काव्य: अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन


(1) मुझे नहीं पता

मुझे नहीं पता 
झूठ और सच के बीच 
जमीन और आसमान का अंतर।

नहीं पता 
आभूषणों में खोट की तरह 
कितना प्रतिशत अंश मिला होता है 
सच में झूठ का।

अक्सर पूरा का पूरा झूठ 
होता है सौ फीसदी सच की तरह
और कभी-कभी पूरा सच पूरे झूठ की तरह।

झूठ और सच के कोल्हू में
बैल की तरह जुतता रोज निर्दोष आम आदमी।

शब्दों के उस 
शिल्पकार से मिलना है
पूरे विश्वास के साथ पल भर में 
पूरे झूठ को जो कर जाता है
अपने मुँह की कारीगरी से पूरा सच साबित।
***


(2) कुछ तो विशेष है उसमें

दशकों से उनके गुरुर की 
मजबूत दीवार का टूटना संभव न था।

लाख गलतियों के बाद भी 
संभव न था वर्षों तक जिम्मेवारियों का झंडा 
ढोते-ढोते अति आत्मविश्वास में विश्वास जीत लेने का दंभ भरने वाले लोगों के लिए उनके विरोध में हाथ लहराते हुए खड़े होना।

वे ही छत्रप थे
वे ही सेनापति 
न्यायाधीश भी वे ही थे।

सबकुछ वे ही थे जिनके रहमोकरम पर
टिकी होती थी एक विचारधारा की व्यवस्था 
तुष्टिकरण की राजनीति का एकपक्षीय न्याय।

उनके महल की दहशत भरी गलियों से 
बेखौफ गुजरा करता था आदेश, अध्यादेश 
और अपने अनुकूल अनुशासन का उपविधान।

उनकी जुबाँ से निकले 
शब्दों के अनुपालन की गुस्ताखियों पर
बरसाए जाते थे तड़ीपार सजा के नामालूम कोड़े
पूरी उम्र दगाबाजी का लगा दिया जाता था ठप्पा।

ऊपर की कोई अदालत नहीं
रास्ते नहीं कभी कोई अपील के।

बाप-दादों की जागीरें और उनकी पद-प्रतिष्ठा के 
जन्मजात उत्तराधिकारी और सक्षम धर्माधिकारी वे ही थे।

इतनी सारी खूबियों के बाद भी
अंतिम ख्वाहिश की आखिरी सीढ़ी पर 
खड़े व्यक्ति की तरह उनका निरीह दिखना 
किसी बड़े परिवर्तन की ठोस बुनियाद से कम नहीं.....

छप्पन इंच का सीना हो न हो 
कुछ तो है उसमें जिसने मजबूर कर दिया 
सोचने पर सुल्तान को
झूठे सब्जबाग और जमीनी हकीकत के बीच
हुआ करता है जमीन और आसमान का अंतर।
***


(3) बहुएँ

पर्दे में रहकर भी
पर्दे के अंदर और बाहर की 
दुनिया से रहती हैं पूरी तरह वाकिफ।

एक कुशल प्रबंधक की तरह
संभालती हैं घरों की अशेष जिम्मेदारियाँ
छोटे-बड़े सभी चेहरों का रखती हैं पूरा ख्याल।

मौजूद रहती हैं सदैव
घरों के गर्म मिजाज में ठंडी हवा की तरह।

भारी तनाव में भी 
बहुएँ नहीं आने देतीं चेहरे पर तनाव
पी जाती हैं पीड़ाएँ हँसकर चीनी पानी की तरह।

अक्सर उन्हीं पर टिका होता है 
स्थायी शांति का गौरवशाली इतिहास
उन्हीं पर टिका होता है लोक-लाज, हास-परिहास।

कम पढ़ी- लिखी होते हुए भी
पढ़े-लिखों से ज्यादा बहुएँ रखती हैं  
गणित का ज्ञान, चेहरे के भावों का सम्पूर्ण मनोविज्ञान

बहुओं को बेटी बनाए बिना बहुएँ असंभव।
***


(4) माँ

बिना पढ़े ही 
चेहरे के भावों से
पढ़ लेती हैं परेशानियाँ

सुने बिना ही
सुन लेती हैं मन की बात

जान लेती हैं 
भूखे पेट की व्यथा 
समय से पहले संभावित खता

दूर रहकर भी
माँ की आँखों में 
मटरगश्ती करते हैं बच्चे।
***

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संपर्क: मणि विला, प्राइमरी स्कूल के पीछे, केवट पाडा (मोरटंगा रोड), दुमका, झारखंड, भारत

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