मेरे पापा का टाइपराइटर

निवेदिता रॉय
खटखट खटाखट खटखट…
सुबह की शुरुआत की वह आहट
शब्दों को काग़ज़ पर उतारती वे उँगलियाँ
सफ़ेद काग़ज़ पर काली स्याही की वे पंक्तियाँ
कार्बन पेपर लगा कर दोहरी कापी का चलन
टेबल पर बिखरे कुछ सफ़ेद काग़ज़ और फ़ाईलों का पुलिंदा
ऐनक से झाँकती वो समझदार आँखें
माथे पर पड़ी वे बारीक सिलवटें
सालों का तजुर्बा बयान करती वे नसीहतें
वे तो एक तस्वीर में क़ैद हैं

अब अलमारी में सजा रहता है पापा का टाइपराइटर
चादरों के नीचे छुपा हल्की धूल में सना
याद करता है अपने पुराने दिन
रुआँसा होता है सोचकर सालों तक रोज़ जिन उँगलियों से मुलाक़ात होती थी
न जाने कहाँ है?
कुछ अकड़न सी महसूस करता है
ना कोई रिबन बदलता है न कोई काग़ज़ चढ़ाता है
गुमसुम सा देख रहा है इस दुनिया की नई चाल
अब तो यूँ ही बीतेंगे कई और साल
तय हुआ मेज़ पर से अलमारी तक का सफ़र
ख़ामोश हो गई वो खटर-पटर!
***

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