कथ्य और कथन की ताजगी भरी कविताएँ: 'रोज बुनता हूँ सपने'

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: रोज बुनता हूँ सपने (कविता संग्रह)
कवि: केशव मोहन पाण्डेय
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशक: सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली 

काव्य साहित्य का आलोक और आभा-मण्डल केवल आकर्षित ही नहीं करता बल्कि प्राण-चेतना को झकझोरता है, भाव-संवेदनाएँ जागती हैं और जीवन स्पन्दित, झंकृत हो उठता है। कविता में ऐसा क्या है? यह शायद तत्काल समझ में नहीं आता और जब समझ में कुछ-कुछ आने लगता है, हम किसी गहरे अनुभव में मौन हो जाते हैं। भीतर का मौन जब टूटता है, कविताएँ निःसृत, प्रवाहित होने लगती हैं। अनुभव, भीतर का चिन्तन-मनन बहुत जरूरी है और जरूरी है हमारी संवेदना का जागना, कविता ही नहीं, साहित्य की कोई न कोई विधा आकार लेने लगती है।

काव्य विधा में आकार लेती हुई कवि केशव मोहन पाण्डेय की काव्यात्मक अनुभूतियों का संग्रह "रोज बुनता हूँ सपने" मेरे सामने है। यह संग्रह साहित्य मार्तंड प्रो० रामदरश मिश्र जी को समर्पित है और सार्थक टिप्पणी के रूप में उनका आशीर्वाद यहाँ संलग्न है। उन्होंने लिखा है, "इन सारी कविताओं में मनुष्यता की आभा दीप्त हो रही है, प्रेम का राग मुखर हो रहा है। बहुत प्रीतिकर बात यह है कि ये कविताएँ कवि के अनुभव और मूल्य चेतना से निःसृत हुई हैं, इसलिए ये बहुत सहज और पठनीय हैं। इनमें प्रयुक्त बिम्ब हमारे अपने लगते हैं।"

संग्रह में अशोक लव जी द्वारा 'सपने बुनती जीवंत कविताएँ' शीर्षक से भूमिका या परिचयात्मक लेख जुड़ा हुआ है। उनके कतिपय निष्कर्षों को उद्धृत करना उचित ही होगा। वे लिखते हैं-'पाण्डेय जी बहुमुखी प्रतिभासंपन्न साहित्यकार हैं, कविता उनकी आत्मा में रची-बसी है।' कविता के बारे में उन्होंने सटीक विवेचना की है-"वास्तव में कविता संवेदनशील हृदय की भावनाओं की अभिव्यक्ति है। हृदय के सूक्ष्मतम भावों की, कोमल अनुभूतियों की, वेदनाओं की और आनंद आदि की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कविता में ही होती है। अलंकृत भाषा, कोमलकांत पदावली, प्रतीक, बिंब, छन्द आदि के कारण कविता का सहृदय पाठक पर अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक प्रभाव पड़ता है। कविता का रसास्वादन अद्भुत होता है। आदि कवि बाल्मीकि से लेकर समकालीन कवियों तक की कविता-यात्रा अद्भुत है।" अंत में अशोक लव जी लिखते हैं-" 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' की भांति कविता अनंत है। कवियों की उड़ान-क्षमता, अभिव्यक्ति सामर्थ्य, अनुभव आदि के संग कविता कैसे-कैसे रूप धारण करती है। इस संग्रह की कविताएँ सीधे मन में उतर जाने वाली कविताएँ हैं। कवि में बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत कला है।"

विजय कुमार तिवारी
कवि केशव मोहन पाण्डेय जी ने अपने 'आत्मकथ्य' में कविता, कविता संग्रह, अपनी रचना प्रक्रिया आदि को लेकर महत्वपूर्ण बातें की हैं, वे लिखते हैं-"रोज बुनता हूँ सपने" कोरोना की विभीषिका के बाद की, इधर घटित हुई अनेक घटनाओं के बाद की, संबंधों और भावनाओं के आहत होने के बाद की, हताश हुए मन में उजास भरने की सुखद परिणति है। कविता मेरे लिए संजीवनी है। जब मैं सस्वर नहीं चीख पाता, नहीं रो पाता, मुखर होकर नहीं प्रत्युत्तर दे पाता, तब कविता मुझे साहस देती है, संबल देती है और साथ देती है।" केशव मोहन पाण्डेय जी के इस संग्रह को लेकर ऐसी सशक्त टिप्पणी, भूमिका के बाद मेरे लिए कुछ कहना शेष नहीं रह जाता। मैं उन्हें हृदय पूर्वक बधाई देता हूँ।

परम्परागत चिन्तन से कवि की सोच किंचित भिन्न है। इस में कुल 60 छोटी-बड़ी सहज कविताएँ हैं।  'रोज बुनता हूँ सपने' संग्रह की पहली कविता के नाम पर ही संग्रह का नामकरण हुआ है। सपने बुनने, कलियाँ चुनने और विद्रोह करने के पीछे कवि का अपना मानवीय चिन्तन है, वह कंकड़-पत्थर बहार कर अपनी जिम्मेदारियों की स्वच्छ, सीधी, सपाट सड़क देना चाहता है। 'संबंध' रिश्तों के टूट कर कमजोर होते जाते स्वरूप की मार्मिक कविता है-संबंधों का महीन धागा/जिसे बड़े मनोभाव से/दृढ़ करते थे पिता/माँज-पोंछकर/चमकाती रहती थी मां/उसे कमजोर करते-करते/तोड़ दिए हम सबने। अब नहीं दिखता संबंधों का घना पीपल, नहीं दिखते हम-उम्र लोग, सब कुछ डरावना लगता है और सड़ गया है संबंधों का धागा।'आदमी होने के नाते' व्यंग्य और अन्तर्विरोध की कविता है। कवि बियावान में भी जुड़ने-जोड़ने का काम करता है जबकि वे लोग परिवार, गाँव तोड़ते हैं, बाजी मार जाते हैं। कवि को तब समझ में आता है-आदमी बहुत कमजोर है या वे आदमी हैं ही नहीं। 'आरक्षण का देवता' कविता देश में आरक्षण की राजनीति पर गम्भीर प्रश्न उठाती है जिसका किसी के पास उत्तर नहीं है। कवि के कुछ सुझाव भी हैं-आरक्षण देना ही है/तो मानसिक विकास पर दो। 'आह्वान' कवि की उद्दात्त भावनाओं की रचना है। स्वयं को, परिवार, समाज और देश को गतिशील करना है तो जाति, कुल, धर्म आदि के बंधनों को बिना देर किए तोड़ना होगा।

होली के बाद' माँ की यादों के साथ भावुक करने वाली कविता है। घर के सभी लोग, सभी बच्चे रंग लगाने-छुड़ाने मे व्यस्त हैं, माँ व्यस्त है पकवान बनाने में और जब सभी आराम करते हैं, माँ बरतन साफ करती है, कल सुबह सबके लिए ब्रेकफास्ट/टिफिन तैयार करना है। 'चलते जाना है' कविता में महाभारत की घटनाओं का उदाहरण देते हुए कवि कर्मरत रहने का संदेश देता है। 'जन्मभूमि की हवा' को संबोधित करते हुए कवि जन्म स्थान की मिट्टी, हवा, पानी, नदी की रेत, खर-पतवार सबसे जुड़े रहने की प्रतिबद्धता का भाव सँजोए हुए है। 'जो शब्द गढ़ते हैं' सक्रियता, सतत सृजन और चुनौती स्वीकार करने  के भाव की कविता है। कवि की पंक्तियाँ देखिए-

जो शब्दों को गढ़ते हैं
वे कभी नहीं मरते हैं।

'तुम्हारे खत' कविता में कवि के लिए खत सिद्ध करते थे/कि प्यार की/नहीं होती कोई पराकाष्ठा। यह भाव देखिए-दोनों से मिलने लगी शक्ति/लड़ने की/आगे बढ़ने की/और कुछ न कुछ गढ़ने की भी।

कवि ने लड़कियों की तुलना सामर्थ्यवान, गतिशील, तरल, निर्मल जल लिए, चुनौतियों को स्वीकार करती, विकराल स्वरूप धारण करती, लक्ष्य की ओर बढ़ती और हर अवरोध को मिटाती हुई नदी से की है 'नदी होती हैं लड़कियाँ' कविता में। 'कलियाँ' कविता का एक-एक शब्द संभावनाओं का गहरा आश्वासन है-कांटों के बीच/आँखें बंद रखती हैं/कलियाँ/अपने भीतर/असीमित/सुगंध रखती हैं/और उस सुगंध में/रखती हैं संभावनाएं/परागण की। सामर्थ्य और यथार्थ स्थिति के अन्तर्विरोध की कविता है 'लड़की'।कवि लड़की के सामर्थ्य, साहस और उड़ान को पहचानता है कि वह सब कुछ बन रही है परन्तु यह सच्चाई देखिए-परन्तु लड़की/आज भी/नहीं बोल पा रही है/ठीक से/वह/आज भी/धरती बनकर/बिछती जा रही है/पाँवों के नीचे। 'विक्षिप्त' मार्मिक व्यंग्य कविता है। कविता बहुत कुछ कहती है हमारे समाज और उसके दृष्टिकोण के बारे में। कवि की पंक्तियाँ करारा व्यंग्य है समाज पर, वे लिखते हैं-

मैंने देखा है
यौवन को ढोती
उस बाला की तुलना में
विक्षिप्त हजार आँखें।

सृजन, साहस और महान व्यक्तित्व लिए बेटियों पर अद्भुत कविता है 'बेटियाँ रचना करती हैं'। यह कवि के उदार मन और सम्यक दृष्टिकोण की कविता है। बेटियों, लड़कियों को कहाँ पहचान पाते हैं लोग? कवि को उनमें मौन साधक, सिद्ध, वामनावतार और रचनाकार की छवि दिखाई देती है। कवि का प्रश्न सटीक है और हमें उत्तर खोजने की आवश्यकता है।

'प्यार की परिभाषा' बदल गई है। कवि का चिन्तन अपनी जगह सही है। 'नारी-मुक्ति' कविता में दोहरा चरित्र उभरा है नारी का, व्यंग्य भाव भी है और अंत में कविता जीवन्त होती है, देखिए-जब पिताजी गुजरे थे/तब फोड़ दी गई/माँ की चूड़ियाँ/तोड़ दिए गए/कंगन और मंगलसूत्र भी/और पछाड़ खाती मां/पिताजी के शव के पास/अपने ही हाथों से/लाकर रख दी/सिंदूरदानी अपनी। 'माँ और मेरी भूमिका' बहुत ही भावुक और जीवन्त कविता है। समय सन्दर्भ में जीवन के बदलाव के साथ कवि का चिन्तन अद्भुत है। मा की उम्र ढलती है, पुत्र कभी बेटी, कभी नन्हा बेटा, कभी बचपन की सहेली और पिता बन माँ का सहारा बनता है। केशव मोहन पाण्डेय की कविताओं में अद्भुत सहजता है, सकारात्मकता और रिश्तों को सम्हालने के भाव हैं। माँ के साथ सभी का जीवन गहरे तौर पर जुड़ा होता है। इस संग्रह में माँ को लेकर अनेक कविताएँ हैं-माँ के बिना होली, माँ मारती थी, माँ बहुत बड़ी होती है, माँ की रूठी खाट और मां। कवि के अनुभव, माँ को लेकर स्मृतियाँ इन कविताओं में मुखरित है-समय के साथ/पर्व-त्योहार भी/हो गए राजनैतिक/और तुम भी चली गई मां/कई रंग लेकर/मेरी दुनिया से/हमेशा के लिए। कवि का भाव देखिए-फिर भी मेरे मन को/दृढ़ विश्वास है/आज भी मां/मेरे आस-पास है। इन पंक्तियों में कवि ने बहुत कुछ कहा है-उसकी ज्ञान की बातें/चमत्कार लगती हैं/तब मां/ ईश्वर का अवतार लगती है/भले ही /उसकी अक्षम काया/मेरे कंधे के सहारे खड़ी होती/या चारपाई पर पड़ी होती है/फिर भी मां/बहुत बड़ी होती है। माँ की रूठी खाट के सहारे माँ उपस्थित है कवि के लिए। खाट खड़ी कर दी गई है और माँ घर की औरतों को लोगों की बुरी नजर से बचा रही है। माँ और बच्चे के बीच सब कुछ सहज स्वाभाविक होता है। कवि का भाव देखिए 'मां' कविता में-

समय के साथ
बदल जाता है
बच्चे का स्वभाव
पर माँ नहीं बदलती
नहीं होने के बाद भी
इस दुनिया में।

'भटके युवा' आज के गाँव-घरों की सच्चाई है। कविता उस अन्तर्विरोध को व्यक्त करती है जिसमें माँ-बाप अपनी संतानों को पढ़ने-लिखने, जीवन में सफल होने के लिए भेज देते हैं और वही सफल होती संतान भूलने लगती है अपना गाँव-घर, गाँव की मिट्टी, गली-कूँचे और ये भटके हुए युवा माँ-बाप के परवरिश को ही गलत बताते हैं। कवि के मन में गाँव बसा हुआ है। 'मेरा शहरी होना' उनके मर्म को छूती हुई कविता है। गाँव छूटने की घटना ने कवि के जीवन के नाना संदर्भों को जीवित किया है। वह दुखी है-जैसे दूर हो गया/पिता का साया/उड़ गया/माँ का आँचल/और नहीं बचा पाया मैं/शहरी होकर/संबंधों का इत्र/कि जब कभी चाहूँ/सुगंधित अनुभव कर सकूँ/छिड़ककर जिसे अपने आस-पास।

'मेरी कविता(एक) से मेरी कविता(चार) तक केशव मोहन पाण्डेय ने अपनी कविता को समझने-समझाने का प्रयास किया है। यहाँ कविता को परिभाषित करने की कोशिश ही नहीं है बल्कि जीवन में उसकी उपस्थिति से पड़ने वाले अंतर की व्याख्या है और प्रभावों का चिन्तन भी है। कविता कौन लिखता है जो भीतर का युद्ध जीत पाता है और कविता उसी के साथ चल पड़ती है। असहनीय पीड़ा से कविता जन्म लेती है। कवि के जीवन में कविता संगिनी है जो अकेलेपन में, अशांत मन में मुस्कान भरती है, मूक पाषाण में आह्लाद भरती है और गुदगुदा जाती है। कविता मरहम है, नव-गति है, माँ का ममता-सिक्त आँचल है, पिता का संबल है, सदा जीवन संगिनी है, बेटे-बेटी की किलकारी है, कुनबा, गाँव-शहर सम्पूर्ण धरती है कविता। कविता नाना रूपों में कवि के जीवन में है, कभी चैन देती है, कभी मन को झंकृत करती है, कभी मस्तक सहलाती है, उथल-पुथल मचाती है, कभी सीने से लगाकर चुम्बन अंकित करती है। कवि की कविता में ममता है, समता है, वह अनुराग की सुवेणी की तरह सदा सदया है। कवि स्वीकार करता है, अगर कविता नहीं होती तो वह बिखर गया होता, बह गया होता और झड़ गया होता। जीवन में नाना बिम्बों के रूप में कविता है-आक्सीजन, हरापन, बाँध और जड़ें जो कस देती हैं मिट्टी को। कवि की पंक्तियाँ देखिए-

कविता है
तो चहक है
उदास जीवन में भी
मोगरे, गुलाब.चमेली की महक है
कविता श्वास-प्रतिश्वास है
कविता है तो
हर हाल में
जीने का विश्वास है।

'बोधि-वृक्ष' कविता में कवि रोटी के लिए जड़ से दूर होने को सिद्धार्थ और बुद्ध से जोड़कर देखता है, विपन्नता और भूख में बुद्ध बनने की प्रक्रिया दिखाई देती है, अकेला होना पड़ता है-

लुम्बिनी से कुशीनगर तक के सफर में
रोज मिलते हैं
जड़हीन
बोधि-वृक्ष।

'मेरे जड़ बनने के बाद' जैसी कविता कवि के चिन्तन को दिखाती है जिसमें जीवन बना रहता है। पूरी तरह जड़ हो जाने का दृष्टिकोण कवि का नहीं है। वह चुप नहीं रह सकता, शाखाएं-प्रशाखाएँ फूटेंगी और प्रकाश-संश्लेषण होगा। पंक्तियाँ देखिए-उत्सर्जन-संचयन के बीच/मैं तिरता रहूँगा/भावनाओं में/रहूँगा चैतन्य/उस जड़ बनने पर भी/मैं चुप नहीं रह पाऊँगा। 'मेरे गाँव की पगडंडी' गाँवों की पहचान पगडंडी के लुप्त होते जाने की व्यथा की कविता है। कवि के पगडंडी सम्बन्धी बिम्ब बहुत कुछ कहते हैं। आज पगडंडियाँ नहीं है, कवि की यही पीड़ा है। 'मैं सूरज हूँ' उद्घोष करती कविता है। कवि ने संकेतों में, नाना उदाहरणों में लिखा है, मुझे यानी सूरज को किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता। पंक्तियाँ देखिए-हर उपासक कलम का/एक सूरज होता है/वही सूरज होता है/जिसका आगमन/न चाहकर भी/ दुनिया को मानना पड़ता है/सूरज हर हाल में/प्रकाश देता है/अंधकार हरता है। 'लक्ष्य' कविता इसी संग्रह में 'प्यार की परिभाषा' शीर्षक से छपी है। 'होली ऐसे मनाएँ' कविता में प्रचलित परिभाषाओं, होली से जुड़ी सोच, तौर-तरीके और विचारों से भिन्न कवि का नूतन चिन्तन है-अब मन बनाकर/घर में/एक रोटी अधिक बनाएं/आइए/होली/कुछ ऐसे मनाएं। 

'किस्तों पर गुजारा' कविता वर्तमान जीवन शैली पर चोट है, किंचित व्यंग्य है और तनिक सान्त्वना के भाव भी। रोटी, कपड़ा और मकान के लिए ही हम नहीं भटक रहे हैं, कई बार दौलत की चाह में अस्मत, सम्मान और आदमी होने के प्रति भी बेपरवाह हो जाते हैं। शहर आकर जीवन से गुमराह, खून के रिश्तों से दूर, निभाते हैं व्यावसायिक रिश्ते। बाजारवाद पर जबरदस्त चिन्तन है, पंक्तियाँ देखिए-उलझे रहते हैं/भरने में किस्तों को। कवि हँसता है-फिर भी जीवन प्यारा है/वहाँ रिश्तों पर असंभव था/यहाँ किस्तों पर ही गुजारा है।'सत्य को लकवा नहीं मारा' सत्य-असत्य के बीच के टकराव की कविता है। कवि का मत है, सत्य विजयी होता है। इसलिए वह हमेशा सत्य के साथ खड़ा होता है। 'मैं मशीन हूँ' शहरी जीवन की सच्चाई की कविता है। कवि की पीड़ा है, वह प्रकृति की सुन्दरता, मौसम की अल्हड़ता, फसलों की हरियाली देख नहीं पाता। उनकी स्वीकारोक्ति देखिए-नंगे बिस्तर/या टूटी खाट में सोने पर भी/कल तक तो आदमी था/सब कुछ पाकर/आज मैं मशीन हूँ।

'मेरा 'मैं' अनिर्वचनीय चिन्तन की कविता लगती है। यह भाव देखिए-

फूल तुम्हारी आँखों में
जो चुभ रहा
वह मैं ही हूँ।

फूल का चुभना, अंगारों पर सेंक रही सपने पालती आँखें, तितली पकड़ रहे बच्चों का अल्हड़ बचपन, मैं ही आखेट मैं ही अहेरी, कवि के सारे बिम्ब अद्भुत हैं। कभी-कभी लगता है, वह जो कहना चाहता है, कह नहीं पाता या किंचित भटकाव है, कविता का सम्प्रेषण नहीं हो पाया है। "यह कविता नहीं है' बिम्बों के जाल में रची-बसी कविता, कविता है या नहीं, पाठक तय करेंगे। यह संग्रह की लम्बी कविता है, अनुभवों से भरी हुई, भटकती, बहकती सही राह पकड़ती हुई-सी। इसमें उलझा हुआ मन है, भावनाएँ हैं, कोई रिक्तता फैली हुई है, असंभव की स्थित में सब कुछ संभव है, कवि नहीं, लेखनी नहीं, बस एक कागज, स्त्री भी है, संख्या के बढ़ने से शक्ति, स्वभाव, संस्कृति व सूर्य का बढ़ना है, नाखून का बढ़ना कलम है, समुद्र स्याही है, कवि अपनी स्मृतियों में जी रहा है। स्मृतियों में पिता हैं, हिलती दीवारें हैं, गहरी अनुभूतियाँ हैं, रंग हैं, फिर भी न चित्र बन रहे, न कविता, पिता के जाने के बाद।

'हे पूजनीय पिता' कविता में कवि पिता को स्वीकार करता है कि आप ही के कारण मैंने धरा-धाम को देखा, भावनाओं को अनुभव किया, दूसरों का दुख दूसरों की पीड़ा को समझा, रिश्तों को बटोरना सीखा, हर मोड़ पर सीखा मैंने गुनगुनाना, मुस्कराना व ताल ठोक कर चल पड़ना और आपसे ही मिला मुझे मेरा नाम, हे पूजनीय पिता/आपको शत-शत प्रणाम है। 'शाश्वत अनुभूति' में माँ-पिता को कवि गहराई से याद करता है और जीवन के पग-पग पर उनकी उपस्थिति महसूस करता है। 'वह जो छोर देख रहे हो' क्षितिज की ओर संकेत करते कवि के विचार स्पष्ट हैं, वहाँ सफलताएँ हैं परन्तु वहाँ तक पहुँचने के पहले सुगम-दुर्गम रास्ते हैं, संघर्ष है, नदी पार करने के लिए परिश्रम का सेतु या कर्म की नाव व विश्वास की पतवार बनाना पड़ता है। कोई नहीं पहुँच पाता उस छोर तक। कवि का उद्घोष देखिए-पर मुझे वहीं जाना है/सपनों को पाना है/सफलताओं से मिलना है/और दौड़ पूरा करके/दिखाना है/दिखाना है मुझे/एक मेहनतकश आदमी की औकात। 'स्मृतियाँ' अपने पिता को याद करती, कवि के भाव-चिन्तन की कविता है। 'बढ़ते जाना है' संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते जाने के संदेश की कविता है। जीवन में टूटने की सम्पूर्ण प्रक्रिया को कवि ने समझाया है 'आदमी एकाएक नहीं टूटता' कविता में। पहले दिल टूटता है, रिश्तों की कोशिकाएँ टूटती हैं, संभावनाएँ टूटती हैं, अपने ही लोग ब्लास्ट करते हैं और टूटते हुए आदमी को देखते रहते हैं। 'मेरा प्रेम और चाँद' कविता में कवि ने अपने प्रेम को चाँद की उपस्थिति से जोड़ा है। यह एक पवित्र और भावपूर्ण आश्वासन है प्रेमी का अपनी प्रेमिका के लिए। इस संग्रह में अनेकों कविताएँ सहज मन के ऐसे भावों से भरी है जहाँ सहज स्वीकार है अपने प्रेम का। जीवन में आश्वासन हो तो सब कुछ सहज ही सम्पन्न हो जाता है। 'गौरैया' मन को किंचित भावुक करती कविता है। छोटी सी गौरैया घोसला बनाती है, अंडे देती है, बच्चों को पालती है, दाना चुगाती है, खतरों से बचाती है, वही बच्चे पर निकलते ही उसे छोड़कर कहीं दूर निकल जाते हैं।'समवेत' मशीनी युग के दौर में समूह-समुदाय के भाव-विचार से दूर हो रहे चिन्तन की कविता है। कवि मानवता को बचाने के लिए समवेत चलने का संदेश देना चाहता है।

कवि केशव मोहन पाण्डेय रिश्तों को, संबंधों को बचाए रखना चाहते हैं, इसलिए आइना नहीं दिखाते, तार्किक-अतार्किक ज्ञान की बातें नहीं करते बल्कि डरते रहते हैं। ऐसा कोई मजबूत और विचारवान आदमी ही कर सकता है। 'मैं डरता हूँ' कविता की पंक्तियाँ देखिए-मेरे लिए/कई बार/ महत्वहीन हो जाता है/बाजी मार जाना/कई बार/समझ में आता है/आदमीयत का सही अर्थ/हँसते-मुस्कराते/हार जाना। महिलाओं, स्त्रियों, लड़कियों के लिए आज का माहौल अच्छा नहीं है। 'लड़नी होगी एक जंग' की पंक्तियाँ देखिए-डरने लगी है हर बेटी/हर जननी भी/बेटी होने/बेटी जनने से/सदा-प्रसूता वसुधा भी। कवि कहना चाहता है-करना होगा सबल/मन को/धधकानी होगी ज्वाला/हृदय में/तोड़ना होगा मौन/लड़नी होगी एक जंग। 'नदी को बहने दो' कविता में कवि का भाव देखिए-नदी सभ्यता है/संस्कृति है/राष्ट्र की पहचान है/बहती नदी/कुछ कहती नदी/मानव की जीवंतता का प्रमाण है। अनेक बिम्बों में नदी के महात्म्य की व्याख्या करते हुए कवि की पीड़ा है-नदी डर रही है/नदी मर रही है। अंत में कवि दुखी मन से कहता है-रुको/नदी को पीड़ा मत सहने दो/सुनो/जो कुछ भी कहना चाहती है/कहने दो/नदी को बहने दो। 'बारिश' कविता में कवि की भावनाएँ देखिए-बारिश सबसे प्रिय क्रिया है, मरुभूमि सहित सर्वत्र रंगीन हो उठता है, आकाश से लेकर धरती तक बरसात रंग भर देती है, बारिश निर्भेद होकर उमस के परदे हटा देती है, स्निग्धता भर देती है, श्रृंगार कर देती है और सारा खारापन दूर करके शुद्धतम करती है।  

'पाषाण खंड' कविता का संदेश है, पत्थर का नुकीला, खुरदरा, राह में रोड़ा-सा टुकड़ा समय की मार से बहकर, अनुभव की धार में रगड़ खाकर, चिकना हो जाता है और आँखों को, पाँवों को खूब अच्छा लगता है।'नदी हत्यारिन होती जा रही है' भिन्न भाव-संवेदना की कविता है। नदी का मानवीकरण, उसका संघर्ष, बदलाव, आक्रोशित होकर हत्यारिन हो जाना, उसका राजनीति करना, विपक्ष से डरना और अवसर पाते ही अपनी सामर्थ्य दिखा देना कवि ने नदी को हर तरह से देखा-परखा है। कविता के अंत में नदी की स्थिति देखिए-प्रयोगधर्मी मानव के कारण/कई जगह तो/अपना अस्तित्व खोती जा रही है/आज भी/अपमानित होती नारीत्व की भांति/डरी हुई/डराती हुई नदी/हत्यारिन होती जा रही है।

'यह जीवन' कविता में कवि ने मानव जीवन को धन्य माना है, अहंकार, दम्भ से दूर रहते हुए मुश्किलों को झेला है और बेखटक जीवन जीया है। 'तुम्हारा प्रेम' कविता में कवि को प्रेम की उष्णता महसूस होती है, वह पीड़ाओं की बर्फीली चट्टान को गला देती है और मन तरल होने पर स्नेह की धारा फूट निकलती है। फिन्क और देवनदी गंगा उसी का प्रतिफल है। पंक्तियाँ देखिए-मैं बार-बार अनुभव करता हूँ/तुम्हारे प्रेम की उष्णता को/जो कंटक की भांति/चुभता है सबकी आँखों में/और तुम फिर भी/आँख बचाकर/खिला ही जाती हो/हर देश-काल-वातावरण में/हर सत्ता के समक्ष निडरता से/हर शासन-काल में ताल ठोककर/प्रेम का कोमल-सुगंधित पुष्प/देखने वालों के मन में। 'मधुमेह' इस संग्रह की अंतिम कविता है। माता-पिता के न होने पर जीवन मधुमेह सा रोगी हो जाता है। एक बार पकड़ लेने के बाद मधुमेह छोड़ता नहीं है और सदा के लिए तन-मन को विकारी बना देता है।

पूरे संग्रह में कवि का भावुक मन आदर्श चिन्तन में लगा हुआ दिखता है, उसे माता-पिता के बिना जीने नहीं आता, मधुमेह का रोगी-सा अनुभव करता है। कविताएँ सहज-शांत सी हैं और प्रेम-सामंजस्य का संदेश देती हैं। कविताओं में प्रकृति अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ उभरती है। माता-पिता की तरह कवि के जीवन में नदी है, आकाश, पेड़-पौधे और पत्नी-प्रेयसी का प्रेम भी है। नारी के प्रति कवि की चेतना का कोई महान भाव-चिन्तन है चाहे कोई स्त्री हो, कोई लड़की या अपने घर-परिवार की महिलाएं। अधिकांश कविताएँ कवि के अपने जीवन के स्वानुभव या अपना भोगा हुआ यथार्थ है। हिन्दी के साथ भोजपुरी, उर्दू, अंग्रेजी के शब्द हैं। भाषा-शैली प्रभावित करती है। प्रकाशन सम्बन्धी कुछ समस्याएँ हैं। कुल मिलाकर संग्रह प्रभावशाली है। रामदरश मिश्र जी की पंक्तियाँ इस संग्रह के लिए सटीक हैं, उन्होंने लिखा है-कथ्य और कथन की ताजगी भरी इन कविताओं में, देश, परिवार और गाँव के अनेक रूपों का बहुत सहज और प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

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