काव्य: पुनीता जैन

पुनीता जैन
स्त्री-1

सबकी रसोई में
खाना पकता है अलग तरह
चावल वही /आटा वही /दाल वही
पानी भी /नमक भी / आँच भी

स्वाद सबके
अलग अलग

पकती है स्त्री
अलग अलग अपनी आँच से
अपनी तरह
***

    
स्त्री -2

घर भी
स्त्री का अंतरिक्ष है
उड़ती है /अपनी तरह /यहाँ वह

खिड़की खोलती है
हवा संग बह लेती है
वस्त्र पानी में डुबोती है
गहरे में तैर लेती है

रोटी सेंकती है
तपती /पकती है

यहाँ होती है /नहीं होती है
कण कण में पर्वत समेट लाती है
अंतरिक्ष सा विस्तार भीतर पा जाती है
दरवाजे तक पहुँचते पहुँचते
कई यात्राएँ पूरी कर जाती है....
***


स्त्री-3

दुख
जो पहले पहल पहुँचाता है
गहरे तक आघात

धीरे से वस्त्र बदल
निकट आ बैठता है
बनकर रोजमर्रा की आदत

और इस तरह शुरु होती है
यात्रा पत्थर होने की

पाषाण युग की कंदरा से गुजर रहा
स्त्री का वर्तमान
अब भी
***


स्त्री-4

पढ़ते हुए भूगोल
बचपन में ही जान लेती है
-सूर्य है स्थिर
-पृथ्वी गतिशील

दोहराती रहती है/ तब भी गलत
-सूर्य उग रहा
-सूर्य डूब रहा

स्त्री /पृथ्वी भीतर / वह पृथ्वी है
अपनी गति पहचान जो
भाषा बदल नहीं पाती
***


स्त्री-5

दुर्ग के
विशाल दरवाजे के पीछे
दरवाजे दर दरवाजे
अड़तालीस दरवाजों के भीतर
तहखाने के पिंजरे में बंद
पखेरु एक
स्त्री मन!
***


स्त्री -6

स्त्री
रसोई में ही पा जाती है
अग्नि हवा पानी मिट्टी
छूटता है तो बस
आकाश....
***


स्त्री-7

घर में
पकती है जहाँ रसोई
वहाँ रसोई नहीं
पकती है स्त्री

जिंदगी भर
अर्थ देती है वह
स्वाद में उतर कर स्वयं को...
***


स्त्री-8

जब भी
घर लौटती हूँ
मुँह हाथ पैर धोती हूँ
धूल मिट्टी के बहाने
पृथ्वी को उतारती हूँ पानी में
मना करती हूँ
अभी मिट्टी में मिलने से
***


स्त्री-9

धूप की चाभी से
दिन जब खुला
खुला दरवाजा उजास का
कमर कस फिर उसने काम किया

थक कर चूर हुई
तो उठी
पाया
चाभी खो गयी धूप की
और अंधेरा घिर आया
***


स्त्री-10

देह के दरवाज़े पर
दस्तक होती रही देर तक
आत्मा नींद में थी गहरी
न उठी
न दरवाज़ा खुला
***


स्त्री -11

हर कठिन समय
जब
पृथ्वी वायु जल /एक हो जाते
मुझे समेटने के लिए

तब
बस अग्नि है /जो
भीतर बलती रहती
और
आकाश पीठ ठोंकता रहता
***

2 comments :

  1. स्त्री के मन और तन की अद्भुद पकड़।

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  2. स्त्री के मन और तन की अद्भुद पकड़।

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