नव वर्ष-संदेश

धरोहर
प्रो. इन्द्र बहादुर खरे
(1922-1953)
नववर्ष ने पदार्पण किया है।

तारक बालिकाएँ धूमिल पड़ीं और उषारानी नव श्रंगार कर न जाने कौन सी अदृश्य स्नेह-किरण की खोज में निकल पड़ी निज युगल करों में दीपक-सा लिये।
रानी की लाल रोली देख कलियाँ खिल उठी ठहूक उठी, उर में तरु के और कूक उठी उन्मादिनी आम्रमंजरी के अँचल में 'कुहु' 'कुहु'। मधुप ने निज दृग-अंजुलियों का अनुराग पुष्प-हृदय में उड़ेल दिया। प्रकृति का प्रत्येक परमाणु यौवन की तरंग से बह चला। कानन का कण कण उल्लास सरिता की ओर चल दिया। परन्तु अधिकार किसे है कि नव वर्ष की मधुर सुधा का  रसास्वादन करे?

हमें? कदापि नहीं! यह तो केवल कपोल कल्पना है। क्योंकि हमारा सौंदर्य तो वासना तृप्ति का साधन बन चुका है। आनंद-भवन तो कलह के दुर्गम दुर्ग बन बैठे हैं। कारण? 

कारण पूछना है तो अपने हदय पर हाथ रखिये और तनिक दीनों की दीन-दशा का अवलोकन कीजिये। हमारे हृदय में तो संसार की समस्त कुवासनाओं ने सदा के लिये डेरा डाल लिया है- जिसके कारण हम सर्वदा ही दूसरों की गर्दन पर छुरी चलाने को तत्पर रहते हैं, सर्वदा ही दूसरों का अपहरण करने के लिये प्रस्तुत रहते हैं, सर्वदा ही कुत्सित विचारों का आडम्बर रचते हैं। तब आप किन आशाओं को लेकर इस पवित्र नव वर्ष को मनाने चले हैं? कौन से अरमान लेकर अपने पापों का प्रक्षालन करने चले हैं? 

इसका कारण? मैं तो यही कहूँगा कि इसका मूल कारण है ‘प्रेम का अभाव’ क्योंकि प्रेम तो उस दिव्य संसार की झलक है जहाँ सदा ही नव वर्ष रहता है- बस नव वर्ष यही उपहार लाया है और यही संदेश:-

नवयुवकों जागो और कर डालो अन्त, उस वृक्ष का, जिसके नीचे सूर्य की किरण झाँक ही नहीं सकती; उन कुवासनाओं का जिन्होंने अगणित नैसर्गिक सपनों को, कोमल-कलेवरा-कलियों को प्रस्फुटित होने के पूर्व ही डस लिया। कर डालो अंत उन ईर्ष्या और द्वेषरूपी शत्रुओं का जिनको हमने अपने मन-मंदिर का द्वारपाल ही नहीं अपरंच अपने मन-मंदिर का देवता बना रखा है। और कर डालो छिन्न-भिन्न छल और कपट रुपी सर्पों का। फिर?

फिर हमें पूर्णाधिकार है, उत्साह से नव वर्ष मनाने का। बहने दो प्रेम सुधा, जो बहा दे  कलह के अगाध गृहों को। होने दो झंकृत जीवन-वीणा का एक-एक तार – जो भर दे अनन्त अम्बर में अनोखा राग और बजने दो भँवरों की बाँसुरी जो पहुँचा दे घर-घर में पवित्र प्रेम का संदेश। फिर एक दिन क्या, सदा-सर्वदा नव वर्ष ही नव वर्ष है।
***

इन्द्र बहादुर खरे ’पारुल’ (प्रकाशित “राका” 1-1-1940)

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