहले तक फौज में कप्तान था और अब सेवामुक्त होकर घर आ गया है। एक दफा ताऊ को छोटे भाई कप्तान से मिलने की हुड़क लगी तो ताई को साथ ले, वे चुस्त-दुरुस्त बैलों वाली अपनी शानदार बैलगाड़ी में बैठे और बैलगाड़ी शहर की सड़कों पर फर्राटे भरने लगी। बंबई में छोटे भाई कप्तान, बहू और बच्चों से मिलकर उन्होंने अपने गँवई ठाट से ऐसा जिंदादिली भरा माहौल पैदा कर दिया कि हर कोई उनका मुरीद था।

शहरी गुसलखाने को वे गुरसलखाना समझकर बड़ी अजीबोगरीब कल्पना कर लेते हैं, ब्रेड को ईंट समझकर बिदकते हैं, और फिर एक के बाद एक हास्य-विनोद की फुरफुरियाँ छूटती हैं। ताऊ का गँवईपन कहीं-कहीं भदेस भले ही वे, पर वे गाँव के सच्चे और खरे इनसान हैं, अपनी तमाम कमजोरियों के साथ। बीच-बीच में उनका परिहास और किस्से-कहानियों का अंदाज एक अलग ही समा बाँध देता है। यही वजह है कि बंबई में रह रही कप्तान की बेटियाँ उनके साथ गाँव देखने के लिए ललक उठीं। ताऊ की तरह ताई भी अपने गँवईपन के बावजूद खासी सुगढ़ और स्नेहशील हैं।

उपन्यास का एक मजेदार दृश्य यह है कि ताऊ, ताई, कप्तान, कप्तानी और उनका पूरा परिवार बैलगाड़ी पर बैठ लंबी सैर पर निकल पड़ता है। मुंबई में कारों और बसों के बीच फर्राटा भरती बैलगाड़ी की अद्भुत झाँकी देखकर भला कौन है जो दाँतों तले उँगली न दबा ले। पर ऐसे-ऐसे कमाल न करें तो ताऊ तिलकू ठेठ गाँव के ठेठ ताऊ कैसे लगेंगे, और यह कैसे पता चलेगा कि उन्हें आनंदप्रकाश जैन जैसे बेजोड़ कथाशिल्पी ने रचा है!

‘पराग’ में धारावाहिक रूप से छपा आनंदप्रकाश जैन का बाल उपन्यास ‘सोमबाला और सात बौने’ (अगस्त 1964-नवंबर 1964) ग्रिम बंधुओं की विश्वप्रसिद्ध कथा ‘स्नोवाइट एंड सेवन ड्वार्फ्स’ के आधार पर लिखी गई सुंदर कृति है। पर ग्रिम बंधुओं की कहानी का बाल उपन्यास के रूप में इतना खूबसूरत रूपांतरण आनंद जी ने किया कि उसने ‘पराग’ के बाल पाठकों को मोह लिया। और आज भी इसकी भाषा की चमक मोहती है।

आनंद जी के बाल व किशोर पाठकों के लिए लिखे गए जासूसी उपन्यासों की भी खासी धूम रही है। खासकर ‘राम और श्याम सीरीज’ के जासूसी उपन्यासों में तो बच्चों के कारनामे ऐसे हैं कि वे बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी चकित करते हैं। कुछ रोमांचक जासूसी उपन्यास आनंद जी ने स्वतंत्र रूप से भी लिखे। इनमें ‘पराग’ (अक्तूबर 1983 से सितंबर 1984 तक) में धारावाहिक रूप से छपे उपन्यास ‘ढीली ईंट का रहस्य’ को बाल पाठकों ने बेहद पसंद किया था। इस उपन्यास में बच्चों की एक छोटी सी प्राइवेट जासूसी एजेंसी ‘जासूसी पंजा’ का किस्सा है। अखबार में छपा उसका यह विज्ञापन भला किसका ध्यान न खींच लेगा, “जासूसी पंजा बड़े से बड़े अपराधियों को मक्खी-मच्छर की तरह दबोच लेता है। मैनेजिंग डायरेक्टर रमेशचंद्र बी.एस-सी.।”

एक बार कुबेर चिटफंड कंपनी प्रा.लि. के बड़े बाबू घमंडीलाल जासूसी पंजा के हैड के पास एक पेचीदा मामला लेकर आए, जिसमें उन्हें और मालिक दोनों को धमकी दी गई कि उन्हें तबाह कर दिया जाएगा। वे चाहते थे कि अपराधियों की शिनाख्त हो और वे पकड़े जाएँ। जासूस बच्चे बड़े बाबू को अपराधियों को पकड़वाने का पूरा भरोसा देते हैं, अग्रिम फीस वसूलते हैं और अपने काम में जुट जाते हैं। बीच-बीच में कई लोगों से पूछताछ भी चलती है, जिसमें जासूसी पंजा की पूरी टीम अपने टेढ़े-सीधे अनुमानों से धरती से आकाश तक के कुलाबे भरती नजर आती है। इस बीच एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ घटती हैं कि मामला लगातार उलझता जाता है और रहस्य गहरा होता जाता है। अंत में मामले का राज खुलता है और सारे बिखरे तार सुलझ जाते हैं। पता चलता है कि कुबेर कंपनी के मालिक और बड़े बाबू ने अपनी बेईमानी और धाँधलियों से लोगों का ध्यान हटाने और पुलिस अधिकारियों की झूठी सहानुभूति पाने के लिए यह प्रचार किया था। पर झूठ अंत में पकड़ में आ ही जाता है, और अपराधी बेनकाब होते हैं।

आश्चर्य नहीं कि ‘ढीली ईंट का रहस्य’ में जासूस बच्चों की होशियारी और सक्रियता ही नहीं, जगह-जगह उनकी बुद्धिमत्ता की ऐसी छाप है, जिसने जज साहब और पुलिस अधिकारी को भी मुग्ध कर दिया।

‘डबल सीक्रेट एजेंट जीरो-जीरो वन बाई टू’ भी आनंद जी का बहुत मशहूर बाल जासूसी उपन्यास है, जिसकी बहुत धूम मची थी। पर जहाँ ‘ढीली ईंट का रहस्य’ में जासूस बच्चों की इंटेलीजेंस की छाप है, वहाँ ‘डबल सीक्रेट एजेंट जीरो-जीरो वन बाई टू’ में ताकत, चुस्ती और सतर्कता का। उपन्यास के केंद्र में नशे के कारोबार में जुटे ऐसे दुष्ट लोग हैं, जो कुछ बच्चों को नशे का आदी बनाकर उनकी मदद से पूरे स्कूल में अपना जाल फैला देते हैं। इन दादा किस्म के नशेड़ियों के खौफ से हर कोई डरा हुआ है। स्कूल में रोजाना मारपीट और तोड़-फोड़ की घटनाएँ होती हैं। यहाँ तक कि देखते ही देखते हैडमास्टर साहब के कमरे में काँच की खिड़कियों पर पत्थर बरसते हैं, और सब कुछ चूरमचूर हो जाता है। चारों ओर काँच ही काँच बिखरा है। स्कूल के अध्यापक और प्रधानाचार्य हक्के-बक्के। करें तो करें क्या?

पर फिर एक दिन जो सबसे शरारती क्लास थी, उसमें दो नए बच्चे आए और मामला इस कदर पलटा कि स्कूल के सारे नशेड़ी दादाओं की अक्ल ठिकाने आ गई। साथ ही स्कूल में फैला नशे का जाल भी खत्म। सारे बच्चों और अध्यापकों ने राहत की साँस ली और फिर सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा। पर वे दो चमत्कारी बच्चे थे कौन, यह खुद में एक राज है। पूरे उपन्यास में अंत तक सस्पेंस बना रहता है, और एक के बाद ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं कि उसे दम साधकर पढ़ना पड़ता है। शायद इसीलिए पॉकेट बुक के रूप में छपा यह अपने समय का बेस्ट सेलर बाल उपन्यास था।

इसके अलावा आनंद जी ने वैज्ञानिक फंतासी कथाएँ और उपन्यास भी लिखे हैं। चींटियों की अनोखी दुनिया पर लिखा गया ‘साँवरी सलोनी’ भी ऐसा ही उपन्यास है, जिसमें बड़ी लंबी और रोचक फंतासी कथा है, जो विचित्र मोड़ों से होकर गुजरती है।


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कहानी और उपन्यासों के अलावा भी आनंदप्रकाश जैन ने बाल साहित्य की कई विधाओं में लिखा है। पर उनके बाल नाटक तो कमाल के हैं, जिनमें उनका शब्दों से खेलने वाला मस्त अंदाज देखते ही बनता है। खासकर उनका बहुचर्चित नाटक ‘परियों के देश में’ तो कथानक और चरित्रों को लेकर बहुत बारीकी से बुना हुआ है। इसमें चाचा रंगी और भतीजे की दोस्ती और उनके आपसी संवाद सचमुच गजब के हैं। बातों-बातों में परियों के देश की जो कल्पना गढ़ी गई है, वह भुलाए नहीं भूलती। नाटक के अंत का वह दृश्य अविस्मरणीय है, जब परियों के देश का बना बहुत बड़ा विशालकाय रसगुल्ला लाया जाता है। उसे बड़े स्वाद से खाते हुए जब विपिन की आँखें खुलती हैं, तो उसे पता चलता है कि उसके मुँह में रसगुल्ला नहीं, अमरूद है। ज्यादा भूख के कारण यह अमरूद ही उसे रसगुल्ले का सुख दे रहा है। इस नाटक के टिपिकल किस्म के रंगी चाचा भी कभी भुलाए न जा सकने वाले चरित्र हैं।

‘परियों के देश में’ नाटक की एक बड़ी खासियत और है। इसमें सपने में नजर आने वाली परियाँ ही बच्चों को बड़े प्यार से यह सीख देती हैं कि उन्हें कल्पना में विचरण करने के बजाय, अपने जीवन में कुछ बनने और कर दिखाने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए कि असली राक्षस तो इस दुनिया की वे अपार मुश्किलें हैं, जिनसे पल-पल टक्कर लेते हुए उन्हें आगे बढ़ना है। और इसीलिए, असली रोमांच तो इस दुनिया में है, परियों की कल्पित दुनिया में नहीं।

इसी तरह आनंद जी का एक यादगार बाल नाटक है, ‘भूख हड़ताल’। इस नाटक के केंद्र में बच्चे हैं, जो भोपाल के गैस पीड़ितों की सहायता के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं। इसी बीच जोश और उत्साह में एक छोटा सा बच्चा दीपक आमरण अनशन करने बैठ जाता है। इस पर लोगों को भी जोश आ गया और चंदा देने वालों का ताँता लग जाता है। पूरे शहर में इसे लेकर हलचल है। अखबारों में खबरें छपती हैं।

हर कोई दीपक की एक झलक देखना चाहता है। छत्तीस घंटे से ज्यादा समय हो गया। अब तो डॉक्टर और दीपक के घर के लोगों को बड़ी चिंता हुई। सब उसे अनशन तोड़ने के लिए समझा रहे हैं। अंत में हैडमास्टर साहब उसके इस संकल्प और दृढ़ता से प्रभावित होकर न सिर्फ अपनी ओर से चंदा देते हैं, बल्कि दीपक की खूब तारीफ भी करते हैं कि ऐसे बच्चे हों तो देश और समाज को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। यों नाटक का अंत बड़े खुशनुमा माहौल में होता है। नाटक में बच्चों की सक्रियता के साथ-साथ उनकी सहज हास्य-वृत्ति भी खूब उभरी है, और उसी से आखिर तक हलचल और गहमागहमी बनी रहती है।

‘बचत आंदोलन’ भी आनंदप्रकाश जी का बड़ा मजेदार बाल नाटक है जिसमें बच्चे देश के लिए बचत करने की बड़ी लंबी-चौड़ी योजनाएँ बनाते हैं। देश में बचत आंदोलन चल रहा है तो वे भी कुछ कर दिखाना चाहते हैं, ताकि कोई यह न कहे कि इस देश में बच्चे पीछे हैं। इसलिए वे बड़ी-बड़ी कसमें खाते हैं। उनमें आइसक्रीम छोड़ देना भी शामिल है। पर गरमी के मौसम में आइसक्रीम छोड़ना आसान नहीं है और मन ललचाकर बार-बार उधर ही भागता है। इस पर विपिन बिल्कुल नेताओं की तरह घोषणा करने वाले अंदाज में बताता है, “अगर हमारी पार्टी का कोई भी सदस्य किसी आइसक्रीम वाले के पास देखा खड़ा गया, होंठ चाटता पाया गया, यहाँ तक कि किसी आइसक्रीम खाते हुए लड़के-लड़की के पास मुँह बाए खड़ा भी मिला तो उसे पार्टी से खारिज कर दिया जाएगा।”

पर फिर आइसक्रीम का ठेला वहाँ आता है, तो उसे देखकर उनका मन कैसा डावाँडोल हो जाता है, इसका नाटक में बहुत बढ़िया चित्रण है। फिर आइसक्रीम वाला भी कुछ ऐसी जुगत लगाता है कि बच्चे ललचा उठते हैं। आखिर ‘दूधवाली, पिस्तेवाली, मसालेवाली, बादामों वाली आ...इ...स...क्री...म’ ही बच्चों के बचत आंदोलन पर भारी बैठती है। बच्चे आइसक्रीम लिए बगैर रह नहीं पाते, और फिर स्वाभाविक है कि उनका बचत आंदोलन भी ठप हो जाता है। पूरा बाल नाटक हास्य-विनोद के रंगों से सराबोर है और बड़े खिलंदड़े अंदाज में आगे बढ़ता है।

बच्चों के मन में बैठे गणित के हौए को लेकर लिखा गया आनंद जी का ‘जानमेटरी-उलझमरा’ हास्य के रंगों में सराबोर है तो ‘दूध में चूहा’ बात की बात में आज के नेताओं की राजनीति की पोल खोलता है। इसे पढ़कर पता चलता है कि हमारे नेता लोग एक-दूसरे को फँसाने के लिए कैसे-कैसे झूठे जाल और प्रपंच रचते हैं। हालाँकि समस्या-प्रधान होते हुए भी, नाटक में खूब हास्य-विनोद के छींटे हैं। आनंद जी के प्रायः सभी नाटकों में हास्य-विनोद के मजेदार प्रसंग हैं, जो उन्हें बाल पाठकों में लोकप्रिय बनाते हैं। पर ‘पराग’ के मई 1964 अंक में प्रकाशित ‘झल्लीवाला’ तो आनंद जी का बेजोड़ हास्य एकांकी है, जिसे बहुत बार मंचित किया गया। इसमें आज की पढ़ाई और शिक्षा-पद्धति पर व्यंग्य है, जिसके कारण बच्चों पर बस्ते का बोझ लगातार बढ़ता ही जाता है।

नाटक की शुरुआत बड़ी दिलचस्प है। एक बच्चा मनोज अपने भारी-भरकम बस्ते को उठाने के लिए एक झल्लीवाले को बुलाता है। झल्लीवाला मनोज का बस्ता ढोकर स्कूल लाया तो उसे लेकर बच्चों में आपस में बड़ी मजेदार बतकही शुरू हो जाती है। पर नाटक का असली रंग तब आता है, जब मास्टर जी कक्षा में पढ़ाने के लिए पहुँचे, और बच्चों के बीच बेंच पर बैठे झल्लीवाला को भी छात्र समझकर सवाल पूछने लगे। बेचारा झल्लीवाला...! जो कुछ वह बताता है, उससे मास्टर जी तो हैरान हैं ही, क्लास में भी बार-बार हँसी की लहर दौड़ जाती है। नाटक का अंत बड़ा मजेदार है।

यों आनंद जी का ‘झल्लीवाला’ नाटक हलके-फुलके ढंग से बस्ते के बढ़ते बोझ की समस्या को उठाता है। नाटक में पर्याप्त गति है तो संवादों में चटुलता। लिहाजा यह बच्चों का पसंदीदा बाल नाटक है।

बल्कि सच तो यह है कि यह विशेषता आनंद जी के प्रायः सभी बाल नाटकों में है। वे किसी समस्या को लेकर चलते हैं, पर अपने रूपाकार या कलेवर में पर्याप्त हल्के-फुल्के हैं। इसलिए कि गंभीर चीजों में भी कहीं न कहीं हास्य के छींटे डाल देना आनंद जी को आता है। उन्होंने बच्चों के लिए कुल सात-आठ ही नाटक लिखे हैं, पर वे सभी बेजोड़ हैं और उन पर आनंद जी के विनोदी चरित्र की गहरी छाप नजर आती है। कुल मिलाकर क्षिप्र गति, लुभावने चरित्र और संवादों की चटुलता आनंद जी के बाल नाटकों को बच्चों के बीच खासा लोकप्रिय बनाती है।


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आनंद जी ‘पराग’ के संपादक हुए तो उहोंने तय कर लिया था कि उन्हें मात्र वेतनभोगी संपादक होकर नहीं रहना। ‘पराग’ को पूरी तरह बाल मन और आकांक्षाओं के अनुरूप ढालना है, ताकि वह बच्चों के सपनों की पत्रिका बने, उनकी अपनी पत्रिका। जिसे वे प्यार करें, उसके साथ बोलें-बतियाएँ। और इसके लिए ‘पराग’ जैसा उस समय निकल रहा था, उसके पूरे कायाकल्प की जरूरत थी। पर इसके लिए एक ओर बच्चों से दोस्ती जरूरी थी और दूसरी ओर बच्चों के लिए लिखने वाले लेखकों से। और ये दोनों ही काम उन्होंने बखूबी किए।

‘पराग’ के संपादकीय हों या ‘कुछ अटपटे कुछ चटपटे’ सरीखे सवाल-जवाबों का लोकप्रिय कॉलम, दोनों ही बच्चों से दोस्ती, उनसे गपशप और बतियाने के रास्ते थे। और दोनों की ही ऐसी धूम मची, कि बच्चे दीवानगी की हद तक अपने ‘संपादक दादा’ से प्यार करने लगे। ‘कुछ अटपटे कुछ चटपटे’ कॉलम तो इतना मशहूर हो गया था कि बहुत से बाल पाठक ‘पराग’ में सबसे पहले वही पढ़ते और अपने अटपटे सवालों को पढ़कर दिए गए संपादक दादा के चटपटे जवाबों को पढ़कर मुग्ध हो जाते। इसी तरह बच्चों के लेखकों की बाल मन से जुड़ी रचनाओं को वे केवल उत्साह से छापते ही नहीं थे, उनसे आगे और लिखने की फरमाइश करते। उस दौर के बहुत से नए लेखकों को उन्होंने बच्चों के लिए लिखने के लिए खूब प्रेरित किया, और होते-होते उनमें से कई बाल साहित्य के बहुत चर्चित और सुप्रसिद्ध लेखक बने।

इनमें मनोहर वर्मा भी हैं, जो अपने बाल कहानीकार होने का पूरा श्रेय आनंद जी को ही देते हैं। ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’ पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा कि ‘पराग’ के संपादक आनंद जी के पत्रों से उन्हें बहुत प्रेरणा और शक्ति मिलती थी। जब भी ‘पराग’ का कोई नया विशेषांक निकलता होता था, आनंद जी मनोहर वर्मा को उसके लिए कहानी लिखने का आग्रह करते। और वर्माजी भी उसके लिए खूब रमकर लिखते। उनका कहना है कि इससे न सिर्फ उन्होंने कहानी लिखना सीखा, बल्कि उनकी कहानियों में बहुत विविधधता भी आई। अगर आनंद जी का आग्रह न होता तो शायद उनकी बहुत सी बेहतरीन कहानियाँ लिखी ही न जातीं।

इसी तरह देवेंद्र कुमार की बहुचर्चित कहानी ‘अध्यापक’ आनंद जी ने ‘पराग’ में छापी थी। देवेंद्र जी उस समय उस समय पूरी तरह मसिजीवी लेखक थे। उन गर्दिश के दिनों में जब ज्यादातर रचनाएँ संपादक के खेद सहित वापस आती थीं और कोई एकाध ही छप पाती थी, ‘पराग’ से उनकी ‘अध्यापक’ कहानी का स्वीकृति-पत्र आया, साथ ही आगे और लिखते रहने का आग्रह। दुख और उदासी के क्षणों में यह उनके लिए बहुत बड़ा संबल बन गया। उन्होंने आनंद जी को अपने हालात के बारे में लंबा पत्र लिखा। जवाब में फिर विश्वास और दिलासे से भरी चिट्ठी!...ये छोटी बातें नहीं हैं। एक संपादक का बड़प्पन और उसका कद इन बातों से पता चलता है। और यही एक संपादक की अपने लेखकों से दोस्ती भी है।

आनंद जी किस तरह लेखकों को निरंतर प्रोत्साहित करते थे, इस बारे में चंद्रपाल सिंह यादव मयंक ने भी बड़ी आत्मीयता और अंतरंगता के साथ लिखा है। अपने बालगीतों की नई पुस्तक ‘दूध-मलाई’ उन्होंने आनंद जी के पास भेजी। इस पर जल्दी ही उन्हें ‘पराग’ संपादक का रोचक पत्र मिला, “दूध-मलाई मिली। बहुत मीठी लगी, क्यों न हो, जबकि हलवाई आप जैसा अनुभवी और समझदार हो।” साथ ही यह शुभ कामना भी थी कि “बच्चे आपकी दूध-मलाई खाकर और मिठाई खाकर हृष्टपुष्ट बनें....!”

सन् 1990 में आनंदप्रकाश जैन पर ‘बाल साहित्य समीक्षा’ का विशेषांक निकला था, जिसके अतिथि संपादक मयंक जी थे। पत्रिका में छपे अपने लेख में उन्होंने बिल्कुल सही लिखा है, “श्री जैन ‘पराग’ को मात्र एक चलताऊ बाल मासिक न बनाकर उसे हिंदी बाल पाठकों में नए युग की चेतना का अग्रदूत बना रहे थे, और वह भी बाल-रंजन के उन सभी साधनों और मूल्यों की रक्षा करते हुए, जो उन्हें अब तक चमत्कारी परीकथाओं व लोककथाओं में मिलते रहे थे।...हालाँकि इसके लिए साहित्य में एक विस्तृत और विशाल परिवर्तन तथा क्रांति की आवश्यकता थी। लेखकों तथा कवियों की एक नई टीम की सहायता से स्वतंत्र भारत के लिए सुनागरिक तैयार करने की दिशा में उन्होंने पहल की।”

‘पराग’ के जरिए आनंद जी ने एक और ऐतिहासिक महत्त्व का काम किया। वह था हिंदी में नई चाल के शिशुगीतों को बढ़ावा देना। हिंदी के शिशुगीत अंग्रेजी के मुकाबले हलके क्यों पड़ते हैं, यह सवाल आनंद जी के मन को लगातार मथता था। उन्होंने सोचा, शिशुगीत न तो पिटे-पिटाए ढंग से लिखे जा सकते हैं और वे किसी भी तरह के उपदेश का बोझ लादने में समर्थ हैं। बच्चों के लिए वे किसी मजेदार खेल की तरह हों, तभी वे बढ़िया शिशुगीत कहे जा सकते हैं। उन्होंने लिखा, “हिंदी में शिशुगीतों (नर्सरी राइम्स) का चलन बहुत पुराना है। ये बड़े दिलचस्प और चटपटे होते हैं, फिर भी इन्हें जैसा प्रचार-प्रसार मिलना चाहिए था, वैसा नहीं मिल सका। इस अभाव की पूर्ति करते हुए हम ‘पराग’ में नए से नए शिशुगीत प्रकाशित करते रहेंगे। चार से छह साल तक के बच्चे इन्हें जबानी याद कर सकते हैं। अन्य भाषा-भाषी बड़े बच्चे भी इन्हें मजे से याद कर सकेंगे। इनसे मुहावरेदार हिंदी सरलता से उनकी जुबान पर चढ़ जाएगी।”

‘पराग’ के हर अंक में आनंद जी का लिखा यह संपादकीय नोट छपता था। और सच ही हिंद में अच्छे शिशुगीतों के विकास में ‘पराग’ ने एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

कहानियों का एकदम नया अंदाज तो ‘पराग’ की सबसे बड़ी खासियत थी ही। आनंदप्रकाश जैन ने बड़ी सतर्क दृष्टि से चुन-चुनकर नए ढंग की, और सही मायनों में आधुनिक कहानियाँ छापीं, जो मौजूदा समय और बच्चों से जुड़ी हुई थीं। बच्चों के लिए उपदेशात्मक सामग्री की तो ‘पराग’ में कोई जगह थी ही नहीं। पर साथ ही पिटी-पिटाई लीक वाली लोककथाओं और बार-बार दोहराई गई गिनी-चुनी ऐतिहासिक कथाओं को फिर से छापना भी उन्होंने मंजूर नहीं किया।

इसमें कोई शक नहीं कि आनंदप्रकाश जैन के समय में ‘पराग’ का जो रूप है, उसने समूचे बाल साहित्य को प्रभावित किया और लेखकों की सोच बदली। उन्हें बदले हुए समय और बच्चों की बदलती सोच के हिसाब से, नए ढंग से अपनी बात कहने के लिए ललकारा। और यही कारण है कि साठ के दशक के बाद बाल साहित्य वह नहीं रहा, जो तीसरे-चौथे या पाँचवें दशक में लिखा जा रहा था। इसमें आनंद जी का एक बड़ा और ऐतिहासिक योगदान हैं। वे बाल साहित्य में एक बड़ा युगांतर ने वाले बड़े लेखक और सही मायने में, बाल साहित्य के दिग्दर्शक थे।
आनंद जी को परीकथाओं और लोककथाओं का विरोधी कहा जाता है। पर यह भूलना नहीं चाहिए कि उन्होंने ग्रिम बंधुओं की एक प्रसिद्ध कथा के आधार पर एक बाल उपन्यास ‘सोमबाला और सात बौने’ लिखा था और ‘पराग’ में वह धारावाहिक छपा भी। डेनमार्क की लोककथाएँ सरीखी लोककथाओं की पुस्तकें भी उन्होंने लिखीं। असल में आनंद जी पिष्टपेषण के विरोधी थे, पुरानी चीजों को फिर-फिर उसी बासी ढंग से दोहराने के भी। डा. त्रिभुवन राय से बातचीत में वे खुलकर इस बारे में अपनी राय प्रकट करते हैं। आनंद जी साफ-साफ कहते हैं, “कहा तो यह भी जाता है कि मैं धार्मिक कथाओं का भी घोर विरोधी था। मगर यह पूरा सच नहीं था।...वास्तव में मेरा विरोध पिष्टपेषण से था, लकीर का फकीर बने रहने से था।”


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पिछले दिनों ‘पराग’ के सन् साठ के दशक के संपादकीयों को फिर से पढ़ने का अवसर मिला तो मैं विस्मय में डूबता चला गया। उनमें एक विरल आकर्षण है। मस्ती और बतकही का आनंद, और इसीलिए वे आज भी लुभाते हैं। इन संपादकीयों से जीवन और बाल साहित्य के प्रति आनंद जी की दृष्टि पता चलती है, और यह भी कि बच्चों से उनकी दोस्ती कितनी गहरी थी। वे अपनी मनमोहक अदा से बाल पाठकों को हमेशा के लिए अपना दोस्त बना लेना जानते थे। मजे की बात यह है कि ऐसे बच्चे बड़े होकर खुद पिता बने, कुछ तो दादा-नाना भी, पर ‘पराग’ के ‘संपादक दादा’ से उनकी दोस्ती की वह चमकती डोर अब भी वैसी की वैसी है, और आनंद जी का जिक्र हो, तो वे पल में अपने बड़प्पन का बोझ उतारकर अपने बचपन की जादुई दुनिया में जा पहुँचते हैं, और फिर उनकी बातों का कोई ओर-छोर नहीं रहता।

चलिए, अब कुछ नजीरें पेश की जाएँ।

अप्रैल 1960 अंक में लिखी ‘दादा की चिट्ठी’ में आनंद जी लिखते हैं, “प्यारे बच्चो, नए वर्ष के ‘पराग’ का हाथी याद है न? तुम सबने उसके साथ खूब होली खेली होगी। अच्छा, हमने तुम्हारे लिए रसगुल्लों का पार्सल भेजा है। रसगुल्ले कैसे लगे, यह जरूर लिख भेजना। जिस पत्र में सबसे ज्यादा मिठास होगी, उसे हम ‘पराग’ में छापेंगे। 15 अप्रैल तक हम तुम्हारे पत्र की बाट जोहेंगे।”

इसके बाद वे किस आनंद के साथ ‘पराग’ में छपी रचनाओं का जिक्र करते हुए, उन्हें पढ़ने की ललक जगाते हैं, इसकी एक बानगी देखिए, “इस बार तुम्हें कहीं सरला और विमला फोन पर बातें करती मिल जाएँ, तो इनसे हमारी नमस्ते बोलना, पर बोलना जोर से। बात यह है कि या तो इनके फोन ही खराब है या ये दोनों कुछ ऊँचा सुनती हैं।…चलमचल, चलमचल, आगे दो गुड़ियाँ मिलेंगी। ये भाई-बहन दौड़ने में बहुत तेज हैं, पर हैं बड़े नटखट! अगर तुम इन्हें दौड़ाना चाहोगे, तो ये तुम्हें गाल फुलाने को मजबूर करेंगे। अब तुम्हारी मर्जी है भई, फुलाओ गाल और दौड़ाओ इन्हें!” यों चलमचल...चलमचल वाले कौतुकी अंदाज में वे मानो ‘पराग’ में छपी सब रचनाओं को ही नानी की प्यारी कहानी में ढाल देते हैं, जिससे उन्हें पढ़ने की उत्कंठा बेहद बढ़ जाती है।

जाहिर है, ‘पराग’ के संपादक के रूप में बच्चों से दोस्ती का एक नटखटपन भरा गवाक्ष आनंद जी खोल लेते हैं, जहाँ पर बिना किसी आदर्शवादी लबादे के, वे बच्चों से खेल-खेल में बतिया सकें, और उनके मन को टटोल सकें। इसी के साथ वे एक और खेल करते हैं। जिस समय आनंद जी ‘पराग’ के संपादक नियुक्त हुए तो उनकी उम्र बहुत अधिक न थी। भले ही उनका नाम दूर-दूर तक फैल गया हो, पर थे तो वे नवयवुक ही। भला एक सीधा-सादा दिखने वाला नवयुवक भारी-भरकम रुतबे वाला संपादक दादा कैसे हो सकता था? तो आखिर उन्होंने एक कौतुक रचा। नकली दाढ़ी लगाई और नकली दाँतों का एक पूरा सेट भी। यानी अब बन गए वे बात-बात में दाढ़ी सहलाने और गरदन हिलाने वाले ‘पराग’ के भारी-भरकम संपादक दादा, जो हो-हो करके हँसना भी जानते हैं। इस रूप में अपना कोई फैंसी चित्र तो उन्होंने संपादकीय के साथ नहीं छापा, पर मीठी बतकही के बीच अक्सर अपनी नकली दाढ़ी और दाँतों से जुड़ा कोई न कोई कौतुक वे जरूर करते, “अच्छा, हम जरा अपनी दाढ़ी उतारकर धो लें और दाँत लगाकर माँज लें!”

उनकी इस चटपटी गपशप का असर यह हुआ कि संपादक और पाठकों के बीच कोई दूरी न रही, बल्कि मनोरंजक वर्तालाप का एक खुशनुमा पुल तैयार हो गया। बच्चे और ‘पराग’ के बड़े पाठक भी, एक से एक बढ़िया और मजेदार चिट्ठियाँ लिखने लगे। ऐसी चिट्ठियाँ, जिन्हें पाना किसी भी पत्र-पत्रिका के संपादक को गर्व और आनंद से भर देता है। एक बार तो दादा के नाम पाती में कृष्णा शिशोदिया की ऐसी चिट्ठी हासिल हुई, जिसमें संपादक दादा की दाढ़ी को भी ‘परनाम’ किया गया था, उनकी राजी-खुशी और हालचाल पूछे गए थे। साथ ही एक मीठा कटाक्ष भी था, “जा री, मेरी प्यारी चिट्ठी, दादा जी के धाम,/सबसे पहले करना उनकी दाढ़ी को परनाम!/राजी-खुशी पूछना उनकी, मेरी भी बतलाना, इधर-उधर की कुछ गप्पों में फिर उनको उलझाना!” फिर शुरू हुई मतलब की बात—
इसके बाद बात मतलब की रखना उनके आगे,
सुस्ती उनकी आनन-फानन, सुनकर जिसको भागे!
प्रश्न अटपटे पूछ-पूछकर, उन पर रोब जमाना,
बढ़िया-सा इनाम आ जाए, ऐसा डौल लगाना!
अगर कहें, वह भूल गए हैं, घर पर अपना चश्मा,
फौरन जाना समझ कि तुझको देते हैं वह चकमा!...

‘पराग’ के बालमना संपादक दादा का इससे उत्साहित होना स्वाभिक ही था। लिहाजा फरवरी, 1965 के संपादकीय में बगल में ही एक बच्ची का चित्र है, जो लैटरबाक्स में चिट्ठी डाल रही है। और संपादकीय में भी उसका जिक्र है, “प्यारे बच्चो, तुम बराबर में एक नन्ही-मुन्नी बच्ची का चित्र देख रहे हो। वह अपने प्यारे दादा को—यानी हमें—अब पठा रही है। जानते हो, इस पत्र में उसने हमसे क्या पूछा है? क्या कहते हो—हम ही बताएँ? भई, हम कैसे बता सकते हैं? अभी यह पत्र हम तक पहुँचा ही कहाँ है!”

इसके बाद वे बच्चों को अपने मित्रों, परिवार के लोगों और परिचितों को अच्छे पत्र लिखने के लिए उत्साहित करते हैं। यही नहीं, बल्कि बात की बात में पत्र-लेखन पर वे ‘पराग’ का एक पूरा अंक निकालने की योजना बनाते हैं और उसे बाल पाठकों के साथ साझा करते हैं। इस अच्छी सी सूचना के बाद फिर एक मीठी चुहल, “तब तक तुम हमें एक पत्र लिखो और इसी तरह डाक के बंबे में छोड़ दो। मगर उस पर टिकट लगाना मत भूलना—हाँ!”

सन् 1962 में चीन के हमले ने पूरे देश को मर्माहत कर दिया था। बच्चे भी पड़ोसी देश द्वारा भारत की पीठ में छुरा घोंपने से व्यग्र और दुखी थे। वे ‘पराग’ के संपादक दादा को पत्र लिखकर पूछते थे कि संकट की इस घड़ी में उन्हें क्या करना चाहिए? अप्रैल 1963 के अंक में ‘बच्चों-कच्चों’ से बतियाते हुए वे बड़े सुलझे हुए ढंग से उन्हें एक सही और संतुलित राह सुझाते हैं—
“अनेक बच्चों के पत्र हमारे पास आए हैं कि इस राष्ट्रीय संकट के समय बच्चों का क्या कर्त्तव्य है। हमने उनका उत्तर भी पिछली चिट्ठियों में दिया है। आज हमारा एक नया उत्तर है कि जहाँ जो बच्चा जो भी परीक्षा दे रहा है, चाहे कष्टों से लड़ने की, चाहे प्रश्न-पत्रों से जूझने की, वहाँ उसे सफल होना ही चाहिए। असफलता सबसे बड़ी लानत है।...”

27 मई 1964 को पूरे देश की धड़कन बन चुके महानायक नेहरू जी गुजर गए। बच्चों के तो वे प्यारे चाचा थे। जब यह समाचार आया, तब ‘पराग’ के मई और जून के अंक तो निकल ही चुके थे। लिहाजा जुलाई, 1964 अंक के संपादकीय में वे दुखी और शोकविह्वल मन से नन्हे-मुन्नो प्यारे बच्चों को संबोधित करते हैं—
“आज जब हम तुम्हें यह चिट्ठी लिख रहे हैं, तो तुम्हारी तरह हमारा मन भी शोक में डूबा हुआ है। 27 मई ’64 को, दिन के दो बजे से कुछ मिनट पहले चाचा नेहरू हमें और तुम्हें बिलखता छोड़कर परियों के देश चले गए। तुम तो जानते हो न कि गुलाब की नन्ही-मुन्नी परी उन्हें बहुत प्रिय थी। इसीलिए वह अपनी अचकन में एक फूल लगाए रहते थे। अब वह हमेशा हमेशा के लिए उसी गुलाब की परी के अतिथि हो गए हैं। किंतु तुम सब यह विश्वास रखो, वह तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे—तुम भी उनकी बातों को कभी न भूलना।”

इससे पता चलता है कि ‘पराग’ बच्चों की केवल एक रोचक और लुभावनी पत्रिका ही नहीं थी, बल्कि सुख-दुख की हर घड़ी में उसने बच्चों को दिशा देने, और उसे देश व समाज की भावधारा में ढालने की भी कोशिश की। यह बच्चों के संपूर्ण विकास की कोशिश थी, और एक लोकप्रिय बाल पत्रिका के संपादक के रूप में आनंद जी का इष्ट भी यही था।

‘पराग’ जब किशोरों की पत्रिका बनी तो उसका रूप तो बदला ही, साथ ही साथ संपादकीय लिखने का तेवर भी। नवंबर 1971 के संपादकीय में आनंद जी लव-कुश को किशोर वर्ग के आदि विद्रोही के रूप में याद करते हैं। ‘पराग’ के ‘संपादक दादा’ अब संपादक बन गए हैं और पहले की तरह चुहल न करके, थोड़े गंभीर ढंग से अपनी बात कहते हैं। नए स्तंभों के साथ-साथ कहानियों का रंग-ढंग भी बदला। यह दीगर बात है कि भारतीय समाज और संभवतः किशोर वर्ग भी इसके लिए पूरी तरह तैयार न था। इसलिए ‘पराग’ के किशोर रूप को उस जोशखरोश से स्वागत नहीं किया गया, जिस तरह बाल पत्रिका वाला उसका रूप बच्चों और बाल साहित्य में अपनी एक अमिट जगह बना चुका था।...उधर प्रबंधन की ओर से कई तरह की अड़ंगेबाजियाँ। इस सबका दुखद परिणाम यह हुआ कि आनंद जी को ‘पराग’ से अलग होना पड़ा। विदाई के समय उन्होंने ‘पराग’ और उसके पाठकों के लिए शुभ कामनाओं से भरा संपादकीय लिखा। वह भी दुर्भाग्य से नहीं छप पाया।

यों एक महान युग का अंत हुआ। दुखद अंत। बाल साहित्य के लिए एक दुर्भाग्य की तरह!...और आनंद जी फिर से उसी राह पर चल पड़े, जो सदा से उन्हें आकर्षित करती थी। उनका लिखना...अनवरत लिखना। अपने लेखन पर उन्हें नाज था, जो अंत तक नहीं रुका। उनके टाइपराइटर पर शब्द ‘टप-टपाटप...टप-टपाटप’ दिन में बारह-बारह चौदह-चौदह घंटे बारिश की बूँदों की तरह टपकते, और एक से एक बड़ी कृतियों में ढलते जाते। वे जल्दी ही फिर से अपनी लय में आ गए।

‘पराग’ से मुक्त होने के बाद आनंद जी कोई तेईस बरस तक जिए, और यह उनके लेखन का एक महत्त्वपूर्ण दौर है। इस कालावधि में एक से एक रोमांचक इतिहास कथाएँ और उपन्यास तो लिखे ही गए, ‘चंदर’ उपनाम से लिखे गए उनकी जासूसी उपन्यासों की सीरीज ने भी बहुत प्रसिद्धि बटोरी। लगभग सत्तर जासूसी उपन्यास उन्होंने लिखे, जिन्हें साँस रोककर पढ़ना पड़ता था। एक बार शुरू करने के बाद आप बीच में छोड़ नहीं सकते थे।

कहना न होगा कि इन जासूसी उपन्यासों की रचना ने ही आकाशवृत्ति के इस लंबे कठिन दौर में आनंद जी की गृहस्थी को सँभाले रखा और आर्थिक मुश्किलों के झंझावात में नाव डूबी नहीं। उस समय जिस तरह की मुश्किलों से वे गुजरे, उसकी कुछ झलक उनके आत्मपरक लेख ‘मैं और मेरा कौशल’ पढ़कर समझी जा सकती है। इसे पढ़ते हुए कई जगह आँखें भर आती हैं। यह बात किसी चमत्कार से कम नहीं कि ऐसे हालात में भी, उनका लेखक अंत तक सक्रिय रहा व पूरे लेखकीय स्वाभिमान के साथ जिया।

यह बड़ी तकलीफ की बात है कि आनंदप्रकाश जैन सरीखे बाल साहित्य के बड़े रचनाकार की भी बहुत सी रचनाएँ आज उपलब्ध नहीं हैं। ‘पराग’ के बाल पाठकों को रिझाने वाली उनकी कहानियाँ, बाल उपन्यास तथा खासी चुहल और विनोदप्रियता के साथ लिखे गए संपादकीय! ये सबके सब, तथा और भी ढेरों चीजें आज ‘पराग’ की फाइलों में बंद हैं। उनका उद्धार होना चाहिए। इसके अलावा भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में जहाँ-तहाँ बिखरी उनकी जितनी बालोपयोगी रचनाएँ आज उपलब्ध हैं, वे अगर सम्मिलित रूप से एक जिल्द में सामने आ सकें, तो बाल साहित्य में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान की एक छोटी सी झलक तो हमें मिल ही सकती है। साथ ही बाल साहित्य के एक बड़े और बहुआयामी रचनाकार के रूप में उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन भी हो सकेगा। 
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
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