कहानी: रामराज्य

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


बहोरन टिक्का को जिस दिन मालूम हुआ कि उसे गले का कैंसर है, वह सकते में आ गया। उसे बीते दिनों के एक-एक पल याद आने लगे। रह-रहकर  अतीत में किये गये अपने ओछे कृत्यों पर अब उसे आत्मग्लानि होने लगी थी। गले के कर्क रोग के दर्द से अधिक पीड़ा उसे अपने उन कृत्यों पर हो रही थी, जिसे उसने जानते-समझते हुए अपने संज्ञान में किया था। उन दिनों अहंकार का दंभ उस पर कुछ इस तरह हावी था कि उसकी नजर में मानो हर कोई नासमझ ही था। यह जानते हुए भी कि अहंकार एक ऐसी दौड़ है, जहाँ हर जीतनेवाला अंततः हार जाता है। इतना सब कुछ जानते हुए भी उसकी आँखों पर मोटा पर्दा पड़ गया था। अपने अवगुण उसे दिखाई ही नहीं पड़ते थे।
बहोरन के पिता रामदयाल टिक्का एक साधारण आदिवासी किसान थे। स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों में उन्होंने अपने क्षेत्र का नेतृत्व किया था। राष्ट्र-समाज के लिए स्वराज्य के साथ ‘रामराज्य’ की एक नयी परिकल्पना उसके मन में थी। उसकी दृष्टि में रामराज्य का एक विशेष अर्थ था और वह अर्थ था- भाईचारा, कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी। कुछ इन्हीं नैसर्गिक गुणों के कारण उसकी ईमानदारी और कर्मठता की मिसाल पास के दस-पंद्रह गांवों तक दी जाती थी। राष्ट्र के आह्वान पर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी और आजादी के बाद स्वतंत्रता-सेनानियों को मिलनेवाली पेंशन को भी ठुकरा दिया था। जीवन भर धरती का सीना खोदकर खाते रहे, पर कभी किसी सरकार के आगे हाथ नहीं पसारा। ‘टिक्का’ उनका सरनेम था। रामदयाल कहते थे कि उनके पूर्वजों में चार-पांच पीढ़ी पहले किसी के ललाट पर टीकेनुमा लंबा-सा तिल था। अतः बचपन में ही उनका नाम ‘टीका’ पड़ गया था। कालांतर में यही नाम अपभ्रंश रूप में ‘टिक्का’ के रूप में प्रचलित हुआ, जो गुजरते समय के साथ हमारा सरनेम बन गया। बहोरन के जन्म के संबंध में भी रामदयाल कहा करते थे कि घर की साफ-सफाई, घर-आँगन बुहारते हुए उसका जन्म हुआ। घर-आँगन बुहारने के क्रम में जन्म होने के कारण जन्म के साथ ही दाई ने आकर कहा था, ‘गोमके’ बेटा हुआ है- बहोरना। दाई द्वारा दिया गया बहोरना नाम चल पड़ा। पड़ोसियों ने भी बहोरना और बाद में बहोरन कहना शुरु किया। धीरे-धीरे यही नाम प्रचलित हो गया। रामदयाल चाहते थे कि बहोरन खूब पढ़े-लिखे और बड़ा होकर नेक इन्सान बने। इसके लिए वे अक्सर उसे बचपन से ही ईमानदारी, शुचिता, कर्तव्यपरायणता आदि का पाठ पढ़ाया करते थे। बेईमानी से प्राप्त धन आदि के संबंध में वे उससे अक्सर कहा करते थे कि बहोरन! भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और काली कमाई कुछ ही दिनों तक अपना असर दिखाती है। झूठ की दीवार बालू के भीत की तरह होती है जो देर तक नहीं टिकती और सच कहूँ तो सत्य की तासीर मिटाये नहीं मिटती। किशोरवय बहोरन अपने पिता के इन बातों को बहुत ध्यान से सुनता और समझने की कोशिश करता था।
स्वतंत्रता-सेनानी रामदयाल टिक्का के ये आप्त-वचन केवल स्वयं या घर-परिवार तक सीमित नहीं थे प्रत्युत् वे अपने समाज के लोगों को भी यही पाठ पढ़ाया करते थे। इस आदिवासी अंचल के स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी अहम भूमिका थी और अहम योगदान था। उन्होंने देखा था कि शुचिता और ईमानदारी के इस अंचल में हजारों वर्षों से पर्वत-समुद्र पार के दूसरे धर्म-संस्कृति, वर्ण और नस्ल के लोगों ने कब्जा कर रखा है। यहां के सीधे-सादे लोगों को गुलाम बना रखा है। इस हरित अंचल में कभी सदाबहार जंगल-पहाड़ थे। पवित्र जल से कल-कल, छल-छल बहती नदियां थीं। इसके अतिरिक्त कोयला, लोहा, तांबा, अल्युमिनियम जैसे खनिजों के अकूत भंडार थे। धरती के भीतर और बाहर अकूत खजाना होने के बावजूद आम आदमी की स्थिति फटेहाल थी, जबकि कुछ सामंतवादी सोच और चाटुकार प्रवृत्ति के लोगों की स्थिति बहुत अच्छी थी। रामदयाल ने अनुभव किया था कि इस अंचल का आम आदमी ऊँच-नीच, जाति-वर्ण, रंग-नस्ल, अवर्ण-सवर्ण जैसे कई समाजों में बँटा हुआ है। इतना ही नहीं एक जाति-समाज के भीतर भी कई जातीय-समूह हैं, जो आपस में ही बँटे हुए हैं। रामदयाल की दृष्टि में गुलामी का, गरीबी-फटेहाली का यह एक प्रमुख कारण था। इन सबको समझते हुए उन्होंने अपने क्षेत्र व समाज में अपनी आदिवासी संस्कृति के तहत राष्ट्रीय राजनीति को नयी दिशा देने की कोशिश की थी। अपने समुदायों की उत्कृष्ट कला और शिल्प का स्मरण कराते हुए अपना देश, अपनी भूमि, अपनी माटी के रक्षार्थ आगे आने का आह्वान किया था। अपनी सांस्कृतिक पहचान को उन्होंने माटी की रक्षा के रूप में बदलने का प्रयास किया था और संघर्ष के साथ-साथ आत्मबलिदान के लिए भी तैयार रहने का गुरु-मंत्र गांव-गांव में साल के पत्तों को घुमाकर किया था।
लंबे संघर्ष के बाद राष्ट्र-समाज को जब आजादी मिली थी तो रामदयाल और पूरे अंचल के लोगों ने उसका स्वागत उत्सव मनाकर किया था। घर-घर में दीप जले थे और किस्म-किस्म के मिष्टान्न-पकवान बने थे। मुक्ति-संघर्ष के दिनों में जिस स्वराज और उसके पेटे में रामराज्य की परिकल्पना की गयी थी, उसी के अनुरूप जन-भागीदारी की सरकार बनी। अबुआ सरकार होने से छोटे से छोटे और बड़े से बड़े लोगों को समान अधिकार मिला। रामदयाल ने अनुभव किया कि राष्ट्र-समाज के विकास के लिए अब योजनाएँ बन रही हैं और सामूहिक प्रयत्न से देश तरक्की के पायदान पर चढ़ रहा है। इस पायदान के केन्द्र में मुख्य रूप से कृषि, उद्योग और शिक्षा को रखा गया था। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षिक सभी दायरों में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरु हुई और पूरे देश ने शांति-सद्भाव के पक्ष में अपनी भूमिका चुनी। एक तरह से समाजवाद का एक ढाँचा तैयार हुआ, जिसमें सबके लिए बराबरी का अधिकार था। आर्थिक पुनर्निर्माण और कृषि-विकास के लिए जिस तरह पानी, बिजली, उन्नत बीज की व्यवस्था हुई, उद्योग-तंत्र को मजबूत करने के लिए बड़े-बड़े कारखाने खोले गए और बिजली के लिए बड़े-बड़े बांध बनाये गये। उसी तरह शिक्षा के लिए स्कूल, विश्वविद्यालय जैसे अनगिनत अकादमिक संस्थान खोले गए। समय के अंतराल में जन भागीदारी से खोले गए अकादमिक संस्थानों का सरकारी स्तर पर अधिग्रहण भी हुआ। रामदयाल और उनके जैसे उच्च श्रेणी के वैचारिक प्रतिबद्धता वाले लोगों ने सरकार के इन कदमों की भूरी-भूरी प्रशंसा की और प्रशासन-तंत्र का सहयोग किया।
इसी क्रम में जंगलों-पहाड़ों के शांत और सुरम्य वातावरण में आम आदमी की विशिष्ट शिक्षा के लिए घने जंगल के बीच पहाड़ के रिज पर एक आवासीय विद्यालय सरकार की ओर से खोला गया। चूँकि, यह आवासीय विद्यालय झारखण्ड के नेतरहाट पठार की सबसे ऊँची चोटी पर था, इसलिए इसका नाम रखा गया- नेतरहाट आवासीय विद्यालय। गुरुकुल शिक्षा-पद्धति आधारित इस विद्यालय में नामांकन की प्रक्रिया प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर शुरु हुई। विद्यालय का ‘मोटो’ विद्यार्थियों को उच्चत्तर माध्यमिक शिक्षा के लिए तैयार किया जाना तय हुआ और तय यह भी हुआ कि विद्यार्थियों के बीच अमीर-गरीब, रंग-नस्ल-वर्ण का कोई भेद नहीं होगा। इसलिए समान सुविधाएँ सरकार की ओर से ही देने की बात कही गयी। प्रकृति की गोद में बसा नेतरहाट आवासीय विद्यालय शहरी चकाचैंध से दूर शिक्षा के क्षेत्र में आज भी आम आदमी के लिए वरदान है। स्थापना काल से ही इस विद्यालय का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है। अद्यतन इसने हजारों इंजीनियर, डाॅक्टर, अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक, शिल्पी आदि दिये हैं।
दस साल का होते-होते बहोरन का दाखिला इसी नेहरहाट आवासीय विद्यालय में हुआ। बचपन से कुशाग्र बहोरन गाँव-घर, नाते-रिश्ते में सबकी आँखों का तारा था। यहाँ तक कि बड़े-बूढ़े उसका रास्ता रोकर उससे कई तरह के प्रश्न पूछते थे और वह सबका उत्तर देता था। यह संयोग ही कहा जायेगा कि बहोरन ने अपनी प्रतिभा के बल पर प्रतियोगी-परीक्षा पास की और उसका नामांकन इस विद्यालय में हुआ। वह पूरे विद्यालय में सादगी और तेजस्विता की मिसाल था। इस कारण विद्यालय के सभी शिक्षक (जिन्हें विद्यालय परिसर में गुरु जी कहा जाता है) बहोरन को बहुत प्यार करते थे। यहीं से उसने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की। जिस दिन उसका रिजल्ट आया पूरे इलाके के लोग खुशी से झूम उठे। बहोरन इस इलाके का पहला आदिवासी छात्र था, जो नेतरहाट आवासीय विद्यालय से पढ़कर निकला था। गुरुकुल-पद्धति वाले हिन्दी माध्यम के इस विद्यालय में भाषा के साथ-साथ कला के विभिन्न क्षेत्रों और विज्ञान के नये-नये अनुसंधानों-तकनीकों की शिक्षा देने की बहुत ही अच्छी व्यवस्था है। भारतीय संस्कार यहां घुट्टी पिलाकर दी जाती है जिससे ईमानदारी, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता जैसे मानवीय गुण यहाँ से पढ़े-निकले छात्रों में दूध-पानी की तरह घुल-मिल जाता है। बहोरन टिक्का में ये गुण अपादमस्तक थे। समय के अंतराल में उसने पीएच॰डी॰ तक की पढ़ाई पूरी की और एक अकादमिक संस्थान में उसकी नियुक्ति भी हो गयी।
बहोरन के जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक मध्यम गति से चल रही थी और संस्थान के श्रेष्ठ बौद्धिकों में उसकी गिनती भी होने लगी थी। इस तरह जीवन के बीस वर्ष बीत गए। इन बीस वर्षों में शिक्षा जगत में उसने खूब नाम कमाया। बहोरन की प्रतिभा की गूँज राज्य सरकार तक पहुँच गयी। राज्य सरकार के कई अधिकारी-कर्मचारी उसके छात्र थे। इस कारण राज्य सरकार के मंत्रियों-अधिकारियों तक उसकी पहुँच हो गयी थी। सरकार ने उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे एक बड़े अकादमिक संस्थान के कुलगुरु का दायित्व यह सोचकर दिया कि ऐसे लोगों के उस पद पर जाने के बाद अकादमिक संस्थान की दशा और दिशा दोनों बदलेंगे। बहोरन ने तत्काल कुलगुरु का दायित्व स्वीकार कर लिया। यह बहोरन का संयोग था या दुर्योग कहा नहीं जा सकता क्योंकि संस्थान पूर्व से ही भ्रष्टाचार के दलदल में धँसा हुआ था। एक तरह से बहोरन उस काजल की कोठरी में घुस गया था, जहाँ से बिना कालिख लगे निकलना शायद संभव नहीं था। क्योंकि:
‘काजल की कोठरी में कैइसो ही सयानो जाय,
एक लीक काजल की लागि है, पै लागि है।’
यानी, आप चाहे कितने ही दूध के धुले क्यों न हों, गलत संगति में जाने पर कुछ न कुछ असर तो होता ही है। इस संस्थान में आने के बाद बहोरन को ही यह सिद्ध करना था कि काजल की कोठरी से उसे पाक-साफ कैसे बाहर आना है ? बहोरन को मालूम है, कि इस सफर में किसी को भी पत्थर, रेत, कीचड़ सब मिलेंगे। कोई इस पूरे सफर में कालीन नहीं बिछा सकता। धूप-छाँव की तरह नेकी और बदी साथ-साथ रहेंगे। यह चलने वाले को तय करना पड़ता है कि वह नेकी और बदी में किसे स्वीकार करता है। कुछ दिनों तक तो बहोरन ने बड़ी लगन से काम किया। अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए अकादमिक परिसर ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में वह चर्चा के केन्द्र में था। किंतु, इस अकादमिक संस्थान में एक चौकड़ी थी। इस चौकड़ी के दर्जन भर सदस्य थे, जिनका काम अध्ययन-अध्यापन शून्य और चापलूसी सौ फीसद था। एक तरह से वह समय चौकड़ी के सदस्यों के लिए रामराज्य जैसा होता था,  जब संस्थान के उच्च पदस्थ अधिकारी अयोग्य या अकर्मण्य होते थे। बहोरन कर्मठ पर सीधा-सादा था। इसलिए चौकड़ी के सदस्य बेफिक्र थे। वे नित्यप्रति अकादमिक संस्थान के खुलते ही कार्यालय के इर्द-गिर्द ही नजर आते। चौकड़ी के साथ समयांतर में जितनी बार भी ऐसी स्थिति आयी उनके शब्दों में रामराज्य या रामराज्य जैसा आ गया था। ऐसे रामराज्य का उन्होंने कई बार सुख-भोग किया और मस्ती की थी। चौकड़ी के सदस्यों में विधुचंद्र, नंदन, अवनीन्द्र, ब्रजेन्द्र, आनंद और प्रीतेश जैसे धुरंधर खिलाड़ी-चाटुकार थे। कोई भी अधिकारी-कर्मचारी हो, येन-केन-प्रकारेन ये अपनी पहुँच उस तक बना ही लेते थे। कड़क से कड़क अधिकारी भी उनके साम-दाम-दण्ड-भेद के आगे समर्पण कर दिया करते थे। किंतु, बहोरन में अभी थोड़ी ईमानदारी, थोड़ी शुचिता बची हुई थी, इसलिए वह चंगुल में नहीं आ रहा था। चौकड़ी के सदस्यों ने यह जिम्मेवारी अवनीन्द्र को दी क्योंकि चाटुकारिता का वह सबसे माहिर खिलाड़ी था। आज तक दो-एक को छोड़कर अपवादस्वरूप ही कोई ऐसा अधिकारी- कर्मचारी होगा, जो उसके बुने जाल से बच सका हो। अवनीन्द्र ने बहोरन को चंगुल में लेने के लिए कई पासें फेंके। पर, बहोरन हर बार उन पासों को धत्ता बता देता था। हारकर अवनीन्द्र ने अंतिम पासा सुरा और सुंदरी का फेंका। अवनीन्द्र जानता था कि जब देवता सुरा और सुंदरी से नहीं बच सके तो बहोरन किस खेत की मूली है। सुरा और सुंदरी के इस पासें में अंततः बहोरन फँस गया और दिनोंदिन वह उसमें उलझता ही चला गया। निकल नहीं सका। फिर से, संस्थान में चौकड़ी वालों का आधिपत्य कायम हो गया और चौकड़ी वालों के लिए एक बार फिर से ‘रामराज्य’ आ गया था।
अब संस्थान पूर्ववत् अपने ढर्रे पर चलने लगा। संस्थान का कोई भी काम चौकड़ी की अनुमति के बिना नहीं होता था। यहाँ तक कि बहोरन भी कोई आदेश चौकड़ी से पूछकर ही देता था। पूरी तरह चौकड़ी के शिकंजे में आने के बाद बहोरन केवल ‘हस्ताक्षरकर्ता अधिकारी’ मात्र बनकर रह गया था। चौकड़ी की नजर में बहोरन अब अधिकारी नहीं बल्कि एक अनुपालक था।
देश के सबसे बड़े न्याय घर में चौकड़ी के अनुपालक के रूप में फर्जी दस्तावेज और झूठे शपथ-पत्र देकर बहोरन ने चौकड़ी के सदस्यों की रक्षा की थी। इस कारण चौकड़ी वालों ने बहोरन को भगवान देवाधिदेव महादेव का दर्जा दे रखा था क्योंकि, देवाधिदेव महादेव की तरह उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का कालकूट जो पी लिया था। जब भी बहोरन किसी सभा में, समारोह आदि में जाता तो चौकड़ी के नेतृत्व में पहला नारा-बहोरन भगवान जिंदाबाद का ही लगता था। इस तरह के नारों से आत्ममुग्ध बहोरन को तथाकथित भगवान की उपाधि मिल गयी थी।
उस दिन संस्थान के सभा कक्ष में उन शिक्षकों की पूरी मंडली बैठी हुई थी, जो बैठे-ठाले केवल गप्पें हाँका करते थे। अपनी उपस्थिति दर्ज कर वे मनबहलाव के लिए कभी सिनेमा, कभी चुटकुलेबाजी तो कभी राजनीतिक चर्चाएँ किया करते थे। उस समय वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर गरमा-गरम बहस चल रही थी। सरकारी संस्थाओं के निजीकरण का मुद्दा बहस के केन्द्र में था। बहोरन संस्थान के मुखिया थे और चौकड़ी के शिकंजे में आ जाने के बाद नाम के सर्वेसर्वा थे। संस्थान की पूरी व्यवस्था चाहे वह अकादमिक हो या शैक्षिक चौकड़ी के हाथों में आ गयी थी। संस्थान में तथाकथित रामराज्य आ जाने के कारण चौकड़ी के सदस्यों को कई तरह की खुली छूट थी। इसलिए कर्मचारियों-अधिकारियों का देर से आना और जल्दी जाना मानों, आदत-सी बन गयी थी। एक सप्ताह में पूरा होनेवाला काम छह महीने में भी नहीं हो रहा था। सदन में बैठे कर्मचारी-अधिकारी सरकार के निजीकरण की मंशा को कोस रहे थे। पर, किसी ने यह जानने का प्रयत्न नहीं किया कि सरकार ऐसा क्यों सोच रही है ? निजी संस्थान दिन-प्रतिदिन तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे थे और सरकारी प्रतिष्ठानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी। इसी समय सभाकक्ष में बैठे एक शिक्षक ने दूसरे शिक्षक से कहा- अभी आप का क्लास है महाशय। जाइए, कक्षा लेकर आइए। उस शिक्षक ने तपाक से कहा- मैं नहीं लूँगा। पहले शिक्षक ने फिर कहा- आपको लाखों का पगार मिलता है, किसलिए ? बिना देर किये दूसरे शिक्षक ने कहा- मैं कक्षा नहीं भी लूँगा तब भी पगार मिलेगा। उदाहरण भी दिया- कई ऐसे हैं, जिन्होंने महीनों क्या सालों तक कक्षाएँ नहीं ली हैं और उन्हें पगार बिना रुके मिल रहा है। मैं भी नहीं लूँगा तो मेरा पगार रुकने वाला नहीं है। देखते नहीं, संस्थान में अभी रामराज्य है। आराम करने दीजिए। कल क्या होगा, देखा जायेगा। बहोरन के इस रामराज्य से मुट्ठी भर लोग आश्वस्त हुए, अघोषित छुट्टियों का लंबा दौर चला पर भावी पीढ़ी के लिए भारी क्षति हुई।
बहोरन के चाल-ढाल से नब्बे वर्षीय रामदयाल की बूढ़ी, पर अनुभवी आँखों ने पढ़ लिया था कि उसके बेटे ने अपनी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता का रास्ता बदल लिया है। जिस रामदयाल ने जीवन भर सुरा छुई नहीं, परस्त्री को ठीक से देखा तक नहीं, उसी का बेटा सुरा-सुंदरी में आकंठ डूब जायेगा, सहसा उसे विश्वास नहीं हो रहा था। बेटे बहोरन के चारित्रिक क्षरण से रामदयाल की आँखें सजल हो उठीं और अंतर्मन से कुहक गया। भारी पीड़ा हुई। उधर कर्क रोग की पीड़ा से अवसादग्रस्त बहोरन के भीतर भी कसमसाहट और टीस कम नहीं है। इस टीस में उसके भीतर एक अंतहीन अंतध्र्वनि गूँज रही है- अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत।’ इन गूँजों के साथ ही दूर कहीं रेडियो पर बजती हुई गीत की ये पंक्तियां उसे सुनाई पड़ रही है:
जैसा करम करेगा, वैसा फल देगा भगवान।
ये है गीता का ज्ञान। ये है गीता का ज्ञान।।
रामदयाल की आँखों में आँसू हैं। बहोरन की आँखों में भी आँसू हैं पर, दोनों की आँसुओं में अंतर है। बहोरन की आँखों में जो आँसू हैं वे आत्मग्लानि के आँसू हैं और रामदयाल के आँसू ये कह रहे हैं- क्या इसी ‘रामराज्य’ के लिए हमने संघर्ष किया था? कष्ट झेला था? क्या आजादी के छह-सात दशक होते ही नयी पीढ़ी संघर्ष की उस अहमियत को भूल जायेगी? राष्ट्र का विकास हाशिए पर चला जायेगा और व्यक्तिगत सुख, भोग-विलास इतना हावी हो जायेगा कि निजी स्वार्थ के आगे राष्ट्र-समाज पीछे छूट जायेगा? रामदयाल के विचारों की दुनिया में रह-रहकर एक ही बात कौंध रही है कि हमारी कल्पना के रामराज्य में आदर्श, शुचिता, मर्यादा और नैतिकता के साथ-साथ समता-बंधुता के लिए खास जगह थी, जिसमें लोकमत के प्रति आदर का भाव था। हमने रामराज्य का क्या अर्थ सोचा था और हमारी अगली ही पीढ़ी ने दुर्भाग्य से रामराज्य का क्या अर्थ ले लिया?
तीन पहर रात बीत चुकी है। रामदयाल की आँखों से नींद गायब है। वह बहोरन की ओर कातर दृष्टि से देख रहा है। उसकी नम आँखें बहोरन की कभी तेज और कभी कम होती हुई साँसों पर टिकी हुई है। बहोरन को भी मालूम है कि उसके पास अब कुछ गिनती की साँसें ही बची हुई है। कर्क रोग की वेदना बहोरन के लिए असह्य है अब। वह पास बैठे अपने बेटे शशिकांत को अपने करीब बुलाता है। अस्फुट स्वर और इशारे से समझाता है कि बेटे! मैंने जो गलती की और राष्ट्र-समाज के साथ जो धोखा व अक्षम्य अपराध किया, उसकी सजा मुझे मिल चुकी है। बेटे का हाथ कसकर उसने पकड़ रखा है। वह आश्वस्त होना चाहता है कि भावी पीढ़ी फिर ऐसे कर्म न करे कि पूर्वज शर्मिंदा हों। बहोरन की वह पकड़ शनैः शनैः ढीली होने लगी है और देखते ही देखते हिचकियां भी लगभग शांत हो गयीं हैं। तभी, रात भर टिमटिमाता दिया हवा के हल्के झोंके से  बुझ गया पर दूसरे ही क्षण चिड़ियों की चीं-चीं के साथ पूरे परिवेश में एक अलौकिक आलोक फैल गया।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।