असगर वजाहत का नाटक 'इन्ना की आवाज़', बर्बरता और सत्ता का प्रतीक

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत


                    साहित्यकार भी दूसरे मनुष्यों की भांति एक सामाजिक प्राणी है, जो तत्कालीन राजनीति से अछूता और अप्रभावित नहीं रहा। इसलिए साहित्यकार की कृत्तियाँ राजनीति से प्रभावित होती हैं और इन कृत्तियों में राजनीति के अवशेष देखने को मिल जाते हैं। साहित्य की राजनीति पर नंदकिशोर आचार्य लिखते हैं, "यह राजनीति किसी विचारधारा या दर्शन से नहीं स्वयं साहित्य की अपनी प्रक्रिया से उपजी मूल्य संवेदना से प्रेरित और संचालित है। इसी अर्थ में साहित्य साहित्य कर्म है जिसे अपने राजनीतिक बोध में अपने से बाहर की किसी सत्ता या प्रक्रिया से अनुशासित होने की जरूरत नहीं है।"  [1]

हमारे देश में राजनीति की भावना आज़ादी से पहले एक दर्शन और सेवा भाव के रूप में था। किंतु आज राजनीति का स्वरूप बदल गया है। आज राजनीति सत्ता प्राप्त करने का एक यंत्र बन गई है। डॉ श्याम शर्मा के शब्दों में- "स्वतन्त्रता के बाद देश की राजनीति में जीवन की प्रक्रिया को विकृत, विषमता सड़ांध से भर दिया है। राजनीति में शैशव का दरवाजा खटखटाती पीढ़ी के मालिक में बदबू भर दी और व्यक्ति को जीवन मूल्यों से अलग-अलग कर उसे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थादि भावों में बांध दिया है। देश को आज़ादी तो मिली पर उसके भोग का अधिकार राजनेताओं, पूँजीपतियों और नौकरशाहों ने अपने लिए सुरक्षित कर लिया है और आम आदमी के नाम पर शोषण का दमन चक्र चलाकर मानव जीवन को खोखला कर दिया है।" [2]

कहने को तो हम आज़ाद हो गए हैं, किंतु हम आज राजनीतिज्ञों की राजनैतिक बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। जहाँ पहले राजनीति का संबंध समाज ले लिए नीति निर्माण के होता था, आज वहीं राजनीति से नीति लुप्त हो गई है और सिर्फ राज ही रह गया है। प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा है- "राजनीति आज विषमीकरणों का कूड़ाघर बन चुकी है। वह मानव मूल्य, तर्क, विवेक, बुद्धि, संवेदना आदि की कब्रगाह है।" [3]
अब राजनीति सेवा भाव नहीं,बल्कि एक पेशा बन चुकी है और राजनेता व्यापारी बन गए हैं। इन नेताओं का उद्देश्य अब सिर्फ अपनी भलाई एवं स्वार्थ को साधने तक सीमित रह गया है। जनता की सुविधा इन भोगीवृत्ति राजनीतिज्ञों के लिए वरदान बन गई है। जनता इतनी खोखली और असहाय हो चुकी है कि सत्ता उसे कठपुतली की तरह नाचती है। अर्थात "जनता इतनी बुरी चीज है। खुद तो प्रलोभन में फंसती ही है, दिग्भ्रमित होकर अवसरवादी राजनीति की कठपुतली बनती ही है।" [4]

राजनेता इंसान की ईमानदारी को गुंडागर्दी और पदोन्नति के द्वारा खरीद लेते हैं। आज राजनीति में अपने विरोधियों को समाप्त करने के लिए नेता साम, दाम, दंड, भेद के साथ-साथ कई प्रकार के षड्यंत्रों का भी प्रयोग करते हैं। राजनीति के इस भयावह और विकराल रूप के बारे में डॉ लक्ष्मीनारायण लाल लिखते हैं- "राजनीति की बुनियाद किसी न किसी रूप में हिंसा पर आधारित होती है। राजनीति का लक्ष्य ही सत्ता प्राप्त करना है। जहाँ सत्ता की भूख है, वहाँ हिंसा अनिवार्य है। इसीलिए दाँवपेच राजनीति का एक अस्त्र है। क्योंकि वह विरोधी को परास्त करने के लिए आवश्यक है।" [5]

राजनीति एक ऐसी भावना बन चुकी है जो सत्ता प्राप्ति के बाद मनुष्य के भीतर की मनुष्यता को मार देती है और स्वार्थ की हवस की भावना में जकड़ लेती है। मनुष्य अपने खूनी रिश्तों, सगे-संबंधियों, जिगरी दोस्तों की भी परवाह नहीं करता है। बल्कि वह अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इन सब की बलि तक चढ़ाने पर तत्पर रहता है। "साम्राज्य लिप्सा, राजनीतिक कुचक्रों, झूठे वादों, कोरे आश्वासनों और सत्ता अथवा संगठन के प्रति मोह ने जनता को सदैव उत्पीड़ित किया है। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के चरणों में जब पहली बार सत्ता सिंहासन तथा राजा की स्थापना हुई होगी शायद तभी से बहुत स्वाभाविक रूप में राजा और प्रजा के संबंधों के बीच यह लहर व्याप्त हो गया होगा। राजा इस विश्वास के साथ बनाया जाता है कि सत्ता और संगठन की ताकत से प्रजा का पोषण तथा रक्षण करेगा। परंतु राजा, राजा बनते ही निरंकुश हो जाता है और पोषण तथा रक्षण की बात भूल कर शोषण और भक्षण करने लगता है।" [6]

राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि इसमें ईमानदार व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं रह गई है और न यहाँ कोई नैतिकता का मोल रह गया है। अब सवाल यह उठता है कि "जब राजनीति सत्ता केंद्रीय हो जाए, अंध-राष्ट्रीयता जोर मारे और गलत दाँवपेच की स्वीकृति मिलने लगे,तो सही रचना क्या करें?" [7]

असगर वजाहत ने ‘इन्ना की आवाज’ में सत्ता के उन्हीं षड्यंत्रों और दाँवपेंच का रेखाचित्र खींचा है जो मानवीय मूल्यों और नैतिकता को उठाकर ताक पर रख देती है और समाज में भ्रष्टाचार फलने-फूलने देती है। यह नाटक मध्य एशिया की एक लोक कथा पर आधारित है।

              सुल्तान ने बीस वर्ष पूर्व जिस महल के निर्माण का आदेश दिया था,वह महल अब बनकर तैयार हो गया है। अब सिर्फ महल के द्वार पर सुल्तान का नाम लिखाना रह गया था। किंतु आश्चर्य इस बात पर होता है कि महल के द्वार पर सुल्तान का नाम मिट जाता है और गुलाम इन्ना का नाम स्वयं लिख जाता है। इस चमत्कार को देखकर सभी अचंभे में पड़ जाते हैं। यह बात सुल्तान बिल्कुल सहन नहीं होती है। इन्ना (एक मामूली चरवाहा) सुल्तान के महल के लिए काम करता था। वह समान ढोने वाले घोड़ों को पानी पिला दिया करता था। सुल्तान ने इस राज़ को जानने की कोशिश की । तब सुल्तान को पता चला कि राज्य में लोग इन्ना को एक झलक देखने के लिए कितना आतुर रहते हैं। इन्ना जब चरवाहों का नगमा गाता था तब सब मंत्र-मुग्ध हो जाते थे। सुल्तान इन्ना को गिरफ्तार करवाना चाहता था किंतु उसे भय था कि कहीं लोग विद्रोह न कर दे। इसलिए सुल्तान ने इन्ना के विरुद्ध षड्यंत्र रचा।
 
                    सुल्तान यह समझ गया था कि जब तक इन्ना में इंसानियत रहेगी तब तक महल के द्वार से उसका नाम नहीं मिटेगा । इसलिए सुल्तान ने बड़ी चतुरता के साथ इन्ना को प्रलोभन के माध्यम से भटकने के लिए मल्का को इन्ना के घर भेजता है। मल्का इन्ना की आवाज़ की प्रशंसा करती है और उससे आग्रह करती है कि वह वजीर ए आज़म का पद स्वीकार कर ले।

"मल्का: इन्ना,तुम अपने माज़ी को भूल जाओ क्योंकि तुम्हारा मुस्तक़बिल बहुत शानदार है। तुम्हारी सलाहियतों से मुतास्सिर होकर हम तुम्हें अपना वज़ीर ए आज़म बनाना चाहते हैं।" [8] 

इन्ना प्रधान मंत्री का पद स्वीकार कर लेता है।

        प्रधान मंत्री बनने के बाद वह जनता के समक्ष आता है और उनके लिए काम करने का वादा करता है। उसने जनता की भलाई के लिए आदेश जारी करता है, किंतु उन आदेशों का पालन नहीं किया जाता है। उसके आदेशों के बावजूद के बाद भी देश में मक्कारी, भ्रष्टाचार आदि अपने चरम-सीमा पर पहुँच गए थे। इन्ना सत्ता भोग में इतना लिप्त हो चुका होता है कि वह इन बातों से अनजान रहता है। सत्ता के नशे में ड़ूबकर वह जनता पर अत्याचार, खून-खराबा तथा शोषण करने लगता है। इन सब कुकृत्यों से इन्ना का नाम महल के द्वार से स्वयं मिट जाता है। अंत में सुल्तान उसका मंत्रीपद छीन, उसे ठोकर मारकर उसे महल के बाहर निकालवा देता है। इस प्रकार इन्ना की हालत धोबी के कुत्ते जैसी हो जाती है जो न घर का होता है और न घाट का। उदाहरण देखिये-

"इन्ना: मुझे किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है हुज़ूर...?
सुल्तान: इस जुर्म की सज़ा कि तुम इन्ना थे।
इन्ना: लेकिन अब तो मैं इन्ना नहीं हूँ सुल्ताने आलम।
सुल्तान: अब तुम न इन्ना हो और न हमारे वज़ीरे आज़म।" [9]

         इस प्रकार हम देखते है कि सुल्तान ने किस प्रकार षडयंत्र रचकर एक ईमानदार इंसान इन्ना को भ्रष्टाचार और अत्याचार के जाल में जकड़ दिया है। यह नाटक सिर्फ मध्यकालीन शासक और उसकी कुटिल नीतियों का खुलासा नहीं करता है बल्कि समकालीन राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और निरंकुशता पर भी प्रहार करता है। डॉ नरनारायण राय के शब्दों में "सत्ता किस तरह लोगों को भ्रष्ट करती है यह दिखाता है इन्ना की आवाज।" [10]

संदर्भ
[1] नंदकिशोर आचार्य, लेखक की साहित्यकी, पृ.127,  वाणी प्रकाशन प्रथम संस्करण 2008
[2] लहरों के राजहंस- मोहन राकेश, पृ-128
[3] समकालीन कविता संप्रेषण- विचार आत्मकथा- वीरेंद्र सिंह, पृ, 60
[4] नागार्जुन कि कविता- अजय तिवारी, 52
[5] आधी रात से सुबह तक- लक्ष्मीनारायण लाल, पृ -5
[6] सिंहासन खाली करो- सुशील कुमार सिंह (भूमिका)
[7] रचना और राजनीति- प्रेम शंकर, पृ- 37
[8] इन्ना की आवाज़- असगर वजाहत, पृ-57
[9] इन्ना की आवाज़- असगर वजाहत, पृ-77
[10] नया नाटक: उद्भव और विकास- डॉ नरनारायण राय, पृ-185  

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