हिंदी भाषा के साथ खिलवाड़ (हिंदी पक्ष विशेष)

सिद्धेश्वर

सिद्धेश्वर


पुरानी कहावत है - हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और होते हैं। हर साल हिंदी दिवस के दिन ही हम आत्ममंथन क्यों करते हैं? क्यों साल भर हिंदी के प्रति उपेक्षा भावना रखते हैं? अंग्रेजी के रक्षक हिंदी के अकेले दुश्मन नहीं, बल्कि अनेकता में एकता की बात करने वाले वे देशवासी भी हैं जो राष्ट्रभाषा की बात आने पर मौन हो जाते हैं, या अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषा का झंडा लेकर, शोर मचाने लगते हैं कि मातृभाषा हमारी अपनी क्षेत्रीय मातृभाषा क्यों नहीं? देश की राष्ट्रभाषा हिंदी ही क्यों? क्यों नहीं देश की राष्ट्रभाषा भोजपुरी हो सकती, मगही हो सकती? क्यों नहीं देश की राष्ट्रभाषा उर्दू हो सकती? संस्कृत को क्यों न राष्ट्रभाषा बनाया जाए? दक्षिण भारतीय भी अपने-अपने क्षेत्र की बोलियों, या अपनी-अपनी मातृभाषा को लेकर, जबरदस्त विरोध प्रदर्शन करने लगते हैं। 

 हिंदी को मातृभाषा बनाने के लिए सरकार जब तैयारी करने लगती है, तब यही अलग-अलग क्षेत्र के लोग सरकार को दिग्भ्रमित करने लगते हैं। सरकार को अपनी सत्ता को बचाए रखने की चेतावनी देते हुए, अपने अपने क्षेत्र का झंडा उठाकर हिंदी के विरोध में खड़े हो जाते हैं!

 कुछ ऐसा ही विरोध प्रदर्शन देश की आजादी के तुरंत बाद हुआ था, जब संवैधानिक तौर पर हिंदी को मातृभाषा बनाने के लिए, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कहने पर, कुछ लोग तैयार हुए। तब अंग्रेजी के पोषकों ने शोर मचा कर मातृभाषा की बात टाल दी अगले 15 वर्ष के लिए, औऱ हिंदी को राजभाषा की झोली में डाल दिया गया। तब से हिंदी बेचारी आज तक झोली में पड़ी हुई कराह रही है।

 अरबों खरबों रुपए खर्च करने के बाद भी, देशभर के सरकारी राजभाषा विभाग हिंदी को देशवासियों के मन में स्थापित नहीं कर पाए हैं! आज भी सिर्फ दिखावे के लिए हिंदी की बात होती है औऱ सरकारी कार्यालयों में अभी भी अंग्रेजी का वर्चस्व है।

 जिस तरह देशभर के जाति धर्म के नाम पर अलग-अलग बँटे हुए लोग, हिंदुत्व को सांप्रदायिक बताते आ रहे है, ठीक उसी प्रकार देश के अलग-अलग क्षेत्रीय भाषा के लोग, हिंदी को सांप्रदायिकता के रंग में रंगने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि हिंदी सिर्फ हिंदी भाषियों की भाषा है, और देश की अन्य क्षेत्रीय एवं जातीय भाषा के सामने दुश्मन बनकर खड़ी है। उनका मानना है कि हिंदी यदि देश की मातृभाषा बन गई, तब देश की तमाम भाषाएँ उसके तले दब जाएगी। जबकि क्षेत्रीय भाषाएँ कभी दबती नहीं, बल्कि हिंदी का साथ पाकर विस्तार पाती है।

 इस तरह के संकीर्ण मानसिकता के लोग ही हिंदी को सिर्फ हिंदी भाषियों की भाषा समझते हैं जबकि व्यवहारिक तौर पर आज की तारीख में भी 70% भारतीय जनता हिंदी समझती बोलती है, जबकि वह अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ नहीं समझ पाती। ये लोग यह नहीं समझ पाते कि इसका लाभ सीधे-सीधे अंग्रेजी उठा रही है। देश की भाषा के सिंहासन पर जहाँ हिंदी को बैठना चाहिए था, वहाँ आज भी अंग्रेजी अपना अधिकार जमाए बैठी है। शायद इसलिए हमारे देश की सारी शिक्षा प्रणाली, व्यवसाय और कायदे कानून पर हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेजी का वर्चस्व है।

 हमारे देश के अधिकांश लोगों की मानसिकता भी भाषाई गुलामी से ऊपर नहीं उठ पा रही है। देश का 20% पूंजीपति वर्ग जो 80% जनता के पैसे को दोनों हाथों से लूट रहा है, उसे देश में समानता की बात क्यों पसंद आएगी? उसे तो लगता है कि अंग्रेजी के माध्यम से ही वह 80% आम जनता पर अधिकार जमाए रख सकता है! औऱ यह तभी संभव है जब 80% हिंदी में लिख पढ़ रहे जनता पर, हमारे बच्चे अंग्रेजी में तालीम हासिल कर उनसे हमेशा आगे रहे। शायद इसलिए सरकारी स्कूल भले न फूले-फले, लेकिन अंग्रेजी मीडियम के प्राइवेट स्कूल खूब फल फूल रहे हैं।

 ये 20% लोग हिंदी दिवस के दिन सिर्फ दिखावा करते हैं कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बने जबकि हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनने के बीच यही रोड़ा भी बन जाते हैं।  ये लोग 80% जनता को भ्रमित करते हैं कि हिंदी माध्यम से हम न तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते है ना तो नौकरी। हिंदी गँवारों की भाषा है। हिंदी के माध्यम से हम पूरे देश पर राज नहीं कर सकते जबकि अंग्रेजी पढ़ कर हम पूरे देश पर राज कर सकते हैं - वे ऐसा भ्रम फैलाते हैं। जबकि सच तो यह है कि अधिकांश क्षेत्रों में जाकर वे हिंदी के माध्यम से ही जनसंपर्क कर पाते हैं, इसका प्रमाण हैं टीवी चैनल और अखबार। इलेक्ट्रिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक देखा और पढ़ा जाने वाला माध्यम हिंदी ही है।

 अनेकता में एकता की भावना रखते हुए, हमारे देश का एक राष्ट्रीय ध्वज हो सकता है, एक राष्ट्रीय पशु हो सकता है, एक राष्ट्रीय फल हो सकता है, एक राष्ट्रीय खेल हो सकता है तो फिर एक राष्ट्रभाषा क्यों नहीं हो सकती? आजादी के अमृत महोत्सव मनाते हुए भी यह सवाल हमारे सामने आज क्यों मुँह बाए खड़ा है औऱ इसके लिए कौन जिम्मेदार है? आप चिंतन करें, आँखें खोल कर विचार करें, तब आप पाएंगे कि इसके लिए जितनी जिम्मेदारी हमारी सरकार और 20% पूंजीपति वर्ग की है, उतने ही दोषी हम यानी 80% जनता भी है।

 हमारी सरकार जो सत्ता के दाँवपेंच में क्षेत्रीय भाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा और अंग्रेजी के बीच के संघर्ष में उलझकर कोई ठोस निर्णायक कदम नहीं उठा पाती यह जानते हुए भी कि पूंजीपति वर्ग तो चाहेगा ही कि अंग्रेजी पर उसका आधिपत्य जमा रहे और हिंदी बेचारी ही बनी रहे। संवैधानिक तौर पर सरकार भी पूंजीपति वर्ग के पक्ष में खड़ी हो जाती है।

 लेकिन उस 80% जनता के बारे में हम क्या कहें, जो सिर्फ हिंदी दिवस के दिन जोर शोर से अपना उत्साह दिखलाती तो हैं, लेकिन फिर शांत हो जाती हैं? व्यवहारिक तौर पर फिर वे अंग्रेजी में हस्ताक्षर करने के लिए, अंग्रेजी में गुड बाय, गुड नाइट मम्मी-डैडी कहने के लिए, अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को शिक्षा देने के लिए, अंग्रेजी में आमंत्रण कार्ड छपवाने के लिए, अंग्रेजी में बैंक एवं अधिकांश कार्यकलाप करने के लिए, समर्पित रहते हैं। जिस अंग्रेजी का विरोध हिंदी दिवस के दिन करते हैं, उसी अंग्रेजी को गमछे की तरह साल भर गले में लपेटे रहते हैं।
 लेकिन सोचिए कि आखिर ऐसा क्यों करते हैँ? इसके पीछे भी उनकी मजबूरी होती है! कौन नहीं चाहता कि उसका बच्चा अच्छा पढ़-लिखकर अच्छा पद पाए? कौन नहीं चाहता कि वह गरीबी से उबर कर अमीर बन जाए? कौन नहीं चाहता कि वह बड़े घराने का एक हिस्सा बने? कौन नहीं चाहता कि देश भर में उसकी अपनी पहचान बने?
 हमने भी आत्म मंथन किया है। और हमारे बच्चे भी हमारी बात नहीं सुनते? क्योंकि वे जानते हैं कि मंच पर हिंदी का गुणगान करने वाले ये अधिकारी और ये सत्ता के लोग ही, हिंदी को हेय दृष्टि से देखते हैं, हिंदी वाले को उपेक्षित करते हैं और अंग्रेजी वाले को सम्मान पूर्वक अपनी आँखों पर बिठाते हैं, और हिंदी वाले को उपेक्षित करते हैं और अंग्रेजी वाले को प्राइवेट से लेकर सरकारी तक अच्छे पद पर आसीन करते हैं। ऐसे में वे बच्चे ही सफल होते हैं, जो दिन रात अंग्रेजी के ट्यूशन कोचिंग पढ़ते हुए, अंग्रेजी में बात व्यवहार करते हुए, अंग्रेजी भाषा में अध्ययन करते हुए अंग्रेजी माध्यम की परीक्षाओं में अव्वल होते हैं।

 इन सारी बातों के बाद हम यह पाते हैं कि दोषी हम तो हैं ही लेकिन हम से अधिक दोषी वे सत्ताधारी हैं, जो महात्मा गांधी की मूर्ति पर माला पहनाते हुए भी, महात्मा गांधी की तरह दृढ़ संकल्पित नहीं होते। महात्मा गांधी के बताए हुए आदर्श की राहों पर नहीं चलते। औऱ उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है, अपनी सत्ता बचाए रखना। भाषण भले वे हिंदी के पक्ष में 80% जनता के लिए देते हैं किंतु भीतर ही भीतर वे 20% पूंजीपति वर्गों के लिए, अंग्रेजी के पक्ष में होते हैं औऱ सारी की सारी उच्च नौकरी और उच्च व्यवसाय अंग्रेजी वालों के लिए ही केंद्रित रखते हैं।

 साथ ही साथ, दोषी हम लोगों में वे लोग भी हैं, जो सांप्रदायिकता के रंग में रंग कर, देश हित की भावना भूल जाते हैं, राष्ट्रभक्ति भूल जाते हैं औऱ अपनी जाति और अपने क्षेत्र की भाषा की आड़ में, जब हमारी सरकार चाहती है कि हिंदी राष्ट्रभाषा संवैधानिक तौर पर बन जाए, तब शोर-शराबा करने लगते हैं कि हिंदी ही राष्ट्रभाषा क्यों?

 मेरी समझ से साल भर में एक दिन हिंदी दिवस मनाने की अपेक्षा, इन बातों पर चिंतन मनन करना ज्यादा जरूरी है। वरना 75 साल से तो हम यह करते ही आ रहे हैं यानी हिंदी दिवस मनाते ही रहे हैं, आगे 100 साल भी अगर हम हिंदी दिवस मनाते रहेंगे, हिंदी की इस तरह झूठा गुणगान करते रहेंगे, सिर्फ दिखावे के लिए हिंदी का सम्मान करते रहेंगे, तब हिंदी कदापि राष्ट्रभाषा नहीं बन सकेगी और हमारा देश राष्ट्रभाषा विहीन बना ही रहेगा। और इसका नाजायज फायदा उठाएंगे फिर से वही विदेशी लोग, जिन्होंने वर्षों हमें भाषाई गुलामी से मुक्त नहीं किया और हम पर अपना अधिकार जमाए रखा।

 निश्चित तौर पर राष्ट्रभाषा का विरोध करते हुए हम अपने राष्ट्र का विरोध कर रहे हैं औऱ अपने देश की आजादी को नीलाम कर रहे हैं, उस अंग्रेजी के बाजार में, जहां पर हिंदी की कीमत पर हम अपनी भाषाई आजादी पाना नहीं चाहते। जिस आजादी के लिए हमारे देश भक्तों ने अपनी प्राण की आहुति दी,क्या फिर से गुलामी की ओर बढ़ता हुआ यह हमारा कमजोर स्वार्थ परक कदम तो नहीं?

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