प्रकृति मौन ही रहती है

उषा अवस्थी
सब उसकी संतानें हैं
वह माँ है, पोषण करती है
पर यदि पाँव कुपथ पर धारे
बिजली बनकर गिरती है

प्रकृति मौन ही रहती है

चुप्पी में है शक्ति समाहित
वह शिव, सत्य समर्पित है
यदि उस पर प्रहार हो फिर भी
इक सीमा तक सहती है

प्रकृति मौन ही रहती है

क्रूर आततायी दानव की
जब निर्ममता बढ़ जाती
समरांगण में निर्भय हो
'पंचायुध' सहित उतरती है

प्रकृति मौन ही रहती है

मन से ही सारे बन्धन हैं
मन से होते  कर्म सृजित
हो जब इच्छा शून्य, निर्विषय
प्रज्ञा, शक्ति संवरती है

प्रकृति मौन ही रहती है

नभ का फैला विस्तृत आँचल
विविध रंग से भरती है
चिदाकाश में शून्य लीन हो
एकाकार दमकती है

प्रकृति मौन ही रहती है।
***

परिचय: उषा अवस्थी
शिक्षा: एम ए (मनोविज्ञान), संगीत प्रभाकर एवं संगीत विशारद 
प्रकाशित रचनाएँ: आकाशवाणी लखनऊ द्वारा समय समय पर कविताओं का प्रसारण तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 

6 comments :

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति प्रकृति के मौन की!

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  2. अति सुंदर भाव उषा जी l बधाई

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  3. सुंदर सहज भाव

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  4. रचना सुन्दर लगी ,जानकर खुशी हुई। हार्दिक आभार आपका आदरणीय

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  5. प्रकृति के रूप का इतना सुन्दर चित्रण। सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई हो उषा जी।

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  6. प्रकृति के स्वरूप का इतना सुन्दर चित्रण। सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई हो उषा जी।

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