व्याख्यान: दिग्गज कथाकार शैलेश मटियानी - कुछ यादें और मुलाकातें

प्रकाश मनु

(19 जनवरी 2023 को शैलेश मटियानी जी पर केंद्रित साहित्य अकादेमी कार्यक्रम में दिया गया व्याख्यान)

आदरणीय भाई पंकज बिष्ट जी, प्रिय भाई अनुपम जी, हरिसुमन बिष्ट जी, हरेंद्र सिंह असवाल जी, राजकुमार गौतम जी तथा यहाँ उपस्थित सज्जनो, मित्रो!

मटियानी जी अद्भुत कथाकार हैं। बीसवीं सदी के दिग्गज कथाकार, आधुनिक कहानी के समूचे परिदृश्य में जिनकी उपस्थिति एक रोमांच की तरह महसूस होती है। इसलिए कि मटियानी जी केवल एक बड़े और सिद्ध कहानीकार ही नहीं, वे खुद में एक कहानी भी हैं। दिशाओं में गूँज और थरथराहट भर देने वाली एक ऐसी महाकाय कहानी, जिसके जितना अधिक पास जाओ, जितने अधिक करीब से पढ़ो, उसका होना, उसका बड़प्पन, उसकी महत्ता और काल से होड़ लेने की उसकी अजेय सामर्थ्य उतनी ही अधिक महसूस होती है।
हिंदी कहानी के परिदृश्य में मटियानी केवल मटियानी हैं। और दूर-दूर तक कोई ऐसा शख्स नहीं, जिससे उनकी तुलना हो सकती हो। मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु। नहीं, कोई नहीं। और ठीक यही बात मटियानी जी की कहानियों के लिए कही जा सकती है। मटियानी जी की कहानियाँ एक तरह की महाप्राणत्व लय वाली कहानियाँ हैं, जिनकी साँस आसानी से नहीं चुकती और जो पाठक को एक तरह की गहरी भाव तन्मयता की हालत में पहुँचा देती हैं।

लोक संस्कृति के गर्भ से वे जन्म लेती हैं और ऊपर उठते-उठते वे वहाँ आ जाती हैं, जहाँ उनमें शास्त्रीय रागों जैसा कोई गहरा आलाप सा सुनाई देने लगता है। कहानी आप पढ़कर रख देते हैं, पर वह कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। आपको जीवन भर उसमें से शास्त्रीय रागों सरीखा आलाप और गहरी पुकार सुनाई देती है, जिसके साथ ही उसकी नई-नई अर्थ-छवियाँ आपकी स्मृति में छलछलाने लगती हैं।

शैलेश मटियानी
आप चकित होते हैं, यह कैसी कहानी है, जो कहीं खत्म ही नहीं होती, कभी खत्म ही नहीं होती। और आपके भीतर से जवाब आता है, हाँ, ये मटियानी जी की कहानियाँ हैं। और मटियानी जी की कहानियाँ ऐसी ही कहानियाँ हैं, जो अपने साथ एक तरह का अमरत्व लेकर आती हैं। वे सच ही हिंदी की अमर कहानियाँ हैं।

और यही वजह है कि अगर आपको ‘छाक’ या ‘अर्धांगनी’, या ‘चील’, ‘मिट्टी’, ‘अहिंसा’, ‘इब्बू मलंग’, ‘गोपुली गफूरन’, ‘सवित्तरी’, ‘दो दुखों का एक सुख’ और ‘माता’ सरीखी कहानियाँ पढ़नी हैं, तो आपको मटियानी के पास आना ही होगा। हिंदी में एक से बड़े कथाकार हैं। पर मटियानी जो बड़ी प्राणशक्ति वाली कहानियाँ लिखते थे, उन्हें लिख पाने की सामर्थ्य ईश्वर ने सिर्फ उन्हीं को दी थी। इसलिए उनके बगैर कहानी का कैनवास आज कुछ अधूरा, खाली-खाली और उदास लगता है।

प्रकाश मनु
और सिर्फ कहानियाँ ही क्यों? हिंदी में ‘मुठभेड़’ और ‘वावन नदियों का संगम’ जैसे लंबी बहस से जुड़े दुस्साहसी उपन्यास भला किसने लिखे हैं? ‘बोरीवली से बोरीबंदर तक’, ‘भागे हुए लोग’, ‘चंद औरतों का शहर’, ‘माया सरोवर’, ‘आकाश कितना अनंत है’, ‘कबूतरखाना’, ‘हौलदार’, ‘मुख सरोवर के हंस’, ‘बर्फ गिर चुकने के बाद’—हर उपन्यास मटियानी जी की जी हुई जिंदगी की अलग-अलग इबारत। इन्हें पढ़कर मटियानी जी के बड़े विरल किस्म के अनुभव और जीवन संघर्ष ही नहीं, पूरी की पूरी आत्मकथा भी किसी चलचित्र की तरह आँखों के आगे आ जाती है।

शैलेश मटियानी
मटियानी जी ने एक लंबी बातचीत में मुझसे कहा था, “मनु, मैं प्रेमचंद के बाद खुद को हिंदी का सबसे बड़ा कहानीकार मानता हूँ।” कहते समय उनकी आँखों में जो गहरा-गहरा सा आत्मविश्वास था, उसे मैं देखता रह गया था। मैंने मटियानी जी को पढ़ा था और खुद मटियानी जी के जीवन की खुली किताब को भी बड़े नजदीक से हर्फ-दर-हर्फ पढ़ा था। इसलिए समझ सकता था कि उनके शब्दों के पीछे जीवन भर की कैसी कठिन तपस्या, लंबी सफरिंग, हड्डियों तक को कँपाने वाला जीवन संघर्ष और अनवरत लडाइयाँ थीं, जिनका वे हर क्षण सामना कर रहे थे, और लिख रहे थे। सब कुछ के बावजूद लिखना, लिखना और बस लिखना...! इसी ने उनकी कलम को अजेय बनाया और ऐसी सामर्थ्य दी कि हजारों पाठकों के दिलों पर उन्होंने राज किया, और आज भी कर रहे हैं।

इस महादेश का कोई ऐसा शहर, कोई ऐसा कसबा नहीं है, जहाँ आप मटियानी जी का नाम लें और दर्जनों लोग आगे न आ जाएँ, कि ‘अच्छा-अच्छा, मटियानी जी! मैंने उन्हें पढ़ा है, बड़े अद्भुत कहानीकार हैं। ऐसी कहानियाँ तो कोई नहीं लिखता, जैसी मटियानी जी के यहाँ पढ़ने को मिलती हैं!’
*

मैं बहुत लेखकों से मिला हूँ। पर बहुत कम लेखक ऐसे मिले, जो पहली बार में ही छा जाते हैं और आप उनके साथ-साथ बहने लगते हैं। और यह बहना जिंदगी भर रुकता नहीं है। वह आपके बस में ही नहीं होता। इसलिए कि उनका साथ किसी गाढ़े रस के झरने सा होता है। गहरा नशा! मटियानी जी ऐसे ही थे। उनसे जब पहली दफा मिला, तभी से उनका जादू मुझ पर तारी हो गया था।

शैलेश मटियानी
‘हंस’ के दफ्तर में राजेंद्र यादव जी ने उनसे परिचय करवाया था, “आप जानते हैं इन्हें...? शैलेश मटियानी!”

और वहाँ कुछ देर बातें हुई थीं, पर ऐसी बातें, जो दिल पर गहरे नक्श हो जाती हैं। वे चंद बातें अपनी मौज में जीने वाले हिंदी के सबसे औघड़ और फकीर लेखक सत्यार्थी जी को लेकर हुई थीं, तो फिर उनमें किस्से-कहानियों वाला पुट, अद्भुत-रस का मेल और मजेदारी न होती, यह भला कैसे हो सकता था? फिर लोकगीतों के ऐसे अलबेले मगर भुला दिए गए दरवेश पर मैंने किताब निकाली थी, यह खुद में किसी अजब किस्से-कहानी से कम न था। मटियानी जी को मैं शायद इसीलिए कुछ भा गया। और मैंने तो मटियानी जी को इतना पढ़ा था कि उन सरीखे उस्ताद किस्सागो से बतिया लेना ही मेरे लिए किसी गाढ़े नशे या सरूर से कम न था।

बातों-बातों में उन्होंने पूछा, “आप कहाँ हैं?” और जब मैंने हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रिका ‘नंदन’ का जिक्र किया, तो बोले, “मैं कभी आऊँगा। आप पुस्तक की एक प्रति मेरे लिए रख लें।”

मटियानी जी ने कहा और मैंने सुन लिया—परम आनंद भाव से। पर वे आएँगे मुझ जैसे मामूली लेखक से मिलने, मेरे लिए तो यह कल्पना ही मुश्किल थी। लगभग असंभव! पर वे आए—अपने लहीम-शहीम व्यक्तित्व और अपार जिंदादिली के साथ—  और उस पहली खुली मुलाकात में ही इतनी ढेर-ढेर सी बातें हुईं कि बरसों बाद भी वह रसमग्न कर देने वाली पूरी फिल्म मैं दिल के परदे पर फिर से देख सकता हूँ, जिसमें मटियानी जी की निजी जिंदगी के बेढब सफर, विलक्षण लेखकीय शख्सियत और अजीबोगरीब जिदों से लेकर दुनिया जहान की बातें हुई थीं और मैं भूल गया था कि दफ्तर बंद होने के बाद मुझे घर भी जाना है।

मटियानी जी दीर्घसूत्री हैं, मगर अपन राम भी क्या कुछ कम हैं! अलबत्ता जब बातों के आसमान में उन्मुक्त उड़ानें भरते बहुत देर हो गई तो मटियानी जी ने हलके से डाँटा, “सिर्फ बातें ही करते रहोगे या चाय भी पिलाओगे?”

“ओह, चाय...!” मैं बड़ा शर्मिंदा हुआ। अभी तक तो उनके साथ जुड़ी तमाम-तमाम बातों, उत्तेजक बहसों, गोष्ठी-समारोहों और अखबारी पन्नों पर उनकी ‘युद्धं देहि’ वाली मुद्रा के हलचल भरे प्रसंगों और किस्म-किस्म के अद्भुत रस वाले किस्से-कहानियों से गुजरता हुआ मैं भूल ही गया था मैं भी इसी धरती का प्राणी हूँ, और धरती के प्राणी जब देर तक काम या बातें करते-करते थक जाते हैं तो चाय भी पीते हैं।

अलबत्ता चाय आई और मस्ती से गपशप, ठहाकों पर ठहाके लगाते हुए चाय पी गई। चाय की चुस्कियों के साथ फिर जैसा कि होना ही था, साहित्य की किस्से-कहानियों से भी बढ़कर रंग और रसमयी दुनिया के चरचे और चरखे चल निकले। लगा कि मटियानी जी के साथ मैं एक अंतहीन साहित्यिक सफर में हूँ। 

अजब सुरूर से भरा दिन था, जब साहित्य किताबों और कागजों से निकलकर खून में दौड़ने लगा था। और मुझे गालिब याद आने लगे थे, “रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं काइल, जब आँख ही से न टपके तो लहू क्या है...”

उस दिन मटियानी गए तो ऐसा गहरा नशा छोड़कर कि सच्ची कहूँ तो आज तक वह उतरा नहीं है और हर दिन उसका रस कुछ और गहरा ही होता जाता है।

खैर, उस दिन तो जैसे-तैसे घर पहुँचा, पर फिर हफ्ते-दस दिन बाद मटियानी जी फिर मौजूद और पिछली बार से लेकर अब तक जो कुछ गुजरा, अपनी जीवन-कथा का हर्फ-हर्फ बता देने को इस कदर आतुर कि मैं फिर भूल गया कि एक दफ्तर भी होता है और उसका बंद होने का समय भी होता है। जब पीयन ने बार-बार संकेत से सूचना दी कि गेट बंद करने का समय हो गया है तो बेमन से मैंने बस्ता उठाया, मटियानी जी ने अपना बैग, और हमारे कदम हिंदुस्तान टाइम्स की कैंटीन की ओर बढ़ चले, जिसके बंद होने का कोई चक्कर नहीं था।

मगर जब बातों में से बातों के ऐसे सुर निकले कि चारों ओर गहरा अँधेरा सा पसर गया, तो मुझे घर याद आया। फरीदाबाद की आखिरी गाड़ी के छूटने में कुछ ही समय था। “मटियानी जी, अब तो मुश्किल...!” मैंने लाचारी से कहा। मेरे चेहरे पर अब एक घरेलू प्राणी के भय की दस्तक थी। और फिर मैं और मटियानी जी उठे, बेमन से।

मटियानी जी ने ऑटो पकड़ा और मैं जैसे-तैसे भागते-दौड़ते स्टेशन पहुँचा तो पता चला कि आखिरी गाड़ी निकल चुकी है। अब टुकड़ों-टुकड़ों में कई बसें पकड़कर घर जाना था। और चूँकि उस समय मोबाइल तो छोड़िए, फोन तक भी न था तो मन में विचारों का यह अंधड़ लग चल निकला कि ओह, घर पर सुनीता परेशान होगी।

मुझे पता था कि रात को देर होने पर उसे बस एक की खयाल आता है कि मैं कहीं दुर्घटनागस्त होकर सड़क पर पड़ा हूँ...और मेरे चारों तरफ रोशनियाँ उगलती गाड़ियाँ भागी जा रही हैं। उसे लगता है, मेरे जैसे लापरहवाह का और भला हो भी क्या सकता है? और यहाँ तक कि सही-सलामत घर आ जाने पर भी उसे विश्वास नहीं होता कि मैं ठीक-ठाक हूँ और बड़ी देर बाद वह सहज हो पाती है।

पर गनीमत यही कि खतरे की घंटी देख, घर आते ही मैंने मटियानी जी के एक से एक दिलचस्प किस्से छेड़े तो उसे सहज होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। वैसे भी वह मटियानी जी की कहानियों की घोर प्रशंसक है, और अकसर कह उठती है, “हिंदी में दांपत्य प्रेम की जैसी अद्भुत कहानियाँ मटियानी जी ने लिखी हैं, वैसी कोई और नहीं लिख सका!”

उन्हीं मटियानी जी से मैं मिलकर आया हूँ, यह उसके लिए बड़ी असाधारण बात थी।
*

मनु, मैं तुम्हें इंटरव्यू दूँगा

मगर अब यह जल्दी-जल्दी होने लगा। बीच में मटियानी जी ने मेरे दो इंटरव्यू पढ़ लिए। एक में डॉ. रामविलास शर्मा से लंबी बातचीत थी और दूसरे में कमलेवर से। बस, मटियानी जी मेरे इंटरव्यूज के कुछ ऐसे कायल हो गए कि उन्हें लगा, ऐसे इंटरव्यू तो पूरे हिंदी साहित्य में कोई और नहीं कर सकता। बोले, “मनु, मैं तुम्हें इंटरव्यू दूँगा। बरसों पहले कमलेश्वर ने ‘सारिका’ से एक लेखक को भेजा था। वे भले सज्जन थे, मेरे घर बहुत दिन डेरा डाले रहे। पर इंटरव्यू देने का मूड नहीं बना।...मैंने तुम्हारे इंटरव्यू पढ़े हैं, तुम इंटरव्यू अच्छा लेते हो। थोड़ी फुरसत मिले तो मैं पूरा एक हफ्ता तुम्हारे घर आकर रुकूँगा। सात दिन हम सात विषय तय करके उस पर बात करेंगे। पूरी बातचीत रिकार्ड होगी। फिर वह किताब की शक्ल में आएगी। उस पर दोनों का नाम जाएगा। और हाँ—रॉयल्टी आधी-आधी!”

अब मुई रॉयल्टी की तो मुझे क्या परवाह थी? वे आधी नहीं, भले ही पूरी ले लें। पर हाँ, उनकी जो अफरातफरी वाली हालत थी, जिसमें मैं हमेशा उन्हें कहीं न कहीं तेजी में आते-जाते, बल्कि कहना चाहिए, भागते ही देखता था और भागते-भागते ही हमारी बातें होती थीं, उसमें यकीन नहीं आता था कि पूरा एक हफ्ता वे हमारे घर आकर रुकेंगे और बात हो पाएगी।

तो फिर मैंने तरीका यह निकाला कि हर बार जब वे आते तो मैं उनकी जीवन-कथा का कोई खास प्रसंग छेड़ देता और मटियानी जी लीन होकर सुनाते तो मैं मन के टेप पर पूरी बातचीत रिकार्ड कर लेता और दिन में कई-कई बार रिवाइंड करके पक्का करता जाता।

इस बीच मटियानी जी अपनी सारी नई-पुरानी किताबें मुझे दे गए। कुछ अरसा पहले उन्होंने ‘विकल्प’ और ‘जनपक्ष’ पत्रिकाएँ निकाली थीं, जिनकी खासी धूम रही थी। उनकी पुरानी फाइलें भी मुझे देना वे नहीं भूले। और यही नहीं, अपने जीवन में घटी एक से एक छोटी-बड़ी बात भी जैसे वे मुझे बता देना चाहते थे। पता नहीं, कैसे उन्हें यकीन हो गया था कि जो कुछ वे मुझे बता देंगे, वह रह जाएगा और कहीं न कहीं दर्ज होगा। उनकी अनकही कहानी अनकही न रहेगी।

उधर मटियानी जी के जीवन में पिछले कुछ बरसों में ऐसी भागमभाग थी, जिसे ठीक-ठीक समझना किसी के लिए भी मुश्किल था। मैं कुछ-कुछ अंदाजा लगा पा रहा था। लेकिन मैंने उन्हें पूरी तरह समझ लिया था, यह तो कैसे कहूँ? वे लगभग बदहवास हो चले थे। पूछने पर हमेशा उनका एक ही जवाब मिलता, ''मनु, मैं जीवित कैसे हूँ, यह खुद मेरी समझ में नहीं आता। कायदे से तो जो परिस्थितियाँ हैं, उनमें मुझे जीवित नहीं होना चाहिए था!...’’

सुनकर जी धक से रह जाता। और फिर एक के बाद एक हादसे। उनमें सबसे घातक और मर्मांतक घटना थी, उनके पुत्र की क्रूरतापूर्ण हत्या। जैसे देखते ही देखते उनके जीवन में प्रलय आ गई हो। कुछ दिनों बाद मटियानी दिल्ली आए तो उन्होंने मुझे दरियागंज में किसी जगह बुलाया। पूरे एक घंटे वे मेरे सामने बैठे रहे। न उन्होंने कुछ कहा, न मुझसे कुछ कहा गया। फिर बोले, “मनु, अब तुम जाओ। आज मैं कुछ बात नहीं कर पाऊँगा।”

इस बीच उनके आर्थिक कष्ट और बढ़े ही! कुछ समय बाद केड़िया का एक लाख रुपए का पुरस्कार उन्हें मिला, तो यह खुशी थी कि आंशिक रूप से ही सही, अब उनके आर्थिक कष्टों का कुछ अंत होगा। लेकिन इसके साथ ही जो खबर मिली, वह कलेजा चीर देने वाली थी। पता चला कि मटियानी जी विक्षिप्त हो चुके हैं, इसलिए खुद पुरस्कार लेने भी नहीं आ सके! ... सुनकर मैं सन्न रह गया। हा हंत! मटियानी जी की यह हालत? इस आदमी के दारुण कष्टों का कोई अंत नहीं।

लगा कि अब तो उनसे मिल पाना भी शायद मुश्किल होगा। कभी बात हो सकेगी, इसका तो कतई यकीन ही नहीं था। और जाने कब से आगे खिसकते जा रहे इंटरव्यू की बात तो अब सोची भी नहीं जा सकती थी। … असंभव!
*

मनु, मैं मटियानी बोल रहा हूँ

मेरे जीवन के ये सबसे दुखी और उजाड़ दिन थे। और इन्हीं दुखी और उजाड़ दिनों में अचानक फिर फोन पर मटियानी जी की की लरजती हुई आवाज, “मनु मैं मटियानी बोल रहा हूँ।”

यह तीन अक्तूबर, 1996 की बात है, जब कोई सवा साल के एक लंबे और दाहपूर्ण अंतराल के बाद चिर परिचित लहजे में मटियानी जी का फोन आया, ''मनु, मैं मटियानी बोल रहा हूँ...!’’ सुनते ही जैसे मैं सुख-दुख की एक अजीब लहर में समा गया।

“अरे, मटियानी जी आप...? आप मटियानी जी, ठीक हैं ना!” मुझे यकीन नहीं हो रहा था मटियानी कैसे हो सकते हैं? उनके बारे में तो यह-वह और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है। तो फिर...?

डरते-डरते उनसे मिलने गया तो उनकी बातचीत या व्यवहार में मुझे कहीं कोई असमान्यता नहीं दिखाई दी। न कहीं स्मृति-लोप, न भाषा की असावधानी, न किसी और तरह की असामान्यता।

पता चला कि वे पिछले एक महीने से इलाज के लिए गोविंद बल्लभ पंत हॉस्पीटल में हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने बारीक से बारीक विवरण के साथ पिछले सवा साल की यातनाओं का पूरा वृत्तांत सुनाया। यह इतना दर्दनाक और एक साथ ही इतना मुकम्मल था कि मैं पूरा हिल गया। इसके बाद तो अस्पताल में ही उनसे कई मुलाकातें हुईं। अपनी गहरी मानसिक यातनाओं के बावजूद हर दफा वे मुझे सजग और सचेत लगे। यहाँ तक मेरे आग्रह पर उन्होंने डायरी के पन्ने लिखने शुरू किए और उन्नीस पन्ने लिखे भी।

एक दिन उन्होंने हल्द्वानी आने का निमंत्रण दिया। बोले, ''चाहो तो मनु, तुम अब वह इंटरव्यू ले सकते हो।’’ और इस बात के लिए मान गए कि मैं चाहूँ तो अस्पताल में भी बातचीत हो सकती है। यों भी अस्पताल में उनसे लगातार मिलते हुए एक महीना हो गया था और महीने भर में टुकड़ों-टुकड़ों में इतनी बातें हुई थी कि आगे की बातचीत के लिए कुछ-कुछ भूमिका बन गई थी।

और फिर गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में ही मटियानी जी से हुआ वह लंबा और यादगार इंटरव्यू, जिसमें उनकी जीवन कथा के तमाम अनकहे पृष्ठ खुले। इस इंटरव्यू के महत्त्वपूर्ण अंशों को मटियानी जी के निधन पर हिंदी की दर्जनों पत्रिकाओं ने बड़े सम्मान के साथ छापा। यह पूरा इंटरव्यू शेखर पाठक जी द्वारा संपादित ‘पहाड़’ पत्रिका के शैलेश मटियानी विशेषांक में छपा, और उस पर पूरे देश से पाठकों और लेखकों की इतनी प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ मिलीं कि मैं अभिभूत था।

मटियानी जी को चाहने वाले कहाँ-कहाँ हैं और वे उन्हें किस कदर प्यार करते हैं, यह मैं पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा था।
*

मटियानी जी जिस लंबी, असाध्य बीमारी की चपेट में आ गए थे, वह आखिर उन्हें साथ लेकर ही गई। पर उन्होंने इतनी अमर और कालजयी कृतियाँ हिंदी को दी हैं कि उनका यह कहना जरा भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं लगता कि “मनु, मैं प्रेमचंद के बाद खुद को हिंदी का सबसे बड़ा कहानीकार मानता हूँ।”

मुझे याद है, हिंदी भवन में हुई मटियानी जी की शोकसभा में हिंदी के कुछ जाने-माने आलोचक भी थे, जिन्होंने बड़ी शर्मिंदगी के साथ कहा कि मटियानी जी सरीखे जनता के दुख-दर्द से जुड़े बड़े कहानीकार पर उन्होंने आज तक एक शब्द भी नहीं लिखा। पर अब वे उन्हे गंभीरता से पढ़ेंगे और उन पर लिखेंगे भी।...पर उन स्वनामधन्य आलोचकों ने ‘इब्बूमलंग’, 'चील’, 'दो दुखों का एक सुख’, 'अहिंसा’, ‘छाक’, 'माता’, 'अर्धांगिनी’ सरीखी जनता के सुख-दुख से जुड़ी अमर कहानियाँ लिखने वालों के लिए अपनी स्याही की एक बूँद बरबाद करना भी उचित नहीं समझा।

शायद इसलिए कि मटियानी अपनी जिद में जीने वाले स्वाभिमानी लेखक थे और किसी बड़े से बड़े तुर्रम खाँ की जी-हुजूरी करने से उन्हें नफरत थी। भले ही वह शख्स हिंदी का कोई बड़ा स्वनामधन्य आलोचक क्यों न हो।
*

पर मटियानी मामूली कथाकार नहीं हैं। कभी बाबा नागार्जुन ने बड़े प्यार से कहा था, शैलेश मटियानी हिंदी कहानी के गोर्की हैं। पर मुझे लगता है, मटियानी जी एक साथ हिंदी के गोर्की भी थे, और चेखव भी। उनकी कहानियों में गोर्की सरीखी जमीनी हकीकत और तलछट की सच्चाइयाँ हैं, तो चेखव सरीखी महाप्राण लय भी, जिसे आलोचकों से ज्यादा उनके पाठकों ने समझा था। और यही वजह है कि उन्हें अपने पाठकों का बेइंतिहा प्यार मिला था।

मटियानी जी के पास जितनी उम्दा और हर लिहाज से प्रथम श्रेणी की रचनाएँ हैं, उतनी प्रेमचंद के बाद शायद ही किसी हिंदी कथाकार के यहाँ देखने को मिलें। इसी तरह हिंदी कथा-साहित्य में रेणु जी की आंचलिकता की बहुत तारीफ होती है, होनी भी चाहिए। लेकिन जैसा कि राजेंद्र यादव जी ने भी कहा, हिंदी के आंचलिकता की शुरुआत बहुत पहले मटियानी जी अपनी कहानियों और उपन्यासों में कर चुके थे।

मटियानी जी हिंदी के बड़े और दिग्गज कथाकार ही नहीं, हिंदी कथा-साहित्य के शलाका-पुरुष हैं, जिनसे हिंदी कहानी का कद और ऊँचाई नापी जा सकती है। उनकी कहानियाँ एक बार पढ़ते ही पाठकों के दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए घर बना लेती हैं और रोशनी के कतरों की तरह भीतर जगमगाहट पैदा करते हुए हमारी आस्था को संबल प्रदान करती हैं। किसी लेखक की इससे बड़ी शक्ति और अमरता भला और क्या हो सकती है!
***

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: + 91 981 060 2327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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