लघुकथा: ऋतु गुप्ता

ऋतु गुप्ता
"हाँ शून्य है मेरे पापा"

हाँ, बस पापा, आप और मम्मी कल सुबह की ट्रेन से कॉलेज आ जाइएगा, आपकी और मम्मी की दोनों की टिकट मैंने करवा दी है, बस आपको अपने जरूरत का जरुरी सामान लेकर ही यहाँ आना है, बाकी किसी ज्यादा सामान की जरूरत नहीं है।

देव ने अपने पापा आलोक से कहा तो आलोक ने अपने बेटे से पूछा, बेटा सब कुछ ठीक तो है ना, पूरी  बात विस्तार से तो बता। तो देव ने अपने पापा से कहा पापा बस आप ये समझ लीजिए कि मुझे कल के  कालिज प्रोग्राम में आपकी जरूरत है, आप और मम्मी दोनों समय से आ जाइएगा, इतना कहकर देव ने फोन रख दिया।

बेचारे आलोक बाबू क्या करते, अपनी पत्नी संध्या के साथ जाने की तैयारी करने लगे।

आलोक  एक फैक्ट्री में बतौर सुपरवाइजर काम करते हैं, संतोषी स्वभाव के व्यक्ति हैं, न कोई शौक, न ही झूठी शान की आदत है। बस अपने काम से काम रखते हैं। ईश्वर से अपने परिवार की सुख शांति की प्रार्थना करके, दोनों बच्चों के अच्छे भविष्य की प्रार्थना कर अपने नियत समय पर काम पर निकल जाते हैं।

आलोक बाबू के दोनों बच्चे शुरू से ही होनहार और मेधावी रहे हैं, आलोक बाबू ने भी अपनी हैसियत से बढ़कर अपने बच्चों को वो सब कुछ दिया है जो वह दे सकते हैं।अब बच्चे भी समझदार हो चले हैं ,उन्हें अच्छे से पता है कि उनके पिता किस तरह मेहनत करके उन्हें पढ़ा लिखा रहे हैं। आज के समय में एक मध्यमवर्गीय इंसान को बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाना आसान नहीं होता। बेटी मणिका तो अभी छोटी है, परंतु अपने भाई को देखकर उसके ही नक्शे कदम पर चलने की कोशिश करती है।

आलोक और उनकी पत्नी संध्या दोनों ही साधारण मध्यमवर्गीय आम इंसान हैं, पर बहुत विवेकी और जागरूक हैं । दोनों ने बेटी और बेटी में कभी कोई फर्क नहीं किया, बस उन्हें तो दोनों बच्चों के सपने साकार करने हैं, उनकी ख्वाहिशों को पंख लगाना है। बाकी सब कुछ उन्होंने ईश्वर पर छोड़ दिया है, दोनों का ही ईश्वर पर अटूट विश्वास है, उनका मानना है कि अपने कर्म अच्छे से करते जाओ, ना किसी से छल करो ना कोई कपट तो, ईश्वर स्वत: ही तुम्हारे हक में परिणाम देंगे ।

नाते रिश्तेदार मिलने जुलने वाले कहते रहे कि सुपरवाइजर साहब आपकी हैसियत इतनी नहीं कि इतना खर्च बच्चों की पढ़ाई पर कर सके, और भी तो दुनियादारी के बहुत खर्चे होते हैं, और कल को बेटी का ब्याह भी तो करना है,यदि करना ही है तो इसकी शादी के लिए बचत करो नहीं तो आप पहले से ही शून्य है, और भी शून्य  हो जाओगे। पर आलोक बाबू ने सोच रखा था कि चाहे कम पहन लेंगे, कम खा लेंगे, लेकिन बच्चों की शिक्षा में कोई कमी ना आने देंगे।

आज जब वे और उनकी पत्नी संध्या देव के विद्यालय पहुंचे तो उनका परिचय प्राप्त कर उनको बहुत ही सम्मान पूर्वक उनकी सीट तक पहुँचाया गया।

थोड़ी देर बाद जब प्रोग्राम शुरू हुआ तो उनके बेटे देव का नाम मंच पर पुकारा गया। देव को कॉलिज टॉप करने के लिए डिग्री, मेडल और प्रशस्ति पत्र से नवाजा गया ।

यह देखकर आलोक बाबू की आँखें नम हो गई क्योंकि आज उनकी तपस्या  का प्रसाद ईश्वर ने  उन्हें दिया था। आज एक साधारण से सुपरवाइजर के बेटे ने अपनी मेहनत के बल पर ही इतना बड़ा मुकाम हासिल किया था।

तभी देव आकर अपने पिता को मंच पर लेकर गया, जहाँ उसने अपना मेडल अपने पिता को पहना दिया और कहा आज मैं जो कुछ भी हूँ सिर्फ पिता की मेहनत और विश्वास के बल पर हूँ। आज मैं उन सभी को जवाब देना चाहता हूं जिन्होंने मेरे पापा को हमेशा शून्य समझा और शून्य ही कहा। मैं आज उन लोगों से कहता हूँ,  "हाँ मेरे पापा शून्य हैं" पर ऐसा शून्य कि  जिसके आगे भी लग जाए, उसकी कीमत बढ़ा देते हैं। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और आलोक बाबू ने अपने बेटे देव को अपने दोनों बाजूओ में भर कर कंठ से लगा लिया।
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खुर्जा बुलंदशहर, उत्तरप्रदेश

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