आपने क्या संकल्प लिया?

अंजली खेर

चलभाष: +91 942 581 0540; पता: सी-206, जीवन विहार अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड भोपाल- 462 003 मध्य प्रदेश


 दो वर्ष पहले की बात हैं, "कोविड वायरस" का कहर और "युवाओं के अपने कैरियर की जद्दोजहद" दोनों ही अपने-अपने पीक पर थे। कोरोना लॉकडाउन के चलते बेंगळुरू से एम बी ए फाइनल कर रही बेटी भोपाल घर पर आ गयी थी। छह महीने बड़ी कंपनियों में ऑन लाइन एँटर्नशिप के चलते बिटिया का कॉलेज से केंपस सिलेक्‍शन नामी-गिरामी कंपनी में हो गया। हम उसकी इस उपलब्धि पर बेहद खुश थे, पर उसके चेहरे पर चिंता की लकीरों का कारण जाना तो पता चला कि उसकी अदद क्‍लोज फ्रेंड का बेहतरीन प्‍लेसमेंट होने के बावजूद छंटनी के चलते उसके हाथ से इतनी अच्‍छी नौकरी-पैकेज जाता रहा। सहेली को लेकर अपनी बेटी की भावनाओं को बखूबी मैं महसूस कर रही थी।

नया साल दस्‍तक दे रहा था। हम दोनों माँ-बेटी ने मिलकर एक सुंदर हेंडमेड ग्रीटिंग कार्ड पर मोटिवेशन कोट लिखकर बेटी की सखी के लिए तैयार किया, "नये साल का नया दिन हैं, नयी बात करेंगे, कल हार-कर सोये थे, आज फिर नई शुरुआत करेंगे।"

यकीन मानिये, एक छोटे से वाक्‍य की जादूगरी ही थी कि नये साल के पहले ही दिन प्रण कर खुद के बिखरे मन को समेट बेटी की सखी आत्‍मविश्‍वास से लबरेज़ अपने लक्ष्‍य को आत्‍मसात करने में जुट पड़ी। दौर कठिन जरूर था पर दृढ़निश्‍चय का नतीज़ा यह रहा कि एक साथ दो बड़ी कंपनियों के एपॉइंटमेंट लेटर उसके दोनों हाथों की शोभा और विजयी मुस्‍कान उसके चेहरे की खूबसूरती को चार चांद लगा रहे थे।

किसी ने सच ही कहा हैं

       "हार हो जाती है,
     जब मान लिया जाता हैं
      जीत तय हो जाती हैं,
    जब ठान लिया जाता है।"

क्‍या नये साल का सूरज कुछ अलग रंग में रंगकर उदित होता हैं? क्‍या नये साल का सूरज पूरब की जगह पश्चिम से उगता हैं? क्‍या नये साल में सूरज की किरणें कुछ अधिक तेजोमय होती हैं? जी नहीं, सूरज तो हर शाम ढलते-ढलते बंद दरवाजे से नीचे से धूप का छोटा सा पुर्जा फेंक, अपनी कल सुबह वापसी का टिकट हमें थमाकर चला जाता हैं, वापस हर अगली सुबह अपने नियत समय-दिशा से समस्‍त सृष्टि को अपने दिव्‍य तेज़ से आलोकित करता आया हैं।

पर नये साल के पहले दिन की सूर्य-रश्मियों में न जाने कौन सा चुंबकीय आकर्षण होता हैं, जो इसके आने का अंदेशा होते ही बीते साल आँखों में पलते इंद्रधनुषी सपनों को साकार रूप देने, हम अपनी आरामपसंद आदतों को अनुशासित करने, उनमें आवश्‍यक सुधार लाने, कुछ विशेष पाने, पर्सनेलिटी में कुछ पॉजीटिव एड करने आदि अनेक बातों के लिए खुद से कितने ही प्रॉमिसेस करने की कवायदें करते हैं।

गौर फरमाएँगे तो सब कुछ जानते समझते भी खुद से किये गये इन सारे वायदों को दिनचर्या में शामिल करने का उत्‍साह जनवरी बीतते न बीतते ही समाप्‍तप्राय हो जाता हैं, ऐसा क्‍यों होता है? जानते समझते हम अपने मन पर नियंत्रण क्‍यों नहीं रख पाते? शायद "वक्‍त की महत्‍ता" को हम समय रहते समझ नहीं पाते।

हौसलाअफ़ज़ाई के लिए अपने पसंदीदा सफलतम् चरित्र के पोस्‍टर, प्रेरक वाक्य अक्‍सर हमारे कमरों की दीवारों की शोभा बढ़ाते दिखाई दिया करते हैं। पर मंथन योग्‍य विषय हैं कि "फर्श से अर्श" तक पहुँचने वालों को आदर्श मानना, उनको सर-आँखों पर बिठाना एक आम बात हैँ, पर उनके संघर्ष की कहानी को जानना-समझना और अंगीकार करने के लिए उनकी ही तरह "वक्‍त को गूंथने" की कला को अंगीकार करने का सामर्थ्‍य "स्‍व" में जगाने की कवायद गिनती भर लोग ही कर पाते हैं।

जी हाँ, वक्‍त आटे की तरह ही होता हैं, इसे जितना गूंथते जाएँगे, इसकी "सिकदार यानि तौल या मात्रा" बढ़ती जाती हैं। इस तारतम्‍य में हमें अपनी शारीरिक-मानसिक और वैचारिक क्षमताएँ क्रम-दर-क्रम परिवर्धित करनी होगी।

अक्‍सर ऐसा होता है कि किन्‍ही दुखद, मन को खट्टा करने वाली यादें-घटनाएँ हमारे मन-मस्तिष्‍क को नकारात्‍मकता से घेरे होती हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित डाटा के आधार पर 30 सालों तक हुए 300 से ज्‍यादा अध्‍ययनों के आंकड़ों के विश्‍लेषण के अनुसार जीवन में तनावपूर्ण घटनाएँ शरीर की प्रतिरोध क्षमता पर बुरा प्रभाव डाली हैं, हालांकि मन को झकझोरने वाली बातों /यादों को अवचेतन में आने से कोई नहीं रोक सकता पर इनसे निज़ात पाने हेतु "इंटेंशनल फॉरगेटिंग सिस्‍टम" अत्‍यंत कारगर साबित होता हैं। इसके लिए यदि कोई बुरा विचार हमें बारंबार परेशान कर रहा हो तब या तो हमें तुरंत ही दूसरे पसंदीदा कामों में खुद को व्‍यस्‍त करना होगा या किसी कागज पर उस तकलीफ देने वाली बात को लिख क्रम-दर-क्रम एक-एक लाइन काटकर – चिट के टुकड़े-टुकड़े कर उन्‍हें फ्लश करें।

कहीं पढ़ा था कि "एक व्‍यक्ति व्‍यक्तित्‍व का निर्माण तभी कर सकता है, जब वह खुद पर दूसरों से ज्‍यादा भरोसा करना सीख जाये।" बेशक दूसरों की टीस देने वाली टिप्‍पणियों से खुद को जज करने के बजाय खुद को तराशा जाये तो मनमाफि़क परिणाम मिलने की संभावनाएँ प्रबल होती हैं। सफलतम व्‍यवसायी रतन टाटा कहते हैं कि "अपने आपको पुन: खोजने की कोशिश करें।"

हमारी ही कुछ आदतें, जैसे कामों की प्राथमिकताएँ तय न कर पाना, यह मशक्‍कत कि सुबह-सबेरे की शुरूआत किस तरह करना हैं? अनुशासित करने के लिए सुबह-सबेरे नींद से जगाते अलॉर्म को बंद कर बस, 5 मिनट और सोना, अपना सामान सही समय पर यथावत न रखना, घड़ी-घड़ी मोबाइल चेक करना, किसी से मदद लेने में संकोच करना, किसी को "न" कहने में हिचकिचाना और एक ही साथ कई सारे काम करने के चलते एक भी काम को परिणाम तक न पहुँचा पाने जैसी आदतें खुद को तराशने की दिली ख्‍वाहिशों पर पानी फेरती हैं।

कहते हैं न जब जागे, तब सबेरा, किसी भी काम की शुरूआत का कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता न ही कभी देरी ही होती हैं, तो आइये इस नूतनवर्ष हम खुद में कुछ नया पिरोये -

**मंजिल या लक्ष्‍य तक पहॅुचने तक पहले ही दिन वाली बेचैनी को हर घंटे- हर मिनट- हर सेकंड महसूस करें, यही हमसे जम तक मेहनत कराएगी।

** "ऑलवेज ऑन कल्‍चर" सबसे जुड़ाव का मानसिक भुलावा हैं, बेहतर होगा खुद को दुनिया से डिस्‍कनेक्‍ट कर हर दिन कुछ घंटे खुद से कनेक्‍ट करें, खुद को पढ़ें, गुनें, विचारमंथन कर खुद को मथने की रणनीति तैयार करें।

** कही पढ़ा था कि "चवन्‍नी संभालें, रुपया अपनी कद्र खुद करेगा" – इस तथ्‍य के गूढ़ अर्थ पर मनन करें तो जिस तरह चिल्‍लर से रूपया व एक-एक ईंट से गगनचुंबी इमारतें बनती हैं ठीक उसी तरह हमारी छोटी-छोटी कोशिशें क्रम-दर-क्रम हमें सफ़लता के क्षितिज पर ले जाने के मार्ग प्रशस्‍त करती हैं, सो हमें एकदम लांग जंप नहीं, बल्कि जहाँ से जो भी सीखने को मिले, आत्‍मसात करते चलने की आदत डालनी होगी।

** हमारे घर में एलबम बहुत संभालकर रखे जाते हैं, वैसे ही हमें अपने पास एक लक्ष्यपत्र भी रखना चाहिए, जिसमें हमारा ड्रीम टार्गेट लिखा हो, इसे ऐसी जगह लगाकर रखे कि हर समय वह हमारी नज़रों में रहे, और उस तक पहॅुचने के लिए हमें अनुशासित रहने की याद दिलाता रहे।

मार्क जकरबर्ग हर साल कुछ नया संकल्‍प लेते हैं ताकि कुछ नया सीख पाएँ इसमें मंदारिन भाषा सीखने से लेकर हर दिन ऐसे नए लोगों से मिलना, जो कि पेशेवर जिंदगी से अलग हो। मार्क कहते हैं कि ऐसा करना उनके विज़न के विस्‍तार के दायरे को खोलता हैं। सफल लीडर्स की माने तो नई चीजें सीखते रहने का फंडा नई लर्निंग्‍स के साथ उसकी स्‍पीड बढ़ाने में मदद करता हैं। साथ ही खुद सीखने और दूसरों को सिखाने से स्किल्‍स और भी बेहतर होती हैं इसे "प्रोटेजे इफेक्‍ट" नाम दिया गया हैं।

इस प्रकार देखा जाए तो, बेशक समय बहुत तेजी से बदल रहा है, इसके साथ कदमताल मिलाकर चलने के लिए हमे भाग्यवादी बन बैठे रहने के बजाय, अपनी कुछ आदतों मे बदलाव लाना होगा। निःसंदेह, कार्य कठिन जरूर है, पर असम्भव नहीं।

तो इस नए साल आपने क्या संकल्प लिया? 

25 comments :

  1. बहुत ही उत्तम शब्दों के माध्यम से बेहतरीन अभिव्यक्ति 👌👌👌

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  2. लेखिका ने बहुत हि सुंदर तरीके से अपने लक्ष्य प्राप्ति कि तरफ बढ़ने का सही मार्ग सुझाया है।लेखिका को बहुत बहुत आभार।

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  3. बहुत ही सुंदर , सारगर्भित आलेख ।

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    1. दिल से धन्यवाद मेरी मिष्ठी

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  4. एक बेहतरीन प्रेरणादायक लेख, बधाई

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  5. बहुत ही सुन्दर लेखन महोदया आपको प्रणाम

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  6. Bahut Saandar or Motivation kahani. Is kahani se hame bhi Naye Saal ki Nai udan pa sake 😊💐

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    1. हृदय से आभार

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  7. वाह अप्रतिम प्रेरक लेख हैं,असीम हार्दिक बधाईयां शुभ कामनाएं आद अंजली खेर जी ,सादर ,गजानन भगत

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    1. मनःपुर्वक् आभार जी

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  8. आदरणीय खेर जी की लेखनी का जवाब नहीं है।विविध संदेशों के साथ सरल शैली के लेखन में उनका कोई सानी नहीं है।

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    1. हृदय तल से धन्यवाद आपका

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  9. Bahut motivate karta hai aapka article Thanks

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    1. हृदय से आभार आपका

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  10. सुन्दर भावयुक्त

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    1. आभार जी आपका

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  11. सारगर्भित और प्रेरणादायक
    सुंदर अभिव्यक्ति साथ ही उत्कृष्ट लेखनी आपकी

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    1. हृदयतल से आभार आपका

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    2. मोती की तरह पिरोए गए शब्दों की खूबसूरत विचार श्रृंखला....
      शानदार लेखन शैली💗💗

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