बिल्ली का खून (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: फ़ारसी
लेखक: फ़रीदह राज़ी
अनुवाद: देवी नागरानी

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


फ़रीदह राज़ी
अब मैं अपनी बिल्ली पर नज़र डालती हूँ। कैसी सूख गयी है? यह मुझे अच्छा लग रहा है, खुद को हल्का-हल्का महसूस कर रही हूँ। कोई खास बात नहीं, वह मर गई। हम दोनों को चैन पड़ा। 
कब से वह अपंगों की तरह घिसट रही थी। उसकी म्याऊँ म्याऊँ से पता चलता था कि वह दुख झेल रही है मगर ज़ाहिर नहीं करती। उसकी घुटी घुटी पतली आवाज में फरियाद की कैफियत आ गई थी। वह सारा वक़्त किसी कोने में सिकुड़ी पड़ी रहती और मींची आँखों से मेरी तरफ देखा करती थी। उसकी दृष्टि, उसकी क्षुब्ध दृष्टि मेरे पञ्जर को जलाये जा रही थी। बिल्ली दिन-ब-दिन कमज़ोर होती जा रही थी। बाल उसके सूखे हुए बदन पर चिपक कर रह गए थे और उसका सौंदर्य कम होता जा रहा था। वही बिल्ली जो परछाई भी देख पाती तो पहले चीते की तरह छलांग मारती थी और ऐसे भयानक रूप से गुर्राती थी, अब ऐसी बेजान हो गई थी कि मैं उसे कितना भी छेड़ूँ, वह या तो शिथिल पड़ी रहती या मेरी ओर ध्यान दिये बिना उठकर किसी और कोने में जा पड़ती। उससे पहले वह मगन मस्त रहती थी, कालीन पर लंबी लेट जाती, नर्म सफेद सीना उभार कर बंद पंजों से मुझको नोचती थी। वह चाहती थी कि मैं उसको गुदगुदाऊँ, उसका सीना खुजाऊँ और वह गड़गड़ाहट शुरू कर दे। नशीली आँखों से वह मेरे पीछे पड़ जाती कि मैं उसके साथ खेलूँ। जब वह ठीक थी तो सोफे के एक किनारे फैल कर लेट जाती और खर्राटे भरती थी। तब उसके भरे-पूरे बदन पर फूले फूले बाल चमक मारते थे। उसके गोल मुँह और साफ-सुथरी मूछों से खुशी बरसती थी। लेकिन अब उसे देख रही हूँ तो जी मतला रहा है। वह घुल कर रह गई थी, हर वक़्त रोती रहती थी। मैं उसे बहलाने के लाख जतन करती, पर कोई फायदा न होता। न जाने क्यों उसका दिल कुछ उदासीन सा होता जा रहा था। बस मुझे देख कर रह जाती थी, 'न खाना-पीना, न घूमना-फिरना, न खेलना-कूदना' कुछ भी याद न था । 
यह सब पिछले साल की वसंतऋतु में शुरू हुआ। एक सुरमई बिल्ला मुंडेर पर आकर म्याऊँ म्याऊँ करने लगा था, जिसे सुनकर मेरी बिल्ली के कान फड़कने लगते, बदन तन जाता और वह लपक कर खिड़की के पास पहुँच जाती। मैं दरवाजा बंद रखा करती थी कि कहीं ऐसा न हो वह बाहर निकल जाए फिर बच्चों के किलोल में विघ्न डाल दे और मेरे लिए मुसीबत खड़ी हो जाए। लेकिन एक दिन जब मैं घर लौटी तो वह गायब थी। मैंने हर जगह ढूंढा, पर वह कहीं नहीं मिली। कुछ दिन बाद खिड़की के बाहर उसकी आवाज सुनाई दी, मैंने दरवाजा खोला तो वह छलांग मार कर अंदर आ गई और मुझे नज़रअंदाज करती हुई सीधे रसोईघर में घुस गई। मालूम होता था बहुत भूखी है।
वह दुबली हो गई थी और उसका बोलना-चालना भी बंद सा हो गया था। हर चीज के इर्द-गिर्द घूमती, और जो पाती खा लेती और किसी कोने में पड़ी सो रहती। कुछ दिन तक मुझ से खिंची खिंची रही लेकिन धीरे धीरे उसकी पुरानी आदतें लौट आयीं। अब वह मुझसे कभी-कभार खेलने लगी, सुबह-सुबह मेरे बिस्तर पर आ जाती और मेरे चेहरे पर धीरे से मुट्ठी मार कर मुझे जगाती।
एक दिन फिर उस सुरमई बिल्ले की आवाज़ सुनाई दी। मेरी बिल्ली की आँखें चमकने लगी, बाल खड़े हो गए। उसने अंगड़ाई सी ली और अपनी जगह पर चक्कर काटने लगी। फिर दोनों ने खिड़की के शीशे के आर-पार से खेलना शुरु किया। सुरमयी बिल्ले की हरी-पीली आँखें चमक रही थीं, उसके फूले-फूले नर्म बाल थे और छोटा सा गोल मुँह भला लगता था। दोनों देर तक अपने खेल में मस्त, एक दूसरे को घूरते, म्याऊँ- म्याऊँ करते गुर्राते रहे, फिर थक कर खिड़की के पास पड़े रहे और धीरे धीरे दुमें हिलाने लगे। आखिर मेरी बिल्ली से न रहा गया। वह धीरे-धीरे चलती हुई मेरे पास आई कूदकर मेरी गोद में बैठ गई, और चापलूसी शुरू कर दी। उसकी जो अदाएँ मुझे पसंद थी सब उसने दिखाई। सर मेरी गर्दन से रगड़ा, आँखें मींच कर जमीन पर लोटने लगी लेकिन मैं ज़रा भी न पसीजी, क्योंकि मैं समझ रही थी कि वह क्या चाहती है। मैंने उसके सीने पर हाथ रख दिया। अचानक वह उछल कर पीछे हट गई और मेरे सामने खड़े होकर फुफकारने लगी।
सुरमई बिल्ला देर तक खिड़की के पीछे म्याऊँ-म्याऊँ करता रहा, आखिर वहाँ से चला गया। लेकिन मेरी बिल्ली सुबह तक खिड़की के सामने बैठी रही। मैंने सोचा कोई बात नहीं कुछ दिन में भूल जायेगी और वह बिल्ला भी अपने घर लौट जाएगा। लेकिन एक रात जब मैं घर आई तो देखा सुरमई बिल्ला खिड़की के पीछे बैठा था और वे दोनों एक दूसरे को देख रहे हैं। मुझे ताव आ गया, डपट कर उसकी तरफ लपकी और वह भाग गया। मेरी बिल्ली ने नाच-नाच कर म्याऊँ-म्याऊँ करना शुरू कर दिया, फिर पंजों से दरवाज़ा खुरचने लगी। मैं उसे छोड़ कर अपने काम में लग गई। कई दिन तक मैंने ध्यान रखा कि दरवाजा बंद रहे और वह भागने न पाए। मेरी यही मर्जी थी, वह मेरी बिल्ली थी। 
एक दिन फिर शाम के वक़्त सुरमई बिल्ला अहाते में नजर आया। मुझे गुस्सा आ गया, लकड़ी उठाकर मैंने अहाते में उसे पीटा और मार-मार कर बाहर निकाल दिया। वापस आई तो मेरी बिल्ली चीते की तरह मेरा रास्ता रोकने लगी। मैं जिधर भी मुड़ती वह उछलकर सामने आ जाती। वह बुरी तरह भड़की हुई थी। उसकी अंगारे बरसाती आँखें फैलकर दुगनी हो गई थी, सिकुड़ा हुआ मुँह भयानक हो रहा था। मैंने उसे ठंडा करने की बड़ी कोशिश की, लेकिन वह अपने आपे में नहीं थी। आखिर वह मुझ पर झपट पड़ी, मेरी गर्दन से लिपट कर उसने अपने नुकीले दाँत मेरे चेहरे पर गढ़ा दिए। मेरी साँस रुकी जा रही थी, मैं डरकर चीखने लगी। किसी ने आकर उसे हटाया। मैंने बुरे हाल कमरे में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया। मेरी बिल्ली ने मेरे और मेरे अत्याचार के विरुद्ध बगावत कर दी थी।
वह रातभर घर से बाहर निकलने के लिए रोती रही, लेकिन मैंने उसे निकलने नहीं दिया। उसके बाद वह हर रोज़ रात-रात भर खिड़की से लगी बैठी रहती, मगर सुरमई बिल्ले का कहीं पता न था। मैंने अपनी बिल्ली के लिए बेहतरीन भोजन तैयार किए, जो जो उसे भाता था सब दिया, लेकिन उसने किसी चीज को हाथ नहीं लगाया। मैं उससे जितला लाड़ जताती वह उतनी ही जिद्दी और चिड़चड़ी होती गई। अपने घर में मैंने उसे खुली छूट दे दी कि जिन जगहों पर उसकी पाँव धरने की जुर्रत नहीं होती थी, वहाँ जाकर सोए। लेकिन वह दिन-ब-दिन निढाल होती जा रही थी। 
एक दिन पड़ोस के कोठे पर किसी बिल्ले की आवाज सुनकर वही मेरी बिल्ली जो मुश्किल से खुद को एक कमरे से दूसरे कमरे तक घसीट कर ले जाती थी, जिसके अंदर कुछ नहीं रह गया था, अचानक इस तरह छलांग मारकर खिड़की से बाहर कूदी की टांग तोड़ बैठी, और फरियादियों की तरह गली में रोने लगी। मैं उसे घर में उठा लाई। बहुत दिनों में जाकर वह ठीक हुई लेकिन लंगड़ाने लगी। मेरी हर कोशिश बेकार थी, वह बदल चुकी थी और अब मेरा धैर्य भी छूटने लगा। उसकी सिसकियों, चीखों, और टूटन ने मेरी नाक में दम कर रखा था। उसका एक कोने में मरे हुए चूहे की तरह पड़े रहना मुझे चिड़चिड़ा किये जा रहा था। मैं समझती थी, कि वह ऐसा समझती थी कि वह दुख झेल रही है और घुलती जा रही है। मैं जब भी उसके निकट जाती तो उसकी आँखें पथरा कर मुंदने लगतीं, कुछ देर तो वह सर उठाती, फिर पलकें झुकाती फिर गर्दन झुकाकर वहीं सो जाती।
कल एक बिल्ले की आवाज सुनाई दी तो मैंने खिड़की खोल दी ताकि यदि उसका जी चाहे तो बाहर चली जाए। उसने सर उठाया, कान हिलाये, मूछें सीधी कीं और खिड़की की तरफ देखा। फिर उसकी थकी थकी बुझती हुई निगाहें मुझ पर जम गईं। उसने कई बार फरियाद के अंदाज़ में म्याऊँ-म्याऊँ की आवाज निकाली, दाँत कटकटाए और दुबारा सो गई और आज... आज मैंने उसे मार डाला। 
***

लेखिका परिचय: फ़रीदह राज़ी ईरानी कथाकार, कवि, नाटककार, व अनुवादक थीं। उनकी कहानियों तथा एक उपन्यास का अङ्ग्रेज़ी में अनुवाद हुआ है। तेहरान में जन्मी फ़रीदह ने न्यूयॉर्क में फ़ारसी साहित्य, कला व दर्शन में तेहरान विश्वविद्यालय तथा न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय से सनद ली। उन्होंने ईरान के कला व संस्कृति मंत्रालय तथा राष्ट्रीय पुस्तकालय में शोधकर्ता का कार्य किया। अल्पवय में लेखन आरम्भ करने वाली फ़रीदह का पहला आलेख 13 वर्ष की आयु में छपा था। उनका देहांत 1 फ़रवरी 2023 को हुआ। वे अपने आस-पास के जीवन से सन्दर्भ रखते पात्रों पर केन्द्रित कथाएँ लिखती हैं। प्रस्तुत कहानी, गुरबा उम्म रा कुष्तम में एक पालतू बिल्ली के माध्यम से उन्होंने ईरानी समाज में स्वतंत्रता चाहने वाली महिलाओं की दुःखद स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है।

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