व्यंग्य: हिंदीदानों को लगी नई बीमारी

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

कोई दिवस मनाना हो और समारोह न हो तो सत्ता किस काम की! किसी मंत्री, राज्यमंत्री के साथ फोटो न निकले तो अफसरी किस काम की! सरकारी बजट के बराबर, झूठे-सच्चे बिलों का लेखा न बने तो बड़े बाबू की बाबूगिरी और लेखापाल की कुर्सी किस काम की! कितने सोच-विचार के बाद एक फाइल चलती है, तब मनता है दिवस। विशाल बजट खप जाए तब देश-विदेश में मनता है ऐसा एक दिवस। आप जो गली-मोहल्ले से लगाकर दुनिया के तमाम बड़े-बड़े शहरों में हिंदी दिवस मनाने को आतुर हैं, यह बड़े बजट वाला ही दिवस है। इसका बजट, योग दिवस, बाल दिवस और शहीद दिवस से बहुत ज्यादा है। हिंदी डे के सामने वेलेंटाइन्स डे, मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेन्शिप डे कहीं नहीं लगते। हिंदी डे को छोड़ कर दूसरे सारे ‘डेज़’ में अपनी गाँठ का या माता-पिता को बहला-फुसला कर लिया गया पैसा लगाना पड़ता है। खुद का पैसा लगा कर कोई दिवस मनाओ तो क्या मनाया? इस तरह के दिवस मनाने की खबर कहीं नहीं छपती। खुद को खबर बना कर प्रचारित-प्रसारित करना हो तो सबसे माकूल दिन है हिंदी डे। कविता पढ़ते हुए, भाषण देते हुए और विमोचन करते हुए फोटो खिंचवाने का ऐसा दिन साल में एक बार ही आता है। कार्यक्रम में बैठ-बैठे झपकी भी ले लो तो इसे ‘चिंतन का समय’ माना जाता है। हिंदी दिवस की गोटा-किनारी चमक देख कर अब हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े की मीठी चाशनी भी बाजार में फेमस हो रही है।  हम हिंदी वाले, भारत के दक्षिणी राज्यों में रुठे अहिंदी भाषियों को मना नहीं पा रहे, वहाँ हिंदी विरोध जारी है। पर रोजमर्रा के काम में हमने हिंदी को कितना अपनाया, यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

हिंदी ने जो दिया, छप्पर फाड़ कर दिया और सबने आनंद से लिया। हिंदी दिवस की आभा अन्य दिवसों से अधिक चमकी, क्योंकि हर विभाग के पास हिंदी दिवस का बजट था। जितना बड़ा विभाग था उतना बड़ा बजट मिला। बड़े बजट ने बड़े जूतों को चमकदार बनाया। पॉलिश करने वालों की राजनीति और ज्यादा चमकी। सितंबर आने की सुगबुगाहट में स्वतंत्रता दिवस की संध्या से ही कविगण पुरानी कविताओं को हिंदी दिवस की नई कविता में बदलने लगे। हिंदी की दो लाइनों से वे चालीस लाइनों की कविता उगा लाए। पुरस्कारजीवी तुक मिलाने लगे। हिंदी की तुक ‘बंदी’ से मिला दी। फिर चकबंदी, हकबंदी, शराबबंदी, नोटबंदी सबकी तुक हिंदी से मिल गई पर स्कूली शिक्षा प्रणाली से नहीं मिली। अपने ही बच्चे कान्वेंट संस्कृति में बड़े होने लगे। नई पीढ़ी में अंग्रेजी ने जबरदस्त घुसपैठ की, हिंदी माध्यम के स्कूल दोयम माने जाने लगे। सबने देखा हिंदी खोती जा रही थी, पर जिम्मेदार लोग नहीं बोले क्योंकि उनको पेशेवर संस्थानों से चंदा कम मिलने का खतरा था।

उत्सवी नौटंकीबाजी बहुत है पर हिंदी के हालात नहीं सुधर रहे। देसी साहबान समय-समय पर देश-विदेश में हिंदी में बात करते हैं, वे हिंदी में भाषण भी देते हैं। हिंदी के ऐसे शब्द बोलते हैं जैसे कविवर अज्ञेय की आत्मा उनमें समा गई हो पर कोई उनके भाषण का लिखा पर्चा देख ले तो उसे खुद की आँखों पर विश्वास न हो। सालों हो गए हिंदी डे मनाते हुए, जल्दी ही हिंदी दिवस का अमृत महोत्सव भी मनाएँगे, पर हिंदीदानों को एक नई बीमारी लग गई है। देखिये न, उनके भाषण के लिए इक्कीसवीं सदी की हिंदी कितनी आधुनिक और स्लिम हो गई है। भाषण जिस लिपि में लिखा है उसमें न मात्रा का चक्कर है, न अनुस्वार का और न ही आधे-पूरे अक्षर का। शिरोरेखा का भी बंधन नहीं है। जी, आपने सही पहचाना, हिंदी ने अंग्रेजी के कपड़े पहन लिए हैं। यहाँ हिंदी देवनागरी लिपि की जगह रोमन लिपि में लिखी जा रही है।

जिस तेजी से इंटरनेट ‘टू जी’ से ‘फाइव जी’ हुआ हिंदी की लिपि भी तेजी से बदली। हाथ-हाथ में हसीन मोबाइल फ़ोन आए तो चैट के छोटे-बड़े संदेश रोमन हिंदी में लिखे जाने लगे। डैटा मुफ्त या कम दामों पर मिलने की देर थी, क्रांति आ गई। देखते-देखते सारी भारतीय भाषाओं की लिपि रोमन हो गई। दुनिया की शायद ही कोई भाषा बची हो जो रोमन लिपि में नहीं लिखी गई हो। कौन-सी भाषा रोमन लिपि में लिखी गई है, उसे लिखने वाला जाने या पानेवाला। मोबाइल पर हिंदी के संदेश रोमन में आना शुरू हुए तो देखते-देखते वाट्सएप और मैसेंजर के संदेश रोमन हिंदी में हो गए। टिकटॉक वक्त रहते सिमट गया अन्यथा वह रोमन हिंदी का टॉक शो बन जाता। ट्विटर और स्नैपचैट के भी यही हाल हैं। अल्पशिक्षितों को अंग्रेजी में कामकाजी हिंदी लिखनी आ गई तो पढ़े-लिखे लोगों की बल्ले-बल्ले हो गई, वे अपने भाषण रोमन लिपि में लिखवाने लगे। रोमन लिपि में हिंदी लिखो तो किस हिंदी अध्यापक की हिम्मत कि वह छोटी-बड़ी मात्रा या वर्णों की गलतियाँ निकाल दें। ई-संवादों में रोमन हिंदी जिस तेजी से लोकप्रिय हुई, उतनी तेजी से तो कोई राजनीतिक दल भी लोकप्रिय नहीं हो पाया। किसी धर्म का इतनी तेजी से फैलाव नहीं हुआ जितना रोमन का हुआ। दुकानों के, बड़ी संस्थाओं के, सड़कों और दर्शनीय स्थलों के और खुद हमारे नाम रोमन लिपि में लिख दिए गए। रोमन लिपि का आधिपत्य हमने आगे बढ़कर स्वीकार कर लिया। हमें अपनी संस्कृति और धरोहर की लिपि देवनागरी को खोने का कभी डर नहीं लगा। मानसिक गुलामी की हद है ये।

टोरंटों या न्यूयॉर्क में ऐसा होता तो मैं इसे विदेशी प्रभाव मान लेता। पर कोलकाता के हाथ-रिक्शे वाले हों, बिहारी खोमचे वाले हों, मुंबईया दलाल स्ट्रीट वाले हों या दिल्ली घेरने वाले, सब पर रोमन हिंदी का भूत चढ़ा हुआ है।  पिछले दिनों मन बहुत उदास हो गया। मेगा बजट की हिंदी फिल्म बन रही थी। हिंदी के प्रख्यात लेखक-निर्देशक, अपने अभिनेता और अभिनेत्री के हाथों में उनकी ‘स्क्रिप्ट’ थमा रहे थे। उनके हिंदी डॉयलॉग रोमन लिपि में लिखे थे। जीभ हिंदी बोल रही थी, कान हिंदी सुन रहे थे, दिल में हिंदी धड़क रही थी पर आँखें रोमन लिपि में हिंदी पढ़ रही थी। लगा हिंदी डे के शोर में देवनागरी सिमट रही थी।

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