काव्य: राजेंद्र कुमार शर्मा

राजेंद्र कुमार शर्मा
बेटी बड़ी हो गई है।

जो नहीं उतरती थी कभी 
पापा की गोद से एक क्षण को भी
वो अपने पैरों पर खड़ी हो गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

नहीं भागती साइकिल के पीछे
नहीं करती जिद चॉकलेट की
वो पहले से ज्यादा गंभीर हो गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

नहीं रचाती अब गुडिया की शादी 
नहीं ढूंढती छुपने को दादी का आंचल
माँ का हाथ बटाने में व्यस्त हो गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

अपने जन्म दिन मानने की खुशी और 
न मानने की नाराजगी भूल सी गई है
यही है जीवन की सच्चाई वो मान गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

हुआ करती थी दादा दादी की लाडली
चढ़ बैठती थी दादा के कंधे पर 
उनके जाते ही अपना बचपन भूल गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

कभी चहकती थी छोटी चिड़िया-सी
पूरे घर को जीवंत बनाए रखती थी
उसकी वो हँसी पता नहीं कहाँ खो गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है

नहीं साझा करती अपने दिल की बात 
नहीं होने देती किसी अभाव का अहसास
भवितव्यता की तैयारी में जुट गई है
बेटी देखते देखते बड़ी हो गई है 

बेटियों के साथ ही ऐसा क्यों होता है
उनका बचपन क्यों किसी बोझ में खोता है
वो नहीं करती कोई शिकवा और शिकायत 
और लाचार पिता छुप छुप कर क्यों रोता है?
***


बाज़ार

खुशियों से भरे बाजार है
सब नकद के व्यवहार है
हम तो खाली जेब निकले
समझे की कुछ तो उधार है

देख कर राज हैरान है कि
हर खुशी और प्यार सब
कारोबार से ही सरोबार है 
आते है यहाँ पैसे वाले भी
पसीने की कमाई भरकर
जिसका कोई और हकदार है

लगा था सब आसान ही है
ईमानदारी से जीत जायेंगे
लगी जो ठोकर तो समझे
राह में बिखरा दुख अपार है
कोशिशें बहुत की तैरने की
देख पानी के बहाव को पर
जीवन तो खुद में मझधार है

सोच के दरवाजे तोड़ने से भी
क्या हासिल होगा मेरे दोस्त
घर के रास्तों पर खड़ी दीवार है
और गर गिरा भी दी दीवार
तो भी कुछ हासिल न होगा
विचारों पर बैठा पहरेदार है

समझे थे जिन्हें अपने करीब
उन्होंने ही तो डुबोया हमको
दावा यह है कि ईमानदार है
नाम करते हैं ईश्वर बंदगी का
पर आत्मा में भरा अंहकार है

कब समझेंगे एकाकार को
बंदगी करते वो निराकार है
खोजते जहाँ जीवन आधार
वो अपने आप में निराधार है
खुशियों और मेरे बीच खड़ी
दीवार एक दो नही, हजार है

गर्मी की तपिश में बारिश की
एक ठंडी बौछार का इंतजार है 
ना रुकेगी खुशियाँ मेरे हिस्से की
आने वाली खुशियों की बहार है।
***


जिंदगी

तपती सड़क पर 
नंगे पाँव भागती 
नादान जिंदगी
प्लेटफॉर्म पर
चाय चाय पुकारती
मासूम जिंदगी
रेल की पटरी से
कूड़ा बीनती 
बेपरवाह जिंदगी
गाँव के खेतों
में फसल काटती
अवयस्क जिंदगी
होटल में झूठे बर्तन धोती 
निर्मल जिंदगी
सड़क किनारे
साहब के जूते 
कमीज से चमकाती  
निश्चल जिंदगी
घर में मालकिन की
बेवजह डाँट खाती 
छोटी सी जिंदगी
लोगों की फैंकी जूठन से
पेट भरती जिंदगी
सरकारी कार्यालयों में 
पानी पिलाती 
बड़ी सी जिंदगी
मधुशाला में टूटे
काँच के टुकड़ों को
समेटती जिंदगी
खेल के मैदान को
दूर से निहारती जिंदगी
स्कूल जाते बच्चों
को आतुर निगाहों
से सँवारती जिंदगी
माता पिता के साथ
अपने बचपन की
तस्वीर उकेरती जिंदगी
सुंदर पोशाकों
के सपने बुनती जिंदगी
गाँव की पगडंडी के
सपने देखती जिंदगी
जाड़े की रातों में
ठंड से कँपकँपाती जिंदगी
फुटपाथ पर भूखे पेट
सोती जिंदगी
तेज रफ्तार कार से
कुचली जाती जिंदगी 
बस इतनी सी जिंदगी
जिसके लिए
इतनी सारी बंदगी?

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