हिन्दी सॉनेट: अनिमा दास

मोहन-प्रिया

इंद्रधनुषी उपत्यका से तुम्हारे नयन युगल
मंद मंद स्मिता से तुम्हारे  कृष्ण कज्ज्वल
न कहूँ मिथ्या… हो तुम अनेक श्रावणी सी  
प्रिया! प्रेयसी! प्राजक्ता तुम प्रेम परिधि की।

घन अलकों में कर आबद्ध सहस्र प्रहेलिका
स्वर्णजल की कुमुदिनी,हे!स्वप्नमग्न प्रेमिका
न कहूँ मिथ्या,पूर्वानिल की तुम प्रथम सुगंध
प्रिया! प्रेयसी! तुमसे प्रणय का चिर अनुबंध।

करपल्लव में,मोहना! धर प्रीत अनंत अपार
रौप्यमंडल में संगमित देहद्वय का अभिसार  
मिथ्या नहीं है… युगों का यह आत्म विसरण
प्रिया, अद्य प्रतीक्षिता, प्रेम ही मेरा आभूषण।

है पथ दुष्कर-तरल वैशाख का शुष्क पुष्कर 
अनुगामिनी मैं, आलिंगन में मेरे सिक्त अध्वर।

***


पीड़ा पर्व 

प्रबल पीड़ा का प्रलाप है, अमर्त्य का असह्य विलाप है 
जीवन लाक्षा गृह सा ऐ स्वार्थी! अक्षर अंत का शेष संलाप है
क्षत का क्षितिज है विस्तृत… है मृग, माया का ही अधिकृत 
आज तपोवन में है गहन तमस, स्निग्ध ज्योति परावृत्त ।

मंदार सा रक्तिम हो जाओ, हे! अश्रु, रक्तशय्या पर सो जाओ
मुग्ध नक्षत्र है निद्रित, मंदिर के मौन मूर्ति सा हो जाओ
चन्द्रिका में झरते अग्निकण, त्रिताप से तप्त पुष्पगण
भ्रमर भ्रमित स्वभ्रम में, निशिथ में होता स्वप्न क्षरण।

प्रथम पद में व्यथा कामिनी, द्वितीय पद में तपस्विनी 
सिंधुमग्ना स्रोतस्विनी,  हृदय ह्रद की श्वेत चारु हंसिनी
क्षण-क्षण के घोर निनाद में, भू-गर्भा हुई अंतर्नाद में 
स्वर शून्य अभ्र में, निर्वस्त्र निशि हुई बद्ध अपवाद में।

करो त्राण, दो निर्वाण, श्रापाग्नि में है दग्धित काया अप्राण
समाप्त हो, समाप्त हो, प्राचीन प्रथा का यह प्रश्न-पुराण।

***


मृत्यु कलिका 

यह तुम्हारी ही पदचाप है…  हाँ तुम्हारी 
ऊदबत्ती से तुम्हारी सुगंध है मुझे आती
घनधूम्र में एक आकार सा होता बिंबित
पूर्ण हर्ष से आत्मा को करता आमंत्रित।

राजमार्ग पर रंगीन पुष्पों का यह परत 
इंद्रधनुषी-तोरण पर प्रतीक्षित अनुमत
ज्ञात है मुझे, यह तुम्हारा ही है संदेश
मैं त्याग आऊँ यथा शीघ्र ही देहावशेष।

अभिसिंचित हो रहें काष्ठ श्लोक मंत्र से 
स्थिर हो रहें अस्थि शोण स्नायु तन के
मन स्थिर हो रहा तुम्हारा स्पर्श पा कर
पंचभूत में पंचाग्नि में है तप-रत अध्वर।


ऐ! मृत्यु कलिका, अंतिम स्वर वाहिका
शीतल आलिंगन में होती द्रवित तंत्रिका।
***


अनिमा दास (सॉनेटियर)
कटक, ओड़िशा

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