पुस्तक समीक्षा: तुम्हीं से ज़िया है

समीक्षक: ज्ञानप्रकाश विवेक


पुस्तक: 'तुम्हीं से ज़िया है' ग़ज़ल संग्रह
ग़ज़लकर: सुभाष पाठक 'ज़िया'
प्रकाशन: अभिधा प्रकाशन 
मूल्य: ₹ 300 रुपये
वर्ष: 2022


सुभाष पाठक 'ज़िया' की ग़ज़लों में अपने वर्तमान की विभिन्न छवियाँ और निरंतर बदलते समय का बोध मौजूद है। उनकी ग़ज़लों में जो व्याकुल स्थितियाँ हैं वो किसी इश्तहार की तरह नहीं हैं। अपना प्रतिपक्ष रखती ग़ज़लें, अपना निजता बोध भी रखती हैं।

सुभाष पाठक 'ज़िया'
उनकी पहली ग़ज़ल का पहला शेर ग़ौरतलब है जो प्रतीकात्मक है। शेर में गोधूलि का समय दो समयों का रचनात्मक उत्सव होता है। एक समय जाता हुआ। दूसरा आता हुआ। सुभाष की ये ग़ज़लें भी दो समय की अंतरधारा, द्वंद्व, बदलाव को व्यक्त करने में सफल होती हैं। पहली ग़ज़ल के पहले शेर में जिस प्रतीक (गोधूलि) की बात हो रही थी, वह शेर है -

सूरज जब दिन की बातों से ऊब गया
परबत से उतरा दरिया में डूब गया
 
यहाँ सूरज के डूबने का बिंब है तो एक अन्य ग़ज़ल में, जो न सिर्फ़ लंबी बहर में है बल्कि रदीफ़ का प्रयोग भी बहुत कलात्मक रूप से हुआ है। यहाँ- 'ज़िया' है रदीफ़ के ज़रिए बात कही गई है। ज़िया यानी प्रकाश। यह जो प्रकाशित होने की उत्सवधर्मिता है, यही कविता उत्सव या कहें कि ग़ज़ल उत्सव भी है। यह ग़ज़ल उत्सव तब और अधिक प्रभावशाली तथा सृजनात्मक हो जाता है जब ठाठ फ़क़ीराना हो। शेर है -

ज्ञानप्रकाश विवेक
जरा-सा ही कंकर मचा दे समन्दर में हलचल मेरे जुगनुओ तुम ये सोचो
अँधेरी है रातें मगर रौशनी का कोई तीर मारो तुम्हीं से ज़िया है


दुष्यंत ने कहा था- 'हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए', तो नए समय में, एक युवा ग़ज़ल लेखक, नयी तरह की चुनौतियों को शेर में यूँ व्यक्त कर रहा है- 

'थकन को उतारो न यूँ थक के हारो वफ़ा के सितारो तुम्हीं से ज़िया है'

'तुम्हीं से जिया है' इस विश्वास को वो अधिक दृढ़ता से, नए मुहावरे के ज़रिए कहते हैं।

'ये रौशनी तो है तेरी मुरीद साँकल खोल'

'साँकल खोल' रदीफ़ में एक संबोधन है। संबोधन में उम्मीद की आश्वस्ति है। साँकल शब्द का तो ख़ूबसूरत प्रयोग है ही, पूरी ग़ज़ल में जब 'साँकल खोल' की ध्वनियाँ गूँजती हैं तो एक आशावाद का वातावरण निर्मित होता है। सुभाष की ग़ज़ल का एक और शेर ग़ौरतलब है -

मैं ऊबता हूँ, न क़िस्से को और लम्बा खींच
अगर है हाथ में डोरी तो फिर ये पर्दा खींच

बात ज़िन्दगी की है। बात क़िस्से के ज़रिए व्यक्त हुई है। शेर आधुनिक है लेकिन जीवन-मृत्यु का बोध पुरातन। ज़िन्दगी की दास्तान इतनी तवील भी न हो कि ऊब आने लगे। अगर 'तू' (पात्र) ऊब रहा है तो फिर पर्दे की डोरी खींच। यह शेर सुभाष के उत्कृष्ट शेरों में से है। पूरा भारतीय दर्शन इसी पर्दे के खींचने और डोरी के टूटने का विस्तार है।

ग़ज़ल कथन को अर्थपूर्णता और तहदारी से शेर में व्यक्त करना, ग़ज़ल लेखक के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन उससे भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होता है शेर चिंतन तत्व को शामिल करते हुए, ग़ज़ल कथन की रचना | शेर के एक मिसरे में सुभाष कहते हैं -

'ऐ ज़िंदगी तुझे क्या- क्या न सोचता मैं भी'

ग़ज़ल लिखना भी दर हक़ीक़त ज़िन्दगी को सोचना ही है। ज़िन्दगी के हज़ारों शेड्स हैं, हज़ारों रंग,हज़ारों घटनाएँ | हर पदार्थ जीवन से जुड़ा है। यह जीवन की लीला है कि यादों के ज़रिए पुराना समय जीवित हो उठता है। यह जीवन की लीला ही है कि हर बेजान शय, साँस लेती प्रतीत होती है। सुभाष ने अपनी ग़ज़लों में जीवन के उन क्षणों को व्यक्त किया है जो सुख- दुःख का राग पैदा करते हैं -

कौन है किसको फ़र्क़ पड़ता है
घर में रोयें कि कू-ब-कू रोयें

यह रोना मात्र रोना नहीं है। इस रोने के पसमंज़र एक अकथ संसार की रचना है। 'अकथ' को सुभाष ने इस शेर में भी बहुत अर्थपूर्ण दृष्टि से अभिव्यक्त किया है। यहाँ 'संभावना' और 'कल्पना' जैसे तत्व अपनी अहम भूमिका निभाते प्रतीत होते हैं।

मैं जानता हूँ न निकलेगा रात में सूरज
मैं चाहता हूँ मगर एक रात ऐसी भी

इस असंभव के जो संभव है, वही तो ज़िन्दगी है। वही जद्दोज़हद। वही ज़िद। वही जीवन राग!

सुभाष पाठक ने सोच समझकर शेर कहे हैं। उन्होंने लम्बी बहरें चुनीं। उन‌का ख़ूब निर्वाह किया। विशिष्ट बात यह रही कि इन लंबी बहरों में ग़ज़ल ने कथन के अतिरिक्त रदीफ़ों के ज़रिए भी नई संचेतना पैदा की है।

सुभाष की ग़ज़लों में अव्यक्त को व्यक्त करने का प्रयास है और किसी अज्ञात कोने को शेर में व्यक्त करना और छोड़ देने का भी। ये शेर-

जो कहा नहीं जो सुना नहीं वो समझ लिया वही कर लिया
कि ख़मोशियाँ हुई हैं ज़ुबां यही ज़िन्दगी का सुकून है

संवेदनशील रचनाकार / ग़ज़लकार का विनम्र भाव केवल दीनहीन मनुष्य की ओर नहीं रहता बल्कि दीनता का बोध करातीं जड़ वस्तुओं की ओर भी रहता है। ग़ज़लकार उन जड़ वस्तुओं में भी जीवन की खोज कर लेता है।

सब गुज़रते हैं मेरे सीने से
मैं हूँ इक पायदान चौखट का

घर की सबसे उपेक्षित वस्तु पायदान है और ग़ज़ल लेखक ने स्वयं को पायदान के रूप में व्यक्त करते हुए दीनता का बोध कराया है। यह दीनता आख़िरी मनुष्य की दीनता है जो कतार में सबसे पीछे खड़ा है।

सुभाष पाठक ने शेरों में दृश्यात्मकता का रचाव भी बहुत कुशलता से किया है।

आओ कि साहिलों पे घरौंदे बनाएँ हम
तुम थपथपाओ रेत सनम पाँव हम रखें

यह बचपन की मासूमियत का शेर है जो दिखाई देता है जो महसूस भी होता है।

ग़ालिब ने कहा था- "इक गुना बेख़ुदी मुझे दिन रात चाहिए।" यानी थोड़ी सी दीवानगी रचनाकार के लिए ज़रुरी है। सुभाष पाठक कहते हैं-

सब अपने-अपने जैसों के पास ही बैठे हैं
तुम पागल हो मैं भी पागल, मेरे पास रहो

आत्मीयता के क्षण इस प्रकार भी व्यक्त किए जा सकते हैं।

सुभाष पाठक की एक ग़ज़ल पुस्तक पहले भी छप चुकी है। यहाँ वो ज़्यादा आत्मविश्वास से, नया मुहावरा गढ़ते हुए गज़लें कह रहे हैं। शब्दों के प्रति सजगता और शेर को सघनता से कहने का कलाकौशल भी उन्होंने अपने अनुभवों से अर्जित किया है। 'तुम्हीं से ज़िया है' किताब के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
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ज्ञानप्रकाश विवेक (बहादुरगढ़, हरियाणा)

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