'कोरोना काल में अचार डालता कवि' और उनकी कविताएँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: कोरोना काल में अचार डालता कवि (कविता संग्रह)
कवि/साहित्यकार: रामस्वरूप दीक्षित
मूल्य: ₹ 200.00 रुपये
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ

किसी वरिष्ठ कवि को पहली बार पढ़ने का सुअवसर मिलता है, मेरे लिए सब कुछ नया होता है और यह नयापन मुझे किसी नयी दुनिया के आलोक में पहुँचा देता है। कविता की समीक्षा सहज भी है और जटिल भी। जटिल इसलिए कि कवि का चिन्तन बहुत सारे बिम्बों में उलझा होता है। कवि  बिम्बों का सहारा लेकर कविता में भाव-चिन्तन, संवेदनाएँ और अर्थ भरता है। संघर्ष तभी दिखाई देता है जब जीवन में पूर्णतया या आंशिक तौर पर जीवन्त या चेतन तत्वों का अभाव होता है। अभाव, गतिशील करने के पीछे का बहुत बड़ा कारक तत्व है। अभाव कई तरह के होते हैं। पूर्ण अभाव सर्वाधिक प्रभावकारी होता है। जीवन-तत्वों का पूर्ण अभाव मृत्यु की ओर खींच ले जाता है और यह हर तरह से विनाशकारी होता है। कविता जीवन की ओर खींचती है और जीने की उम्मीद बंधाती है। कविता अभाव की चुनौती को स्वीकार करती है और कोई न कोई खिड़की खुलती ही है। जीवन में संवेदनाओं और संघर्षों को मिलाने से ही काव्य साहित्य पूर्ण हो सकता है।

विजय कुमार तिवारी
वरिष्ठ और बहुचर्चित कवि श्री रामस्वरूप दीक्षित जी का हाल ही में छपा काव्य संग्रह 'कोरोना काल में अचार डालता कवि' मेरे सामने है। प्रकाशक की ओर से बड़ी सशक्त टिप्पणी की गयी है। वे लिखते हैं, "रामस्वरूप दीक्षित युग चेतना के कवि हैं। उनकी कविताएँ ऐसे बेचैन कवि की कविताएँ हैं, जो अपनी बेचैनी को पाठकों के साथ साझा करते हुए उन्हें अपने साथ उस स्थान पर ले जाती हैं, जहाँ बदलाव की रोशनी को आते हुए साफ-साफ देखा जा सकता है। समकालीन समाज में मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने की गुंजाइश न के बराबर रह गई है। कवि इस स्थिति से भीतर तक विचलित और आहत है। वह सुनियोजित साजिश के तहत आम आदमी को गिरफ्त में लेने के लिए बुने जा रहे पूंजी के जाल को न केवल समझता है वरन उसे काटने को भी प्रेरित करता है।"

कविता संग्रह 'कोरोना काल में अचार डालता कवि' में कुल छोटी-बड़ी 53 कविताएँ हैं। पहली ही कविता 'तब हम कहेंगे' झकझोरती है अपने प्रश्नों के माध्यम से और उत्तर में कही गयी बात विचलित करती है-

तब हम कहेंगे
उस समय तक
हम सयाने हो चुके थे
हमने चुप रहना सीख लिया था।

'खामोशी' कविता की सशक्त स्थिति देखिए-खामोशी का वह सब मतलब नहीं है, जो आम तौर पर समझ लिया जाता है, बल्कि एक ही अर्थ है/वह ये कि/हम तुम्हें एक मौका और देना चाहते हैं। 'गूंगा' कविता में कवि की अनुभूतियाँ चिन्तन की नयी दुनिया दिखाती है-गूंगे की भाषा शरीर में समा जाती है, धीरे-धीरे आँखों में उतर आती है, हाथों से काम लेता है, खुश होते ही चेहरा फूल बन जाता है, क्रोध में धरती डोलने लगती है, आकाश नीला हो जाता है, उसका मौन बहुत शोर करता है, गूंगे का प्रेम पवित्र और ताकतवर होता है, प्रेमिका उसके प्रेम में नहा उठती है, वह पारो को लेकर अपनी बेआवाज दुनिया में चला जाता है और जब वह किसी बोलने वाले की आँखों में आँखें डाल कर देखता है तो सामने वाला जमीन देखने लगता है।

अपनी कविताओं में रामस्वरूप दीक्षित जी दोनों तरह के दृश्य दिखाते हैं, संभावनाएँ भी परन्तु चूक जाने या न कर पाने की स्थिति का ज्ञान भी देते हैं। 'चाहो तो' कविता हालात के मारे व्यक्ति को संबोधित करती है, यदि ऐसे हालात न बना दिये गये होते तो तुम भी महसूस कर सकते थे फूलों की खुशबू, प्रेम, बालों को सहलाती अंगुलियों की छुअन, हवाओं में किसी की गंध या आराम से नदी किनारे किसी की याद में खोये रह सकते थे। अब तो अदृश्य बाघ की धारीदार पीठ और पैने नाखून उभरने लगते हैं, कुछ भी सोचने से पहले। 'तसल्ली' कविता मरने-मारने की स्थिति में संतोष की गहरी अनुभूति दिलाती है। 'चाहत' कविता में जीवन में विसंगति पैदा करने वालों को समाप्त करने की चाहत है और मर्मस्पर्शी यह चाहत भी है-

मैं ये भी चाहता हूँ कि
लोगों के दिमाग पर लगे पहरे हटा दिए जाएँ।

'बेगुनाही' का गुनाह देखिए-बेगुनाह होना/सबसे बड़ा गुनाह है/इस समय। दीक्षित जी संकेत करते हैं-इस राष्ट्रवादी समय में/किसी बेगुनाह का/आराम से जीते रहना/सबसे बड़ा खतरा है/राष्ट्र के लिए। 'अकारण' कविता भयावह स्थिति की ओर संकेत करती है- वे भी मार दिए जायेंगे जो जबान और आवाज के बावजूद शांत, निर्विकार बैठे हैं।

रामस्वरूप दीक्षित जी आज के समय की गहरी पहचान रखते हैं और यथार्थ संकेत करते हैं। 'युद्ध की जरूरत' का व्यंग्य देखिए, वे लिखते हैं, जंगल, महासागर, नदी, पहाड़ किसी हो युद्ध की जरूरत नहीं है, बस/मनुष्य ही है/जिसे खुद को बचाने के लिए/युद्ध की जरूरत है। 'गिरना' कविता गिरने की व्यापक संभावनाओं और परिस्थितियों का व्यंग्यात्मक उल्लेख करती है। अगली कविता है-'कोरोना काल में अचार डालता कवि' और यही शीर्षक है इस संग्रह का। कविता में लाचारी है, अन्तर्द्वन्द और गंभीरता भी। कवि की स्थिति देखिए-अचार डालने में डूबा कवि/भूल गया कि/बाहरी दुनिया में/जिस रोटी के साथ/अचार खाया जाता है/वह तेजी से गायब हो रही है। किसी भी कवि के लिए यह सर्वाधिक पीड़ादायक स्थिति है---अंत में जब कुछ न मिला अचार डालने को/तो वह डालने लगा/अपनी ही उन कविताओं का अचार। कवि की शायद कोई राजनीतिक चेतना जाग रही है 'बेचना' कविता में और संकेत बहुत साफ-साफ है। वैसे ही 'भय' कविता में जटिलता है, बेचैनी है, पीड़ा है, खालीपन है, मौन और लाचारी है। कवि लौटता है प्रकृति की ओर और फूलों, तितलियों पर उसकी कविता छपती है, अखबार में। आग के बजाए वह फूलों से खेलना चाहता है, कविताएँ लिखना चाहता है। अगले दिन सरकारी फरमान के तहत नष्ट किए जा रहे हैं फूलों के सारे पेड़।

रामस्वरूप दीक्षित जी की कविताएँ गम्भीर चिन्तन का प्रतिफल हैं। 'लड़ना' कविता देखिए-कुछ लोग लड़ रहे हैं/कुछ लड़ने को सोच रहे हैं/कुछ लोग लड़ने के खिलाफ हैं। आगे लिखते हैं-कुछ लड़ाई को जरुरी समझते हैं। कवि का निष्कर्ष देखिए-लड़ाने वालों ने/रोटी से ज्यादा लड़ाई को बना दिया है/ हमारी जरुरत। वे समाज को कई हिस्सों में बाँटते हैं। 'असमंजस' क्या है कवि के सामने? जो कहना था, क्या वही कहा जा रहा है? क्या हमी कहना चाह रहे हैं या कोई कहलवा रहा है मुझसे? कवि के सामने अनेक प्रश्न हैं और सबसे बड़ा असमंजस है/कि हमें नहीं पता/कि हम असमंजस में हैं। 'बाज' की आक्रामकता पर सशक्त कविता है। 'लिखा उन्होंने' प्रवासी द्वारा अपने घर पर चिट्ठी लिखी गयी है जिसमें नीम को लेकर सारी बातें हैं। कविता मार्मिक व भावपूर्ण है और उसमें मेरा पता भर है-पढ़ने के बाद/मैंने वह पत्र/चुपचाप/नीम के पेड़ के पास रख दिया। 'तानाशाह' से सब डरते हैं। कवि ने रहस्य उजागर किया है, वह खिले फूलों, उड़ती तितलियों, पतंग उड़ाते बच्चों, मस्ती में गाती स्त्रियों, पहाड़ और स्कूल की घंटियों सबसे डरता है। कोरोना काल में 'पेड़' के जीने के अंदाज से कवि को सीख मिलती है। 'भेड़िए' कविता कवि की गहरी दृष्टि का परिचय देती है। वैसे ही कविता की निर्भीकता का संदेश है 'कविता' नामक कविता में। 'प्रार्थना नहीं' कविता में सारी प्रार्थनाओं की चर्चा है जो सदियों से मनुष्य करता आया है। कवि का चिन्तन देखिए-तपेदिक पीड़ित पिता और कैंसर ग्रस्त मां का/ इकलौता बेटा/आज भी काम न मिलने के कारण/खाली हाथ न लौट आये/ये प्रार्थना (?) भी कि/अगर अब भी ये सब जारी रहा/तो अब हम प्रार्थना नहीं क़ुछ और करेंगे। कवि ने 'पिता' को जिम्मेदारी का नाम दिया है। वह पुत्र को ऐसा बनाना चाहता है-जो केवल अपने पिता की नहीं/पिता की उम्र के सभी लोगों की/एक जैसी चिंता कर सके/और खुद पिता बनने पर/अपनी संतान को वह सब कुछ दे सके/जो आगे चलकर उन्हें भी एक अच्छा पिता बना सके।

'पिता का कमरा' अत्यन्त मार्मिक कविता है और हमारे वर्तमान समय की सच्चाई भी। पिता का हृदय देखिए और प्रार्थना भी-कि हे प्रभु/मेरे बेटे को उसके बेटे के मकान में/एक कमरा जरुर देना। 'सहिष्णुता' कविता का संदेश यही है कि पानी, हवा, पेड़ आदि सर्वत्र सहिष्णुता है, बस आदमी ही है जिसने अपनी जबान तेजाब में डुबो रखी है। 'दीक्षित जी 'जरुरत' कविता के माध्यम से उत्तम सीख देते हैं। हम लोग बहुत कुछ फालतू चीजें बटोरे रहते हैं जिनकी वजह से/प्रेम और सद्भाव के लिए/ जगह कम पड़ने लगती है। 'अधिकार' कविता का संदेश है, माना तुम्हें सब कुछ पाने का अधिकार है लेकिन यह भी याद रखो-तुम्हारे पड़ोसी को भी/दो-चार/तारे गिनने लायक/आकाश/कपड़े सुखाने लायक/ धूप/और/साँस लेने लायक/हवा/तो चाहिए ही। कवि 'खतरा' कविता में खुलकर उल्लेख करता है कि कविता को किससे खतरा नहीं है और अंत में  बताते हैं-कविता को असली खतरा/उन लोगों से है/जो उसका इस्तेमाल/एक तमगे की तरह कर रहे हैं/और फिर जो अपने स्वार्थों की खातिर/इस तमगे सहित/उन खलनायकों के चरणों में झुकते हैं/जिनके खिलाफ/कविता हर स्थिति में/तन कर खड़ी रहती है। 'वह आदमी' कविता के माध्यम से दीक्षित जी महात्मा गाँधी को याद करते हैं। 'हत्यारे' शीर्षक के अन्तर्गत तीन कविताएँ हैं। कवि का संकेत है, हत्यारे/अब हथियार लेकर नहीं आयेंगे आपको मारने/ अपने विचार लेकर आयेंगे। लोग आपको मरता हुआ देखते रहेंगे और हत्यारों के लिए/बेहद मुफीद समय है ये। दूसरी कविता में कवि ने विस्तार से हत्या के तौर-तरीके, योजना आदि का यथार्थ चित्रण किया है। तीसरी कविता में कवि की भावनाएँ देखिए-ये कुछ जरुरी सा होता जा रहा है/हत्यारे समय में/खून से सने खेतों में/हथियारों की जगह/फूल उगाने के लिए।

रामस्वरूप दीक्षित जी के बिम्ब भी कम जटिल नहीं हैं। 'अच्छा हुआ' कविता हतप्रभ करती है। कवि का सोचना है, आज पिता होते-तो बहुत दुखी होते/अगर आज वे होते/तो अपने ही घर में/खुद को एक गैर जरुरी सामान में बदलते देख/न जाने उन पर क्या बीतती। बिम्ब देखिए- गाँव के दोनों पहाड़ किसी महानगर के कंकरीट की इमारत में रहने लगे हैं, यहाँ के कुछ पेड़ अमीरों के ड्राइंग रुम में पसरे पड़े हैं, गाँव की नदी, गाँव का दूध, गाँव का गेहूँ सब शहर में पहुँच गया है। यह कवि मन की पीड़ा है।  आज हमारे सामने भय के सारे कारण बेचैन किए रहते हैं। 'एकांत' कविता दिखाती है-अदृश्य बाज, बदलने लगा है अजगर की शक्ल में फिर खूंखार भेड़िया गड़ा देता है नुकीले दांत। दीक्षित जी लिखते हैं-एक चीत्कार के साथ/टूटता है एकांत का दायरा/हवा के कांपने की आवाज/सुनी जा सकती है/साफ-साफ। 'सड़क' पर खामोशी को तोड़ते हुए मजदूर निकल पड़े हैं कोरोना काल में। कवि का भाव भावुक करता है, आज वे बीच सड़क में चल रहे हैं। 'किसी के भी 80वें जन्मदिन पर' कविता में सच देखिए-

मगर न हो सका संभव
जीने की तरह जीना
न मरने की तरह मरना ही बन सका

कवि का चिन्तन सत्य ही है-हमने खुद ही मार डाला अपने को। कवि की पंक्तियाँ उत्साहित करती हैं-80वां जन्मदिन/बहुत मुकम्मल समय है/इस बात पर विचार करने के लिए/कि/अब जो और जितना बचा है जीवन/उसे जी लिया जाए/अपने लिए अपने/और सिर्फ अपने लिए। अंत में दीक्षित जी प्रश्न करते हैं-क्या बिना किसी काम धाम के/जीवन को/केवल जीवन की तरह/नहीं जिया जा सकता? आज की सोच में पिता-पुत्र के दयनीय सम्बन्धों को नंगा करती है कविता 'जिनके पापा उनके पापा जैसे नहीं लगते।'

'तितलियाँ' जीवन और सुख-समृद्धि की प्रतीक हैं। उनकी संख्या कम हो रही है। हथियार बनाने वाले, कारखाना चलाने वाले, तेज रफ्तार गाड़ियाँ चलाने वाले, पेड़ काटने वाले या पक्ष-विपक्ष के नेता, किसी की सोच तितलियों के खिलाफ नहीं है। पंक्तियाँ देखिए-बावजूद इसके/तितलियाँ/लगातार कम हो रही हैं। 'विद्रुप' कविता में कवि ने वर्तमान जीवन का वीभत्स चित्र खींचा है। इसमें उदास बच्चा है, गिलहरी है, जल स्रोत कम हो रहे हैं, चेहरों से मुस्कान गुम है, हवा प्रदूषित हो रही है, फलों में कीड़े पड़ने लगे हैं और फूलों की खेती पर अमेरिका की नाराजगी है। 'छीनना' क्रिया को कला से जोड़कर कवि ने अपनी अद्भुत चिन्तन दृष्टि का परिचय दिया है और अंत में लिखा है-छीनना/अब एक साधारण क्रियापद नहीं रहा/जीवन का मुख्य कारोबार बन गया है। कवि 'झुको' कविता के माध्यम से जो संदेश देना चाहते हैं, आप सहमत/असहमत हो सकते हैं, इस चिन्तन को नकार नहीं सकते। 'खतरनाक कवि' उसी चिन्तन का विस्तार है। कवि की पंक्तियाँ देखिए-उसे पता है कि/उसकी कविता/कभी खत्म नहीं की जा सकती/क्योंकि उसने/अपनी कविता को/मनुष्य में तब्दील कर दिया है।

'क्या आपने कभी' कविता के सारे प्रसंग गरीबी, कमजोरी, लाचारी, मजबूरी के हैं और कवि ने एक साथ पाठकों को सारे हालात गिनाए हैं। अंत में कवि का व्यंग्य भाव देखिए-अगर आपको इन स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा हो/तो ईश्वर को धन्यवाद दीजिए/और नदियों, पहाड़ों, फूलों और पेड़ों पर/ कविताएँ लिखकर/बड़े और भले कवि  बने रहिए। 'हमारे पिता' कविता लिखते समय कवि को रोना आया होगा। पीड़ा की ऐसी सहज, सत्य अनुभूतियाँ विरले लिखी गई हैं। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों की पहचान दिलाती और सावधान करती कविता है, 'बुरा वक्त'। 'माँ के न होने पर' कविता के सारे प्रसंग सच्चाई का चित्रण करते हैं। कवि की इन अनुभूतियों की मार्मिकता और भावनाएँ विह्वल तो करती ही हैं, ज्ञान भी देती हैं। 'भाषा के भूखे भेड़िए' सशक्त अन्तर्विरोध की कविता है। नयी-नयी शब्दावली के साथ हालात का सटीक चित्रण हुआ है और कवि के संकेतों को समझने की जरूरत है। वैसे तो मजदूर पर अनगिनत कविताएँ लिखी गई हैं, इस 'मजदूर' कविता का आसमान तनिक अधिक नीला है, भावनाएँ अधिक गहरी हैं और सच्चाई प्रभावित करती है। 'ताले' कविता में व्यंग्य है, चिन्ता है और भय भी, पंक्तियाँ देखिए-इसी बीच/उड़ती-उड़ती सी खबर है/कि जल्द ही ये ताले/लोगों की जबान पर होंगे। कवि के भाव व प्रश्न स्त्री के प्रति संवेदना जगाते हैं, सच्चाई बयान करते हैं 'इतवार' कविता में। 'अपेक्षा' कविता में कवि के भाव-विचार अनुकरणीय हैं-मुझे चाहिए ऐसे फूल/जिन्हें मसलने की सोचने पर/हाथों का पूरा वजूद थरथरा उठे/ऐसी नदी/जिसमें उतरने से पहले/सौ बार सोचना पड़े/ऐसा चांद/ जिसकी चांदनी में/धूप की गर्माहट हो/मुझे चाहिए ऐसी बर्फ/जिससे आग पैदा की जा सके। संग्रह की अंतिम कविता 'मुनादी' को पुनः पढ़िए, सब कुछ स्वतः स्पष्ट है-जो सहमत हैं सुनें/जो असहमत हैं, वे भी सुनें/जो न सहमत हैं, न असहमत/वे और भी ध्यान से सुनें/अंधेरे ने/अपना नाम और लिंग बदल लिया है/वह अब रोशनी हो गया है/सरकारी आदेश है/कि अब इसे इसी रूप में/जाना और पहचाना जाए/उसके पूर्व नाम का स्मरण भी/देशद्रोह माना जायेगा।

रामस्वरूप दीक्षित जी को पढ़ते हुए उनके गहन चिन्तन भाव की अनुभूति हो रही है। उनकी भाषा सहज भी है, दुरुह भी। उनका शब्द भंडार विशाल है। उनकी कविताओं में हिन्दी, उर्दू, भोजपुरी सहित स्थानीय भाव-बोली के शब्द हैं और शैली अलग प्रभाव दिखाती है। सत्ता को लेकर उनका चिन्तन किंचित भिन्न संसार में ले जाता है। लोग सहमत हों या नहीं, कोई नकार नहीं सकता। कहीं-कहीं व्यंग्य है, सहजता है और उपदेशात्मक भाव-विचार भी। उनका काव्य-सृजन हिन्दी साहित्य को अपने तरीके से समृद्ध कर रहा है। प्रकाशक का यह कथन सही है- इस संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए आप पाएँगे कि इन्हें पढ़ने के बाद आप वह नहीं रह जाते जो पहले थे, बल्कि एक परिवर्तनकामी मनःस्थिति में पहुँच जाते हैं और खुद को मनुष्यता के पक्ष में खड़ा पाते हैं।"

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