अहिंसक मार्ग की अहिंसक यात्रा का सुख

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

जब सारा शहर सो रहा होता है तो उस समय भी राहें जागती हैं, अपने पथिकों को गंतव्य तक पहुँचाने के लिए। पथिकों का अपना गंतव्य बस पता हो। रास्तों का अपना कोई पूर्वाग्रह नहीं होता। उन राहों पर कोई भी आयु-वर्ग, धर्म, जाति, पंथ या सम्प्रदाय के लोग आ जा रहे हों, राहें यह नहीं कहतीं कि तुम्हारे लिए मेरे पास कोई स्थान नहीं है जैसे सूरज समान रूप से आसमान से अपनी तपिश देता है, चाँद शीतलता।

इन राहों पर असंख्य यात्री अपनी यात्रा समाप्त करके जा चुके हैं। भटके हुए लोग न अपने गंतव्य तक पहुँच पाते हैं और न ही जागती हुई राहों के दर्द को समझ पाते हैं। वे कभी नहीं चाहती हैं कि इंसान भटके हुए यात्री के रूप में जाना जाए। सूनी राहें कभी भी पथिकों को डराती नहीं। पथिक के भीतर बैठे भय की कोख में हिंसा होती है। इसलिए वह किसी हिंसक दस्तक से डरा होता है। इसलिए हमारी चेतना का आकाश भय रहित होना आवश्यक है। क्योंकि भय, हिंसा या किसी खतरे की दस्तक होती है, इसलिए सांसारिक जगत में रहने वाले लोग अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित रहते हैं, भयभीत भी। आपने देखा होगा कि योगी, संत या ऋषि लोग अपने तपश्चर्या के बल पर अपने मन, बुद्धि एवं मार्ग का वरण करते हैं और निर्भीक रहते हैं। 
हमारी चेतना का आकाश बहुत बड़ा होता है। सामान्य सांसारिक जीवन जीने वालों में भय, हिंसा और खतरे की चिंता उन पर भारी पड़ते हैं तो लोग अपने उस सूनेपन में भयाक्रांत हो उठते हैं और उनका साहस डगमगाने लगता है। हमारे सनातन परंपरा में इसीलिए तपश्चर्या का मार्ग अपना कर ऐसी अनेक विभूतियाँ हमारे समक्ष उदाहरण के रूप में आज विद्यमान हैं जो निडरता के प्रतीक हैं। सच कहा जाए तो ऐसी विभूतियाँ ही तो इतिहास, समय, काल को प्रभावित कर सृष्टि का सहयोगी बनी हैं। 
मार्ग जब मनुष्य के जीवन अंग बनते हैं तो उसके लिए सन्मार्ग की निष्ठा सबसे उत्तम मानी गयी है। सन्मार्ग का अर्थ है- सत्य का अनुगामी बनना। झूठ का मार्ग अपना कर लोग मिथ्यालाप करते रहे हैं। सूनी राहों पर असत्य ढोने वाले भी चलते रहते हैं। राहें उन्हें भी नहीं रोकतीं, लेकिन असत्य-मार्गी का इतिहास बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। घृणा की दृष्टि से देखा जाता रहा है, यह भी हम सब जानते हैं।

हम सभी मनुष्य हैं और हमारे जीवन का एक सत्व है। इसलिए हमारी दृष्टि, हमारी परख मनुष्य केंद्रित रहेगी ही। यह आवश्यक है और अनिवार्य भी है, एक चेतसमना के लिए। क्या आपको नहीं लगता कि हम बहुत सी बातों, बहुत से मुद्दों और उपलब्ध स्थितियों से अभी भी अनभिज्ञ हैं? इसलिए हम जितना जानते हैं हमारी परख के दायरे भी तो वही होंगे। हम मनुष्य के विभिन्न मनोविज्ञान को समझने के क्रम में इसलिए बहुत कुछ नया जानते हैं और आश्चर्य करते हैं। हिंसा, भय, घृणा, असत्य या दूसरे बहुत से मनुष्य के कर्मों व प्रतिफल का विश्लेषण जिन महान लोगों ने संसार भर में किया वे मनुष्य को केंद्र में रखकर सब कुछ करते रहे हैं, और कर रहे हैं। इन सबसे इतर भी बहुत कुछ है और ऐसे अनेक रहस्य हो सकते हैं जिन्हें हम और हमारी पीढ़ियाँ आगे जान सकें। लेकिन यह तय है कि राहों के हम कहीं न कहीं अनुगामी हैं।

भौतिक जीवन के भौतिक मार्ग और आध्यात्मिक जीवन के आध्यात्मिक मार्ग हैं। संत लोग प्रायः अध्यात्म के मार्ग पर चलकर समय-काल-परिस्थितियों पर अपना छाप छोड़ते हैं। कुछेक ने भौतिक जगत में ही सब कुछ तलाशने की कोशिश की लेकिन उन्हें सत्य का जब भान हुआ तो उन्होंने अपने मार्ग को दुरुस्त किया और अपनी छवि नए तरीके से स्थापित करने से भी नहीं चूके।
लेकिन यह धरती बहुत विचित्र है। असंख्य उदाहरण इस धरती पर हैं जो अपने सच्चे और अच्छे मार्गों की वजह से युगों-युगों तक सराहे व अपनाए जाते रहे हैं। यह केवल भारतीय भूभाग की बात नहीं है अपितु संसार में जहां कहीं भी इतिहास, भूगोल, संस्कृति व सभ्यताएँ विद्यमान हैं उन सभी क्षेत्रों में क्षेत्रों की बात है। सत्य के मार्ग अपनाने वालों ने ही प्रेम की प्रतिष्ठा की है। सत्य और अहिंसा में फर्क नहीं होता, यह तो एक ही सिक्के के दो पहलू बताए गए हैं। सत्य के मार्ग ही शांति की ओर जाते हैं वरना हार और अशांति तो हर उस पाप मार्ग में है जो मनुष्य अपने अहंकार में या अज्ञान में चयन करके चलना शुरू करता है। यह अज्ञानता मनुष्य को युद्ध मार्ग तक ले गई हैं। युद्ध का मार्ग विनाशकारी होता है। असत्य की पराजय तो इसमें होती ही है किंतु सभ्यता और संस्कृतियों का, मनुष्य जाति का इसमें विनाश होता है। इसमें वे लोग भी मार दिए जाते हैं जो केवल अपने जीवन में सहज जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। वे हिंसा के शिकार होते हैं।

युद्ध के मार्ग पर चलकर महाभारत के अनेक महारथी विनाश के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं कर पाए। दुनिया के हर युद्ध का अपना-अपना दर्द है। युद्ध के मार्ग पर चलकर महान अशोक सम्राट दुखी हुआ। युद्ध का मार्ग इसीलिए हमारी चेतना के आकाश से परे की विषय है। चेतसमना लोग युद्ध की जगह शांति एवं प्रेम के मार्ग पर चलना पसंद किए हैं। सम्राट अशोक कलिंग के युद्ध के बाद इतना निराश हुआ कि उसने बुद्ध-मार्ग पर चलने का व्रत लिया। अपने ही परिवार के लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर बुद्ध और उनके संदेश को प्रचारित-प्रसारित किया। कहते हैं बुद्ध का मार्ग मध्यम मार्ग है, और यह तो अष्टांगिक मार्गों का प्रतिपादन करता है। बौद्ध धर्म में यहां तक कहा गया है कि वैर के मार्ग पर चलने पर केवल वैर बढ़ता है और प्रेम के मार्ग पर चलने पर शांति का संवर्धन होता है। इसी प्रकार जब मुस्लिम लोगों ने अतिक्रमण का मार्ग अपनाकर अपनी संस्कृति का विस्तार करना चाहा और इस बीच अनेक युद्ध और लड़ाइयाँ हुईं तो इससे दुखी उन्हीं में से कुछ लोगों ने पीर, फ़क़ीर और सूफ़ी मार्ग अपनाकर मोहब्बत का पैगाम बाँटने का यत्न किया क्योंकि युद्ध व लड़ाइयों के इस मार्ग में केवल हिंसा व दर्द हाथ लगे।

मार्गों का अपना सौंदर्यबोध होता है। यदि सही रास्ते पर चलकर किसी की पीड़ा को कम कर दे कोई, तो वह उसके लिए फरिश्ता, देवता और भगवान बन जाता है। यदि गलत रास्ते पर चलकर अतिक्रमित करके लोगों को दुखी कर दे वही, तो राक्षस के रूप में देखा जाता है। पर मन का अपना स्वभाव अपने अनुशासन से सन्नद्ध नहीं होते तो व्यक्ति गलत राह को ही चुन लेता है और उसके अहंकार, अकल्पनीय महत्वाकांक्षा और गलत निर्णय महाभारत जैसे युद्ध को आमंत्रित कर देते हैं। इसलिए शांत-क्लांत राहों के मौन पर बेलगाम मन का अश्व यदि कोई व्यक्ति दौड़ाता है तो राहें कुछ नहीं कहतीं लेकिन बदले में निराशा और सर्वनाश उनके हिस्से में आ ही जाता है।

ज्यादा चातुर्य में अपनाया गया पथ व्यक्ति के लिए कभी दुर्भाग्य बन जाता है तो कभी सही साबित हो जाता है। इसलिए चतुराई किस हद तक आपके लिए, या किसी के लिए हितकारी है, यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर है। सरपट दौड़ती नदी में मछली तो ऊसर में या रेगिस्तान में नहीं चल सकती। वह तो समुद्र में भी अपनी अनुकूलता तक ही जा सकती है। मनुष्य को यह बात समझ क्यों नहीं आती की उसकी भी कुछ सीमारेखा है। अधिक चातुर्य में मनुष्य कभी-कभी फंस जाता है और वह क्रूर या हिंसक भी बन जाता है किंतु उसको जब तक सच का पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है। इसलिए प्रज्ञावान लोग सदैव अपने ध्येय-मार्ग की पवित्रता, शुचिता, अनुशासन और दृष्टि पर सदैव चैतन्य होकर सोचते हैं और उसके बाद ही अपने ध्येय के अनुसार अपना मार्ग अच्छे गुरु के मार्गदर्शन में अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं। ऐसे लोग यशस्वी हो जाते हैं। विजयश्री उनके पथ का अभिनन्दन करती है और अहिंसक छवि उनकी, अपने समय में और आने वाले समय में यशोगान करती हैं। अनेक पुष्प उनके मार्ग पर बिछना अपना सौभाग्य समझते हैं और उनके प्रत्येक कार्य को किसी के कृपा से सराहना पाने की कोई जरूरत नहीं होती वे स्वतः सर्वप्रिय बन जाते हैं।

इस जगत में तो सब कुछ चलायमान है। आत्मा स्वयं एक यात्री है जो नौका समान शरीर में स्थिर नहीं रह सकती। वह भी अपने एक पड़ाव के बाद दूसरे पड़ाव की राही है। सूर्य भी अपनी निरन्तर यात्रा पर है, चन्द्र भी। यह पृथ्वी भी यात्री है और समस्त ग्रह-नक्षत्र-तारे भी यात्री हैं। यात्रा का अंत भी एक नई यात्रा का प्रारंभ है। नश्वर शरीर भी अपनी एक जीवन की यात्रा पूर्ण करके दूसरी यात्रा पर निकल पड़ती है, नए स्वरूप के साथ। सड़क तो समय है। इस समय के सूनेपन और इसके रंगमय ध्वनि को सुनकर समझकर हम चाहे जिस कल्पना लोक में खो जाएँ किंतु समय तो एक निरपेक्ष सड़क है। वह गतिमान भी है और कदाचित ठहराव भी इसी समय में विद्यमान हो पर उसके उस अंश को हम अपनी कल्पना में स्थिर नहीं कर सकते। समय तो सबसे ज्यादा अहिंसक है बस उसे हम हिंसक अवसर न दें। इस समय पर सरपट भागते जीवन के छंद भी बहुत सुंदर हैं बस इसमें कौन किस प्रकार का शिल्प का अनुबंध करके आगे बढ़ता है, यह तो यात्री की अपनी रुचि, इच्छा और चयन पर निर्भर है।

हमें हमारी यात्रा तय करनी है। इसे हम कैसे व किस रूप में अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं, यह तो हमारे ऊपर निर्भर है। यदि हम वास्तव में एक उत्कृष्ट यात्री बन सकें, तो इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि हम अपने अतीत का वर्णन जिस किसी से करेंगे उसमें आत्मबोध भी सुखकारी होगा, गौरवशाली होगा। इसलिए हम अपने जीवन में एक ऐसी संकल्पना की राह ढूंढें, एक ऐसे पथ के पथिक बनें की चाहे वह शहर की सूनी सड़कें हों या तेज गति से भागती सड़कें, हमारे यात्रा की यशोगान युग-युगांतर तक लोग करें। चरैवेति चरैवेति!

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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