काव्य: चंद्र मोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी

1. आत्मभक्षी ऑरोबोरोस*


‘माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या’
 ग्रीक आख्यानों की ‘गाया’
जीव-जगत की पालनहार;
कब और किसने रच दी
जैविक विकास की अनूठी माया?
कुदरत में निखर आया
असीम सौन्दर्य, अतुलित वैविध्य 
और सबके इतर 
मानव-मस्तिष्क का चमत्कार!

कुदरत ठगी सी रह गई
चाहा कुछ, क्या सामने आया?
भस्मासुर कहें या फ्रैकन्स्टाइन
फितरती, अपनी असलियत पर आया 
धरा सुत - जीतने निकला उसे
स्व-घोषित स्वामी विश्व का
संपदा, साधन व संसाधन सभी
उसीके लिये, अधिकार उसका
‘बेकनी सिद्धांत’ का आदर्श ले 
उपभोक्ता प्रारूप में वह रम गया।

सुनी थी हमने कथा
‘ऑरोबोरोस’ नामक सर्प की 
निगलने चला जो स्वयं को  
पूंछ से ही कर दिया प्रारम्भ 
चलती चली यह प्रक्रिया
और वह स्वयं को खा गया।

कहते रहे तुम, नहीं यह संभव
लेकिन फितरती मस्तिष्क उसका
डायनोसौर उसकी चाहतों का
अंतहीन जरूरतें, संसाधन नहीं पर्याप्त,
देख निज का वास्तविक प्रतिरूप 
विनाश कथा का अनोखा आरम्भ
दिग भ्रमित, विकास का भ्रम लिये  
कैसे वह स्वयं को छल गया?

याद कर महात्मा के बोल:
‘आधुनिक शहरी सभ्यता जन्मी
औद्योगीकरण के क्रोड़ से 
 लिये हैं छिपाए वे बीज
स्वयं उसके विनाश के।’

आज यह केवल कथा है 
भावी वक्त में इंसान की यह दशा है
उसके कार्यों के मूल में, सोच में 
अधिकतर विकास-क्रियाओं में
आत्मभक्षी सर्प की सी दिशा है।
(*ouroboros या uroboros) 
***
***

  
2. हिमालय-गाथा


1. हिमालय: उदभव 
 
सुदूर अतीत की बात
यही कोई पाँच करोड़ साल
टकराये थे दो विशाल भूखंड 
एक जलजला सा उठा
विध्वंस का अनोखा मंजर
एक विराट उथल पुथल
चुप देखता रह गया आसमान।

पर सृजन उभरता है
विध्वंस की क्रोड़ से ही
तभी एक शिशु जन्मा
धरा की कोख से उठा, बढ़ा
ऊंचा उठता चला गया
कालांतर में वह बन गया
‘हमसाया आसमां का’*।

सोचा नाम क्या होगा
कवि-मन (कालिदास) ने कहा:
.’हिमालयो नाम नगाधिराज:’
पूर्व से पश्चिम - धरा को आलिंगन में लेता
भारतीय भूखंड का मानदण्ड।

सृष्टि और विनाश -अनवरत चलता खेल
जैसा जमीन के बाहर दिखा
अंदर भी वही पेलमपेल
भूमिगत परतों का दाब
भूचाल ले आता है 
इन सब विपदाओं के बावजूद
हिमालय उठता चला जाता है।

कैसा जज़्बा है?
हर चोट उठा देती है उसे
यह मंजर प्रेरित करता सदा मुझे
एक हिमालय मन में हमारे
संघर्षी अनुभवों से सराबोर
बात सिर्फ इतनी समझनी है
ऊँचाई का हर रास्ता काँटों से गुजरता है
सृजन का पथ विध्वंस की वादियों से
होकर निकलता और निखरता है।

*इकबाल रचित ‘सारे जहाँ से अच्छा’ से
***



2. हिमालय: अंतर्द्वंद

मुकुट की तरह सजा माथे पर
आत्मीय इस धरती का 
कब से खडा हू मैं यहाँ
लगातार।

मुकुट बना था मैं, प्रहरी भी 
पावन इस भूमि का
गर्वान्वित भी था 
दशों दिशाओं में तब 
न ऐसा प्रहरी था अन्यत्र
न ऐसा मुकुट और
न था इन दोनों रूपों में
मुझे पाने का वैसा अधिकारी।

अब वह है बात पुरानी
गत सदियों का इतिहास सामने
अंधायुग सहस्र वर्षों का, देखा मैंने
साक्षी यदि उत्कर्ष काल का
कठिन समय भी भोगा मैंने
असहज एक विचार कभी विस्मित करता
क्या यही भूमि जिसका गर्वान्वित प्रहरी था? 
दर्शक बना तटस्थ, मूक, अस्थिर अतर्मन
अनजाना अवसाद ह्रदय पर हावी था।

रह रह आता याद स्वर्ण युग
कहीं नहीं था वैसा कोई
जिसके माथे की शोभा बन
हर्षित था, सम्मानित भी
कहा किसी ने ‘देवतात्मा’ 
राष्ट्रीय अस्मिता में मुझको स्थान दिया   
और किसी ने कहा मुझे ‘हमसाया आसमा का’।

कितना कुछ बदल  गया सदियों में 
मन मे अब गहरी पीडा का बिम्ब
उभरता जाता है
निकला करता जो जिह्वा से
घनीभूत बादल बन कर
आँखों में आज छलकता है।

कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता
कहता अतर्मन पुन: स्वर्ण युग आयेगा
मैं पुन: गौरवान्वित होऊंगा इस धरती से
धीरे-धीरे मन पर जमा घना बादल
बरस-बरस कुछ छँट जायेगा।

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