बूढ़े होते दरख़्त आशियाने को मोहताज

संदीप तोमर

संदीप तोमर

आधुनिक जमाने में जहाँ जनसामान्य की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है, मध्यम-वर्गीय समाज पर आधुनिकता के चलते खर्चों में बेतहाशा वृद्धि भी हुई है, जिसके चलते बुजुर्ग-समस्या भी अकल्पनीय रूप से बढ़ी है। आज वृद्धावस्था अभिशाप सदृश हो रही है। भारतीय समाज पर इसका प्रभाव अधिक हुआ है। आज बुजुर्गों का जीवनयापन भी एक बड़ी समस्या है। उम्र के साथ-साथ स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ना स्वाभाविक है, बुजुर्गीयत चलने में असमर्थता, अपाहिज सदृश बिस्तर को अपनी नियति मान जीवन-निर्वाह की स्थिति तक ले आती है।

कुछ समय पहले प्रवासी लेखिका जया वर्मा का कहानी संग्रह “सात कदम” समीक्षार्थ प्राप्त हुआ, संग्रह में एक कहानी ‘गुलमोहर’ बड़ी संवेदनात्मक कहानी है, जिसमें विदेश में रहने वाला पाश्चात्य संस्कृति में रचा-बसा एक बेटा माँ के पास सुरक्षित पुरखो के बनाए बंगले गुलमोहर को बेचने के लिए माँ को मनाने के सारे जतन करता है और अंत में अपने मंसूबों में कामयाब भी हो जाता है, माँ को एयरपोर्ट पर छोड़कर विदेश चले जाने पर वृद्धा माँ हतप्रभ होती है। बेटा ध्रुव फ्लैट के कागज और चाबी का लिफाफा माँ के लिए छोड जाता है। यह बुजुर्ग माँ की व्यथा की करुण कहानी है। गुलमोहर कहानी का ध्रुव भारतीय परिवेश से निकलकर भी माँ के प्रति संवेदनहीन है। कहा जा सकता है कि एनआरआईज़ में अभिभावकों के प्रति संवेनधीनता में लगातार इजाफा हुआ है।

एक बार किसी परिचित के यहाँ चाय पर आमंत्रित था, संयोग से एक रिटायर ऑफिसर भी आमंत्रित थे। परिचय और बातचीत के दौरान उन्होंने अपने प्रवासी पुत्र के अमेरिकी निवास के अनुभव साझा किए। उनके अनुसार उनके मोटे पैकेज पर काम करने वाले पुत्र-पुत्रवधू को अपने बच्चे की स्कूल के बाद की देखभाल के लिए अवैतनिक केयरटेकर की आवश्यकता थी, उन्होंने विधुर पिता को इस काम के लिए योग्य समझ अपने पास बुला लिया। एक दिन पोते की अभद्रता पर डांटने के चलते हुए पुलिस केस के बाद उन्हें आत्मग्लानि का सामना करना पड़ा, साथ ही पुत्र-पुत्रवधू की लानतें भी सहनी पड़ी। आत्मसम्मान को लगी ठेस के चलते वे इस दृढ़ निर्णय के साथ भारत वापिस लौट आए कि पुनः अपने इकलौते पुत्र के पास विदेश जाकर नहीं रहेंगे। इस घटना को सुनने के बाद मैंने एक कहानी लिखी थी, लेकिन एक सवाल मेरे ज़ेहन में कोंधता रहा- उन बुजुर्गों का बुढ़ापा कितना दर्दनाक होता है जिंहोने अपनी जीवनभर की कमाई अपनी संतान को विदेश में नौकरी करने के योग्य शिक्षा दिलाने पर स्वाह कर दी, और जो पेंशनयाफ़्ता भी नहीं हैं।

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी- जिसमें एक बुजुर्ग महिला का अपनी बड़ी कोठी में सोफ़े पर बैठने की स्थिति में कंकाल बरामद हुआ। बुजुर्ग महिला बैठे हुए ही मृत्यु को प्राप्त हो गयी, मृत शरीर को सड़ने से लेकर कंकाल मात्र रह जाने में कितना समय लगा होगा, ये सोचकर और उस तस्वीर को देखकर ही रूह कांप जाती है।

इसी तरह की एक और कहानी वायरल हुई, कहानी का शीर्षक था- “अपाहिज बूढ़े मेज़र जनरल का हश्र” कहानी कुछ इस तरह है- चलने-फिरने में असमर्थ रिटायर्ड मेजर जनरल के बेटो की नई शादियाँ हुई थी। एक ने गर्मी की छुट्टियाँ गुजारने फ्रांस का प्रोग्राम बनाया, दूसरे ने लंदन का और तीसरे ने पेरिस का। घर के एक कमरे में मेजर का फर्श पर गद्दा लगा दिया गया, और नौकर को कहा कि इनका पूरा ख्याल रखना, हमें कोई शिकायत ना मिले। मेजर का इतना नाम था कि उन्हें हर जगह अपना परिचय मेजर जनरल के बेटे के रूप में देना पड़ता था।

 जाने से पहले नौकर को चेतावनी दी गयी थी कि तीन माह यानि उनकी वापसी तक नौकर को बाबा का पूरा ख्याल रखना होगा और वक्त पर खाना देना होगा। सबके चले जाने पर नौकर ने सारा काम संभाल लिया। मेजर अकेले घर के कमरे में लेट साँस लेते रहते, चल-फिर नहीं सकते थे, न खुद से कुछ मांग पाते। एक दिन नौकर घर को ताला लगाकर बाजार से ब्रेड लेने गया, उसका एक्सीडेंट हुआ और हॉस्पिटल पहुँचाने तक वह कोमा में चला गया। रिटायर्ड मेजर जनरल कमरे में बन्द, वे किसी को आवाज देने की स्थिति में नहीं थे। नौकर कोमा से होश में नहीं आया, इधर 3 माह बाद जब बेटों ने वापस आकर ताला तोड़कर कमरा खोला तो उनके पिता की लाश कंकाल में तब्दील हो चुकी थी।

ये घटनाएँ इतनी कम भी नहीं हैं कि इन्हें यूँ ही मात्र घटना समझकर छोड़ दिया जाए, इस ताह की घटनाएँ हमें बताती हैं कि किस तरह अपनी संतान के लिए नेकी और बुराई की परवाह किए बगैर एक पूरी पीढ़ी उनका भविष्य संभालने के लिए अपना तन, मन, धन सब कुछ खपा देती है, उनका सपना भविष्य की पीढ़ियों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने का होता है उसी में वे अपना सम्पूर्ण जीवन स्वाह कर देते हैं। वे सोचते हैं कि यह औलाद बुढ़ापे में उनकी देखभाल व सेवा करेगी लेकिन भौतिक चकाचोंध में लिप्त आधुनिक पीढ़ी उनकी अपेक्षाओं के विपरीत व्यवहार करती है।

कितने ही बुजुर्ग सड़कों, गलियों, पार्कों में आपको अलग-अलग कामों में लिप्त मिल जाएंगे, आप उनसे उन कामों के बारें में बातचीत करेंगे तो वे बताएँगे कि हम समय व्यतीत करने के लिए ऐसा करते हैं, जबकि सत्य इससे परे होता है। घर के कितने ही काम उनके मत्थे मढ़ दिये जाते हैं, मसलन- बच्चों को पार्क ले जाना, बाजार से सब्जी लेकर आना, दूध लाकर देना, कार साफ करना, आदि काम; और महिला बुजुर्गों से सब्जी कटवाना, दूध गरम करवाना, मटर छिलवाना, दालें व चावल साफ करवाना, बर्तन साफ करवाना इत्यादि काम लिये जाते हैं। ग्रामीण समाज में बुजुर्गों से चरखा कतवाना, ऊन के कपड़े बनवाना, कपास ओटना, रस्सी बटवाना, गेहूँ साफ करवाना और पिसवाना इत्यादि काम लिए जाते हैं। इन कामों को लेने में महिलाओं की भूमिका अधिक दिखाई देती है इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि पुरुष इन कामों को लेने में पीछे होते हैं। मामला कुछ भी हो इस तरह से हम जाने-अनजाने बुजुर्गों का शोषण ही कर रहे होते हैं। जिस उम्र में उन्हें आराम की अवश्यकता हैं, जब उनकी मांसपेशियाँ शिथिल हो गयी हो, उस उम्र में उनसे काम लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।  

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे सबके शरीर में विकार / व्याधि का आना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में यदि वे उच्च वर्गीय हैं तो उनकी संतान नर्स या अटेंडेंट की व्यवस्था कर देती है। जबकि ये भी सर्वविदित है कि इलाज के साथ-साथ अपनों का स्नेहिल साथ बीमारी से उभरने में अधिक काम आता है। भौतिक सुख-सुविधा से परिपूर्ण जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है कि उनका समय किस तरह व्यतीत होता है? उम्रदराज लोगो के पास अवकाश का समय अधिक होने के कारण उन्हें मनोरंजन और बातचीत की अवश्यकता अधिक होती है लेकिन आँखें साथ न दे पाने के कारण वे मनपसंद पुस्तकें नहीं पढ़ पाते, टीवी-कार्यक्रम देखना भी उनके लिए कठिन होता है। अगर आँखें सक्षम भी हैं तो बच्चों के कार्टून कार्यक्रम, सास-बहू के सीरियल और न्यूज चैनल की राजनीतिक बहस इत्यादि परिवार द्वारा देखे जाने के बाद उनके लिए टीवी भी खाली नहीं रहता। ऐसे में उनका समय नहीं कटता जिसका नतीजा ये होता है कि तरह-तरह की दुश्चिंताएं उन्हें घेर लेती हैं, वे बदहवास से रहने लगते हैं। कुल मिलकर बच्चों, बड़ों दोनों के पास ही उनके लिए समय नहीं होता। एक समय था जब मोहल्ले-पड़ोस के बुजुर्ग गली में खेलते बच्चो को बुलाकर उनसे आल्हा-उदल के किस्से, रामचरित्र मानस की चौपाई, होली की कवितायें इत्यादि सुनते थे, लेकिन आज बच्चों तक के समय को इलेक्ट्रोनिक गजेट्स ने छीन लिया है। बुजुर्ग अधीरता या व्याकुलता से प्रतीक्षारत घर की दहलीज़ पर टक-टकी बाँधे रहतें हैं कि कोई आकर उनसे कुछ पल बातें कर लें। लेकिन आज इन बुजुर्गों के पास बैठना या बातें करना लोगों को समय की बर्बादी लगता है। एक बुजुर्ग महिला मेरी जानकारी में हैं जो महानगर में व्यस्त बेटे की फेस्बूक चेक करके देखती है कि क्या मेरा बेटा मेरे बारे में भी कुछ लिखता है? एक माँ अपने लेखक बेटे की रचनाओं की अखबार की कटिंग्स अपनी पड़ोसनों को दिखाकर कहती है-‘ये सब मेरे बेटे ने लिखा है।‘ एक महिला को सिर्फ इसलिए फेसबुक अकाउंट बनवाते देखा ताकि वह अपने विदेश में बसे बेटे और उसके परिवार की फोटो देखकर संतोष कर सके कि उनसे मिल ली। इस मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है कि बुजुर्ग अपने बच्चों से दूर होकर किस तरह की मन:स्थिति के साथ जीवन जीते हैं।  

सरकार ने वृद्धाश्रम को बुजुर्गों के जीवन के विकल्प के रूप में देखना शुरू किया, पिछले कुछ वर्षों में प्राइवेट वृद्धाश्रम में भी खूब वृद्धि हुई है। अभी देखने में मिलता है कि लोग-बाग रिटायर होने से पहले प्राइवेट वृद्धाश्रम में अपनी जगह सुरक्षित कर रहे हैं, ऐसे व्यक्ति अपने साथ साथ एक ऐसे व्यक्ति के लिए भी एक कमरा बुक कर देते हैं, जो अपना खर्चा वहन करने की स्थिति में नहीं है, उनकी मंशा उस व्यक्ति से अपनी सेवा कराना होता है, विचारणीय ये है कि वे जब खुद वृद्धावस्था में होंगे तो किसी अन्य वृद्ध की सेवा कैसे कर पाएंगे?

सरकार ने जगह-जगह वृद्धाश्रम खोल तो रखेँ है लेकिन न ही वे संख्या में पर्याप्त हैं न ही उनका रखरखाव ही सही है। धनिक वर्ग के बुजुर्ग बदनामी के डर से वृद्धाश्रम जाना नहीं चाहते तो दूसरी ओर आर्थिक दृष्टि से कमजोर या निम्न वर्ग के बुजुर्गों का जीवन गरीबी में ही बीत जाता है, मजदूर वर्ग के बच्चों के वृद्ध माँ-बापों की न तो अपेक्षा है न इच्छा ही। घर के टूट फूट इत्यादि के काम कराते हुए कितने ही बुजुर्ग ऐसे मिलते हैं जो शरीर से जर्जर होकर भी मजदूरी करते हैं, रिक्शा चलाते हैं या फिर किसी दुकान पर बेलदारी करते हैं। वे गरीबी में पैदा होकर गरीबी में ही दम तोड़ देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी वर्ग हो अधिकांश वृद्ध-जनों की स्थिति चिंतनीय ही है।

बदलती प्राथमिकताओं में आधुनिक पीढ़ी माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य-विमुख हो रही है। जिसमें एकल परिवारों ने आग में घी का काम किया है। आवश्यकताएं अनंत हैं और भौतिक सुख-सुविधाओं की बनिस्पत आदमनी न्यून, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता की उपस्थिति उन्हें बोझ सरीखी प्रतीत होने लगती है और वहीं से तिरस्कार की शुरुआत होने लगती है। वहीं से वृद्ध लोग दोयम दर्जे के व्यवहार का सामना करने लगते हैं।

मेडिकल विज्ञान की प्रगति रिपोर्ट पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि चिकित्सीय सुविधाओं के चलते देश में उत्पादक एवं मृत्यु दर घटने से बुजुर्गों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गयी है, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या की गतिशीलता से भी यह आंकड़ा बढ़ा है। हालात यही रहे तो जल्दी ही सम्पूर्ण भारत में यह विषमता आने वाली है कि वृद्धजन, जोकि जनसंख्या का अनुत्पादक वर्ग है, वह शीघ्र ही उत्पादक वर्ग से बड़ा होने वाला है। यद्यपि यह समस्या इतनी गंभीर नहीं है जितनी वृद्धों के समाज में समन्वय की समस्या है। इसका मुख्य कारण उम्र बढ़ने से व्यक्तिगत परिवर्तन होना और वर्तमान औद्योगिक समाज का अपने वृद्धों से व्यवहार का तरीका है। जैसे-जैसे व्यक्ति वृद्ध होता जाता है, समाज में उसका स्थान एवं भूमिका बदल जाते हैं। हमें उस भूमिका को समझने और उनके साथ तारतम्यता बैठाने की है।

21वीं सदी के तीसरे दशक के अंत तक वृद्धों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होने की संभावना है। विकसित राष्ट्रों में स्वास्थ्य एवं समुचित चिकित्सा सुविधा के चलते व्यक्ति अधिक वर्षों तक जीवित रहते हैं अत: वृद्धों की जनसंख्या विकासशील राष्ट्रों से ज्यादा विकसित राष्ट्रों में है। भारत एवं चीन, जो कि विश्व की जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा रखते हैं, इनमें भी बेहतर स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधा के चलते वृद्धों की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में वृद्धजनों की संख्या 10 करोड़ 38 लाख थी जिसमें अब तक भारी वृद्धि होने का अनुमान है।

संस्कृतियों में वृद्धावस्था को विद्वता एवं जीवन के अनुभवों का खजाना माना जाता रहा है। कितने ही किस्से सुनने को मिल जाते हैं जब शादी-विवाह या कार्यक्रमों में बुजुर्ग बड़ी समस्याओं के समय संकट-मोचक बनते हैं। अभी हाल ही में इसी तरह का एक ऐसा ही वाकया सुना, जब किसी बारात में बुजुर्ग को न लाने की शर्त रखी गयी, कुछ देर बाद लड़की पक्ष ने कहा- दुल्हन विदा करने की शर्त ये होगी कि पास बहती नदी में इतना दूध बहा दो कि नदी में पानी की जगह दूध ही दूध दिखाई दे। बारात में सब हैरान कि ऐसा कैसे संभव है। शादी में छुपा कर लाये गए एकमात्र बुजुर्ग ने समाधान सुझाया, तब लड़के पक्ष ने जाकर कहा- हम नदी में दूध बहा देंगे लेकिन पहले आप नदी को पानी से खाली करवा दीजिये। लड़की पक्ष के लोग समझ गए कि शादी में जरूर कोई बुजुर्ग है। यह कहानी मात्र बुजुर्गों की अहमियत बताने के लिए प्रयोग की गयी है, ऐसे कितने ही प्रचलित किस्से आप और हमने सुने होंगे।

परंपरागत रूप से हर संस्कृति में वृद्धों की देखभाल परिवार की जिम्मेदारी मानी जाती है लेकिन सामाजिक परिवर्तनों के चलते अब यह ज़िम्मेदारी राज्य एवं स्वशासी संगठनों की बन चुकी है। भारतीय संस्कृति में वृद्धों को अत्यंत उच्च एवं आदर्श स्थान प्राप्त रहा है। श्रवण कुमार द्वारा वृद्ध माता-पिता को कंधे पर बिठाकर संपूर्ण तीर्थयात्रा करवाने कि कहानी से कौन अपरिचित होगा। आज भी अधिकांश परिवारों में वृद्धों को ही परिवार का मुखिया माना जाता है। लेकिन अब श्रवण कुमार सा पुत्र होना ही मुखिया की भूमिका की सार्थकता सिद्ध कर पाएगा, अतः वर्तमान पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेने की अवश्यकता है।

यदि परिवार पर बरगद की तरह छांव फैलाने वाला व्यक्ति वृद्धावस्था में अकेला, असहाय एवं बहिष्कृत जीवन जिये तो ये आधुनिक पीढ़ी के लिए शर्म की बात है। जब तक हम वृद्धजनों की कीमत नहीं समझेंगे, उस उम्र की पीड़ा का अहसास नहीं करेंगे, तब तक हमारी सारी अच्छाइयां तुच्छ हैं। अतः वृद्धों के सम्मान हेतु जनचेतना जगाने की जरूरत है। वृद्धों की बेहतरी के लिए विशेष योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाना समय की मांग भी है। इसके लिए सतत प्रयास किए जाने चाहिए। वृद्धों के सम्मान में वृद्धि के लिये कुछ सुझाव:

1. बहुसांस्कृतिक जागरूकता पर हमें ध्यान देना होगा।
2. वृद्धों को काम के बदले ज्यादा पैसा मिलना चाहिए, इस संबंध में सरकार को नए नियम बनाने होंगे।
3. वृद्धों को अधिमान्यता देने में वृद्धों की समस्याएं सुलझ सकती हैं। नौकरियों में जहाँ बुद्धि एवं सोच की आवश्यकता हैं, वहाँ वृद्धों को लाभ देना चाहिए।
4. परिवार एवं राज्यों को वृद्धजनों की सतत देखभाल करनी होगी। जहाँ पर उनके अधिकारों का हनन हो रहा हो, वहाँ कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है।
5. वृद्धों को समाज में प्रमुखता मिलनी चाहिए ताकि उनके जीवन को सार्थकता का एहसास हो। उनकी सामाजिक कार्यों में संलिप्तता एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव उनके जीवन को नई स्फूर्ति प्रदान करेगा।
6. परिवार के निर्णयों में वृद्ध लोगों को शामिल करें ताकि उन्हें अपनी महत्ता का अहसास बना रहे।
7. वृद्ध व्यक्तियों को उनके मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य की देखभाल की पूर्ण सुविधा मिलनी चाहिए ताकि वे मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहें।
8. वृद्ध व्यक्तियों को उनकी ऊर्जा के साथ शिक्षा, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं मनोरंजन के स्रोतों को अपनाने की पूर्ण सुविधा मिलनी चाहिए जिससे कि उनमें परिपूर्णता का बोध हो।
9. वृद्ध लोगों को पूर्ण सम्मान एवं सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए ताकि वे मानसिक एवं शारीरिक शोषण से बच सकें।
10. परिवार के वृद्धजनों को भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक सहायता की अत्यंत आवश्यकता होती है ताकि वे अकेलेपन या अवसाद की स्थिति में न आ पाएँ।
11. वृद्ध लोगों को आर्थिक स्वतंत्रता बहुत जरूरी है। उनके पास पर्याप्त पैसा होना जरूरी है ताकि उनमें असुरक्षा की भावना समाप्त हो जाए एवं वे अपनी जरूरतों के मुताबिक खर्च कर सकें।

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