बदलते समय और समाज के बनावट की कविताएँ - समुद्रे बुद्धस्य नेत्रे (डॉ. ऋषिराज जानी)

समीक्षक: डॉ. अरुण कुमार निषाद

पुस्तक: समुद्रे बुद्धस्य नेत्रे (संस्कृत काव्य संग्रह)
लेखक: डॉ. ऋषिराज जानी
प्रकाशन: श्रीवाणी अकादमी प्रकाशन अहमदाबाद (गुजरात)
संस्करण: प्रथम संस्करण 2016
मूल्य: ₹ 70 रुपया
पृष्ठ संख्या: 80



पिछ्ले दिनों सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार डॉ.ऋषिराज जानी की रचना “समुद्रे बुद्धस्य नेत्रे” पढ़ने का मौका मिला। डॉ.ऋषिराज जानी ने अपनी रचनाओं की पृष्ठभूमि को इस क़दर से रचा है कि पाठक अपने आपको इन रचनाओं के अन्त तक पहुँचने से रोक नहीं सकता। बहुत ही सरल शब्दों में बुनी गई ये रचनायें आज के हमारे समाज के वर्तमान हालात, उसके बदलते स्वरूप को बख़ूबी प्रस्तुत करती हैं। डॉ. जानी की शैली बहुत समर्थ, सरल और कथा के चरित्रों के साथ पूरा न्याय करती है। संवेदनाओं को गहरे तक छूती इस संग्रह में कुल 42 रचनायें हैं।

अरुण कुमार निषाद
कवि का कोमल हृदय समाज की बुराइओं को देखकर परेशान हो उठता है। अन्योक्ति का सहारा लेकर वह कहता है कि इससे तो अच्छा यह आँख ही न होती। 
एकस्माद् बौद्धस्तूपात्
निपतति बुद्धनेत्रे
× × ×
बुद्धनेत्रयोरश्रूबिन्‍दवो
भवन्ति
मौक्तिकानि...। पृष्ठ 8

आज के परिवर्तित होते परिवेश में लोगों को स्व की चिन्‍ता है, पर की चिन्‍ता तो अब किताबी बातें होकर रह गईं।

युवका: - वयं न जानीम:
× × ×
यदि
मद्यपानेन, धूमपानेन
उन्‍मत्तकरैर्द्रव्यै:
त्वमपि पिपासां शमयितुमिच्छसितर्हि
गच्छाग्रत:।
× × ×
सुन्‍दरी:- अहं नास्मि देवि!
अहं तु दत्तसङ्केता युवती (call girl) |
× × ×
वासना न भवन्‍ति तृप्ता:।
× × ×
पुनरप्यागच्छन्ति। पृष्ठ 9-11

डॉ. ऋषिराज जानी
‘महानगरे चन्‍द्रमा’ नाट्यकविता में डॉ. ऋषिराज जानी लिखते हैं कि जो चन्‍द्रमा बच्चों का चन्‍दामामा, प्रेमी-प्रेमिकाओं के सुरत-क्रीड़ा आनन्‍द को बढ़ाने वाला, कवियों का उपमान था आज लोगों द्वारा उपेक्षित है। पृष्ठ 12-14 

मशीनी जिन्‍दगी के बारे में लेखक का कहना है-

अहं स्नानगृहस्थे ....... स्मर्तुम्। पृष्ठ 17

‘विक्रय महालयस्य दर्शनम्’ कविता में कवि कहता है कि मनुष्य की मृगतृष्णा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जितना जिसके पास है वह उतने में सन्‍तुष्ट नहीं है। 

कदाचिद् अहं धनिक: अभविष्यम्। पृष्ठ 20

‘मातृदिने मातु द्वैधीभाव:’ नाट्यकविता में डॉ. जानी एक माँ की मन:स्थिति को बतलाते हुए लिखते हैं – 
विदेशे तु जीवनमीदृशं भवति .....। पृष्ठ 25-27

‘प्रतिकूल प्रभाव:’कविता में गंगा नदी की पीड़ा को दिखाया गया है। दुनिया का उद्धार रहने वाली आज स्वयं अपने उद्धार के लिए चिन्‍तित है। 
अपरो भागीरथोऽवतीर्ण: 
मां
देवनद्यां परिवर्तितुम्। पृष्ठ 31

कार्यक्रम के बीच-बीच में टी.वी. पर आने वाले अश्लील विज्ञापनों के विषय में ऋषिराज कतहे हैं – 
चलचित्रै: सह प्रसूत: 
कामुकताऽश्लीलतामयो
भारतीयसंस्कृतिघातक: क्षेत्रीयरोग:। पृष्ठ 32

भौतिकता की चकाचौंध भरी इस दुनिया में वृद्धों की होती उपेक्षा के बारे में डॉ.ऋषिराज जानी कहते हैं - पृष्ठ 34-35 
पुत्र: ‘एफिल टावर’ दृश्यावलीं पश्यति
तदा
वृद्धा माता नेत्रज्योतिर्हीना
पर्यङ्के शेते । पृष्ठ 34-35

वर्तमान समय में नारियों की दशा का वर्णन करते हुए कवि कहता है- 
यूयं तथैव पीडयथ नारीम्। पृष्ठ 40
औद्योगीकरण ने ग्रामीण सभ्यता को नष्ट कर दिया है। 
ग्रामा: खादिता नगरसभ्यता। पृष्ठ 41

आज समाज इतना दूषित हो गया है कि राम कृष्ण बुद्ध जैसे महापुरुष एक बार फिर इस धरती के उद्धार के लिए अपना बलिदान दे दें तब भी यह सुधर नहीं सकती है। पृष्ठ 42 

आधुनिकता की जिन्‍दगी जीने वाले आज के बच्चे प्राकृतिक आनंद से अनभिज्ञ होते जा रहे है। पृष्ठ 47 

आज का मानव अपने दु:खों से कम दु:खी है वह औरों के सुख से परेशान है। पृष्ठ 49 

मनुष्यों ने धीरे-धीरे वनस्पतियों को समाप्त कर दिया है। आज के बच्चे न तो जंगली जीव-जन्‍तुओं से परिचित हैं न ही उनकी आवाजों और बोलियों से। पृष्ठ 50 

‘जीवन पश्यति’ कविता में ऋषिराज लिखते हैं कि लोग अब किसी के दाह-संस्कार में केवल औपचारिकता पूर्ण करने के लिए जाते हैं कि लोग उनको असभ्य और असामाजिक न कहने लगें। बाकी न तो अब उनसे उस मृतक आत्मा के प्रति कोई संवेदना होती है न ही उस शोक संतप्त परिवार के प्रति सांत्वना के दो शब्द। 

बहिस्स्थिता
मृतकसम्‍बन्‍धिन:
परस्परं नानाकथामग्ना:। पृष्ठ 52
समाज में बढ़ रहे भ्रष्टाचार और अनाचार पर कवि कहता है – 
धर्माचार्ये भ्यो जना धनं ददति
धर्माचार्या:
× × ×
सर्वाणि शस्त्राणि निर्वीयाणि ... सन्‍ति .....। पृष्ठ 63
राजमिस्त्रियों की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए डॉ. जानी लिखते हैं – 
एते स्वपन्‍ति
सूर्यातपेषु निदाघे,
× × ×
मशका: कुर्वन्‍ति तेषां रुधिरपानं निशासु। पृष्ठ 65
घरेलू हिंसा पर लेखनी चलाते हुए डॉ.ऋषिराज जानी लिखते हैं। 
स्त्रियो रुदन्‍ति गृहेषु
तदा 
तासां मुखेषु वस्त्रपट्टा बध्यन्‍ते।
मद्यपा: पतिदेवता:
तास्ताडयन्‍ति। पृष्ठ 68

‘आख्यायिका-अभिविष्यत्’ कविता में कवि ने गर्भपात की समस्या को उठाया है। लोग पुत्र की चाहत में अपनी पत्नी की जान की परवाह भी नहीं करते कि गर्भपात के समय वह जिन्‍दा भी रहेगी अथवा नहीं। 

‘हृदेश्वरि! पुत्राय मे कामना।
गर्भ परीक्षणं कारयेति।
यदि भ्रूणस्थं शिशुकं कन्‍या भवेत्
तार्हि पातय तामिति। पृष्ठ 79

यह संग्रह पारिवारिक मानसिकताओं, पर्यावरण की चिन्ता और समाजिक विडम्बनाओं का ताना-बाना है जो व्यक्ति को अपने भीतर की नकारात्मकता पर झाँकने पर मजबूर कर देता है। समाज के विभिन्न पक्षों को छूता यह संग्रह अपनी विशिष्ट शैली, संवाद और चरित्र-चित्रण के बेहतर चुनाव के कारण पाठकों को अपने निकट ले आता है। डॉ. ऋषिराज जानी को इस बेहतरीन संग्रह हेतु साधुवाद!

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