काव्य: श्रीमती स्वरूप कुमारी बक्शी

धरोहर
श्रीमती स्वरूप कुमारी बक्शी 
(22 जून 1919 – 13 अप्रैल 2019)
श्रीमती स्वरूप कुमारी बक्शी हिंदी की सुविख्यात, वरिष्ठ साहित्यकार थीं एवं उनके द्वारा रचित 37 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कहानी, कविता एवं नाटक संग्रह, उपन्यास, लघु उपन्यास, खण्ड काव्य, बाल साहित्य आदि शामिल हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में इनके साहित्य पर शोध कार्य भी हुआ है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा यश भारती सम्मान तथा अन्य कई सम्मानों से इन्हें विभूषित किया जा चुका है। आकाशवाणी से इनके द्वारा रचित वार्ताएँ, कहानियाँ, एकांकी नाटक, कविताएँ आदि प्रसारित होती रही हैं। इनके द्वारा सृजित नाटकों का मंचन बड़ौदा, पुणे, भोपाल, लखनऊ आदि में भी हुआ है। स्वरूप कुमारी बक्शी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं तथा उत्तर प्रदेश सरकार में वह शिक्षा, गृह एवम समाज-कल्याण मंत्री भी थीं। आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. संस्कृत तथा एम.ए. अंग्रेज़ी में पास किया था।



प्रकृति वात्सल्यमयी है


आज तुमको मैं सुनाऊँ
एक अनहोनी कहानी,
दो दृगों में भर न लेना
सावनी धारा सुहानी। 

डगर सूनी मौन लम्बी
था वहाँ जंगल घनेरा,
बढ़ रहा था सनसनाहट
वंशियों को ले अँधेरा। 

दूर जंगल में उतरती आ
रही थी साँझ वेला,
वृक्ष पर लगने लगा था
पक्षियों का मधुर मेला। 

यह सरल है छन्द केवल
वेदना गम्भीर लाए,
मौन अक्षर हैं कटोरे
जो नयन का नीर लाए।  

लो अचानक रुक गई मैं
सामने क्या दृश्य देखा,
टूटकर मानो धरा पर
गिर पड़ी थी चन्द्र रेखा। 

वृक्ष के नीचे पड़ी थी
मृदु कमल कलिका अकेली,
जो कभी न हो सके हल
दुखित अनबूझी पहेली। 

झींगुरों का झुनझुना ले
मौन धरती माँ बनी थीं,
पुष्प कलियों के खिलौने
प्रीत मन कितनी घनी थी। 

रश्मियों के तार झूला
सा झुलाते जा रहे थे,
वृक्ष के पत्ते थिरक
पंखे डुलाते जा रहे थे। 

आ गईं  चिड़ियाँ कई, उस
पर दया करने लगी थीं,
गीत गाकर चहचहा कर
लोरियाँ देने लगी थीं। 

घोर वन की शून्यता में
वह अकेली स्वामिनी थी,
खो गई है बीन जिसकी
अश्रु भीगी रागिनी थी।

चन्द्र रेखा सी सलोनी
सुन्दरी नवजात थी वह,
कौन उसको छोड़ आया
क्रूर कितनी बात थी वह। 

स्नेह मात या पिता का
मिल नहीं पाया उसे था,
एक काँटा समझ कोई
क्यों वहाँ वह रख गया था। 

क्रूर है मानव परन्तु
प्रकृति ममता बनी है,
दीन दुखियों के लिए
सद्भावना गहरी घनी है। 

माँ प्रकृति उसका हृदय
है प्रेम का झरना निरन्तर,
कर रही रक्षा ममत्वम्
श्वान हो या मनुज सुन्दर। 

वह नहीं थी निःसहाय
वन पिता का था सहारा,
माँ बनी मृदु लोरियाँ
गाने लगी शुचि सलिल धारा। 

वृक्ष भी झलने लगा तब
प्यार से पंखे निरन्तर,
डालियों ने फूल की चादर
बिछा दी बालिका पर।

भूख जब उसको लगी
रोने लगी नन्हीं पहेली,
चोंच में दाना लिए झट
आ गई चिड़िया सहेली। 

गगन के पक्षी, नदी की
मछलियाँ औ शेर हाथी,
प्राण से सम्पन्न शक्ति,
ये हमारे मित्र साथी। 

वृक्ष डाली फूल पत्ती
बन गए सब मित्र प्यारे,
खिल उठी नन्हीं कली
नव गगन पक्षी क्षण न हारे। 

गोद में मैंने उठाया
एक पल वह फरफराई,
नैन खोले एक क्षण फिर
फूल सी वह मुस्कुराई। 

अश्रु भर आए नयन में
देख पंकज पात सुस्मित,
उमड़ आया स्नेह मन में
मातृ सुख से मैं असिंचित। 

बस्तियों से दूर जंगल
में हमारी झोंपड़ी थी,
सूर्य की सूई चली तो
वह घराने की घड़ी थी।

लकड़हारा था घरेलू
संगिनी मेरी गरीबी,
धन नहीं था पास मेरे
यह हमारी बदनसीबी। 

चाँदनी की रश्मि सी
कुसुम जूही की कली थी,
गोद में लिपटी हुई वह
कमल कोमल सी भली थी। 

हो गया प्रसन्न मालिक
देख उसको मुस्कुराया,
श्रमिक हाथों से उठाया
झूल-झूले से झुलाया। 

शून्य था संसार मेरा
हो गया गुलज़ार मेरा,
एक नन्हीं-सी कली ने
कर दिया उद्धार मेरा।
झोंपड़ी  के आँगना में
स्वर्ग हर्षित सुख समाया,
थिरकती मुस्कान उसकी
हृदय मेरा जगमगाया। 

पालना पल-पल झुलाऊँ
लोरियों में गीत गाना,
माँ यशोदा बन गई मैं
अँगना मेरा सुहाना।

जन्म लेने के समय शिशु
एक से होते यहाँ हैं,
गोद में माँ के दुलारे
दूध ही पीते यहाँ हैं। 

नव शिशु सुकुमार कोमल
जन्म से निष्पाप होता,
ईश्वर की रश्मियों को
बादलों के संग लाता। 

एक गोरा एक काला
एक घन घनश्याम,
दूध का रंग एक जैसा
अश्रुओं के दाम। 

एक ईश्वर है सभी में
एक ही है जात उनकी,
एक ही है शाम उनकी
एक ही है प्रात उनकी। 

भूल जिसने भी करी हो
अबोध को क्यों भोगना है,
सत्य की रवि-रश्मियों को
आज हमको खोजना है। 

जो भी हो मर्जी तुम्हारी
हे प्रभू प्यारी वही है,
दोष को वरदान कर दे
नर वही नारी वही है।
***

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