एक कहानीकार का सकारात्मक ‘सुनेहा’

समीक्षा: मधु संधु

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब

पुस्तक- सुनेहा  
कहानीकार-   डॉ. शमीर सिंह     
प्रकाशक- बिम्ब प्रतिबिंब, फगवाड़ा, पंजाब
मूल्य- 185/
ISBN- 978-93-91562 -35 -9 
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उस दिन डॉ. शमीर सिंह जी की मोबाइल कॉल थी, ब्रिटिश कोलम्बिया से। थोड़ी बातचीत हुई और फिर उन्होंने बताया कि उनकी कहानियों पर पुस्तक आई है- सुनेहा। सुनेहा पर बात करते वे अतीत की यात्रा में गुम होने लगे कि दशकों पहले जब स्टडी वीज़ा पर वे लाहौर गए थे तो एक व्यक्ति ने ‘भरावां का ढाबा’ के मालिक के लिए उन्हें एक संदेश दिया था। आज भी यह ‘भरावां का ढाबा’ और इसी के भाग ‘द ब्रदर्स’ की अनेक शाखाएँ इस शहर अमृतसर में हैं। शमीर सिंह मेरे शहर के हैं, हमपेशा रहे हैं और गुरूभाई भी। उनका शोध क्षेत्र मुख्यत: गुरुवाणी, गुरुमति काव्य और गुरमुखी लिपि के हस्तलिखित ग्रन्थों पर है। शमीर सिंह एकदम शांत और सौम्य स्वभाव के हैं । उनकी बातें सुनकर बहुत अच्छा लगा और जब पुस्तक हाथ में आई तो एक ही सिटिंग में पढ़ डाली या कहें कि उन कहानियों की चुम्बकीय शक्ति ने उठने ही नहीं दिया। पुस्तक में 10 छोटी कहानियाँ संकलित हैं- सुखी रहो, जज़्बा, आहत, यात्रा, सुनेहा, नसीरां, अलार्म, प्रश्न, हल्की सी चीख, लचछू चाचा।  कहानियों में एक ही संदेश है- पाठकों को, आज की पीढ़ी को, साहित्यकार को, आम आदमी को- पीछे मुड़ कर देखो, मूल्यवत्ता, सकारात्मकता तुम्हें बुला रही है, चेता रही है। तरसेम गुजराल ‘दरवाजे पर दस्तक’ में लिखते हैं-

मधु संधु
“उम्र के इस पड़ाव पर उन्होने अपनी गुमशुदा कहानियों को खोज निकाला, यह उनकी रचनाधर्मिता को पाठक जगत तक लाने का अद्भुत प्रयास है। ... उनकी कहानियाँ अपनी सादगी और अर्थपूर्णता के कारण हिन्दी साहित्य जगत में अपनी जगह बनाए रखेंगी।”[1]     
इस देश ने विभाजन की विभीषिका झेली- भोगी है और इसके अनेक पक्षों पर अज्ञेय की ‘शरणदाता’ , कृष्णा सोबती की ‘सिक्का बदल गया’, मोहन राकेश की  ‘मलबे का मालिक’, अश्क की ‘चारा काटने की मशीन’, महीपसिंह की ‘पानी और पुल’, कमलेश्वर की  ‘भटके हुये लोग’ आदि कहानियाँ मिलती हैं।  यशपाल का ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी का ‘तमस’, कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’, नासिरा शर्मा का ‘ज़िंदा मुहावरे’, कृष्णा सोबती का ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ उपन्यास उसी त्रासदी के दस्तावेज़ हैं। ‘ तमस’ के इलावा खुशवंत सिंह के ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’ अमृता प्रीतम के ‘पिंजर’ ने चित्रपट पर इस त्रासदी का वर्णन किया है। ‘सुनेहा’ संकलन की ‘सुखी रहो’, ‘सुनेहा’, ‘प्रश्न’ 1947 के उसी विस्थापन से संबद्ध हैं। आम आदमी की त्रासदियों का जनक यह विभाजन तो एक राजनीतिक निर्णय था। हवाएँ और पक्षी तो आज भी सीमाओं के आर- पार उड़ाने भर रहे हैं, बस मानस जात को इजाजत नहीं है -
“सीमा पर हवाएँ तो पहले की तरह वैसे ही बहा करती, पक्षी भी सीमा के आर-पार पहले की उड़ान भरते हुये आते- जाते, मगर हिन्दू- सिख पाकिस्तान की तरफ न जा सकते और न ही मुसलमान पाकिस्तान की तरफ से हिंदुस्तान आ सकते थे। ”[2]    
विभाजन अपने साथ सांप्रदायिकता, पलायन, विस्थापन, अपनों को खोने का दर्द, अमानवीय हिंसा, उजड़ने की पीड़ा, मार- काट, नफरत, लूटपाट, आगजनी, छीना झपटी, असुरक्षा, बिलखना लेकर आया। आज भी पंजाब की उस पीढ़ी के घाव रिस रहे हैं । ‘सुखी रहो’[3] की धन्नो का पति और ससुर वहशी हजूम की बर्बरता का शिकार हो प्राण खो देते हैं और सास भी दम तोड़ देती है।  
कहानियाँ विस्थापन में समाई मानवता की, संत्रास में समाये जीवनराग की, द्वेष में समाये स्नेह की, निराशा में समाये जीवट की बात करती हैं। डॉ. शमीर सिंह लिखते हैं-
“विश्वस्त सा मैं इन कहानियों में मानव सौहार्द व पारस्परिक प्रेम के संदेश को देशव्यापी सीमाओं से पार प्रसारित करने के लिए यत्नशील बना रहा हूँ। ”[4]
 ‘ सुखी रहो’ की धन्नो की शादी पर पिता के दो मुसलमान मित्र भी आते हैं। विभाजन के समय, जब मुसलमानों का झुंड घर को घेर लेता है, तब भी जगतार के पडोसी हामिदा और राशिद सहारा बनकर साथ खड़े हो जाते हैं। चौधरानी सास बहू को अपने घर ले जाती है। पति, सास, ससुर की ह्त्या के बाद पड़ोसिन ही सहारा बनती है और कालांतर में अपने भतीजे से उसकी शादी करके फिर से उसका घर बसा देती है। धन्नो का पति पाँच दिन का वीज़ा लगवा भारत उसके मायके घर भी आता है। ‘सुनेहा’ का नायक 1989 में दस दिन के स्टडी वीजे पर हस्तलिखित प्रतियों की छानबीन करने लाहौर आता है और लोगों का प्यार, अपनापन और अतिथि सत्कार का जज़्बा उसे अभिभूत कर देता है। कोई शर्बत पिलाता है, कोई अमृतसर की यादें सांझी करता है और कोई मित्र के लिए संदेश भेजता है।  ‘प्रश्न’  में पाकिस्तान आए नायक को मोहसिन साहिब अपनी बेटी की शादी के आयोजन में आमन्त्रित करते है, भट्ट साहिब और मोहसिन भाई के साथ बचपन की, स्कूल की यादें ताज़ा की जाती हैं।         
एक विरासत खो देने की पीड़ा, सभ्यता, संस्कृति, भाईचारे के केंद्र लाहौर को खोने का दर्द, ननकाना साहिब, पंजा साहिब, करतारपुर साहिब, कटासराज जैसे धर्मस्थलों के छूट जाने की कसक आज भी पंजाब के हृदयतल में कुलबुलाती है। लाहौर के पंजाब यूनिवर्सिटी पुस्तकालय, दयालसिंह कॉलेज पुस्तकालय, मालरोड पर स्थित स्टेट लाइब्ररी, महाराजा रणजीतसिंह के शाही किले के पुस्तक भंडार के पराये हो जाने की वेदना कुछ ऐसी थी कि देश की सांस्कृतिक विरासत ही पराई हो गई हो। ‘सुनेहा’ का नायक 1989 में दस दिन के स्टडी वीजे पर हस्तलिखित प्रतियों की छानबीन करने लाहौर आता है। 
सात्विकता, धर्म यहाँ सर्वोत्तम हैं। ‘सुखी रहो’ में अमृतधारी पिता सुजान सिंह ग्राहकों से बातचीत करते हुये अक्सर गुरुबाणी की तुकों का उच्चारण करते हैं और तराजू तोलते समय वाहिगुरु अलापते हैं। खाना खाने के बाद वाहिगुरु का शुक्राना करना कभी नहीं भूलते। बेटी के पाकिस्तान से आने पर अखंड पाठ रखवाते हैं। ‘ यात्रा’  का गुरदीश बस में गुटका खोल जपुजी साहिब का पाठ करता है। 
भारत में एक ऐसा समय भी आया था, जब आम आदमी प्रशासन से आतंकित था, लेकिन यह देश एक संस्कृति से अनुस्यूत है- राम की, रामायण की संस्कृति। ‘आहट’  कहानी में लेखक कहता है कि जब हर आहट संत्रास को जन्म दे रही थी, पुलिस राज का आतंक था, तब भी श्रद्धानत पुलिस के जवान  रामायण का एपिसोड देखने के लिए घरों के दरवाजे खटखटा लिया करते थे।    
रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, आत्मीयता, सहृदयता के भी होते हैं। प्रवासी पंजाब प्रदेश का हो या चीन का, किशोर हो, युवा हो या वृद्ध हो, ‘जज़्बा’  कहानी कहती है कि इंसानियत सब को जोड़ देती है। 
‘नसीरां’  गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय की कुर्बानियों और साहस को अंकित  करने वाली ऐतिहासिक कहानी है और इसकी केन्द्रबिंदू पीर बुद्धूशाह की वीर पत्नी ‘नसीरां’ है। ‘अलार्म’  में सुषमा और संगीता के माध्यम से लेखक स्पष्ट करता है कि पूर्वाग्रह स्थायी नहीं होते अलार्म की तरह। सादगी, कड़ी मेहनत, लक्ष्यबद्धता व्यक्ति का कद ऊँचा कर देती है। ‘हल्की सी चीख’  में पशु प्रेम और पिल्ले की  मानवीयता है। 
डॉ. शमीर सिंह की कहानियाँ कहती हैं कि साहित्य सिर्फ दुखों की, संतापों की दास्तान नहीं है। सृजन का मूल सिर्फ वेदना और उदासी नहीं है। सिर्फ वियोगी ही कवि नहीं होते।    
इन कहानियों की शैली में आत्मकथात्मकता/ संस्मरणात्मकता  का स्पर्श है। कहानियाँ छाया चित्रों सी, अतीत की स्मृति सी हैं। यहाँ जीवन के खंड चित्र हैं, आज की समस्याएँ या तनाव नहीं, बीते कल की सहृदयता है। लेखकीय सम्मोहन पाठकीय चेतना को छह, सात, आठ दशक पीछे की यात्रा पर ले जाता है और वह सोचता है- क्या यही सतयुग था। जब इंसान के पास इंसान के लिए समय था। जब मन की बात पढ़ने में सब निष्णात थे। जब सुख- सुख वैयक्तिक नहीं सांझे हुआ करते थे।  
पंजाब विभाजन की कहानियों में पंजाबियत तो कूट- कूट कर भरी है। पंजाबी नामों में (धन्नो, जगतार,), शीर्षकों में (सुनेहा), शब्दों में (कायिनात, हालेमी), मुहावरों में, धर्म में, संस्कृति चित्रण में, गीतों में (अव्वल अल्ला नूर उपाइया, कुदरत दे सब बंदे    
 

इस सुनेहे में स्नेह- सौहार्द की पदचाप है, थपकियाँ हैं। भाषा में मिठास है, जादू है, शैली में कशिश है। 


संदर्भ

1. डॉ. शमीर सिंह, सुनेहा, बिम्ब प्रतिबिंब, फगवाड़ा, पंजाब, 2022, दरवाजे पर दस्तक, पृष्ठ 14 
2. वही, सुनेहा, पृष्ठ 41 
3. वही, सुखी रहो 
4. वही, आत्म स्वीकृति, पृष्ठ 15  
5. वही, प्रश्न 
6. वही, यात्रा 
7. वही, आहट 
8. वही, जज़्बा 
9. वही, नासिरां 
10. वही, अलार्म 
11. वही, हल्की सी चीख 
12. वही, यात्रा, पृष्ठ 38 


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