किसी रोचक उपन्यास की तरह है मनु जी की आत्मकथा: मैं मनु

समीक्षा: मैं मनु (प्रकाश मनु)

समीक्षक: मंजुरानी जैन

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पुस्तक का नाम – मैं मनु (आत्मकथा)
लेखक – प्रकाश मनु
प्रकाशन-वर्ष – 2021
पृष्ठ संख्या – 320
मूल्य – ₹ 399.00 रुपए
प्रकाशक – श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली-110041
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प्रकाश मनु जी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व हैं, यह सभी जानते हैं। हाल ही में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई है, ‘मैं मनु’। उनकी आत्मकथा का यह पहला भाग श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। हिंदी साहित्य में उनके कद के विषय में बताने की कोई जरूरत नहीं है। वे हिंदी साहित्य के सम्मानित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार, एकांकीकार, कवि और समीक्षक हैं। साथ ही मन छू लेने जाने वाले बड़े भावपूर्ण संस्मरण उन्होंने लिखे हैं। डा. प्रकाश मनु ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ जैसे महाग्रंथ के रचयिता तो हैं ही। केवल बाल साहित्य की उनकी सौ से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य की हर विधा में उन्होंने लिखा है और खूब लिखा है। साहित्य ही उनका ओढ़ना और बिछौना है। लगता है, वे साँस भी साहित्य में ही लेते हैं।

मंजुरानी जैन
मनु जी ने अपनी इस आत्मकथा को अपने माता-पिता, बड़ी बहन और दिवंगत हो चुके बड़े भाइयों को समर्पित किया है, ‘जिनकी स्मृतियाँ इस आत्मकथा के शब्द-शब्द में समाई हुई हैं!’ इन शब्दों में अपने माता-पिता और अपने से बड़े बहन-भाइयों के प्रति उनकी असीम श्रद्धा झलकती है, जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा और पाया भी।

कुछ अरसा पहले प्रकाश मनु जी के आत्मीय संस्मरणों की पुस्तक ‘यादें घर-आँगन की’ प्रकाशित हुई थी। उसमें उन्होंने अपने बचपन से लेकर, प्रसिद्ध बाल पत्रिका ‘नंदन’ में सह-संपादन के कार्यकाल तक के संस्मरणों को ताजा किया है। लेकिन अब प्रकाश मनु जी ने अपनी आत्मकथा को चार काल-खंडों में विभाजित करके लिखने का बीड़ा उठाया है। ‘मैं मनु’ उनकी आत्मकथा का पहला खंड है, जिसमें उनके बचपन से लेकर किशोर जीवन तक के अनुभव, घटनाएँ और प्रसंग अंकित हैं। यह भी कह सकते हैं कि उनकी यह आत्मकथा, उनके अंतर्मुखी से बहुमुखी होने तक के सफर की रोमांचक कहानी है, जिसके तार उनके घर-परिवार के आत्मीय जनों से लेकर उन बड़े साहित्यकारों तक फैले हैं, जिन्हें मनु जी अपना जीवन-आदर्श मानते हैं।

इस आत्मकथा की भूमिका ‘मेरी कहानी : कुछ भूली कुछ भटकी सी’ में उन्होंने अपने आत्म-संस्मरण और आत्मकथा के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। अपने लेखक बनने के पीछे अनेक कारणों का खुलासा भी किया है। उन्होंने हमेशा यह स्वीकार किया है कि बचपन में उनके एकांतप्रिय, घोर पढ़ाकू और अंतर्मुखी होने ने ही, उन्हें लेखन की राह पर चलने को प्रवृत्त किया है। उसमें नौ भाई-बहनों में आठवें नंबर के छोटे कुक्कू यानी अपने बचपन से लेकर किशोर जीवन से जुड़ी सभी स्मृतियों को मनु जी ने इस आत्मकथा के बहाने फिर से जिया है।
‘मैं मनु’ में उन्होंने अपनी बारीक-से-बारीक संवेदनाओं और स्मृतियों के धागों से इस आत्मकथा को बुना है। ‘बचपन के किस्से-कहानियाँ और सतरंगी दुनिया’, ‘स्कूल के वे अबोध दिन’, ‘काठ की तख्ती, मिट्टी का बुदक्का’, ‘सर्दियों की धूप और तालाब का किनारा’, ‘हमारा जेबखर्च और वे साढ़े पाँच आने’, ‘चम-चम सिक्के और मेवालाल की मिठाई’, ‘बचपन के खेलों का तिलिस्म’, बिजली—एक जादुई शै’, ‘श्याम भैया—मेरे बचपन के हीरो भी, गाइड भी...!’, ‘एक थी चींटी, एक थी फाख्ता’, ‘चश्मे वाला कुक्कू’ आदि अध्यायों में विभाजित इस आत्म-कहानी को प्रकाश मनु जी ने अपने बचपन के एक-एक किस्से की यादों से सजाया है। इसमें उनके पूरे बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियाँ बिखरी पड़ी है। बीच-बीच में उनकी कल्पना ने नित नई उड़ानें भरी हैं और जीवन की सातवीं कोठरी में कदम रखकर, मनु जी के लेखकीय जीवन की संघर्ष भरी दुनिया को आत्मसात किया है।
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प्रकाश मनु
हालाँकि इस सफर में मनु जी अकेले नहीं हैं, वरन् उनके साथ जीवन का पूरा प्रवाह है। उसमें समय है, लोक आख्यान हैं, परंपराएँ हैं, उस समय के इतिहास का कौतुक है और विचित्र वृत्तांत हैं। इसमें बचपन के अपने कल्पना-संसार में उड़ने, जीवन में अलग रास्ता चुनने, और अपने लेखन से दुनिया बदल देने के सपने देखने के असंख्य प्रसंग हैं। अपने जीवन में आए प्रत्येक व्यक्ति और उनसे संबंधित सभी स्मृतियों का उल्लेख उन्होंने पुस्तक में पिरोए अलग-अलग अध्यायों में बड़े विस्तार से खुलकर किया है। फिर चाहे उनके माता-पिता हों, भाई-बहन हों, उन सबसे जुड़े उनके जीवन-साथी और बच्चे हों, स्कूल और शिक्षक हों, दुकानदार हों, उनके जीवन और व्यक्तित्व से जुड़े अनगिनत प्रसंग हों, परिवार की तरह उन सबके सान्निध्य की स्मृतियों को प्रकाश मनु जी ने प्यार और ईमानदारी से जिया है।

बत्तीस अघ्यायों और 320 पृष्ठों में बिखरी उनकी इस आत्मकथा में मन की बातें और स्मृतियों के बेमिसाल अक्स बिखरे हुए हैं। ‘मैं, यानी कुक्कू’, ‘माँ की ममतालु आँखें’, ‘घर-परिवार का पुराना इतिहास’, ‘चंदर, मैं नवा चखाँ?’, ‘कुछ सतरें पिता के बारे में’, ‘बड़ी भैनजी और बाऊ जी’, ‘कृष्ण भाईसाहब—वह मुसकराता चेहरा’ और ‘श्याम भैया—मेरे बचपन के हीरो भी, गाइड भी...!’ अध्यायों में उऩ्होंने विशेष रूप से अपने और अपने परिवार के एक-एक सदस्य का परिचय, व्यक्तित्व और व्यवसाय आदि से जुड़ी बारीक-से-बारीक स्मृतियों को उकेरा है। यही नहीं, बल्कि अपने पाँच बड़े भाइयों और बड़ी भैन जी के जन्मस्थान कुरड़ गाँव का उन्होंने बड़ा ही सजीव वर्णन किया है, जो अब पाकिस्तान में है। कुरड़-कट्ठा गाँव और खुशाब तहसील की उस समय की सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों से अपने पाठकों को अवगत कराते हुए, मनु जी ने बहुत से रुचिकर प्रसंगों की चर्चा की है। 
उस जमाने के पिता के गाँव कुरड और जिला सरगोधा के रोचक वृत्तांत के साथ ही अपने दादा और नाना जी के परिवारों का सजीव खाका उपस्थित करके, उनसे जुड़े सहज और स्वाभाविक प्रसंगों के बीच वे पाठकों को दशकों पुराने माहौल में ले जाते हैं। अपने परिवार की व्यावसायिक बुद्धि और दादा जी के औघड़ व्यक्तित्व को भी उन्होंने बहुत सराहा है।

आत्मकथा के इस पहले खंड ‘मैं मनु’ में मनु जी ने अपने दादा, पिता और बड़े तीन भाइयों के कठिन परिश्रम से व्यापार आगे बढ़ाने के अनेक किस्सों को भी बड़े सहज भाव से गूँथ दिया है। बड़े करुण शब्दों में सन् 1947 की मार-काट और खून-खराबे की सच्ची तस्वीर उन्होंने खींची है। साथ ही बँटवारे के समय पाकिस्तान का हिस्सा बन गए अपने घर को छोड़कर आए परिवार के संघर्ष पूर्ण दिनों की पूरी कहानी भी शब्दों में उतार दी है। सन् सैंतालीस में भारत आने पर बड़ी बहन की शादी और उसके साथ ही शिकोहाबाद आकर पुर्नस्थापित होने पर और वहाँ के महत्वपूर्ण इतिहास का दिलचस्प खाका खींचना भी वे नहीं भूले।

दारा शिकोह की नगरी शिकोहाबाद में बस जाने पर बूढ़े दादा जी सहित पूरे परिवार की एकजुटता, धैर्य तथा कबीलाई संस्कृति, ऊपर से रूखे और कठोर लगने वाले पिता की दिलेरी और हिम्मत को प्रकाश मनु जी ने भरपूर सराहा है। यहाँ आकर एक बड़े परिवार के गुजर-बसर व छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी निभाने और खोई हुई साख को वापस लाने के लिए, पिता के साथ बड़े भाइयों की कड़ी मेहनत, त्याग और व्यवसाय-संबंधी बातें भी उन्होंने साझा की हैं। साथ ही अपने जन्म, बचपन और घर के प्रत्येक सदस्य से संबंधित रुचिकर जानकारी और एक-के-बाद-एक घटी छोटी-बड़ी घटनाओं को उन्होंने पूरे विस्तार से सामने रखा है। उनके मन की इस नदी में डूबती-उतराती और हिचकोले खाती, धीरे-धीरे किनारे तक आती नौका में बसी बचपन से किशोर जीवन तक की अमूल्य स्मृतियों का आत्मकथा में सुंदर विवरण है। 

इन सब परिस्थितियों से गुजरते हुए, बीच में बलराज भैया, श्याम भैया और एक भाभी की असमय मृत्यु का मार्मिक विवरण आँखें भिगो देने वाला है। समय के घूमते पहिए के साथ संघर्ष भरे दिनों से लोहा लेते हुए, अपने परिवार के डूबते-उतराते पलों और हालात का विवरण, कहीं होठों पर मुसकान बिखेर देता है, तो कहीं मन को गहरे तक छू लेता है। 
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आत्मकथा में बचपन का शब्द-चित्र उकेरते हुए मनु जी ने अपने से ढाई साल बड़ी बहन कमलेश का जिक्र विशेष रूप से किया है, जिसने उन्हें खुशी-खुशी अपने खेलों में तो भागीदार बनाया था। लेकिन कमलेश दीदी और उनकी सहेलियों द्वारा गुड्डे-गुड़िया की शादी, गुट्टे के खेल व अन्य सभी खेलों में उनकी कुशलता के सामने अपने को कच्चड़ और कमजोर पाकर, हीनभावना से ग्रस्त ‘कक्कू’ के अंतर्मन की मासूम अनूभूतियों का खाका मनु जी ने अपनी आत्मकथा ‘मैं मनु’ में बड़ी जीवंतता से उभारा है। ऐसी स्थिति में एक कमरे में बंद होकर शब्दों की दुनिया में सिमट जाने और उनसे खेलने वाले कुक्कू का लेखक बनना शायद तभी तय हो गया होगा।

माँ की ममतालु छवि का चित्रण करते हुए मनु जी ने अपनी नानी की सुनाई ‘अधकू की कहानी’ और माँ की सुनाई ‘सातवीं कोठरी’, ‘गिठमुठिए’, ‘एक बेटे की कहानी’ और ‘भूख’ का प्रमुख रूप से जिक्र किया है। ये ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें वे कभी भूल नहीं पाए और जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में उनकी प्रेरणा का स्रोत बनीं। ‘बचपन के किस्से-कहानियों की सतरंगी दुनिया’ अध्याय में इन कहानियों के अलावा और भी कई मजेदार कहानियों को पूरा विस्तार देते हुए, मनु जी ने अपने संवेदनशील और भावुक मन परं उनके प्रभाव का उल्लेख किया है। नानी और माँ से सुनी इन कहानियों के पात्र, उनकी कल्पना में किस प्रकार साकार होकर उभरे और उनके रचना संसार में सहजता से प्रवेश पाते चले गए, उसका पूरा ब्योरा आत्मकथा के पन्नों में मिल जाता है। बचपन में सुनी कहानियाँ आदमी के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं, प्रकाश मनु जी की यह आत्मकथा इसका जीता-जागता उदाहरण है। बचपन में सुनी अनेक कहानियों का प्रभाव उनके बाल साहित्य में मौजूद है। 
मनु जी की इस आत्मकथा को पढ़ते हुए बचपन से ही शब्दों के प्रति उनके दुर्वह आकर्षण का भी पता चलता है। घर के सामान के साथ आए अखबार के कागज से बने थैलों पर अंकित शब्दों के प्रति उनकी दीवानगी और पागलपन की हद तक पुस्तकों में छिपे खजाने को चाट जाने का शौक बचपन में ही उनके प्रकाश मनु बनने का संकेत देता है। कमलेश दीदी के खेलों का लोहा मानने वाले मनु जी ने छुटपन में उनकी पाठ्य पुस्तक के एक पाठ के सही उतर बताने और उसकी स्कूल में वाहवाही मिलने वाले प्रसंग का जिक्र करके, एक तरह से अपनी यानी ‘कुक्कू’ की पीठ थपथपाई है। या कहें, अपने को खेल-कूद में कच्चड़ और कमजोर समझने वाले संवेदनशील कुक्कू के आंतरिक घावों पर मरहम लगाया है। शायद उनका बाल साहित्य उनके बचपन के कुक्कू की इस नायाब तृप्ति और आनंद से ही निकला होगा।

बचपन में पिता का हुक्का भरने, साथ ही पिता को हुक्का पीते देख, स्वयं उसे गुड़गुड़ाने की नटखट जिज्ञासा को अंजाम देने, और गले में साँस अटकने पर अपनी बालसुलभ गलती से सबक लेने वाला किस्सा बड़ा रोचक है। ऐसे ही बड़े जोश से कबड्डी खेलते समय कई दिनों के जेबखर्च के जोड़े हुए साढ़े पाँच आने की अमूल्य रकम के खो जाने की घटना से उनके मन की जो हालत हुई, वह पढ़ने लायक है। ‘चमचम सिक्के और मेवालाल की मिठाई’ भी उनके जीवन की ऐसी मजेदार घटना है, जो अपने आप में एक कहानी ही है। उस समय के पुराने और नए सिक्कों के बीच का विवरण और मूल्य को लेकर उनका दिलचस्प दर्शन कमाल का है। साथ में जुड़े मेवालाल के ठेले की मिठाइयों का आकर्षण, कुप्पू की कहानी और दाल-सेब खाने के लिए पिता के हिसाब की कॉपी को रद्दी में बेचने के प्रसंग बड़े मजेदार है। नए और पुराने पैसों के हिसाब-किताब तक प्रकाश मनु जी को अब तक ऐसे याद हैं, जैसे यह अभी की बात हो। रुपए के मूल्य को लेकर उनके मन में उठने वाले कुछ प्रश्न तो अभी तक अनसुलझे ही रह गए हैं।
इतना ही नहीं, मनु जी की इस आत्मकथा का कलेवर काफी विस्तृत है, जिसमें अपने समय के सवाल, परिस्थितियाँ और संवेदनाएँ हैं। सन् 1962 में चीन के भारत पर आक्रमण के दौरान भारत में सेना और सरकार के आत्मबल को बढ़ाने के लिए भारत की जनता में देश-प्रेम का जो जज्बा दिखाई पड़ा था, और जगह-जगह लोग उत्साह से भरकर अपनी सेवाएँ देने के लिए आगे आए थे, मनु जी ने उसकी भी एक जोशीली झाँकी पेश की है। ‘चीनी आक्रमण और घायल हिदुस्तान का जज़्बा’ अध्याय इस लिहाज से देश के इतिहास की एक करुण कथा समेटे हुए है। 
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‘मैं मनु’ पढ़कर पता चलता है कि अपनी स्नेहिल और पवित्रता से सराबोर माँ को लेकर प्रकाश मनु जी के मन में एक विशेष जगह सुरक्षित है। मनु जी ने उनको एक प्यारे से तिनकों से बने घोंसले की संज्ञा दी है, जिसमें सिर छिपाए उन्होंने दुनिया के ढेर सारे जंजालों से बचते हुए, अपने को बड़ा होते देखा है। अपने देवस्वरूप नाना की छाप से गढ़े गए अपनी माँ के उदार और ममतालु व्यक्तित्व की गरिमा को प्रकाश जी ने जिस श्रद्धा और असीम प्यार के साथ याद किया है, वह अतुलनीय है।

पूरी आत्मकथा में ‘माँ की वे ममतालु आँखें’, ‘चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?’ और ‘आते जाते मौसम और त्योहारों की धूम’ नामक अध्याय सबसे अलग नजर आते हैं, जिनमें मनु जी ने अपने कोमल भावों के कैनवास को, अपनी यादों में बसी माँ की अनेक छवियों से सजाया है। माँ की स्नेह और जिज्ञासा भरी आँखों से झाँकते भोलेपन, पवि़त्र हृदय, उनके मीठे स्वर, उनमें व्याप्त विश्वास, उनकी भद्रता, दानशीलता व पर्वों को उत्सव रूप में मनाने की सहज संस्कारी वृत्ति तथा परिवार के लिए उनके गहरे समर्पण को मनु जी कभी नहीं भूल पाते। माँ उनके मन में बसी हैं और उन्हीं को वे अपनी निर्मात्री मानते हैं। आत्मकथा में माँ के जीवनावसान के समय की यादों का विवरण इतना मार्मिक है कि आँखें भर आती हैं। माँ के प्रति व्यक्त उनकी भावनाएँ मन को कहीं गहरे तक छू लेती हैं।

मनु जी ने अपनी आत्मकथा में कई ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है, जहाँ उनका भोला-भाला, कमजोर दिखाई देने वाला बचपन अंदर से उतना ही सशक्त और विद्राही दिखाई देता है। माँ और उनकी सहेलियों के बीच घुसकर, चुपके से उनकी बातें सुनकर, न जाने अपने भीतर वे क्या-क्या छिपाकर रख रहे थे। उन सबको इस बात का भान भी नहीं होगा कि उस सीधे-सादे, भोले-भाले बच्चे के अंदर अपनी उम्र से इतना बड़ा दिमाग होगा। लेकिन उनकी व्यक्तिगत बातों के बीच से स्त्री जाति की व्यथाओं को चुपचाप गुनकर, कुक्कू बचपन में ही इतना संवेदनशील हो गया कि उसके मन में ढेरों प्रश्न इकट्ठे होते गए, जिनके उत्तर शायद अब भी उसे नहीं मिल पाए। स्त्री जाति की सहनशीलता के प्रति उसकी संवेदनशीलता इस बात की परिचायक है कि उनकी सोच औरों से अलग और विशेष थी। इससे यह भी पता चलता है कि प्रकाश मनु बचपन से ही अपने घर-परिवार और मित्रों में सबसे अलग थे। उनकी आत्मकथा में उनका भावुक मन हर जगह दिखाई देता है।

कईं संदर्भो में उन्होंने अपनी माँ के व्यक्तित्व पर नाना जी के विलक्षण, शानदार, उदार व प्रभावकारी व्यक्तित्व की छाप को लक्षित किया है। अपने जमींदार नाना जी की दूसरे गाँवों में दूर-दूर तक फैली साख का भी उन्होंने बड़े सुंदर शब्दों में वर्णन किया है। यही कारण है कि उनकी मृत्यु के बाद भी, देश के बँटवारे के समय वहाँ के मुस्लिम समुदाय ने उनकी बेटी और उसके परिवार को आँखों में आँसू लिए बड़ी भावभीनी विदाई दी। नाना जी की शख्सियत का चित्रण करते हुए मनु जी ने उस समय की परिस्थितियों तथा अपनी मौसी, मौसा और मामा से जुड़ी मार्मिक घटनाओं का बहुत संवेदनात्मक ढंग से वर्णन किया है।

‘सर्दियों की घूप और तालाब का किनारा’ अध्याय भी बड़ा रोचक है, जिसे पढ़कर नन्हे कुक्कू के सरल मन का चित्र आँखों में कौंध जाता है। सिर पर कपड़ों की गठरी रखे तालाब पर कपड़े धोने जाती माँ। उनके साथ ही कपड़ों की छोटी सी गठरी पकड़े कुक्कू के भी तालाब पर जाने और वहाँ तालाब किनारे खूबसूरत प्राकृतिक नजारे में खो जाने का वर्णन चित्ताकर्षक है। फिर वहाँ खेल-कूद, मस्ती और खुश्शू खरगोश से दोस्ती के प्रसंग किसी चलचित्र की तरह लगते हैं। इसके साथ ही मनु जी ने बचपन में अपने छोटे भाई सत के साथ खेलने, अपनी बालसुलभ जिदों, अपने नटखटपन व नादानियों के कारण कुत्तों और बंदरों के काटने से भुगते दर्द की बहुत सी यादों से रूबरू कराया है। कमलेश दीदी और उनकी हमउम्र सहेलियों के साथ खेलने, और इसी संदर्भ में मुन्ने खाँ की बिसातखाने की दुकान पर तरह-तरह के खिलौने और सामान लेने जाने के प्रसंग रोचक हैं। इऩ्हें पढ़ते हुए मनु जी के मस्ती और नादानियों भरे बचपन की अऩेक दिलचस्प तस्वीरें आँखों के आगे आ जाती हैं।

यहाँ तक कि बचपन के प्रसंगों को याद करते हुए, वे फरीदाबाद के अपने घर में बंदर जैसे जानवरों के आतंक को याद करना भी नहीं भूले। बंदरों की सेना से पार पाने के लिए पैसे खर्च करके लंगूर की नियुक्ति करने का किस्सा बेहद मजेदार है। ये बातें पाठको को भी अपने बचपन की ओर खींच ले जाएँगी। 
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माँ की तरह ही मनु जी ने अपने पिता के पृथ्वीराज कपूर जैसे शानदार व्यक्तित्व की हर छवि को उभारा है। उनकी पठानों जैसी कद-काठी, पहनावा, चेहरा-मोहरा और गोरे-ललछौंहे रंग आदि का उऩ्होंने सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। साथ ही व्यवसाय में उनकी ईमानदारी, शानदार धज और कर्मयोगी छवि को भी उभारा है। मन-ही-मन अपने बच्चों से स्नेह करने वाले तथा घर की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ कर्मठता का पाठ पढ़ाने वाले पिता के आकर्षक व्यक्तित्व, उनकी उत्सवधर्मिता और सामाजिक सरोकार आदि के साथ ही मनु जी ने उन्हें घर के एक रोबीले मुखिया के रूप में देखा है और बड़े सुंदर शब्दों में उनका चित्रण किया है। यहाँ तक कि वे स्मृतियाँ भी उनके मन में ताजा हैं, जब बचपन में पिता उनकी कमजोर आँखों पर चश्मा चढ़वाने कि लिए, रेलगाड़ी में बैठ अलीगढ़ शहर ले गए थे। रेलगाड़ी की वह सुखद यात्रा भी वे आज तक नहीं भूले।

वहीं दूसरी ओर मनु जी ने पिता के व्यक्तित्व की कुछ कमजोरियों और उनके जीवन के कुछ नकारात्मक पक्षों को भी बड़ी सच्चाई से उद्घाटित किया है, जिससे उनके परिवार काफी संकट में फँस गया था। उन्होंने अपने पिता में दो विरोधी बिंबों को जरूर देखा, लेकिन उनके साथ बिताए गए बचपन से लेकर उनके अंतिम दिनों तक की अपनी स्मृतियों में उनकी आत्मीय छवियों को बड़ी खूबसूरती से सबके साथ साझा किया हैं।

कृष्ण भाईसाहब का आदर्श चरित्र भी आत्मकथा में बहुत अच्छे ढंग से उभरा है। उनके साथ जुड़ी अपने बचपन की स्मृतियों को मनु जी ने बहुत भावुक होकर याद किया है। घर-परिवार के कठिन समय में कृष्ण भाईसाहब का कॉलेज की पढाई छोड़कर पिता के व्यवसाय में हाथ बँटाना, उनके विवाह के रोचक प्रसंग और बाद में स्टेशन मास्टर बन जाने पर भी जीवन को सादगी से जीने की प्रवृत्ति, उनका प्रसन्न चेहरा, आशावादिता और दूसरों को हिम्मत बँधाने का दुर्लभ गुण—इन सबकी यादें आज भी उनके मन में ताजा हैं।

अपने से बड़े श्याम भैया के साथ मस्ती में गोते खाना, हवा से बातें करती उनकी तेज साइकिल पर बैठकर सैर करने के स्वर्गिक आनंद का अहसास, पतंगें उडा़ते समय उनका सहयोगी बनाकर दूसरों की पतंगें काटने का रोमांच तथा श्याम भैया के साथ चोरी-छिपे फिल्में देखने के अनुभवों को मनु जी ने बड़े भरे दिल से याद किया है। माँ के लाड़ले और अपने संस्कारी, ईमानदार पिता के दृढ़ और कठोर अनुशासन व बड़े भाई-बहनों की डाँट से डरने वाले कुक्कू को खुलकर जीने की सीख देने और उनके व्यक्तित्व को सँवारने का काम श्याम भैया ने ही किया था। घरघुसरे कुक्कू को उन्होंने ही बाहर की दुनिया की सुंदरता और विविधताओं से परिचित कराया। साथ ही उन्होंने मनु जी को सिखाया कि हमें हर चीज में आनंद लेना चाहिए। अगर हम जीवन में किसी छोटे से छोटे काम को भी पूरे मन से और आनंद लेकर करेंगे, तो इससे हमारा पूरा जीवन ही आनंदपूर्ण हो जाएगा। यह ऐसी सीख थी, जिसे मनु जी आज तक नहीं भूले।

शब्दों की दुनिया में खोए अपने छोटे भाई की रुचियों को भाँपकर श्याम भैया ने ही प्रेमचंद की कहानियों की किताबें भेंट करके उनके अंदर छिपे कहानीकार को जगाया था। इसी तरह श्याम भैया की अलमस्त कलात्मक दृष्टि प्रकाश मनु जी के दिलो-दिमाग पर अंकित दिखाई पड़ती है। यही कारण है कि श्याम भैया तो नहीं रहे, लेकिन मनु जी की कृतियों ‘नंदू भैया की पतंगें’ और ‘मैं मनु’ में श्याम भैया के प्रति उनकी संवेदना जैसे छलछला रही है।
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जिंदगी के निर्माण में कहीं-न-कहीं हमारे शिक्षकों की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण और प्रणम्य होती है। बहुत से लोग इस बात को भूल जाते हैं। पर प्रकाश मनु जी ने अपने प्यारे अध्यापकों को याद करते हुए, स्कूल के दिनों की बड़ी सुदर स्मृतियों को जिया है। उनके प्रारंभिक शिक्षा-काल में पालीवाल प्राइमरी स्कूल में नर्सरी कक्षा के बड़ी-बड़ी मूँछों और चश्मे वाले स्नेही मास्टर जी का उनके नाम ‘कुक्कू’ को लेकर चुहल करने का अनोखा अंदाज और उनकी हास्य-विनोदपूर्ण भंगिमाओ का चित्र सीधे मन में उतर जाता है। यह कौतुकपूर्ण प्रसंग अनायास ही पाठकों के होंठों पर मुसकराहट ला देता हैं।

इसके साथ ही मनु जी के बचपन की कुछ विचित्र और अटपटी आदतें, पाँचवीं कक्षा तक पहाड़े सीखने और जोर-जोर से दोहराने का जोश, हिंदी की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव होने पर मात्रा-संबधी उलझनें, और स्कूली जीवन के तरह-तरह के अनुभवों को उन्होंने इस आत्मकथा को लिखने के बहाने एक बार फिर से बड़े मजे लेकर जिया है। इन प्रसंगों में उनकी भाषा की सरसता देखने लायक है।

ऐसे ही पालीवाल इंटर कॉलेज में राजनाथ सारस्वत जैसे अंग्रेजी के गुस्सैल अध्यापक द्वारा सुनाई गई मुर्गा बनने की सजा को सुनकर अपनी जिद ठान लेने की किशोर वय प्रकाश मनु जी की दृढ़ता पाठकों के मन में विस्मय और रोमांच पैदा करती है। एक कमजोर ओर भोले-भाले बच्चे के रूप में उनकी दृढ़ता की एक मिसाल यहाँ दिखाई देती है, जिसे भूल पाना मुश्किल है।

‘मेरे अध्यापक, जिन्होंने मेरी आँखों को रोशनी दी’ अध्याय में मनु जी ने पालीवाल इंटर कॉलेज के कितने ही अध्यापकों की स्मृतियों से अपनी आत्मकथा को सजाया है। उनमें नवीं कक्षा में पढ़ाने वाले सारस्वत सर, इंटरमिडिएट के अंग्रेजी के मि. खुराना की आदर्श अध्यापक की सुंदर छवि, गणित के जादूगर सर गिरीशचंद्र गहराना, भैतिक विज्ञान के लक्ष्मणस्वरूप शर्मा जी व साहित्य के विद्वान शांतिस्वरूप दीक्षित आदि की छत्रछाया में शिक्षित व पल्लवित होने के प्रत्येक क्षण की स्मृतियों को प्रकाश मनु जी ने गहराई से जिया है। राजनाथ सारस्वत सर को लेकर उन्होंने एक लंबी कहानी ‘जोशी सर’ भी लिखी। प्रकाश मनु जी मानते हैं कि उनके सभी गुरुजनों ने किसी-न-किसी रूप में उनके अंदर के लेखक को जगाया है।

अपने बचपन से लेकर बहुत से प्यारे और सहयोगी मित्रों की यादें भी उऩ्होंने इस आत्मकथा में अंकित की हैं, जो काफी रोचक और संजीदा दोनों हैं। बनती-बिगड़ती दोस्ती के किस्से, अपने मित्र सत्ते की साइकिल को देखकर साइकिल चलाने की इच्छा और उसके व श्याम भैया के सहयोग से साइकिल सीखने की यादों का बड़ा रोचक वर्णन है। साथ ही साइकिल चलाने की मजेदार तकनीकें, सड़क पर नटों का अद्भुत और कौतुक भरा तमाशा देखने, ऊँचे-ऊँचे शानदार ताज़ियों और रामचंद्र की बारात निकलते देखने जैसी अनगिनत यादों को भी उन्होंने इस आत्मकथा में साझा किया है।

‘किस्सा चंदा मामा का’ नामक अध्याय में उन्होंने पालीवाल इंटर कॉलेज में छठीं कक्षा के दौरान ही अपने मित्र की एक छोटी सी दुकान से ओमप्रकाश शर्मा के जासूसी उपन्यास और कुशवाहा कांत के ‘लाल रेखा’ जैसे प्रसिद्ध उपन्यास किराए पर लेकर पढ़ने का भी जिक्र किया है। ‘चंदा मामा’ और ‘मनमोहन’ पत्रिकाओं में पढ़ी कहानियों के अजब-अनोखे अद्भुत पात्रों ने भी कहीं उनके बाल साहित्य को समृद्ध बनाया है। एक कहानी की पात्र एक राजकुमारी है। वह जब-जब सेब खाती है तो उसकी नाक बढ़ती जाती है और बढ़ते-बढ़ते मीलों दूर चली जाती है। ऐसे ही बचपन में अनारदाने की चटनी बेचने वाले एक हँसोड़ व्यक्ति को उन्होंने देखा, जो ‘चटनी’ को बड़ा आनंद लेकर ‘चतनी’ कहता था, तो मजा आ जाता था। उन्हें वह किसी किस्से-कहानी की तरह मजेदार लगा। किशोर वय में ‘पराग’, ‘नंदन’ पढ़ने और ‘धर्मयुग’ व साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के बाल-पृष्ठों से दोस्ती करने वाले कुक्कू की साहित्य के प्रति गहरी रुचि भी आत्मकथा के पन्नों में जगह-जगह नजर आ जाती है।

इस आत्मकथा को लिखने में बड़े भाई कश्मीरी भाईसाहब के किस्सागो व्यक्तित्व से भी उन्हें बहुत मदद मिली। मनु जी ने कश्मीरी भाईसाहब के योगदान को सराहते हुए, बहुत विनयपूर्वक लिखा है कि यदि वे पाकिस्तान स्थित कुरड़ गाँव की पारिवारिक इतिहास-कथा उन्हें न बताते, तो शायद इसका आनंद आधा रह जाता।

बचपन में मनु जी भले ही घरवालों के बीच एक भोले-भाले कमजोर और झेंपू-से बालक में रूप में नजर आते रहे हों, लेकिन समय-समय पर उनका विद्राही और जिद्दी स्वरूप भी इस आत्मकथा में दिखाई देता है। चाहे वह बचपन में माँ से अपने छोटे भाई सत के बराबर पैसे लेने की जिद हो, या सेकेंडरी पालीवाल स्कूल में राजनाथ सारस्वत जैसे अंग्रेजी के गुस्सैल अध्यापक द्वारा सुनाई गई मुर्गा बनने की सजा को न मानने की अडिग जिद का मामला हो। या फिर किशोर वय में श्याम भैया को यह जता देना हो कि उन्हें फिल्में नहीं, साहित्य पढ़ना कहीं अधिक अच्छा लगता है।

इसी तरह इंटरमीडिएट में मनु जी का अपने दोस्तों के साथ मिलकर अंग्रेजी के खिलाफ आंदोलन करना भी जता देता है कि वे सही बात के लिए लड़ना जानते हैं। कक्षा में खिड़कियों पर दरवाजे लगाने की जिद और ‘यस सर’ के बजाय हिंदी के शब्दों से कक्षा में उपस्थिति दर्ज कराने की माँग को लेकर, कक्षा में ब्लैकबोर्ड के नीचे बैठकर उनका अनशन करना—ये ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे पता चलता है कि यह अंतर्मुखी बालक समय के साथ कितनी तेजी से बदल रहा था। बड़े भाई जगन भाईसाहब के जब-तब डाँट लगाने पर इकठ्ठे हुए गुस्से में मनु जी का घर से भाग जाना भी ऐसा प्रसंग है, जिसे पढ़कर उनके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ पता चलता है। ये सब छोटे-बड़े प्रसंग उनके विद्रोही स्वभाव को प्रमाणित करते हैं। मनु जी के उपन्यास ‘गोलू भागा घर से’ में गोलू के घर से भाग जाने पर उसे जिस तरह के अनुभव हुए, वे कहीं न कहीं मनु जी के अपने जीवन से ही आए जान पड़ते हैं।

इसमें संदेह नहीं कि अपने अतीत का इतना सुंदर चित्र शब्दों के माध्यम से तभी खींचा जा सकता है, जब आदमी को उससे गहरा लगाव हो। लगता है, मनु जी ने अपने बचपन की एक-एक घटना को मन में सँजोकर रखा, ठीक किसी लॉकर में रखे अमूल्य खजाने की तरह। आत्मकथा में एक के बाद एक ढेरों विस्मयपूर्ण प्रसंग उनकी कलम से सहज ही निकलते चले गए हैं, जैसे उपन्यासों में एक कथा के अंदर दूसरी उपकथाएँ एक के बाद एक गुँथती चली जाती हैं। उन्हें पढ़कर ही उपन्यास का पूरा आनंद लिया जा सकता है।

वास्तव में ‘मैं मनु’ को एक आत्मकथात्मक दिलचस्प उपन्यास की संज्ञा देना श्रेयस्कर होगा। इसे पढ़कर समझ में आता है कि मनु जी का परिवार तो बहुत बड़ा है, जो उनके जीवन में आए सभी लोगों को मिलाकर ही पूरा होता है। इन सारे लोगों के साथ जुड़े किस्सों का क्रमवार ब्योरा बड़ा अद्भुत है।

सच पूछिए तो मनु जी की विगत स्मृतियों से सजा हुआ उनकी आत्मकथा का एक-एक शब्द उनके मन से निकला प्रतीत होता है। यही कारण है कि उनकी यह आत्मकथा मनमोहक भाषा में सरलता से लिखा ऐसा आत्मकथात्मक उपन्यास है, जिसे एक बार शुरू करने के बाद पूरा पढ़े बिना हम छोड़ नहीं सकते। निश्चित रूप से आत्मकथा साहित्य में ‘मैं मनु’ की एक अलग पहचान बनेगी।
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