हिंदी का सरलीकरण

हिंदी पखवाड़ा - 1 सितम्बर से 14 सितम्बर हिंदी दिवस तक
अनुराग शर्मा
नमस्कार,

आज 31 अगस्त को हिंदी पाठकों की वर्तमान पीढ़ी में सर्वाधिक मक़बूल साहित्यकारों में से एक अमृता प्रीतम का जन्मदिन है। पद्मश्री अमृता प्रीतम सन 1956 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' पाने वाली पहली महिला बनीं और सन 1982 में उन्हें 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' भी मिला।

यह सम्पादकीय लिखते समय कल से आरम्भ हो रहे हिंदी पखवाड़े की बात आना स्वाभाविक है जो 14 सितम्बर को पड़ने वाले हिंदी दिवस के साथ सम्पन्न होता है। हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े के आयोजनों के उल्लास के साथ ही चलता रहता है, हिंदी पर मुकदमा। कहीं हिंदी थोपे जाने की शिकायत होती है और कहीं उसकी जटिलता की। एक मित्र ने संगणक शब्द का उदाहरण देकर हिंदी को अनम्य ठहरा दिया। उनका कहना था कि जब कम्प्यूटर शब्द मौजूद है तो हिंदी वाले संगणक शब्द क्यों लाये। मित्र के विचार से -
1. कम्प्यूटर शब्द की मौजूदगी संगणक को अनावश्यक सिद्ध करती है। 
2. संगणक शब्द कम्प्यूटर की तुलना में अपरिचित और कठिन है।

मेरे विचार से जिन्होंने कम्प्यूटर शब्द पहली बार सुना था उन्हें वह भी अपरिचित और कठिन लगा होगा, लेकिन धीरे-धीरे वह प्रचलन में आ ही गया। इसके अलावा, किसी भी समृद्ध भाषा में पर्यायवाची शब्दों की प्रचुरता होती है। एक शब्द की उपस्थिति से दूसरा अनावश्यक नहीं हो जाता। सेलफ़ोन, मोबाइल फ़ोन, हेंडहेल्ड डिवाइस, इनमें से किसी भी शब्द पर आपने किसी हिंदीभाषी को आपत्ति करते नहीं देखा होगा, लेकिन यदि हम कहीं हम हिंदी का शब्द चलभाष या  हस्तक देख लें तो हमारी आपत्ति मुखर हो जाती है। इसी प्रकार हैडफ़ोन के बाद ईयरपॉड, ईयरबड, ईयरप्लग आदि स्वीकार्य हैं लेकिन कर्णक सुनने पर तकलीफ़ हो तो इसमें हमारा परहेज़ केवल एक भाषा के प्रति भेदभाव भरा हो जाता है। लगभग सभी शब्द जीवन में पहली बार सामने पड़ने पर अपरिचित, और शायद कठिन लगते हैं लेकिन विदेशी भाषा के शब्दों का हम लिहाज़ करते हैं और हिंदी के शब्दों के प्रति न केवल विरक्त बल्कि असहिष्णु भी हो जाते हैं। हमें ठहरकर सोचना चाहिये कि ऐसा व्यवहार अपनी भाषा के प्रति हीनभावना और दुर्भावना नहीं तो और क्या है?

बेतुके शब्द मत गढ़िये, व्यर्थ की बहसों में मत पड़िये, अन्य भाषाओं से मत लड़िये, लेकिन अपनी भाषा, और संस्कृति का मज़ाक भी मत उड़ाइये। साथ ही, हिंदी के उच्चारण को विकृत करने से भी बचिये। राष्ट्रीय गान 'जन गण मन' से आरम्भ होता है तो वहाँ गण को गन मत कीजिये। यदि जन और गण का अंतर मालूम नहीं है तो जानने की कोशिश कीजिये। मुझे लगता है कि हिंदी के हनन का सबसे बड़ा अस्त्र हम हिंदीभाषियों का आलस्य ही है। बांगलादेश को संसारभर की भाषाओं में बांगलादेश ही कहा जाता है लेकिन हिंदी का कोई भी टीवी चैनल लगा लीजिये आपको देस ही सुनाई देगा। लगता है जैसे देश को हमने देशनिकाला दे दिया है।

हिंदी को आपका प्रेम और लगन दोनों चाहिये, दीजिये और जहाँ कहीं भी सुधार की गुंजाइश हो, संकेत अवश्य कीजिये लेकिन यह भी ध्यान रखिये कि टंकन त्रुटि वास्तव में भाषा के अज्ञान से जन्मी त्रुटियों की श्रेणी में नहीं आनी चाहिये। इंगित उसे भी कीजिये लेकिन कुछ अधिक नरमी के साथ 😁।

हिंदी थोपे जाने का आरोप तो अत्यधिक हास्यास्पद है लेकिन उस पर बात काफ़ी लम्बी हो जायेगी, सो, वह कहानी फिर कभी।

हमेशा की तरह इस अंक पर भी आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है, बेझिझक लिखिये।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 अगस्त 2022 ✍️

2 comments :

  1. प्रिय भाई अनुराग जी,

    आपके संपादकीय हमेशा ही रुचि से पढ़ता आया हूँ। आपके शब्दों में मुझे हमेशा एक शांत लपट सी नजर आती है, जो ऊपर से देखने पर एक धीरजवान विचार की तरह लगती है, पर भीतर उतरने पर वह गहरी, बहुत गहरी व्याकुलता सी जगाती है और कुछ कर गुजरने की एक चुनौती भी उसके साथ आती है।

    हिंदी को लेकर आपके विचारों में भी कुछ ऐसी ही तेजस्विता और ललकार मुझे नजर आई, जिसके पीछे न जाने कितने अनुभवों का दंश और पीड़ा भी संभवतः छिपी है। मैं उसे महसूस कर सकता हूँ। खुद मैंने अपने जीवन में जो कुछ देखा-भाला, उसे कहूँ तो पूरा एक ग्रंथ बन जाएगा।

    कहना न होगा कि 'सेतु' केवल एक पत्रिका नहीं। इसके जरिए पूरे हिंदी जगत, और विशेष रूप से प्रवासी भारतीयों में आपने जो उदग्र आत्मविश्वास जगाया है और अपने कुछ होने का अहसास, अपने कुछ होने का सरूर भी--उसे मैं सच ही प्रणाम करता हूँ। आने वाला समय उसके महत्त्व को समझेगा। आपकी और 'सेतु' की व्यापक भूमिका को भी।

    हमेशा की तरह इस अंक में भी कई महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। कुछ पढ़ गया हूँ, कुछ पढ़ूँगा धीरे-धीरे। 'सेतु' से आपने अपने स्नेह की डोरी से मुझे भी जोड़ लिया है, यह मेरे लिए आनंद और गौरव की बात है। इसके जरिए मैं एक व्यापक विश्व समुदाय से जुड़ पाया हूँ। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

    कामना करता हूँ कि 'सेतु' के अंक इसी तरह हिंदी जगत में कुछ हलचल सी लेकर आएँगे।

    मेरा स्नेह और शुभकामनाएँ
    प्रकाश मनु

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  2. धर्मपाल महेंद्र जैनSeptember 6, 2022 at 9:40 PM

    बहुत अच्छा और जरूरी संपादकीय।

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