तैत्तिरीय ब्राह्मण के आधार पर अग्न्याधान की प्रक्रिया: एक अनुशीलन

डॉ. धनंजय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233


 वेदों के अर्थों का प्रतिपादन करने एवं उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। वेद की प्रत्येक शाखा का एक ब्राह्मण हुआ करता था, जिसमें उसके मन्त्रों की व्याख्या की गयी थी। वेदों की 1130 शाखाएँ थीं तथा प्रत्येक शाखा से सम्बन्धित एक ब्राह्मण था। वर्तमान समय में अधिकांश ब्राह्मण ग्रन्थ अप्राप्य हैं तथा अब उनमें अधिकांश के नाम भी विदित नहीं हैं। सम्प्रति ऋग्वेद के दो, शुक्ल यजुर्वेद एवं कृष्ण यजुर्वेद के एक-एक, सामवेद के ग्यारह एवं अथर्ववेद का एक ब्राह्मण ग्रन्थ उपलब्ध है।

 ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ कृष्णयजुर्वेद का ब्राह्मण है। यह कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से सम्बन्धित है। वस्तुतः यह ब्राह्मण कृष्णयजुर्वेद का ही एक भाग है। कृष्णयजुर्वेद के गद्य भाग को ब्राह्मण कह दिया गया है।
 ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ तीन काण्डों में विभक्त है। इन्हीं काण्डों को अष्टक भी कहते हैं। प्रथम एवं द्वितीय काण्ड में 8-8 प्रपाठक तथा तीसरे काण्ड में 12 प्रपाठक है। इस प्रकार सम्पूर्ण ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ में 8+8+12=28 प्रपाठक हैं। ये प्रपाठक अनुवाकों में विभक्त हैं तथा सम्पूर्ण ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ में 308 अनुवाक हैं।

 अग्न्याधान की प्रक्रिया का वर्णन ‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ के प्रथम काण्ड में हीं वर्णित है। यज्ञ में अग्नि का आधान अग्न्याधान कहलाता है। विना अग्नि के यज्ञ की कल्पना करना व्यर्थ है। वैदिक देवताओं में अग्नि को विशेष महत्व प्राप्त है। अग्नि ही समस्त हविष्यों को तद्-तद् देवों तक पहुँचाने का कार्य करता है, यही वैदिक मान्यता अग्नि को सर्वश्रेष्ठ देवों में स्थान दिलाता है।

‘तैत्तिरीय ब्राह्मण’ में अग्न्याधान के मन्त्र के रूप में यजमान वा पुरोहित इस मन्त्र से अग्नि का आधान करता है -
(ऊँ) भूर्भुवः स्वद्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा। 
 तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे।। (यजुः 3/5) 

अग्नि प्रदीप्त करने के लिए यज्ञकर्ता यजमान या सम्पादनकर्ता पुरोहित जिस मन्त्र से अग्नि प्रज्ज्वलित करता है वह इस प्रकार है -

(ऊँ) उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेथामयं च। 
 अस्मिन्त्सधस्थे ऽ अध्युतरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत।। (यजुः 15/54)

जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगती है तब शुद्ध लकड़ियों (चन्दन, पलाश, आम्र) की तीन समिधाएँ घृत में डुबोया हुआ एक-एक कर अग्नि में समर्पित करते हुए अलग-अलग तीन मन्त्रों से समिधा समर्पित की जाती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में इसका सुन्दर वर्णन है। यथा -
1. (ऊँ) अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्वचेद्ध वर्धय सास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा।। इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम।।

पुनः दो लगाातार मन्त्रों से यज्ञ आगे बढ़ाया जाता है -
2. (ऊँ) समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा।। इदमग्नये इदन्न मम।।

3. (ऊँ) सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम।।

तीसरी समिधा के लिए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण होता है - 
4. (ऊँ) तन्त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्द्धयामसि। वृहच्छोचायविष्ठ्य स्वाहा। इदमग्नयेऽङ्गिरसे इदन्न मम।। 
पुनः घृताहुति-मन्त्र आदि का विधान है।

 निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तैत्तिरीय ब्राह्मण में वर्णित अग्न्याधान-प्रक्रिया पूर्णतः वैदिक यज्ञ से सम्बन्धित है। पृथिवी स्थानीय देवताओं में अग्निदेव का अन्यतम स्थान है। विना अग्नि के आधान से यज्ञ का निष्पादन नहीं हो सकता। अग्नि का आधान जिन मन्त्रों एवं क्रियाकलापों से किया जाता है वही वर्णन अग्न्याधान-प्रक्रिया के अन्तर्गत है।

 यज्ञवेदी मे निर्माण के उपरान्त यज्ञवेदी में अग्निप्रज्ज्वलन तक की क्रियाविधि वैज्ञानिक है। यज्ञ की अपनी विशेषता होती है। प्रकृति के आधारभूत तत्वों में अग्नि का स्थान सर्वविदित है। वैदिक ऋषि प्रकृति के गोद में पले-बढ़े। प्रकृति की अमूल्य निधि ‘अग्नि’ का देवता रूप में कल्पना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ही तो है। बिना अग्नि के जीवन की कल्पना कर रूह काँप उठता है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि अग्नि के इस महत्व से अच्छी तरह परिचित थे। अतएव समस्त यज्ञों में अग्न्याधान-प्रक्रिया का अपना महत्व सर्वोपरि है।

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