गीत: सोच व्यभिचारी हुई है

बृज राज किशोर 'राहगीर'
आदमी बारूद जैसा हो गया है।।

जब, जहाँ देखो, वहीं फटने लगा है।
बेवजह मैदान में डटने लगा है।
प्रेम की सारी किताबें बंद करके,
सिर्फ़ हिंसा का सबक़ रटने लगा है।
पूछता है कौन अब शालीनता को,
क्रूरता के मंच पर ग़ायब दया है।।

भावनाओं के कमल मुरझा रहे हैं।
आपसी रिश्ते दरकते जा रहे हैं।
स्वार्थ सधता हो तभी सम्बन्ध रखिए,
लोग अब यह रास्ता अपना रहे हैं।
ज़िंदगी की हादसों वाली सड़क पर,
दोस्तो यह हादसा बिल्कुल नया है।।

चेतना पर वासना तारी हुई है।
आदमी की सोच व्यभिचारी हुई है।
मानसिक विक्षिप्तता वाले समय में,
यौन-इच्छा एक बीमारी हुई है।
देश में क़ानून कितने ही बने पर,
आज भी हर ओर कोई निर्भया है।।।

पता: FT-10, ईशा अपार्टमेंट, रूड़की रोड, मेरठ-250001 (उत्तर प्रदेश), भारत
संक्षिप्त परिचय: वरिष्ठ कवि, पचास वर्षों का लेखन, दो काव्य संग्रह प्रकाशित, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं एवं साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित, कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ

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