पुस्तक समीक्षा: खुल गये संभावनाओं के द्वार

समीक्षकः मुकेश कुमार सिन्हा


कृति: चिड़ियों का स्कूल (बाल कविता संग्रह)
कृतिकार: अनुभव राज
प्रकाशकः अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर-842002
पृष्ठः 72 मूल्यः ₹ 120/-

वह संगीत सुनता है, पेंटिग करता है, गायकी में अभिरुचि है, तो कविताओं को भी गढ़ता है। मतलब, एक साथ कई विधाओं में सिद्धहस्त है। रू-ब-रू होइये उसकी प्रतिभा से। कह उठिएगा-कमाल का बच्चा है! वह सामान्य नहीं है, मगर सामान्य को भी मात देने का हुनर रखता है। उसकी रचनात्मक सोच और काव्य सर्जना से आश्चर्यचकित होना तय है।

अनुभव राज
हम बात कर रहे हैं अनुभव राज की। माँ डॉ. आरती कुमारी खुद बेहतरीन कवयित्री हैं, तो बहन आस्था दीपाली के गायन, नृत्य और काव्यात्मक हुनर के क्या कहने? माँ और दीदी की तरह अनुभव भी प्रतिभा संपन्न है। कवि को गढ़ने में माँ के साथ-साथ नाना-नानी की भूमिका अतुलनीय रही है, इसलिए उसने प्रस्तुत पुस्तक को नानी स्व. रीता सिन्हा एवं नाना अलख निरंजन प्रसाद सिन्हा को समर्पित किया है।

बाल कवि की कविताओं में कल्पना नहीं है। वो लिखते हैं-‘मैंने अपने आसपास की चीजों को जिस तरह देखा, महसूसा, उनको उसी प्रकार अभिव्यक्त करने की कोशिश की है।’

अनुभव राज लिखित ‘चिड़ियों का स्कूल’ (बाल कविता संग्रह) में 38 कविताएँ हैं। पहली कविता है-‘प्रार्थना’। वह प्रार्थना करता है कि कभी शिथिल न रहूँ। किसी के तीखे वचनों को सुनकर कभी मन में घृणा का भाव नहीं आये। अति प्रशंसा सुनकर मन में अहंकार न छाये। माना कवि ने स्वयं के लिए प्रार्थना की है, लेकिन इसमें संदेश निहित है। अमूमन, लोग प्रशंसा सुनकर अहंकारी हो जाते हैं, उन्हें सच का आईना दिखाया जाये, तो गुस्से से लाल-पीले हो जाते हैं, मगर कवि का ऐसा स्वभाव नहीं है। वह लिखता है-
सपने पूरे करूँ सभी के
ऐसी युक्ति, शोहरत दो
मेरे भगवान मुझको ऐसी
बल बुद्धि और हिम्मत दो

मुकेश कुमार सिन्हा
वह थककर बैठने वालों में से नहीं है। वह जानता है परिस्थितियों से लड़ना या यूँ कह लीजिए कि अपनी क्षमता से विकट परिस्थितियों को अनुकूल बनाना। यदि हौसला हो, तो कहाँ समय भी रोड़े अटकाता है? ऐसी शख्सियत को तो समय का भी सलाम है! उसे प्रतिकूल परिस्थितियों में दौड़ने आता है। जीवन ने उसे उलझाकर रख दिया है, बावजूद कवि की तमन्ना है-
मैं ज़िद्दी हूँ तूफ़ानों में
दीप जलाना चाहूँ
पंख हैं कोमल फिर भी नभ में
मैं तो उड़ना चाहूँ

अनुभव जानता है परिस्थितियों से लड़ना। उसे आँसू बहाना नहीं आता, बल्कि मुसीबतों में भी मुस्कुराना आता है। उसे भगवान से शिकायत है, मगर इसका यह कतई मतलब नहीं कि वह हार मान ले। वह पढ़ना चाहता है, बढ़ना चाहता है। वह आलसी बनकर नहीं रहना चाहता है, बल्कि उसकी चाहत है रोज सवेरे उठने की और प्रतिदिन स्कूल जाने की। यह कविता उत्साह बढ़ाती है और उन बच्चों के लिए प्रेरक भी है, जो परिस्थितियों से लड़ना नहीं चाहते और थककर बैठना चाहते हैं। 
पैदल चाहे ऑटो बस से बच्चे जाते हैं
व्हील-चेयर पे बैठ के मैं भी जाऊँगा स्कूल

अक्सर बड़ों का बच्चों से सवाल होता है कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहेगा? बच्चों का चंचल मन ऐसा होता है कि कभी वह चिड़िया बनना चाहता है, कभा पायलट, कभी स्टेशन मास्टर, तो कभी उद्घोषक। कभी डाक्टर, कभी कवि, तो कभी टीचर, इंजीनियर-ब्लॉगर और न जाने क्या-क्या? एक दिन का निःशक्तता आयुक्त बने कवि अनुभव राज की पंक्ति बहुत कुछ कहती है-
पर इन सबसे पहले चाहूँ मैं हो जाऊँ खड़ा
रहूँ न आश्रित कभी किसी पे मैं हो जाऊँ बड़ा

कवि आज जो कुछ भी बोल पा रहे हैं, कर पा रहे हैं, समझ पा रहे हैं, दुनिया को और अपनी जिंदगी को सकारात्मक ढंग से देख पा रहे हैं, तो यह सब माँ की देन है। बच्चों के लिए माँ जग की सबसे प्यारी माँ होती है। माँ के होने से बच्चों को सारी खुशियाँ नसीब हो जाती है। माँ बच्चों को उदास होने नहीं देतीं, बल्कि माँ बच्चों का उत्साह बढ़ाती हैं, साहस पैदा करती हैं। माँ है, तो जीवन में प्रकाश है। माँ क्या होती है? कवि ने लिखा है-
माँ की वाणी वेदों जैसी
माँ गीता कुरआन है
माँ के वचनों में है अमृत
माँ सदगुण की खान है
माँ के चरणों में है जन्नत
माँ जीवन का सार है
कवि को नींद आ रही है। वह माँ से अनुरोध करता है कि आओ न माँ! मुझे लोरी सुना दो न। वह एक पल भी रुकना नहीं चाहता, बल्कि माँ की गोद में समा जाना चाहता है। ऐसा इसलिए, ताकि नींद आ जाये। नींद आने पर कवि स्वप्न लोक में चला जाता है। स्वप्न में उसकी मुलाकात परियों से होती है, जो उसे लेकर अपने देश को चली जाती हैं। वहाँ पहुँचकर कवि मन प्रसन्न हो उठता है। माँ को काम छोड़कर सुलाने का अनुरोध करने वाले कवि को इस बात का डर है कि कहीं नींद दूर न चली जाये और वह वंचित न रह जाये परियों के देश में जाने से। 
गुड्डे गुड़िया देकर हमको यूँ बहलाओ ना
सारे छोड़ों काम-गोद में मुझे सुलाओ ना

आजकल के बच्चों से पूछिए, परिवार की परिभाषा? कह उठेंगे-मम्मी-पापा, बहन और मैं, किंतु अनुभव राज के लिए परिवार का मतलब है-दादा-दादी, मम्मी-पापा, भैया-दीदी और चाचा-चाची। वह छुट्टी में नाना-नानी के घर जाता है, वहाँ मामा-मामी का प्यार पाता है। मौसा-मौसी जब भी घर आते हैं, खेल-खिलौने लेकर आते हैं। बुआ-फूफा दिल्ली की सैर कराते हैं। यह कविता बच्चों को बताती है कि परिवार क्या है? अनुभव की कविताओं में संदेश होता है। ‘घड़ी’ कविता में निहित संदेश को देखिए-
समय बाँट कर काम करें गर
कभी न रुकने पाएंगे
हर पल नई मंज़िल को छूते
आगे बढ़ते जाएंगे

शीर्षक कविता ‘चिड़ियों का स्कूल’ में संदेश है। संदेश यह कि हम मीठी बोली बोलें, संदेश यह कि हम मेहनत करें, संदेश यह कि हम संग-संग पढ़ें, संदेश यह कि हम आसमान में उड़ें। निश्चित, हम अच्छी आदतों को ग्रहण कर लें, तो हमेशा सफल हो सकते हैं। हमारा शारीरिक और मानसिक विकास हो सकता है। अच्छी आदतों को अपनाने का फायदा देश और समाज को मिलेगा, इसमें संशय की बात ही नहीं है। अच्छी आदतों में शामिल है अखबार पढ़ना, किताबें पढ़ना। किताबों के पन्नों में अंकित है-मनमोहक कहानियाँ, मानवता के उपदेश, नीति और ज्ञान की बातें। कवि का कहना है-
मुझको पास रखो बच्चों
मैं हूँ तुम्हारी मित्र
हर पल तुम्हारे साथ हूँ
जैसे गुल और इत्र

हमें प्रकृति से प्यार करना चाहिए। भगवान ने हमें अनुपम उपहार दिया है, जिसे सहेजना हमारा फर्ज है। पेड़-पौधे, पशु-पंछी, आहर-पोखर, नदी-तालाब, सूरज-चाँद, पहाड़-झरने, ये अनुपम उपहार हैं। इनसे सीखने की जरूरत है। मसलन, नदी कहती है-सदैव आगे बढ़ो, तो सूरज की किरणें हमेशा आलस त्यागने को कहती है। कवि ने लिखा-
सुबह सवेरे किरणें आयीं
मुझसे कह गयीं जागो
देर तलक ने सोओ तुम
संग समय के भागो

कवि की कविता में प्रकृति को बचाने की नसीहत है। कितना अच्छा लगता है पहाड़ों पर घुमना, तालाबों में तैरना, पेड़ तले सुस्ताना। मगर, यदि पहाड़-तालाब, पेड़ न रहेंगे, तो कैसा होगा मानव जीवन? हम निरंतर पहाड़ को जमींदोज कर रहे हैं, तालाब को पाट रहे हैं, पेड़ को काट रहे हैं। हम कहाँ चिंता कर रहे हैं प्रकृति की। प्रकृति की प्रकृति है देना, बावजूद हम ज्यादती करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में कवि का आह्वान है-
आओ मिलकर पेड़ लगाएँ
जग को सुंदर स्वच्छ बनाएँ

‘गुल्लक’ के माध्यम से बचत करने की सीख दी गयी है। वहीं ‘आवाजें’ पढ़कर हम यह जान-समझ सकते हैं कि चिड़िया कैसे बोलती है? बिल्ली, मुर्गा, कौआ, कुत्ता, बकरी, तोता आदि की आवाजें कैसी हैं? कवि को दीवार घड़ी पसंद नहीं है, बल्कि डिजिटल वॉच उसकी पसंद में शामिल है। ऐसा इसलिए कि डिजिटल वॉच न केवल समय बताता है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देता है, प्यार से जगाता है। आधुनिक सामग्रियों को पसंद करने वाले कवि का मेहनत से जी नहीं चुराने का संदेश है-
श्रम से तो तुम मुँह न मोड़ो
मेहनत करते जाओ

वीरों की धरती है भारत। देश के लिए अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया। कवि ने शहीद जुब्बा साहनी को याद किया। जुब्बा साहनी का जन्म मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर थानांतर्गत चैनपुर में निर्धन परिवार में हुआ था। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दरम्यान 16 अगस्त, 1942 को मीनापुर थाने के अंग्रेज इंचार्ज लियो वालर को जिंदा आग में झोंक दिया था। बाद में पकड़े जाने पर 11 मार्च, 1944 को जुब्बा साहनी को फाँसी दी गयी। क्रांतिकारियों को कहाँ परवाह थी अपनी जान की? शहीद जुब्बा साहनी, सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु, बापूजी की गाथा को कलमबद्ध करने वाले अनुभव राज की कविता ‘सिपाही’ देश प्रेम का संदेश देती है-
आजादी का परचम ये
अरमान तिरंगा है
हर इक भारतवासी का
अभिमान तिरंगा है

अपना देश भारत संपूर्ण विश्व में प्यारा है। भारत की महिमा का गान कौन नहीं गाना चाहता है? न जाने कितनी जातियाँ भारत में निवास करती हैं? कितनी बोलियाँ बोली जाती हैं? कितने पर्व-त्योहार हैं? फिर भी भारत की एकता और अखंडता अक्षुण्ण है। बाल कवि की ख्वाहिश है- जो भूख-गरीबी में उलझे हुए हैं, उन्हें अधिकार मिले, सबको सुरक्षा मिले, सबको शिक्षा मिले, कौशल का विकास हो। कितनी सुंदर ख्वाहिश है कवि की। काश! हर बच्चा अनुभव जैसा हो जाये!
देश ये मेरा रंग रंगीला सब देशों में आला
इसकी महिमा है सब गाएँ क्या गोरा क्या काला

होली रंगों का त्योहार है। यह त्योहार तन-मन में खुशियाँ भरता है। पूड़ी-पुए, दही-बड़े को कौन नहीं खाना चाहता? यह त्योहार हमें एकजुट रहने का संदेश देता है। वहीं, दीपोत्सव पर्व का इंतजार छोटे-छोटे बच्चों को बहुत पहले से होता है। बच्चे जी-भरकर मस्ती करते हैं, पटाखे छोड़ते हैं। पिताजी घर में लाइट्स लगाते हैं, तो दीदी घरों को रंगोली से सजाती हैं, वहीं मम्मी मिठाइयाँ तैयार करती हैं। कवि बच्चों को दीप जलाने को कहते हैं, घर के अंदर, छत के ऊपर, दरवाजे पर, घर के बाहर। आँगन-आँगन दीप जलाने की नसीहत देने वाले कवि ने लिखा-
आओ बुझते मन में तुम
आशा के दीप जलाओ
जहाँ जहाँ अंधियारा हो
खुशियों के दीप सजाओ

अनुभव राज मुजफ्फरपुर का है। यह जिला उत्तर बिहार का समृद्ध जिलों में से एक है। यहाँ की शाही लीची के क्या कहने? यहाँ लहठियाँ मिलती हैं, जो मनभावक होती हैं। कोई मुजफ्फरपुर जाता है, तो लोग बाग कह उठते हैं कि अच्छा मुजफ्फरपुर जा रहे हैं, लौटते वक्त लहठी और लीची लेते आइएगा। लंगट सिंह कालेज यहीं है और यहीं है बेनीपुरी जी का घर। जानकी वल्लभ शास्त्री जी का घर निराला निकेतन भी यहीं तो है। कवि ने लिखा-
गरीबनाथ मंदिर पावन है
झुके सबका सर है मुजफ्फरपुर में

काश ऐसा होता स्कूल, मेला, पुआ, अखबार, तितली, इन्द्रधनुष, कान्हा, वोट दे दो आदि विषयों पर कविता गढ़ने वाले कवि अनुभव ने संदेश दिया है कि हमें अपनी शक्ति की पहचान होनी चाहिए। हम जहाँ हैं, जिस रूप में हैं, अपनी अहमियत को बरकरार रखने की कोशिश हो! सच भी है कि हर जगह हीरे-पन्ने ही काम में नहीं आते। तलवार की अपनी अहमियत है, तो सूई भी कहाँ कमतर है? माना यह कथन मिट्टी के सवाल पर धरती मैया का है, मगर यह पंक्ति बहुत कुछ कहती है-
तुम तो हो सृष्टि का सार
कभी न मानो खुद से हार

स्नातक में अध्ययनरत अनुभव राज की रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। ‘सा रे ग म प’ में बतौर साझा रचनाकार की पहली एकल पुस्तक है- ‘चिड़ियों का स्कूल’। संग्रह की कविताएँ अनुभूतिजन्य है, संदेशपरक है। पहली काव्य पुस्तक के प्रकाशन के बाद साहित्यिक बगिया को कवि अनुभव से आशा और उम्मीद बढ़ गयी है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि पहली पुस्तक यह बताने को काफी है कि इस नन्हे से बालक में प्रतिभा है। इस पुस्तक में संभावनाओं के द्वार को खोलने का माद्दा है। मुकेश ‘सोना’ द्वारा तैयार रेखाकृति कविताओं को और प्राणवान बना रही है।
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सिन्हा शशि भवन, कोयली पोखर, गया-823001
चलभाष: 93 0463 2536

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