समीक्षा: 'काशी कथा' में डूबने-उतराने का सुख

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: काशी कथा (काशी के आध्यात्मिक व्यक्तित्वों की कहानियाँ)
उपन्यासकार: त्रिलोकनाथ पांडेय
मूल्य: ₹ 249.00
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई

लेखन के साथ ही साहित्य में आलोचना एवं समीक्षा की शुरुआत हुई होगी, भले ही उसका स्वरुप जैसा रहा हो। कथा विधा या साहित्य की अन्य विधाओं के विकास की तरह ही समीक्षा या आलोचना का भी विकास हुआ है। साहित्य लेखन ऐसे भी हो सकता है, कोई त्रिलोक नाथ पांडेय जी से सीख सकता है। वे इतिहास में गहरे उतरते हैं, हीरे-मोती ढूँढ़ निकालते हैं, भारतीय वैदिक-सनातनी ग्रंथों का अनुशीलन करते हैं और  निचोड़ प्रस्तुत कर देते हैं। वाराणसी उनका भी निवास स्थल है और भगवान भोले नाथ ने काशी को ही अपना प्रवास-स्थल चुना। कहा जाता है, काशी उनके त्रिशूल पर टिकी हुई है। त्रिलोक नाथ पांडेय जी ने अद्भुत शिल्प का प्रयोग किया है अपनी पुस्तक 'काशी कथा' में और नये सिरे से चिर-परिचित कथाओं को हमारे सामने रखा है। ये कहानियाँ और उनके सभी उदात्त चरित्र जनमानस में रचे-बसे हैं, लोग खूब परिचित हैं और सदियों से उनका अनुसरण करते हुए अपना जीवन साधते-संवारते रहते हैं।

विजय कुमार तिवारी
'अथातो काशी-कथा जिज्ञासा' में त्रिलोक नाथ पांडेय जी काशी के महत्तत्व का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, "मैं काशी हूँ। सब मेरे पास आते हैं। कोई मेरी गोद में जन्म लेता है, तो कोई बाहर से दौड़ा आता है मेरी गोद में बैठ जाने के लिए। कई मेरे पास ऐसे आते हैं जैसे खाली लिफाफा-निष्प्राण शरीर-आग के हवाले होने के लिए। मैं उन्हें भी स्वीकारती हूँ।" काशी ने आगे कहा, "मैं धन्य हो उठी, जब शिव कैलाश से आकर मेरी गोद में बैठ गये। शिव-पार्वती ने मुझे वह दिया जो आज तक कभी किसी को न मिला। पवित्रता की मुहर शिव-पार्वती ने मुझपर लगायी। मेरी गोद में पार्श्वनाथ जन्मा, सिद्धार्थ को जब समझ हुई मेरी ही गोद में दौड़ा आया, दक्षिण से बड़ा सपूत, विद्वान, तपस्वी, बड़ा ऊर्जावान शंकर आया जिसे यहीं सच्चे ज्ञान की समझ हुई, मेरी गोद में नटखट बेटा कबीर जन्मा, रैदास, तुलसी राम-धुन में लगे रहे। रामानन्द, कीनाराम सहित अनगिनत रत्न यहाँ हुए जिनका आलोक दुनिया भर में फैला। त्रिलोक नाथ पांडेय जी ने स्वयं को काशी का नालायक बेटा कहा है और इसी भाव से मां काशी का आदेश मानकर इस ग्रंथ की रचना की है। कथा सुनाने की शैली और उनकी सहज, सुगम्य भाषा ने अलग से चमत्कृत किया है। 'शिव-पार्वती' के संक्षिप्त वर्णन ने गूढ़ रहस्य खोलकर रख दिया है और उनका यह प्रयास स्तुत्य है। यह उनका गुरुतर दायित्व था कि ऐसा आध्यात्मिक चिन्तन दुनिया को दें और उन्होंने अपना धर्म निभाया।

'कैलाशी चलो बसें कहीं और' शिव-पार्वती के काशी आगमन और प्रवास की दिव्य कथा है। सारी कथा स्वयं पार्वती जी सुना रही हैं और पांडेय जी ने कथा को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कथ्य-कथानक से खूब छेड़छाड़ की है, खूब मनोरंजक बनाया है और तत्व-दर्शन तक की यात्रा करवाई है। यह उनके गहन शोध, अध्ययन और रस-सिक्त मन की उड़ान है। कथा के पात्रों का सटीक मनोविज्ञान दिखाई देता है और कथ्य-कथानक का आवरण में छिपा रहस्य सहजता से उपलब्ध होता है। अपने तरीके से पांडेय जी ने ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों को उजागर किया है। काशी का वैभव, शिव-पार्वती के बीच का संवाद और सारे सन्दर्भ चमत्कृत करते हैं। आधुनिक मन का यह चिन्तन सब कुछ खोल कर रख देता है। लेखक की रसिक वृत्ति और अपने परमाराध्य शिव-पार्वती का ऐसा चित्रण उनके साहस और ज्ञान का परिचायक है। यहाँ भक्ति है, प्रेम है, रस है, अलंकार है, परम ज्ञान है और सबको एक साथ प्रस्तुत करके त्रिलोक नाथ पांडेय जी ने अपनी साहित्यिक-प्रतिभा का परिचय दिया है।

पार्श्वनाथ, तेईसवें तीर्थंकर की कथा 'काशी कथा' में पांडेय जी ने उन्हीं के मुख से सुनाने का रोचक शैली में प्रयास किया है। पार्श्वनाथ ने संक्षेप में अपने 10 जन्मों की कहानी सुनाई है। मेरे विश्वास को बड़ा बल मिला है। जीवनानुभवों के आधार पर मेरा मन दशकों से इन्हीं विचारों में उलझा हुआ है। मेरा मानना है कि ऐसे विचारों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए, ज्ञान का कोई नया आलोक उभरेगा और चिन्तन-दिशा सन्मार्ग पर आ जायेगी। सनातन या वैदिक से कोई विरोध नहीं है बल्कि सुअवसर है जीवन को परिष्कृत करने, श्रेयस्कर धारण करने और जीवन को सफल बनाने का। लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व उनका जन्म काशी में हुआ। पिता अश्वसेन काशी के राजा थे और उनकी माताजी महारानी वामादेवी जी थीं। सर्पिल मानवाकृतियों में यक्ष दम्पति धरणेन्द्र और पद्मावती ने कहा, "महारानी आपकी कोख में तीर्थंकर आने वाले हैं।" उन्होंने तीस वर्ष की उम्र में सन्यास लिया। पार्श्वनाथ का मन सांसारिकता से क्षुब्ध होने लगा और वे गहन ध्यान में उतरते गये। ध्यान की अवस्था में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती नौ जन्मों की घटनाओं को देखा। “नौ जन्म पूर्व मैं और मेरा बड़ा भाई दोनों राजपुरोहित के पुत्र थे। अत्यन्त क्रूर और व्यभिचारी भाई ने छल पूर्वक एक दिन मेरी पत्नी से बलात्कार किया। राजा ने उसे देश-निष्कासन का दण्ड दिया। मैं क्षमा करते हुए उसे मनाने गया, वह क्रुद्ध हो उठा और प्रतिशोध में मेरे सिर पर पत्थर दे मारा। तत्काल मेरी मृत्यु हो गयी। ऐसे ही हर जन्म में हम आसपास जन्म लेते और वह मेरी हत्या कर देता था। मुझे हर जन्म में अच्छे साधक तपस्वी मिले और संसार की नश्वरता का ज्ञान दिया। मैं पिछले नौ जन्मों से चले आ रहे द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि को बुझा देना चाहता था। हर जन्म में मैं सहज-शान्त, सहनशील रहने का प्रयास किया और अपने भाई से टकराव टालता रहा। मुझे भगवान अरिष्टनेमि के गृह-त्याग करके ध्यान मुद्रा में बैठे चित्रों ने बहुत प्रभावित किया। राग-द्वेष से मुक्त उनके मुख मण्डल पर दैवीय आभा व्याप्त थी। मैंने इसी मार्ग को अपनाने का संकल्प किया। मैंने राजसी वस्त्र त्याग दिया, सिर मुड़ा लिया और काशी के निकट ही जंगल में ध्यान-साधना में स्वयं को लगा लिया। मेरे भीतर निर्भयता, निर्वैर और ईश्वर प्रेम जाग गया। मेरा भाई मेघमालि भी एक दिन मेरे निर्वैर भाव से प्रभावित होकर चरणों में गिर पड़ा।“ पार्श्वनाथ ने सन्यासियों के लिए चार और गृहस्थों के लिए बारह नियम बनाये। अपने अनुयायियों को उन्होंने भिक्षु कहा और उनके जीवनयापन के लिए भिक्षाचर्या का विधान बनाया।

काशी कथा की अगली कहानी भगवान बुद्ध की है। उनका जन्म नेपाल के लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ। पिता शुद्धोदन और माता माहामाया थीं। माहामाया सिद्धार्थ के जन्म के 7 दिनों बाद स्वर्ग सिधार गयीं और उनका लालन-पालन मौसी महाप्रजावती गौतमी ने किया, इसलिए वे सिद्धार्थ गौतम कहलाए। यह कथा स्वयं काशी के मुँह से सुनी जा रही है, "बुद्ध मेरे आंगन में दौड़े चले आये जब उन्हें सम्बोधि की प्राप्ति हुई और पहला उपदेश सारनाथ में दिया।" सिद्धार्थ गौतम दुख से बचना चाहते थे, वे दुख के प्रति कुछ अधिक ही संवेदनशील थे। उन्होंने रोगी, बूढ़े व मरे हुए व्यक्ति को देखा और क्षुब्ध हो उठे। 29 वर्ष की आयु में दुख से बचने का उपाय खोजने घर से निकल पड़े। उन्होंने भयंकर दुख झेला, शरीर जर्जर हो गया परन्तु दुख से बचने का उपाय नहीं मिला। गाँव की स्त्रियों के गायन में संकेत मिला, बीच मार्ग से चलो, उन्होंने मध्य मार्ग पकड़ लिया। सुजाता ने उन्हे खीर खिलाई। बुद्ध ने पीपल की छाँव में 49 दिनों तक कठिन तप किया। मार के विरुद्ध उनका भीषण युद्ध चला। उन्हें दुखों से निवृत्ति की प्रतीति हुई और उबरने का उपाय मिला। वे अगले 7 दिनों तक उसे गुनते रहे, उनका उस बोधि वृक्ष के बीच मौन संवाद चलता रहा। बोधि वृक्ष के संकेत पर बुद्ध वाराणसी की ओर निकल पड़े। मृगदाव वन में पुराने पाँच साथी मिले। बुद्ध के भव्य तेज को देख वे अचम्भित हुए और उनके चरणों में गिर पड़े। उन्हें ही सर्वप्रथम बुद्ध ने अपने मध्य मार्ग के बारे में उपदेश दिया-1-संसार में दुख है, 2-दुख का कारण है, 3-दुख का निवारण है और 4- दुख के निवारण का उपाय है। महाश्रेष्ठि महोदधि के पुत्र यश में विकृति आ गयी थी जिससे उसका जीवन प्रभावित हो रहा था। किसी प्रातः वह टहलता हुआ मृगदाव वन में पहुँच गया। वहाँ बुद्ध को देखा और चरणों में गिर पड़ा। उनकी मधुर वाणी से बहुत प्रभावित हुआ। बुद्ध से उसने अपनी व्यथा की चर्चा की। बुद्ध ने उसके मनोविकारों को दूर करने पर विचार किया, उन्होंने कहा, "मध्य मार्ग पर चलो, वत्स! दो अतियों से बचो-काम वासना में लिप्त होने की अति और आत्म-ग्लानि से दुख पाने की अति।" यश प्रवज्या लेते ही, गृह त्याग किया और पूर्णतः बुद्ध की शरण में चला गया। बुद्ध ने उपदेश किया." भिक्षुओं! बहुजन के सुख के लिए, बहुजन के हित के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहो।" बुद्ध ने गृहस्थों को उपासक या उपासिका के रुप में स्वीकार किया। उनकी यात्रा जारी थी। उन्होंने सर्वसाधारण के लिए पालि भाषा में उपदेश किया। बुद्ध कहते, "अप्प दीपो भव।" बुद्ध ने शास्त्रार्थ किया और लोगों को अपने मत से परिचित करवाया। लोग उनके संघ में जुड़ने लगे। षड्यन्त्र करके कुछ लोगों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया परन्तु उनकी यह योजना सफल नहीं हुई।

'काशी कथा' के पाँचवें खण्ड 'अहं ब्रह्मास्मि' की चर्चा में आदि गुरु शंकराचार्य लिखते हैं- गुरु गोविन्दपाद की कृपा से अद्वैत वेदान्त का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्हीं के कहने पर मैं काशी आया। मुझे मां अन्नपूर्णा ने स्वप्न में कहा, 'वत्स! तुम तीन दिनों से भूखे रह रहे हो। मेरे पास क्यों नहीं आये? मैं ही सबको भोजन देती हूँ।" मैंने अन्नपूर्णा मन्दिर के सामने प्रार्थना की। मुझे आवाज सुनाई दी, "बेटा, मैं इधर खड़ी हूँ। आ, इधर आ।" इसके बाद कभी मुझे काशी में भोजन की कमी नहीं हुई। सारंगनाथ के धर्मपत्तन में बौद्धों के वैभव को देखा। उनकी दूषित साधना प्रणाली को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। अष्टाध्यायी के सूत्रों को रटने में तल्लीन वृद्ध के उद्बोधन के लिए मैंने 'भजगोविन्दम्, भजगोविन्दम् गोविन्दम् भज मूढ़मते' रच डाला। वह उद्बोधित हुआ और मेरे पैरों पर गिर पड़ा। चांडाल कन्या समया और महाकापालिक प्रसंग ने मुझे आनन्द लहरी की याद दिला दी और मैंने संकल्प लिया कि उनकी पाप युक्त वामाचार साधना के विरोध में शास्त्रार्थ करूँगा। कश्मीर में कापालिक ने शास्त्रार्थ में हार कर मुझे विष देकर मारना चाहा। काशी के आचार्य गण बहाना बनाकर मुझसे दूर भागते थे। मैंने सबको पराजित किया और दिग्विजय का डंका बजा दिया। ब्रह्म ही एक मात्र सत्ता है, जीव और जगत उसी में समाये हुए हैं। जगत, जीव और ब्रह्म में अंतर दिखना समाप्त हो जाने पर जगत जीव में, जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है और इसी अद्वैत अवस्था को आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। काशी नरेश मेरे प्रति श्रद्धालु हुए और नियमित सत्संग में आने लगे। उन्हीं दिनों एक वृद्ध व्यक्ति ने अपने तर्कों से मुझे प्रभावित किया। शास्त्रार्थ लम्बा होने से लोग उबने लगे। एक व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा, "एक ओर भगवान शंकर आचार्य शंकर के रुप में स्वयं हों और दूसरी ओर ब्रह्मसूत्र के प्रणेता बादरायण व्यास, ब्राह्मण के रुप में शास्त्रार्थ कर रहे हों तो इस शास्त्रार्थ का कभी अंत नहीं होगा। आप दोनों इसका अंत करें।" वे चले गये। वैसे ही चांडाल के रुप में स्वयं भगवान शंकर ने मुझे प्रश्नों के माध्यम से उलझा दिया। मेरी अन्तरात्मा में कोई दिव्य ज्योति जागृत हुई और मुझे अद्वैत का परम बोध हुआ। मैंने सैकड़ो ग्रंथों की रचना कर डाली। मैंने समाज में भ्रमण की योजना बनायी ताकि लोगों के बीच रहकर ज्ञान का आलोक फैलाएं। व्याप्त भ्रम जाल तोड़ना जरूरी है। प्रयाग में कुमारिल भट्ट भूसे की आग में आत्मदाह कर बहुत हद तक जल चुके थे। उनकी गति देखकर बहुत दुख हुआ। मैंने कहा, आपसे शास्त्रार्थ करने आया था। उन्होंने महिष्मति में अपने बहन-बहनोई भारती और मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए कहा। भारती ने शास्त्रार्थ को कामशास्त्र की ओर मोड़ दिया। अमरुक के राजा की मृत्यु होने पर उनके शरीर में प्रवेश कर मैंने कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया और भारती के प्रश्नों का उत्तर देकर निरुत्तर किया। माँ की याद आते ही मैं अपने गाँव पहुँचा। माँ की आँखों में चमक उभरी/ मैंने कहा, "अहं ब्रम्हास्मि", मां मुस्कराई और शांत हो गयी। मैंने कहा-तत्वमसि, तुम भी वही हो, अयमात्मा ब्रह्म, यह आत्मा ब्रह्म है और जल्दी से मैंने कहा- सर्वं खल्विदं ब्रह्म अर्थात सब कुछ ब्रह्म है। मां ने अंतिम सांस ली। मैंने आंगन में ही उसकी चिता सजायी और अग्नि के हवाले किया।

काशी कथा की अगली पायदान पर श्रीसम्प्रदाय के प्रवर्तक जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य जी हैं जिनका जन्म प्रयाग में और शिक्षा-दीक्षा, आध्यात्मिक उन्नयन काशी में हुआ। इस खण्ड का त्रिलोकनाथ पांडेय जी ने शीर्षक रखा है 'जात पात की बात नहीं'। स्वामी रामानंदाचार्य ने जाति विहीन भक्ति मार्ग की स्थापना करके तत्कालीन कमजोर हो रहे सनातनी समाज में नई चेतना जगाई। उन्होंने गुरु-आज्ञा लेकर राम-वन-गमन-पथ का अनुसरण करते हुए लम्बी यात्राएं की। मार्ग में अनेक संत-महात्माओं का सान्निध्य, सत्संग मिला और लौटकर अपने गुरु से विस्तार से प्राप्त ज्ञान की चर्चा की। गुरु ने साधु-साधु कहा और पूर्णता का आशीर्वाद दिया। उन्होंने गुरु से प्राप्त मंत्र को सार्वजनिक कर दिया और कहा, "मैं श्रीसम्प्रदाय की स्थापना की घोषणा करता हूँ। यहाँ का द्वार सबके लिए खुला रहेगा, जो भी शुद्ध हृदय से आयेगा और भगवान राम इसके उपास्यदेव होंगे। उन्होंने शास्त्रार्थ करके अपने विरोधियों को पराजित किया और पूछा, "शास्त्रों में कहाँ लिखा है, शरणागति का अधिकार शूद्रों को नहीं है?" कबीर और रैदास सहित उनके द्वादश महा भागवत थे जिनके अधीन श्रीसम्प्रदाय का संचालन था। सौ साल से अधिक जीवन यापन करते हुए स्वामी रामानंदाचार्य ने शरीर त्याग किया।

'काशी कथा' कबीर के बिना पूरी नहीं हो सकती। त्रिलोकनाथ पांडेय ने 'रोवै कबीर की माई' शीर्षक से सारगर्भित खण्ड लिखा है। उनका काल पंद्रहवीं सदी माना जाता है, उन्होंने हिन्दू और इस्लाम दोनों की कटु आलोचना की। स्वामी रामानंदाचार्य जी उनके गुरु बने। कबीर की मां और रामानंदाचार्य के बीच का संवाद रोचक और सत्य उद्घाटित करने वाला है। कबीर की भक्ति और ज्ञान के आगे कोई टिक नहीं पाता था और उनका विरोध शुरु हो गया। उनके अनुयायी और भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। कबीर साथियों को खिलाने के लिए कहते, गरीब मां के लिए मुश्किल होने लगी। पिता आश्वस्त करते-"कोई व्यवस्था करता हूँ।" कबीर कहते-"साईं देगा।" मां गुरु से मिल आने को कहती, कबीर उत्तर देते, "अब गुरु के पास जाने की जरुरत नहीं है। गुरु ने राह दिखा दी है। बस उसी पर चलते जाना है।" पांडेय जी ने मां की कबीर को लेकर चिंता का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। किसी दिन उनकी झोपड़ी के भाग जागे, गुरु रामानंद जी आ गये। उन्होंने कहा, "कबीर तुम जल्दी से विवाह कर लो।" गुरु आदेश मानकर कबीर ने मां से कहा, "मेरी शादी करवा दो।" लोई नामक लड़की से शादी हो गयी। कमाल और कमाली पुत्र-पुत्री हुए। कबीर का ध्यान राम में लगा था। सुल्तान के सामने कबीर को पेश किया गया, उस प्रसंग का चित्रण पांडेय जी ने बेहतरीन किया है। उन्हें बेअदबी के लिए सुल्तान ने दण्ड स्वरुप 25 कोड़े लगवाए। उर्दू, भोजपुरी, अवधी, हिन्दी के शब्दों से यह खण्ड खूब आलोकित है। उनकी लेखन शैली प्रभावित कर रही है।

कबीर के समकालीन संत रविदास (रैदास) उनकी तरह ही स्वामी रामानंदाचार्य जी के शिष्य थे। वे अपना पारिवारिक मोची का कार्य करके जीविका चलाते थे। कबीर के सत्संग से उनमें आध्यात्मिकता और ईश्वर प्रेम जागा। उन्होंने भक्ति के पदों की रचना की और उनके 40 पदों को गुरु-ग्रंथ साहब में स्थान मिला। रैदास स्वयं को स्वामी रामानंदाचार्य और कबीर के बच्चे की तरह मानते थे। वे कहते हैं, "चुपचाप भक्ति करना भी आसान नहीं था, मुझे घर के भीतर और बाहर संघर्ष करना पड़ा। काशी का समाज किसी चमार को संत स्वीकार कर ले, यह सहज नहीं था। हम दोनों पति-पत्नी को घर से निकाल दिया गया।" रैदास ने कर्ज लेकर अलग झोपड़ी बनाई, पुश्तैनी जूता बनाने का कार्य शुरु किया। कार-बार अच्छा चलने लगा। मन कहीं और लगा था, उन्होंने मन को समझाया, 'कर्म ही मनुष्य का धर्म है, इसी में बँधकर रहना होगा।' वे भजन गाते रहते और जूता बनाते रहते थे। गरीबी खूब थी, कर्ज लौटाना मुश्किल हो रहा था। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' रैदास के सन्दर्भ में प्रसिद्ध प्रसंग है। गंगा मां ने उनकी सुपारी को स्वयं ग्रहण किया था और बदले में दो स्वर्ण कंगन दिया। राजा ने नौ लखा हार देना चाहा जिसे रैदास ने ठुकरा दिया। मीराबाई उनसे मिलने काशी आईं और उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया। इस तरह 'सत भाखै रैदास' शीर्षक से पांडेय जी ने काशी कथा में रैदास का बहुत सुन्दर वर्णन किया है।

काशी कथा के अगले संत तुलसी दास जी के बारे में त्रिलोकनाथ पांडेय ने विस्तार से लिखा है। मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण पिता ने बालक का त्याग कर दिया। बालक का पालन-पोषण घर की दासी और बाद में एक भिखारिन ने किया। बाद में रामानंदी सम्प्रदाय के बैरागी साधु नरहरिदास ने इन्हें शिक्षित-दीक्षित किया और तुलसी दास नाम रखा। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें काशी लाया गया। रत्नावली नामक स्त्री से उनका विवाह हुआ। पत्नी के फटकारने के कारण वे गृह त्याग कर साधु बन गये। पांडेय जी यह कथा स्वयं तुलसी दास के मुँह से सुना रहे हैं। यह उनकी अपनी बड़ी रोचक शैली है। भाषा में प्रवाह है और स्थानीय शब्द सहज ही समझ में आ जाते हैं। तुलसी दास जी संकट मोचन हनुमान जी के भक्त थे और हनुमान जी तुलसी दास और श्रीराम के बीच सेतु की तरह थे। संत तुलसी दास के संघर्ष, भक्ति, प्रसिद्धि, काव्य ग्रंथों की रचना, राम कथा सुनाना, काम वासना से लड़ना आदि का पांडेय जी ने विशद वर्णन किया है। कतिपय ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। अयोध्या व काशी के बीच उनका पूरा जीवन हनुमान जी की भक्ति में व्यतीत हुआ और हनुमान जी ने सदैव कृपा की। रामचरित मानस सहित उनके सारे ग्रंथ पूरी दुनिया में प्रचलित हैं और वे श्रद्धा-पूर्वक पूजे जाते हैं।

'काशी कथा' के अंतिम खण्ड में अघोर पंथ के महान संत बाबा कीनाराम का उल्लेख करते हुए त्रिलोकनाथ पांडेय ने अपने शोध, भक्ति और अध्यात्म का परिचय दिया है। उनका 170 वर्षों का सुदीर्घ जीवन था, काशी और सम्पूर्ण भारत में उनकी ख्याति थी। यहाँ कथा स्वयं बाबा कीनाराम जी सुना रहे हैं। उनके गुरु बाबा कालूराम ने कहा, "इस क्री कुंड के किनारे ही तुम्हारी जगह होगी, कीनाराम! तु खुद शिव स्वरुप हो। तुम्हें जगह की क्या कमी होगी, यही तुम्हारा गिरनार है, यही तुम्हारा कैलाश है। जाओ, उस गुफा में हिंगलाज देवी की स्थापना करो, जो तुम्हारे संग आई हैं।" कीनाराम बाबा का जन्म बनारस से 10 कोस की दूरी पर रामगढ़ गाँव के क्षत्रिय किसान परिवार में हुआ था। 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी हो गयी। तीन वर्ष बाद गौना होना था। गौना का जिस दिन मुहूर्त निकला, उसकी पूर्व सन्ध्या पर कीनाराम ने मां से दूध-भात खाने की मांग की। मां ने कहा, "अशुभ है।" कीनाराम बाबा ने जिद्द करके दूध-भात खाया। अगले दिन उनकी ससुराल से सूचना मिली कि दुलहन तो कल ही गुजर गयी है। कुछ महीनों में माता-पिता दोनों गुजर गये। उन्होंने गृह त्याग कर दिया। दुखियारी बुढ़िया के पुत्र को उन्होंने जमींदार से मुक्त करवाया। वही उनका परम शिष्य बीजाराम बना और जीवन भर साथ रहा। जूनागढ़ होते हुए, सत्संग करते हुए दोनों गुरु-शिष्य कोटेश्वर में हिंगलाज देवी के प्रहरी भैरव भीम लोचन मन्दिर पहुँच गये। वहाँ से कीनाराम बाबा कठिन यात्रा करते हुए हिंगलाज देवी की गुफा पहुँचे। मां ने दर्शन देकर कुछ मांगने को कहा। कीनाराम बाबा ने निवेदन किया, "मां! तुम मेरे साथ काशी चलो।" देवी ने कहा, "एवमस्तु, वत्स! मैं अदृश्य रुप से तुम्हारे संग काशी चली चलती हूँ।" कीनाराम बाबा कहा करते थे, "संसार को सारा ज्ञान शिव से मिला है, वही सबके आदि गुरु हैं। शिव के दो रुप हैं-घोर और अघोर अर्थात रौद्र और सौम्य। गिरनार पर्वत पर दत्तात्रेय के रुप में प्रकट होकर उन्होंने अघोर पंथ चलाया। पांडेय जी ने बहुत ही व्यापक रुप से कीनाराम बाबा का जीवन-विवरण लिखा है और अनेकों घटित चमत्कारों का उल्लेख किया है।

'काशी कथा' त्रिलोकनाथ पांडेय जी द्वारा रचित संत-महात्माओं की धार्मिक-आध्यात्मिक कहानियों का संग्रह है। वहाँ जन्म लेने वाला हर व्यक्ति इन कहानियों से देर-सवेर परिचित होता ही है और उसके जीवन पर प्रभाव पड़ता है। काशी में बड़े-बड़े संत-महात्मा हुए, बड़े-बड़े विद्वान लेखक साहित्यकार हुए, काशी शिव की नगरी है और काशी से होकर गंगा बहती है। वैसे ही यहाँ भाषाओं का संगम है, धर्म की चर्चा होती है और वहाँ के लोगों की बनारसी पहचान निराली है। पांडेय जी मे काशी की संस्कृति, काशी की भाषा-शैली, काशी का संस्कार भरा पड़ा है और उन्होंने इस कथा लेखन में उसका प्रयोग किया है। संत-महात्माओं की कहानियाँ लिखने के पूर्व उन्होंने बहुत शोध और अध्ययन किया है। सबसे महत्वपूर्ण है, उन्होंने किसी न किसी के मुँह से कथा सुनवाया है। यह उनके लेखन की शैली है जिसे पाठक खूब पसंद करेंगे। सुखद है, काशी कथा के माध्यम से भारत का धर्म, अध्यात्म और संत-परम्परा की पूरी जानकारी लोगों को होगी।
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समीक्षक: विजय कुमार तिवारी (कवि, लेखक, समीक्षक, कहानीकार, उपन्यासकार)
भुवनेश्वर, उड़ीसा
चलभाष: +91 910 293 9190

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