काव्य: आरती ‘लोकेश’

डॉ. आरती ‘लोकेश’
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, 
सपनों जैसी उस दुनिया में, फिर से फेरा लगाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं 

खेल-खेल में देर से पहुँचूँ, डाँट से न घबराऊँ मैं, 
मुर्गा बनने से बचने को, सौ-सौ बहाने बनाऊँ मैं। 
हड़बड़ी में स्वेटर उलटा, टाई गले लटकाऊँ मैं, 
बिन पॉलिश के जूते पहने, छुप-छुप कदम बढ़ाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

कॉपी पुस्तक सभी छिपा दूँ, पेंसिल घर भूल आऊँ मैं, 
गृहकार्य भी छोड़ अधूरा, फिर टीचर को सताऊँ मैं। 
पी.टी. म्यूज़िक डांस कक्षा, सीख सबको रिझाऊँ मैं, 
विज्ञान की टीचर छुट्टी पर, हर पीरियड खैर मनाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

छीना-झपटी-धक्का-मुक्की, शोर मचा चिल्लाऊँ मैं, 
चोट-फेंट-खरोंच-घाव से, तनिक न थमने पाऊँ मैं। 
अध्यापक के प्यारे मॉनीटर, को भी मज़ा चखाऊँ मैं, 
भला बने वह करे शिकायत, आँख तरेर धमकाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

प्रिंसिपल के पास न फटकूँ, मास्टर से आँख बचाऊँ मैं, 
काम करूँगा कल से पूरा, वादा कर के बच पाऊँ मैं। 
परीक्षा के दिन पास हों तो, बस्ते में कुछ न लाऊँ मैं, 
इधर-उधर ताका-झाँकी कर, खाली पृष्ठ पलटाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

हाथ पकड़कर टीचर पूछे, यह प्रश्न फिर समझाऊँ मैं?
प्रश्न समझकर क्या करूँ, जब उत्तर न दोहराऊँ मैं। 
टीचर कहे उम्मीद है मुझसे, तब अंदर तक लजाऊँ मैं, 
उस आशा पर खरा उतरने, विद्या में मन को लगाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं

बार-बार गलती करने को, जीवन में ललचाऊँ मैं, 
बचपन का मज़ा फिर न आता, सीख तुम्हें बतलाऊँ मैं। 
फिर बच्चा बन जाऊँ मैं, फिर बच्चा बन जाऊँ मैं
***

तुमको नमन माँ भारती

तुमको नमन माँ भारती, 
उर-मंदिर तुम ही सँवारती, 
पूजन, अर्चन दीप अर्पण, 
हम तेरी उतारें आरती। 
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती!
रक्त का मस्तक तिलक लगा
शीशों के पुष्प तुम्हें चढ़ा 
वीरों ने प्राण दिए गँवा 
जब सुना तुम्हें सिसकारती 
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती!
लें प्रण कि तुम आज़ाद रहो, 
हर धड़कन में आबाद रहो। 
स्वर में घुलता आह्लाद रहो, 
हर श्वास यही है पुकारती। 
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती
हम तेरी उतारें आरती। 
*** 

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