एहसास एक स्‍पर्श का

रमेश चन्‍द्र
- रमेश चन्‍द्र


सुरमई साँझ जब धीरे-धीरे धरती की गोद में बसने लगी, तो दिन भर से आक्रांत काल भी विश्रांति खोजने लगा। यह संध्‍या वेला होती ही ऐसी है। थके-मांदे व्‍यक्तियों, पशु-पक्षियों सभी को अंक भरकर झीने-झीने वितान रूपी आँचल में ढाँपकर चिर-प्रतीक्षारत माँ की भाँति ममता का सारा सागर उड़ेल देती है और लोरियाँ देकर सुबह तक के लिए स्‍वप्‍न-लोक में विहार कराती है। फिर प्रात:काल को उन्‍हें फूलों की ताजगी, प्रकृति की स्‍फूर्ति और सूर्य के तेज तथा समस्‍त आशीर्वादों के साथ कर्म-क्षेत्र में उतार देती है। इस प्रकार तमस यानी अंधकार, जिसे प्राणी अपने जीवन में नकारात्‍मक रूप में लेता है, वास्‍तव में जीवन का सकारात्‍मक और अनिवार्य पक्ष है। दिन का समय व्‍यक्ति व्‍यर्थ भी गँवा देता है, परंतु रात को सोकर वह ऊर्जा ही ग्रहण करता है। रात्रि-काल ही जीवन को जीवंतता प्रदान करता है और उसका आशाओं के साथ पुन:-पुन: स्‍वागत करता है, नई स्‍फूर्ति देने के लिए, नया एहसास कराने के लिए, स्‍फूर्त होकर फिर से नए इतिहास के सृजन में रत हो जाने के लिए। वास्‍तव में इस साँझ-सकारे तक के काल से आदमी न जाने कितना पाता है। यही एक सच्‍ची ममता की छाँव है। दिवस तो मनुष्‍य के श्रम के पश्‍चात् होने वाली विश्रांति का प्रतीक है। यामिनी ही उस श्रांति का शमन करने वाली देवतनया है।

एहसास के ऐसे ही क्षण के अवतरण के समय क्षितिज काम से घर लौट रहा था। जिस गाड़ी में वह बैठा था, उसमें मधुर संगीत की धुन बज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह देवधनी नृत्‍य की कोई देवधुन हो। क्षितिज उस धुन में खो गया। वह धुन उसके कानों के माध्‍यम से धीरे-धीरे उसके मन-‍मस्तिष्‍क में उतरती जा रही थी। मन का धुन से तादात्‍म्‍य स्‍थापित हो रहा था, जैसे वह किसी सम्‍मोहन के वश में होता जा रहा हो। जब इन क्षणों में वह पूरी तरह लीन हो गया, उसे लगा जैसे उसका कोई शरीर ही न रहा हो, केवल कान, मन और मस्तिष्‍क हों, सुनने और एहसास करने के लिए। वह देहातीत हो गया। संगीत से एकाकार देहातीत हो वह न जाने मन की किन अतल गहराइयों में पहुँच गया। स्‍वयं में ‘निर्गुण’ हो उसे अब शरीर का कोई ख्‍याल नहीं था। संभवत: उसकी आत्‍मा और प्राण ही वहाँ थे, वे भी अति सूक्ष्‍म रूप में। उसकी सूक्ष्‍म और हल्‍की-फुल्‍की आत्‍मा भी संगीत के साथ वायवीय होकर विचरने लगी थी और प्राण थिरकने लगे थे। वह एक अलौकिक लोक में पहुँच चुका था, जहाँ सब कुछ शून्‍य, परंतु एक अंतहीन विस्‍तार था। उसके कानों में एक अनहद नाद गूँजने लगा। जिसकी जैसी भावना होती है, भगवान उसे वैसा ही फल देते हैं। गीत की पंक्तियाँ बंदनवार, उसकी डोरी वर्णों की शिरोरेखा और शब्‍द उस पर लगी झंडियों का रूप ले चुके थे। ऐसी न जाने कितनी बंदनवारी पंक्तियों से उसका गीत बन चुका था। जब संगीत की धुन झंकृत होती, तो उसकी आत्‍मा उस बंदनवार से लिपट-लिपट जाती। वायु के स्‍नेहिल स्‍पर्श के साथ वह लहर-लहर जाती और किसी तन्‍वंगी नवयौवना की भाँति लरज-लरज पड़ती। वह आत्‍मा अब अपना आत्‍मैक अस्तित्‍व भी खो चुकी थी। यूँ कहिए कि वह शून्‍य में समा चुकी थी। ऐसी निराकार, अस्तित्‍व से परे विहारिणी का किससे सरोकार और किससे साक्षात्‍कार हो सकता था? शून्‍य संवेदनावस्‍था रूप या यूँ कहिए कि अरूप, जिससे बाहर आने का मतलब था अनेक अवस्‍थाओं से बाहर आना यानी पहले आत्‍मा का पुन: शून्‍यावस्‍था से बाहर आना, फिर उसका सूक्ष्‍म रूप में पुन: आना, फिर अनहद नाद की अवस्‍था में आना और उससे बाहर आना, फिर आत्‍मा का शरीर में पुन: प्रतिष्‍ठापन, फिर शरीर का जड़-चेतन की अवस्‍था से बाहर आना अर्थात् संवेदना प्राप्‍त करना और अंत में आत्‍मा एवं प्राण से एकाकार शरीर का चेतन रूप धारण करना। ऐसी अवस्‍था से उसे कौन बाहर ला सकता था? संभवत: कोई पारलौकिक स्‍पर्श!

शून्‍य संवेदना की ऐसी अवस्‍था में जब क्षितिज की आत्‍मा उसके शरीर को जीवित परंतु जड़ छोड़कर किसी परम आत्‍मा से अभिसार का संसार रचाए बैठी थी, तो उसे लगा जैसे किसी गुलाब की कोमल पंखुड़ी या नील कमल-नाल-सी किसी लाजवंती या छुई-मुई ने उसे छू लिया हो। कितनी ही अवस्‍थाओं से अचानक बाहर-से आकर उसके संपूर्ण जड़ शरीर में जैसे सिहरन दौड़ गई। सिहरन क्‍या समस्‍त तन-मन को आलोडि़त कर देने वाला कोई तीव्र एहसास था वह! पर साथ ही साथ आत्‍मा फिर विलीन हो गई, परंतु एहसास नया रूप लेता रहा। उसे लग रहा था जैसे यह कोई ब्रह्म-कमल-नाल हो और उसने संचलन सामर्थ्‍य प्राप्‍त कर ली हो, जैसे कोई ब्रह्माकुमारी मणिमहेश को अर्घ्‍य दे रही हो या कि कोई दैवी शक्ति उसे चेतन कर रही हो। उसे भास हुआ कि शायद यह प्रजापति से भी बड़े शिल्‍पकार का गढ़ा हुआ शिल्‍प है। उसका ज्‍योतित रूप उसे भी भासमान कर गया। उसका स्‍वयं का चेहरा चमकने लगा। धीरे-धीरे उसे लगा कि कोई उसका जलाभिषेक कर रहा है, उसके तन-मन की शुचिता के लिए। शायद यह इंद्रायण थी। फिर उसे लगा कि मलयाचल से चंदनसिक्‍त हवा उसके ऊपर से गुजर रही है, उसे शुद्ध बनाने के लिए। शायद यह वारुणी का वैशेष्‍य था। फिर उसे लगा कि कोई अलौकिक कांति उसके चारों ओर फैल गई है, उसे ज्ञान देने के लिए। शायद यह वैष्‍णवी की आभा थी। वह ज्ञानेश्‍वर हो गया। फिर उसे लगा कि कोई गुलाब की पंखुड़ी महीन से महीन होती हुई उसके चारों ओर फैलती जा रही है और एक झीना, महीन, महकदार एवं मोहक आँचल बन उसे ढाँप रही है, उसे सुरक्षा देने के लिए। शायद यह हिमाचल-पुत्री पार्वती के आँचल का विस्‍तार था। उसे योगक्षेम दान मिला। फिर उसे लगा कि माँ रुक्मिणी के पीछे मोरपंखी श्रीकृष्‍ण खिलखिलाकर हँस रहे हैं और अपनी लीला बिखेर रहे हैं। उस युगल रूप में उसे साहित्‍य (सहितता) का आशीर्वाद मिला। अंत में उसे लगा कि कोई झंकार उसे शून्‍यावस्‍था से बाहर ला रही है, उसके क्रियाशील होने के लिए। शायद यह सरस्‍वती की झंकार थी। वह सारस्‍वत हो गया। सरस्‍वती की झंकार से वह शून्‍यावस्‍था से बाहर आ गया। क्षितिज धन्‍य हुआ। शून्‍यावस्‍था में उसकी आत्‍मा परम आत्‍मा के विभिन्‍न रूपों का साक्षात्‍कार कर चुकी थी। उसे ईश-दर्शन हुए।

घर पहुँचकर क्षितिज ने देखा कि उसकी पत्‍नी सज-धजकर सर्वांग सुंदरी बन उसका स्‍वागत कर रही है। क्षितिज को अपने आगोश में लेने के लिए पत्‍नी ने आँचल फैलाया। जैसे प्रिज्‍म से छिटककर सूर्य की किरणें अलग-अग रूपों में दिखाई देती हैं, उसी प्रकार क्षितिज को उसके आँचल पार से इंद्रायण, वैष्‍णवी, लक्ष्‍मी, पार्वती, रुक्मिणी, सरसस्‍वती और महामाया के रूप दृष्टिगोचर हुए। उसे सप्‍तरूपा सतरंगी महाशक्ति के दर्शन हुए। जब उसने आँचल समेट लिया तो ये सारे रूप उसके मुख-वदन में सिमट आए, जैसे सूर्य ने अपनी किरणें समेट ली हों। तब पत्‍नी में क्षितिज को कभी इंद्रायण का रूप दिखाई देता, कभी वारुणीका, कभी वैष्‍णवी का, कभी लक्ष्‍मी का, कभी पार्वती का, कभी रुक्मिणी का और कभी सरस्‍वती का। उसके ऐसे सामासिक रूप से उसमें पुन: एक दिव्‍य शक्ति का संचरा हो गया। उसे लगा जैसे वह उसकेयुग की आद्या शक्ति, उसकी योगेश्‍वरी हो। उसके बिना वह अधूरा है। वह अर्द्धनारीश्‍वर हो गया! 

(लेखकीय नोट: सूक्ष्‍म रूप से देखें। अस्तित्‍व के इस एहसास में देवियों के रूप में महिला शक्ति को सलाम किया गया है)

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