कहानी: सैनिक की स्मृति में

सुषमा मुनींद्र

- सुषमा मुनीन्द्र

आज चौदह दिसम्बर है।
शीत वितरित कर रहा शीतोष्ण दिन।
इस दिन रोहिणी प्रसाद शहीद हुआ था। रोहिणी प्रसाद के पचासी का आँकड़ा पार कर गये, स्मृति और श्रवण शक्ति को पचास फीसदी खो चुके वयोवृद्ध पिता गदाधर प्रसाद बहुत कुछ से प्रयोजन नहीं रखते। बहुत कुछ भूलने लगे हैं। यहाँ तक कि बलिदान वर्ष कुछ का कुछ बता देते हैं पर चौदह दिसम्बर की तिथि उन्हें हर वर्ष ठीक मौके पर याद हो आती है। रोहिणी प्रसाद के पुत्र रामायण प्रसाद जो चौदह दिसम्बर उन्नीस सौ इकहत्तर को भारत-पाक युद्ध में जब रोहिणी देश के लिये बलिदान हो रहा था तब यह गर्भ काल का पाँचवाँ माह पूरा कर रहा था, को पूर्व सन्ध्या पर समझा देते हैं ठीक सुबह विजय स्तम्भ को धो-पोंछ कर रंग-रोगन से चमकाना है। रोहिणी प्रसाद की स्मृति में बने विजय स्तम्भ को गदाधर प्रसाद अपनी कुशल देख-रेख में पुतइया से पुतवाते थे कि पुतइया अपने सिद्ध हाथों से खूबी के साथ रंग-रोगन कर विजय स्तम्भ को नवीनता प्रदान करेगा। लेकिन उन्हें लगता वे जिस तरह उम्मीद करते हैं पुतइया उस स्नेह, कोमलता, सावधानी से पेण्ट नहीं करता है। जल्दबाजी में ब्रश फेर, मेहनताना ले सटक जाना चाहता है। वे भावुकता में नहीं समझना चाहते थे विजय स्तम्भ उनके लिये रोहिणी प्रसाद से जुड़ा स्मृति पुंज है जबकि पुतइया के लिये कमाई करने का एक लक्ष्य। मानव मनोविज्ञान विचित्र होता है। हम जीवित व्यक्ति से उतना जुड़ाव नहीं रखते हैं जितना दिवंगत से जुड़ते जाते हैं। दिवंगत से जुड़ी प्रत्येक वस्तु और पदार्थ दिवंगत के होने का एहसास कराता है। फिर यह तो विजय स्तम्भ है। श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक । अगले वर्ष से गदाधर प्रसाद स्वयं विजय स्तम्भ को पोतने लगे। फिर रामायण प्रसाद के काबिल होते ही उसे दायित्व सौंप दिया 
“रामायण, तुम बड़े हो गये हो। विजय स्तम्भ की पुताई कर दिया करो।”
“हौ दद्दा।”
दद्दा के साथ विजय स्तम्भ पर आते-जाते अपने पिता के हैरतअंगेज प्रसंग सुनते बयालीस वर्षीय रामायण के सपनों, कल्पनाओं, विचारों में विजय स्तम्भ ऐसा प्रभावी हो गया है कि पिता की तरह लगने लगा है।
चौदह दिसम्बर।
दद्दा लाठी थाम कर तैयार हैं।
“रामायन, जयपाल को बुलाओ। विजय स्तम्भ चलना है।” रामायण चाहता है दद्दा न जायें पर जानता है जर्जर अवस्था के कारण घर से न निकलने वाले दद्दा विजय स्तम्भ पर जाये बिना नहीं मानेंगे।
“हौ दद्दा।”
रामायण प्रसाद ठीक बगल के घर में गया “चाचा।” ओसारी के बाँयी ओर वाली कोठरी में खटिया में धॅंसे जयपाल चाचा बीड़ी पी रहे थे। रामायण का स्वर सुन सक्रिय हो गये। यही है जो सुध-बुध पूछ लेता है। उनका पूत रामफल तो निकट नहीं फटकता।
“आओ रामायण, मैं इंतजार कर रहा था।”
रामायण को जयपाल चाचा अच्छे लगते हैं। इनकी बातों में अक्सर उसके पिता होते हैं। वह कोठरी में आ गया -
“चाचा बीड़ी पीकर तुम खुद को फूँक रहे हो।”
“ये बीड़ी और बैसाखी ही वैतरणी पार करायेगी बेटा।”
चाचा का शीश निराश होकर भले ही झुका रहता है पर आवाज ऊॅंची रहती है। फौजी की तरह पूरा स्वर खोल कर तेज आवाज में बोलते हैं। तेज आवाज में कही गई वैतरणी पार करायेगी वाली बात आँगन में हाथ धो रहे रामफल तक पहुँच गई। अजीब सी भाव मुद्रा में एकाएक प्रकट हो गया -
“रामायण तुम्हें इनकी व्यथा सुनने का शौक है, इन्हें सुनाने का। बैसाखी खटखटाते दिन भर ऑंगन में हाँका लगाये रहते हैं। कभी पानी चाहिये, कभी चाय, कभी खाना, कभी बीड़ी। शहर में अकेले मुझे परेशानी होती है लेकिन ये नहीं समझते। अपने परिवार (पत्नी-बच्चों) को शहर ले जाऊॅं तो पूरा गाँव हॅंसेगा बाप को अकेले छोड़ दिया। ये अपनी जड़ों को छोड़ कर शहर जाना नहीं चाहते। ये जड़ें ऐसी फाँसी हैं कि “रामफल की वाणी सुन जयपाल का झुका सिर अधिक झुक गया। रामायण प्रसाद भ्रमित होकर जयपाल को देखता है और रामफल को । उसके पिता रोहिणी प्रसाद कैसे दिखते थे इस विचार ने उसे बार-बार आकुल किया है। रामफल कितना निर्मम है। पिता के परिवार में जन्म लेने वाले बच्चे किस तरह खुद का एक अलग परिवार बना लेते हैं। उनके अलग परिवार में उस पिता के लिये जगह नहीं होती जिसके परिवार में जन्मे हैं। 
“रामफल, चाचा समर्थ होते तो कुछ काम करते। लाचार होकर घर में न पड़े रहते।”
“समझाना सरल है रामायण, निभाना कठिन। तुम्हारे ऊपर बोझ पड़ता तो जानते। इस महंगाई में अपने परिवार का बोझ उठाया नहीं जाता और ... रोहिणी चाचा नेक थे। शहीद होकर खजुरी (गाँव) का नाम ऊॅंचा कर गये।” उन्नीस सौ इकहत्तर के भारत-पाक युद्ध में दाँया पैर खो चुके चाचा के पास बच निकलने का एक ही उपाय है। बैसाखी उठा कर दो-चार घंटे के लिये घर से टल जाते हैं।
“चलो रामायण। दद्दा इंतजार करते होंगे।”
बैसाखी पर झूलते चाचा, रामायण को निरीह लगते हैं। उनकी असहायता पर रामायण की अम्मा कई बार कह चुकी है -
“रामायण, तुम्हारे बाबू शहीद हो गये थे। इलाज करा कर जयपाल भाई एक पैर पर झूलते वापस आ गये थे। उन्हें जिंदा देख उनके घर के लोग बहुत खुस थे। कहते थे हमारे भाग्ग से जिंदा लौटे हैं। मैं बहुत रोती थी। बेटा, दुःखी इंसान पता नहीं का, का सोचता है। मैं सोचती थी तुम्हारे बाबू एक पैर पर झूलते लौटते और जयपाल भाई शहीद। अब देखती हूँ इनका जीवन, मौत से भी बुरा है। न तरीके से खाना मिलता है न साफ कपड़े।”
मानव मनोविज्ञान विचित्र होता है। मरे हुये व्यक्ति के लिये जो श्रद्धा, करुणा, प्रेम भाव होता है, जीवित के लिये नहीं होता। मरा हुआ व्यक्ति न किसी का अपमान करता है, न क्षति पहुँचाता है, न व्यवधान डालता है, न हक माँगता है। प्रतिस्पर्धा से बाहर होकर सहज ही सबका स्नेह, सम्मान बटोर लेता है। उसकी सुधियाँ, जीवित की उपस्थिति से अधिक प्रभावी हो जाती हैं।
रामायण बाइक को चौगान में ले आया। दद्दा को बीच में बैठाया गया। जयपाल पीछे बैठे। खजुरी के कच्चे-सकरे तीन किलोमीटर लम्बे पथ की दूरी तय कर तीनों विजय स्तम्भ के ठीक सामने उतरे। मुख्य पथ और खजुरी के पहुँच मार्ग को जोड़ने वाले मोड़ पर तत्कालीन विधायक द्वारा निर्मित हुआ विजय स्तम्भ उन्नत खड़ा है। आयताकार चबूतरा। उस पर निर्मित रामायण के ऊॅंचे कंधों तक की ऊॅंचाई लिये स्तम्भ। स्तम्भ के ऊपर फुटबाल की आकृति का गोल गुम्बद। पीले रंग से पुते विजय स्तम्भ में लाल सुवाच्य अक्षर - विजय स्तम्भ - अमर बलिदानी सैनिक रोहिणी प्रसाद, ग्राम - खजुरी, बलिदान दिवस चौदह दिसम्बर, उन्नीस सौ इकहत्तर। स्थान चयन दद्दा ने किया था। मुख्य पथ से गुजरने वाले राही रोहिणी प्रसाद की गौरव गाथा पढ़ेंगे। श्रद्धानवत होंगे। कृषक-ग्रामीण दद्दा नहीं सोच पाते थे आते-जाते वाहन, विजय स्तम्भ को धूल-धूसरित करते हुये ऐसे सर्र से गुजर जायेंगे कि यात्रियों का ध्यान विजय स्तम्भ की ओर कतई स्थिर न हो पायेगा। कुछ लारियाँ यात्रियों को उतारने-चढ़ाने के लिये मोड़ पर रुकती हैं। ये यात्री कस्बा, जनपद अथवा अन्यत्र आने-जाने वाले खजुरी के निवासी हैं। विजय स्तम्भ को देखने के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि इन्हें मुख्य पथ के दोनों ओर लगे दरख्त, चाय-पान की इकलौती गुमटी, गुमटी के समीप बने बड़े इंदारे और विजय स्तम्भ में खास अंतर जान नहीं पड़ता। विजय स्तम्भ पर बैठ कर पक्षी बीट करते हैं। कुत्ते मूत्र विसर्जन। उपद्रवी किशोर कोयले से अश्लील जुमले लिखते हैं। दद्दा अब निर्बल हो हो गये हैं। पहले तीन किलोमीटर की दूरी उनके लिये दूरी नहीं थी। जब इच्छा होती अकेले, कभी रामायण को लेकर पैदल विजय स्तम्भ तक आते थे। कंधे पर पड़े अंगोछे से विजय स्तम्भ की गर्द झाड़-पोंछ देते। अब घर से नहीं निकलते हैं। उन्हें खजुरी के घर-गली कभी याद रहते हैं, कभी भूल जाते हैं।
रामायण प्रसाद झोले से पुताई की सामग्री निकालने लगा। बैसाखी पर झूलते जयपाल और लाठी टेकते दद्दा विजय स्तम्भ को चौगिर्द घूम-घूम कर देखने लगे। किसी ने विजय स्तम्भ पर पान की पीक थूँक कर पच्चीकारी कर दी थी। दद्दा का मस्तक गरमा गया। गुमटी में जमा कुल पाँच लोगों को रोष व्यक्त करती वाणी में ललकारने लगे -
“कउन थूँका हिंया? कउन आँधर (अंधा) हय? आप लोग शहीद का आदर न करो पर थूँको नहीं। विजय स्तम्भ आप लोगन का कुछ नहीं बिगाड़ता।”
लोगों ने एकाएक दद्दा को अचरज से देखा। फिर समीप आकर विजय स्तम्भ पर पड़ी पीक को अचरज से देखा। अनभिज्ञता जाहिर की।
रामायण ने दद्दा को उत्तेजित होने से रोका “दद्दा यह किसी नामी-गिरामी नेता की समाधि नहीं है कि सरकार सुरक्षा का प्रबंध करे। आदमी थूँकेंगे, कुत्ते मूतेंगे। नहीं रोक पाओगे।” 
दद्दा, रामायण की बात नहीं सुन सके। अपने अनुसार बोलते रहे “मैं मूरख था जो विधायकजी को विजय स्तम्भ के लिये यह अस्थान बताया। घर के सामने बनवाता तो किसी की मजाल न होती थूँकने की। तब खजुरी का बच्चा-बच्चा रोहिणी के साहस का किस्सा सुनता था। अब लोग थूँक रहे हैं। रोहिनी का अपिमान कर रहे हैं।”
जयपाल ने सांत्वना पहुँचाती नजर दद्दा पर डाली - दद्दा, रामायण को अपना काम करने दो। तुम मेरे साथ यहाँ बैठो।”
जयपाल, बरगद के नीचे बैठ गये। रामायण ने थाम कर दद्दा को जयपाल के पास बैठा दिया। अंगोछा निकाल विजय स्तम्भ को झाड़ने-पोंछने लगा। रंग रोगन होते देख हर साल की तरह आस-पास से गुजरते दो-चार बच्चे वहाँ खड़े हो गये हैं। विजय स्तम्भ पर कुछ अलग होते देखना इनका मनोरंजन बन जाता है। स्मृति और श्रवण शक्ति खो रहे दद्दा अब चुप रहने लगे हैं। तब बच्चों को बताने लगते थे - 
“लड़को, खजुरी अमर सहीद रोहिनी प्रसाद का गाँव है। रोहिनी को सम्मान देने के लिये विधायकजी यह विजय स्तम्भ बनवाये हैं। इस सहीद के कारन हमारे देस ने पाकिस्तान को लड़ाई में हरा दिया था। यहाँ कोई कोइला से लिखे तो तुम समझाया करो बुरी बात है। सहीद का अपमान है।” 
बच्चों के हाव-भाव में नासमझी के भाव होते। दद्दा को अंतर न पड़ता कि बच्चे गम्भीर बातें सुनने के योग्य नहीं हुये हैं। रामायण प्रसाद आपत्ति करता “दद्दा, बच्चे तुम्हारी बातें नहीं समझते। हम लोगों को विजय स्तम्भ से जो लगाव है, दूसरों को नहीं होगा। बात मान लिया करो।”
दद्दा को रोहिणी के संदर्भ में बात करना और सुनना सुख देता है -
“बातें मनई (मनुष्य) को अमर बनाती हैं रामायन। इन्हीं में कोई बच्चा रोहिनी की बहादुरी को आगे वाली पीढ़ी को सुनायेगा। समझे न।”
दद्दा रोहिणी की बातें बार-बार इस तरह बताते थे जैसे पहली बार बता रहे हैं और सुनने वाले पहली बार सुन रहे हैं। अब शिथिल स्मृति और श्रवण शक्ति के कारण चुप रहते हैं या अपनी धुन में अविराम बहुत कुछ बोलते जाते हैं। इस समय पान की पीक देख ग्लानि से भरे हुये हैं। थरथराती आवाज में परिताप कहने लगे “हमारी मति खराब थी। रोहिनी को हम रोज ताना मारते थे गोकुल प्रसाद (रोहिणी प्रसाद का अग्रज) मास्टर हो गया लेकिन तुम बेकार बैठे हो। गोकुल को सराह (सराहना) कर मैं रोहिनी को अपिमानित करता था। जयपाल, वह दुःखी होकर तुम्हारे साथ फउज में भर्ती होने चला गया था अउर ...।” विजय स्तम्भ का रंग रोगन, दद्दा की आकुल दशा, जयपाल की बैसाखियाँ देख प्रसंग जानने की लोगों की सहज जिज्ञासा होने लगी। किसी ने जयपाल से प्रश्न किया “आप भी फौज में थे?” 
जयपाल को खुद से जुड़ी बातें बताना अच्छा लगता है। फौज की बातें खुद के होने का बोध कराती हैं। प्रश्न सुन तेज आवाज में बताने लगे -
“जबलपुर में फौज की भर्ती हो रही थी। मैं और रोहिणी घर में बिना बताये जबलपुर चले गये थे। जो भी जाँच-परीक्षा हुई हम दोनों पास कर लिये। रोहिणी भाग्यशाली था शहीद होकर नाम कमा लिया। मैं एक पैर गवाँ कर जीवन ढो रहा हूँ।”
“फौज में भर्ती होते हुये डर नहीं लगा?”
“सोचते थे घर में रोज-रोज जलील होने से बच जायेंगे कि निठल्ले बैठे हो। पर ट्रेनिंग के समय बहुत घबराहट होती थी। ट्रेनिंगे बहुत कठिन थी। मैं थकान और मेहनत के कारण ढीला-ढाला हो गया था। गलतियाँ करता। आफीसर कड़क कर डाँटते और पनिश करते। आफीसर कहते थे ‘सैनिक की वर्दी, बूट, कंधे, गर्दन, आवाज, चाल-ढाल चुस्त-दुरुस्त होनी चाहिये। मनः स्थिति एकदम सधी हुई और मजबूत हो। जवान ढीली गर्दन, झुके कंधे, लटके चेहरे में कायर लगते हैं।’ मैंने मान लिया था मैं इतनी मेहनत नहीं कर पाऊंगा। रोहिणी हौसला देता था। कहता था ‘फौज में मेहनत करने वाले चुस्त-दुरुस्त सिपाही को पसंद किया जाता है।’ यहाँ का अनुशासन और नियम कड़े हैं लेकिन अभ्यास हो जाये तो कुछ भी कठिन नहीं लगेगा। सोचो फौजी की ताकत कभी खत्म नहीं होती। लेकिन तुम भागने जैसी बात सोचते हो। सैनिक आगे बढ़ता है, पीठ नहीं दिखाता। मत सोचो मैं इस अभ्यास को नहीं कर पाऊंगा। सोचो, कर पाऊंगा। रोहिणी न होता तो मैं सचमुच कुछ न कर पाता।”
“रोहणी प्रसादजी शहीद हुये तब आप कहाँ थे?”
जयपाल चाचा के मुख पर एक किस्म का गौरव झलक आया। वे सेना की हैरत अंगेज बातें सुनाना चाहते हैं पर घर के लोग नहीं सुनते। आज मौका है। ऊॅंचे स्वर में बताने लगे -
“हमारी टुकड़ी में चौदह जवान थे। ढाँका से दस किलो मीटर दूर छम्भ गाँव में हम लोगों ने तेरह दिन मोर्चा सम्भाला था। दिन भर बम विस्फोट और गोला बारी होती थी। बम बारी में हमारा हेड क्वार्टर से सम्पर्क टूट गया। हम लोग नहीं जान पाये चौदह दिसम्बर को युद्ध समाप्ति की घोषणा हो गई थी। भोजन के पैकेट नहीं गिराये जा रहे थे। हम लोग भूख से परेशान आसमान निहारा करते थे कि सेना का हैलीकाप्टर खाने के पैकेट गिराने आयेगा। हमारे खाली पेट को रोहिणी अपनी बातों से भरा करता था। कहता था ‘हमारे आफीसर कहते हैं इण्डियन आर्मी जमीनी लड़ाई में अव्वल है। बिना खाये-पिये कई दिन तक शत्रु से मोर्चा ले सकती है। जो आत्म बल भारतीय जवानों में है वह दूसरे देशों के जवानों में नहीं है। तुम लोग आत्मबल को मत भूलो। आत्म बल, भूख से बड़ा होता है।’ मैंने उसकी बात को खारिज कर दिया था। मैंने कहा ‘रोहिणी तुम भूख सहने की आदत को आत्म बल कहते हो तो सचमुच सीधे और भोले हो। खजुरी में कई घर हैं जहाँ दोनों जून चूल्हा नहीं जलता। खाना मिलने की आस में लोग भूखे रह कर कई-कई दिन गुजार देते हैं और बचपन से भूखे रहने की आदत डाल देते हैं।’ रोहिणी ने मुझे फटकारा था ‘जयपाल, फौजी घर में, बन में, कैम्प में, युद्ध में, सीमा पर जहाँ भी होता है जोश में होता है। निराशा की बात नहीं करता।”
“खाने के पैकेट गिराये गये?”
“गिराये जाते कि नहीं गिराये जाते उसके पहले दुश्मन जवानों ने अटैक कर दिया। रोहिणी के साथ हमारी टुकड़ी के तीन सिपाही मारे गये थे। मेरे पैर में गोलियाँ लगीं। पैर कटवाना पड़ा। कितने ही जवान मिसिंग परसन घोषित कर दिये गये थे। मेरा एक मित्र जो राजपूताना राइफल्स में था, मिसिंग परसन की लिस्ट में था। पानी से भरे गड्ढे के पास तीसरे दिन बेहोशी हालत में मिला था।”
“बम बारी से डर नहीं लगता था?”
“ऐसा वातावरण होता है, इतनी व्यस्तता बनी रहती है कि लड़ाई से अलग दूसरा ख्याल नहीं आता है। और कहा न, रोहिणी कहता था ‘अभ्यास हो जाये तो कुछ भी कठिन नहीं लगेगा।’ वह ठीक कहता था।” 
“मौत से तो अच्छे-अच्छे दादा घबराते हैं।”
“मौत को आना है तो घर बैठे भी आ जाती है। जो फौज में नहीं होते वे भी मरते हैं। भीतर से कोई डरता भी रहा होगा तब भी एक-दूसरे का हौसला ही बढ़ाया जाता था। डरने वाले को फौज में नीची नजर से देखा जाता है। फौजी इतनी कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं कि निडर हो जाते हैं। रोहिणी कहता था यदि बेटा हुआ तो वह उसे फौजी बनायेगा। बेटा हुआ पर...।
जयपाल चाचा की बातों की ओर ध्यान एकाग्र किये रामायण ने पेण्ट का काम एकाएक रोक कर कहा “चाचा, मैं फौज में जाना चाहता था। अम्मा और दद्दा ने नहीं जाने दिया। दद्दा के साथ खेत जोतने में लगा रहा।”
लोगों का ध्यान रामायण की ओर चला गया। प्रश्न किया -
“सरकार ने नौकरी या रोजगार का बंदोबस्त नहीं किया?”

रामायण ने प्रश्नकर्ता को देखा “नहीं।”
“अब तो सरकार शहीद के परिवार को लाखों रुपिया, पेट्रोल पम्प, जमीन, नौकरी पता नहीं कितना दे रही है। अभी किसी दिन मैं टीवी में न्यूज देख रहा था। शहीद के परिवार वाले इसलिये नाराज हो रहे थे कि उसकी बाडी को हेलीकाप्टर में नहीं सेना के वाहन में सड़क मार्ग से क्यों लाया गया?”
किसी ने बात आगे बढ़ाई “ठीक कहते हैं। याद नहीं है किस राज्य की बात है पर मैंने टीवी पर देखा था शहीद की पत्नी को परिवार वालों ने आमरण अनशन पर बैठा दिया था कि शहीद का अपमान नहीं सहेगी। अपमान की वजह क्या थी मैं ठीक से समझ नहीं पाया लेकिन जब राज्य सरकार ने दस लाख रुपिया देने की घोषणा की, कलेक्टर ने खुद आकर आश्वासन दिया तब पत्नी ने अनशन तोड़ा। लोग शहादत को कैश कराने में नहीं लजाते।”
किसी ने आगे कहा “तब टीवी, मोबाइल नहीं थे। आपको रोहिणी प्रसादजी के शहीद होने की खबर कैसे मिली?”
वह सोलह दिसम्बर उन्नीस सौ इकहत्तर की अपशकुनी साँझ थी जब युद्ध सम्पूर्ण विभीषिका के साथ दद्दा के घर पर टूटा था। दद्दा दिन में कई बार ट्रान्जिस्टर पर खबर सुनते थे। शाम के खबर बुलेटिन में रोहिणी के शहीद होने की सूचना थी। दूसरे दिन स्थानीय कलेक्टर कार्यालय से पूरी जानकारी मिली। जिलाधीश महोदय ने स्वयं आकर एक हजार रुपये का अनुदान दिया था। दद्दा के भीतर वह साँझ आज भी अपनी सियाही लेकर उतरती है। पूछने वाले ने कुछ धीमी आवाज में पूछा शहीद होने की खबर कैसे मिली? दद्दा धीमा स्वर नहीं सुन पाये। जयपाल चाचा ने तेज आवाज में प्रश्न दोहराया। दद्दा चुप्पी से बाहर आये -
“हौ, समाचार में सुने। फेर कलेक्टर दफ्तर से पता मिला। रोहिणी की लहास हमको देखने को नहीं मिली। मोटे कागज पर सेना वाले टाइप करके चिट्ठी भेजे थे जिसमें लिखा था आपका बेटा बहादुरी से लड़ा। हिन्दू विधि-विधान और फौजी सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। फेर कई दिन बाद पोटली में बंधा राख फूल (अस्थियाँ) आया था।”
दद्दा ने गोकुल प्रसाद से इतने बार वह पत्र पढ़वाया था कि उन्हें उसकी इबारत कंठस्थ हो गई थी। दद्दा इस इबारत को अब तक कितने लोगों से बता चुके हैं, कितने लोगों से बताया इसकी गणना नहीं हो सकती। फिजा में सन्नाटा और सन्नाटे में काँपता दद्दा का स्वर -
“... रोहिणी खजुरी आता था तब सेना के किस्से सुनाता था। गाँव, कछार, चौपाल, खेत, बगार घूमता था। रामायन जइसा लम्बा था अउर देखो पोटली में राख बनकर लौटा। उसे याद करते हैं तो पोटली दिखाई देती है के यह विजय स्तम्भ।”
यही आकलन रामायण प्रसाद का है। पिता की कल्पना करता है तो सामने विजय स्तम्भ की आकृति उभर आती है। लगता है यह विजय स्तम्भ नहीं उसके पिता हैं। जिनके पास एक धड़ (स्तम्भ) और एक चेहरा (गुम्बद) है। धड़ में हाथ-पैर नहीं है। चेहरे में आँख-नाक-मुँह नहीं है। जब छोटा था पूछता था -
“दद्दा, मेरे बाबू कैसे दिखते थे?”
“तुम्हारी तरह दिखते थे।”

“दद्दा तुम झूठ बोलते हो। बाबू की मूँछे थीं, मेरी नहीं हैं। मेरी तरह कैसे दिख सकते थे। अम्मा से पूछता हूँ क्या बाबू मेरी तरह दिखते थे?”
नन्हा रामायण भीतर अपनी माँ के पास चला जाता -
“अम्मा, मैं बाबू की तरह दिखता हूँ क्या?”
“मुझे उनका चेहरा याद नहीं है। उनकी एक फोटो है। देख लो।”
बाबू का चेहरा याद न रखने वाली अम्मा, रामायण प्रसाद को विचित्र बल्कि अस्वाभाविक लगती थी। बहुत बाद में समझा था। अम्मा के गौने को मात्र तीन साल हुये थे। साल में एक या दो बार खजुरी आने वाले बाबू इन तीन सालों में गिनती के दिन घर में रहे होंगे। खजुरी के कड़े कायदे और मर्यादा, दादी की सख्ती की वजह से दिन भर घूंघट में लोप रहने वाली अम्मा से बाबू रात की सियाही (खजुरी में तब बिजली नहीं पहुँची थी) में मिल पाते होंगे। अम्मा ठीक कहती थीं बाबू का चेहरा जी भर कर कभी नहीं देख पाई। रामायण, रोहिणी की श्वेत-श्याम पास पोर्ट साइज तस्वीर को कई कोण से देखता। चेहरे से अधिक उसे मूँछे दिखाई देती। थोड़ा बड़ा हुआ, दद्दा के साथ विजय स्तम्भ देखने आने लगा। विजय स्तम्भ न जाने कब तस्वीर पर इतना हावी हो गया कि बाबू की कल्पना करते हुये विजय स्तम्भ की आकृति उभर आती है। पिता को बाबू जैसे सम्बोधन से पुकारना कैसा लगता होगा? बाबू वर्दी में कैसे लगते रहे होंगे जैसे प्रश्नों का उत्तर उसे कभी नहीं मिला। वर्दी में बाबू कैसे लगते होंगे जैसा अनुमान लगाने के लिये उसने एक बार सहेज कर रखी रोहिणी की वर्दी पहन ली थी -
“दद्दा मैं सैनिक बनूंगा।”
उसे फिटिंग से बड़ी वर्दी पहने देख - दद्दा से पहले अम्मा की चीख निकली थी “नहीं।”
“अम्मा, डरो मत। मैं बाबू की तरह नहीं मरूँगा। जयपाल चाचा की तरह लौट आऊंगा।”
भयभीत अम्मा ने वर्दी कहाँ छिपा दी वह नहीं जान सका। अम्मा बहुत डरी हुई थी। उसे खेत, खलिहान, नदी नहीं जाने देती थी। खजुरी की माध्यमिक शाला से आठवीं पास करने के उपरांत आगे पढ़ने कस्बा नहीं जाने दिया। तब सोचता था, दो बेटियों का पिता बन चुका है तब भी सोचता है परिवार में ऐसा व्यक्ति जरूर होना चाहिये जो अम्मा की तरह भयभीत और दद्दा की तरह भावुक होकर नहीं व्यवहारिक होकर सोचे। उसके भीतर का एक कोना आज भी उस शिशु की तरह है जिसे पिता की शाबासी की, मार्ग दर्शन की, संरक्षण की, सुझावों की, व्यवहारिक फैसलों की जरूरत होती है। उसने कभी पैसे का अभाव देखा, कभी संरक्षण का, कभी मार्ग दर्शन का। रोहिणी द्वारा भेजे गये पैसे संयुक्त परिवार की भेंट चढ़ जाते थे। पैसे भेजने वाला न रहा तो मास्टरी प्राप्त गोकुल प्रसाद, रामायण और अम्मा को बोझ मान विभाजन की बात करने लगा था। रामायण को भेद किसी ने नहीं बताया पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जो बहुत पुरानी होने पर भी अपनी ताकत से एक दिन सार्वजनिक हो जाती हैं। बोझ समझने और बॅंटवारा कराने का वास्तविक कारण उसने जान लिया था। 
गोकुल ने रामायण की अम्मा के साथ मुँह काला करने की असफल चेष्टा की थी। शहीद की पत्नी श्रद्धा की नहीं भोग की पात्र बनाई जा रही है देख कर विभाजन का विरोध करने वाले दद्दा ने तत्काल बॅंटवारा कर दिया था “घर में गिद्ध पैदा हो गये हैं। हिस्सा-बाँट हो जाना चाहिये।”
दादी इह लोक छोड़ गई थी। दद्दा, रामायण और उसकी अम्मा को लेकर घर के आधे हिस्से में सिमट आये थे।
पुताई का काम सम्पन्न हुआ।
विजय स्तम्भ ऐसा चमचमा रहा है जैसे कोई तपस्वी समाधि से जगा है। रामायण के भीतर किसी कोने में वह शिशु आज भी मौजूद है जिसे पिता का संरक्षण चाहिये। विजय स्तम्भ की चमक को भर नजर देख कर जयपाल से बोला -
“चाचा, झाड़-पोंछ, चमका कर इंसान को फिर से जीवित किया जा सकता तो मैं बाबू को जीवित कर लेता।”
दद्दा नहीं सुन पाये। सुन कर जयपाल द्रवित हुये “विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली पर बेटा मौत के बाद इंसान को जीवित नहीं कर पाया। प्रकृति के कुछ नियम नहीं बदलते।”
“जब भी विजय स्तम्भ को चमकाता हूँ न जाने क्यों लगता है इसमें जान आ जाये और अचानक बोल पड़े।”
“भाग्य का फेर है बेटा। तुम रोहिणी के जीवित हो जाने की कामना कर रहे हो, रामफल मेरे मरने का इंतजार। सच कहूँ तो अब मैं जीना नहीं चाहता।”
जयपाल का प्रखर स्वर, दद्दा तक पहुँच गया। जयपाल की भावुकता में तत्काल शामिल हो गये “जयपाल कुबोल न बोलो। रामायण को मेरे बाद तुम्हारा ही सहारा है। गोकुल पर हमको बिसवास नहीं। एक अरज जरूर है। मेरे न रहने पर तुम दोनों आज के दिन विजय स्तम्भ को साफ-स्वच्छ करना न भूलना।”
रामायण ने सुना और चुप रहा। चुपचाप विजय स्तम्भ को देखता रहा। आज रात भर वह स्वप्न देखेगा। टुकड़ा-टुकड़ा स्वप्न। स्वप्न के टुकड़ों में अपने पिता का चेहरा ढूँढ़ेगा। चेहरा कभी वक्त की मार और अम्मा के खारे आँसुओं से धुँधली हो चुकी तस्वीर बन जायेगा, कभी अस्थियों वाली पोटली। फिर विजय स्तम्भ तस्वीर और पोटली पर प्रभावी होते हुये बाबू की आकृति बना लेगा। लगेगा विजय स्तम्भ उसके बाबू हैं। उनके पास एक धड़ है और एक चेहरा है। धड़ में हाथ-पैर नहीं हैं। चेहरे में आँख-नाक-मुँह नहीं हैं।

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