कविता: प्रदीप उपाध्याय

प्रदीप उपाध्याय
- (1) -

बनें आधारशिला 
जो बीत गया
उसे भूल जाना ही अच्छा
अच्छा या बुरा 
स्वप्न समझकर।

इतिहास की बातें भी
क्यूँकर याद रखें
सत्य के अंश से ज्यादा
उसमें 
झूठ और जोड़-घटाव।

तब क्या
उचित न होगा
वर्तमान में जिएँ
वर्तमान की ही सुनें
वर्तमान ही बुनें।

शिलालेख के पत्थर
हो जाने से बेहतर है
वर्तमान को गुनकर
भविष्य की
आधारशिला बनें।
***

- (2) -

मेरी जगह 
कभी किसी समय
कोई बुके लेकर आता था 
तो कोई झुककर सलाम 
ऐसे लोग 
खोज ही लेते थे
मिलने-जुलने के अवसर 
क्योंकि तब
मैं आसमान की ऊँचाई पर
उड़ान भर रहा होता था
शायद ऊँचाई पर ही 
झलकता है अपनापन 
और रूतबा 
जानता था बुके में ताजग़ी नहीं है
अपनत्व नहीं है
बनावट है
बगीचे में खिले फूलों सी महक नहीं है 
सलाम में भी तो
औपचारिकताएँ ठसाठस भरी थीं 
फिर भी सहज रूप से स्वीकारा 
शायद कहीं अपनी ठसक का
अभिमान भी था
अब मैं जमीन पर उतर आया हूँ
और शायद उनके लिए भी
मैं अब जमीन पर ही हूँ
तभी तो
अब कोई संदेश  नहीं
लगता है वे जानते हैं
जमीनी हकीकत
तभी तो सामने आने पर
निगाह चुरा लेते हैं
संभवतः बताना चाहते हों
मुझे मेरी जगह!

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