समीक्षा: 'भूर--भू--स्वाहा' सिकुड़ते गाँव और फैलते शहर की कहानियाँ

विजय कुमार तिवारी


साहित्य समीक्षा, आलोचना पर बहुत कुछ लिखा गया है, लिखा जा रहा है, यह क्रम जारी रहना चाहिए और रहेगा भी। कहीं मुझे पढ़ने को मिला, आशय यही था कि नामचीन आलोचक जिन कृतियों को महान और बड़ा सिद्ध कर देते हैं, पाठक उन्हें परे कर देता है। यह चिन्तन का विषय होना चाहिए कि समस्या है कहाँ - लेखक के लेखन में, पाठकों में, या आलोचना, समीक्षा में। लेखक अपने अनुभूत संसार को अपनी संवेदना के साथ लिखता है और जितना उसका अनुभव है, वैसा ही उसका लेखन उभर कर आता है। पाठक को वही लेखन आकर्षित करता है जहाँ उसकी पीड़ा, संघर्ष या अनुभूतियाँ चित्रित हुई दिखाई देती हैं। यह मूल चिन्तन है लेखन-पठन का। साहित्य लेखन में कला पक्ष भी है, अलंकार, रस हैं और अनुभूतियों का मानवीकरण भी। इसमें भिन्नता का होना संभव है क्योंकि कोई भी पूर्ण परिपक्व नहीं होता, इधर दृष्टि गई तो उधर छूट गया, एक भाव मजबूती से पकड़ा तो दूसरा भाव कमजोर रह गया। आलोचना, समीक्षा में इसका उल्लेख किया जा सकता है परन्तु सीधे लेखन को खारिज कर देना किसी भी तरह उचित नहीं है। जितना है, कम से कम उतना भर का सम्मान, श्रेय लेखक को मिलना ही चाहिए। समीक्षक, आलोचक के अधीन नहीं है किसी कृति को महान या कमतर घोषित करना, यह अधिकार पाठकों के पास है, इसलिए ऐसे प्रयास हमेशा हँसी के पात्र होते हैं। समीक्षाएँ हमेशा रचना आधारित होती हैं, ऐसे में समीक्षक के पास बहुत कुछ कहने के लिए नहीं होता। उसे वही कहना है जो रचना में है।

विजय कुमार तिवारी
बक्सर, बिहार में जन्मे कथाकार, लेखक शिव कुमार यादव लम्बे समय से पश्चिम बंगाल में आसनसोल के पास बर्नपुर में रहते हुए साहित्य सृजन में लगे हुए हैं। उनके लेखन का दायरा कहानी, कविता, संस्मरण, उपन्यास के साथ-साथ संपादन तक फैला हुआ है। धनबाद प्रवास काल में उनके ही सौजन्य से हिन्दी के बहुचर्चित लेखक, कथाकार, उपन्यासकार संजीव जी से जुड़ने का सुअवसर मिला। आसनसोल के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर उनकी सक्रिय उपस्थिति रहती है। उन्हीं का कहानी संग्रह 'भूर--भू--स्वाहा' आजकल मेरे सामने है। कथाकार के भीतर की संवेदना का प्रमाण संग्रह का शीर्षक ही है जिसमें लिखा गया है, ये सिकुड़ते गाँव और फैलते शहर की कहानियाँ हैं। इस संग्रह में कुल 16 कहानियाँ हैं जो उनके चिन्तन की दशा-दिशा का संकेत करती हैं।

उनकी कहानियों में गाँव, कस्बा या अर्धशहरी क्षेत्र हैं, वहाँ के लोग हैं, उनका जीवन और संघर्ष है, खुशियाँ और रहन-सहन सब कुछ पूरी सच्चाई के साथ उपलब्ध है। हर लेखक की अपनी दृष्टि व चिन्तन होता है, वह अपने पात्रों के जीवन के साथ घुला-मिला होता है और अनुभूत सत्व को सामने रख देता है। शिव कुमार जी कुछ अधिक ही संवेदनशील हैं जन-पक्षधरता को लेकर, विसंगतियों को लेकर उनका मन चिन्तित और खिन्न हो उठता है। सुखद है, उनके मन की पीड़ा कहानियों, कविताओं के माध्यम से पाठकों को जोड़ती हैं, सम्यक प्रभाव डालती हैं और चेतना जगाती है। ऐसे लेखन की अति संवेदनशीलता कुछ प्रश्न खड़े करती है, उत्तर देश-समाज को ही देना है और पाठक सब समझते हैं।

संग्रह की पहली कहानी 'हंसली माई की जै' लोमहर्षक किंचित वीभत्स और मार्मिक रचना है। गँवई बोली-भाषा और वहाँ के जीवन में रसी-पगी दुख और पीड़ा की कहानी उनके रचना कौशल का परिचय देती है। यह औपन्यासिक आधार वाली गरीबी, अशिक्षा, नीच-ऊँच, घृणा-प्रेम और अपनों की बर्बरता की कहानी है। शिव कुमार जी की शैली अद्भुत है और बड़ी सच्चाई के साथ उन्होंने कहानी को विस्तार दिया है। कहानी में बहुत सारे प्रश्न खड़े हैं जिनका उत्तर खोजना मुश्किल है। नारी विमर्श तो है ही, साथ ही जीवन का अर्थतंत्र और देह तंत्र अपनी पूरी बेहयाई के साथ उजागर हुआ है। हमारे समाज में व्याप्त वर्ग-संघर्ष के साथ-साथ अपनों द्वारा नारी को पीड़ित करने और सामाजिक बुराइयाँ किस तरह नारी के जीवन को तबाह करती हैं, यह एक जबरदस्त उदाहरण है।

'मेघा मुसहर की आँख' कहानी की भाषा-शैली, गँवई शब्दावली, भोजपुरी मिश्रित हिन्दी, उन्होंने चमत्कार किया है। जिनका जीवन गाँवों में शुरु हुआ या बीता है, उन्हें ये कहानियाँ और उनके चरित्र बिल्कुल अपना लगेंगे। जीवन के इन ठेठ गँवईपन को भाषा का संस्कार देकर कहानी रच देना, सबके बस की बात नहीं है। कथ्य-कथानक से साफ लग जायेगा, हमारे गाँव कितने भयानक दौर में जीते हैं और उनका संघर्ष कितना बड़ा होता है। देश कितना भी तरक्की कर ले, गाँव का जीवन जस का तस रहता है। वर्ग-संघर्ष है, जाति-गत संघर्ष है परन्तु सर्वाधिक विसंगतियाँ आर्थिक हैं। एक ओर जमींदार हैं, साथ में मध्यम खेत-खलिहान वाले हैं और दूसरी ओर खेतिहर मजदूर हैं। मजदूरों ने मजदूरी बढ़ाने पर ही धान की रोपाई करने का मन बनाया है, बल्कि हड़ताल कर दी है। शिव कुमार जी लिखते हैं-"पूरा का पूरा भोजपुर अंचल तबाही एवं बर्बादी के कगार पर बढ़ने लगा, धीरे-धीरे---। कहीं सवर्णों की हत्या तो कहीं दलितों, शोषितों एवं पिछड़ी जाति वालों की हत्या--। महीना-दो महीना पर मनाये जाने लगा हत्या-त्योहार।" देश में, राज्य में नई-नई राजनीतिक पार्टियाँ बनने लगीं। बक्सर के किले के मंच पर आम सभा हुई। शिव कुमार जी लिखते हैं, 'आज वही पार्टी, वही नेता, लीडर जिन्होंने अपने चोले बदल लिए थे, तथाकथित गाँधीवादियों या जवाहर टोपीधारियों की भांति हाथ जोड़े, चुनाव में खड़े उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे थे।" हत्याएँ हो ही रही हैं। मेघा मुसहर की आँखों में उस रात का दृश्य तिर उठा। मौत किसी और को आनी थी, मारा गया कोई और। वह दर्द से चीख उठा। शिव कुमार जी लिखते है, 'समय के जाल में वह फंसा था। जाल में नहीं, समाजवाद के फंदे में। समाजवाद का जहाज किस किनारे लगेगा, किसी को नहीं मालूम। गुनगुना-सा अहसास, शोषितों एवं दलितों के लिए भूमि बंटवारे, उचित मजदूरी और सामाजिक न्याय की लड़ाई तो राजद, समता, बसपा एवं अन्य पार्टी वाले हथिया लिए।" हत्याएं फिर भी नहीं रुकीं। दलित, हरिजनों का नरसंहार हुआ जिसने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया। कहानी के माध्यम से शिव कुमार जी कारणों की तलाश करते हुए लिखते हैं, 'भेद खोलने वाला भी कोई दूसरा नहीं बल्कि मेघा मुसहर की आँख ही थी। उन आँखों में उतर आयी थी इलाके की गरीबी और नरसंहार--।'

उनकी कहानियों के बिम्ब चमत्कृत करते हैं, उनके पास वह दृष्टि है, सब कुछ दिखाई देता है, गरीबी, सूखा और आसन्न भुखमरी। वे लिखते हैं, 'बाढ़ और सूखे से फसल बच भी गई, तो भी क्या गारंटी कि अनाज लेकर घर चला जायेगा। औनी-पौनी, लेना-देना, रेंट-मालगुजारी, डीजल-पेट्रोल का अकाया-बकाया चुकता करते-करते जीवन की सांसें रुक जायेंगी।" किसान के जीवन में कदम-कदम पर संघर्ष है और स्थिति दुश्मनी में बदलते देर नहीं लगती। नहर के पानी से सिंचाई को लेकर संघर्ष की कथा बहुत कुछ कहती है। पानी की राजनीति में किसुनी लहूलुहान है और पति-पत्नी के बीच, देश में व्याप्त जाति, भाषा और क्षेत्र के चलते असुरक्षा को लेकर संवाद कहानी की सच्चाई बयान करती है।'एक अपराध यह भी' कहानी की शुरुआत गोरख पांडेय की कविता से हुई है-इस दुनिया को/जितनी जल्दी हो सके/बदल देना चाहिए। यह समाज और देश के राजनीति की कहानी है। नंदीग्राम, झाड़ग्राम का आंदोलन नैनो कार से जुड़ा है। वे साहस पूर्वक उन कहानियों को उठाते हैं जिसने समाज को हिला कर रख दिया है। कहानीकार की कोशिश को अनसुना-अनदेखा नहीं किया जा सकता, भले कोई सहमत हो या न हो। अनारो हंसदा पढ़ी-लिखी समझदार युवा महिला है, पार्टी से जुड़ी है और समाज के हर मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय-विचार रखती है। जमीन को लेकर उठा मतभेद भाई-भाई की दुश्मनी में बदल गया था। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ थी अनारो और मार्क्सवाद व गाँधीवाद दोनों को मानती थी। पहले उसे गायब कर दिया गया और अंत में वह मृत पायी गयी। शिव कुमार जी ने बड़ी बेबाकी से सत्ता, राजनीति, पुलिस-प्रशासन आदि सारे रहस्यों से अपनी कहानी में परदा उठाया है।

वे अपनी कहानियों में भोजपुरी से जुड़े संवाद की भरमार करते हैं, यह उनका अपनी माटी की भाषा से प्रेम है और लेखन शैली का उदाहरण भी। उनका बिम्ब-ज्ञान और चित्र संयोजन का हर कोई कायल हो सकता है, 'भूर--भू--स्वाहा' कहानी देखिए-"हवा के संग-संग ओले की बौछार---। खेतों में लठ की तरह खड़े गन्ने सुत गये। फूले-फले सरसों उड़ गये। गेहूँ, जौ, चना, खेसारी, मटर एवं टमाटर का कहीं नामोनिशान नहीं बचा। घंटे-दो-घंटे के मौसम ने किसानों की नींद उड़ा दी।" किसान की स्थिति, मनःस्थिति का सटीक चित्रण हुआ है यहाँ और शिव कुमार जी ने कारणों की चर्चा की है, कोई सहमत-असहमत हो सकता है, परन्तु पूरी तरह नकार नहीं सकता। वे लिखते हैं, "अगर किसान जिन्दा है तो अपने हौसलों और संघर्षों से---अपनी मेहनत और खेती से।" उसी खेती का बंटवारा चाहता है चरित्तर का भाई ईश्वर। शिव कुमार जी ने विस्तृत विवेचना की है कहानी में और चरित्तर, करुनी का संघर्ष, दुख, पीड़ा और भावनाओं की उथल-पुथल खोल कर रख दिया है। यह कल्पना नहीं है बल्कि गाँवों की, उनसे जुड़े किसानों की सच्चाई है जिसे समझने, बचाने वाला कोई नहीं है। वे विकास के नाम पर हो रहे विध्वंस कि चर्चा करते हैं। 'कारोबार' कहानी में जिन रास्तों पर पहले छायादार पेड़ हुआ करते थे, अब नहीं हैं, सड़के बन रही हैं और पेड़ काटे गये हैं। फेरी करके गाँव-गाँव घूमने वाले नायक और उसके परिजनों के संघर्ष पर अच्छी कहानी है। अंत के दृश्य समाज के भीतर का अन्तर्विरोध दिखाते हैं, विचलित करते हैं और व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं।

'हम जायें तो जायें कहाँ---' कहानी आज के दहशत भरे हालात की कहानी है, न गाँव सुरक्षित हैं और न शहर। शंकर शहर से गाँव लौटना चाहता है ताकि चैन से जीवन गुजार सके। चतुरानन गाँव से शहर भाग आया है ताकि अपना जीवन बचा सके। शहर में कर्फ्यू लगा है और सभी आतंकित हैं। चतुरानन कहता है, "वहाँ आदमी तमाशा बन गया है तमाशा।" शिव कुमार जी कहना चाहते हैं, आज के गाँव खूंखार हो चुके हैं। चतुरानन शंकर से कहता है, "गये होते तो जान पाते कि वह शहर से भी अधम है।" शंकर शहर की, अपनी नौकरी की समस्याएं, शोषण की कहानियाँ सुनाता है, चतुरानन गाँव की जानलेवा वारदातों की चर्चा करता है और कहता है, "देख काकी, इस दुनिया में सिर्फ बुरे लोग ही नहीं मारे जाते, उनमें कुछ अच्छे लोग भी होते हैं।" वह फिर कहता है, "सिर्फ शहरों में ही गुण्डे, क्रिमिनल नहीं बसते काकी, गाँवों में भी बसते हैं।" शिव कुमार जी लिखते है, "खून कभी मरता नहीं। एक बूँद से कई बूँद बनता है---बदला, फिर बदले का बदला, कुछ भी बदलता नहीं।" अंत में कहानी प्रश्न करती है, "हमारी जगह कहाँ है--गाँव में या शहर में, देश में या विदेश में--कहाँ है हमारी जगह?"

कहानीकार की विशेषता है, उनकी कहानी के भीतर अनेक कहानियाँ जन्म लेती हैं, अनेक भाव-विचार फैलते जाते हैं। 'अंधेरे में बेकली' अत्यन्त मार्मिक कहानी है। बेकली अपने काम का वीभत्स चित्रण करती है और थूक देती है। पति का दारू पीना, काम न करना दोनों के बीच झगड़े का मूल कारण है। वह उसे बांझिन कहता है और बेकली उसे नामर्द। वह श्मशान बाबा के यहाँ आना-जाना शुरु करती है, सेवा करती है, चढ़ावा चढ़ाती है, वह सब करती है जो बाबा कहता है और एक दिन उसका पाँव भारी होता है। लोटना की शक्ल न उससे मिलती है और न धूपना से। उसके रंग-रूप को देख बेकली को लगता है, ऐसा ही होगा बाबा। उसके भीतर उद्वेग, घृणा एवं प्यार का ज्वालामुखी पिघलने लगता है। उसी बाबा की लाश पड़ी है। डाक्टर बताते हैं, यह बहुत बडा मुजरिम है। इसने न जाने कितनी औरतों की इज्जत बरबाद की है। बेकली चाकू उठाती है, छलनी कर डालती है बाबा का चेहरा, पेट से अंतड़ियाँ बाहर निकल आती हैं और वह चीख पड़ती है-'कमीना, दगाबाज--पापी।" कहानीकार पात्रों के परिवेश, रहन-सहन, भाषा-बोली और चिंतन-मनोविज्ञान का बखूबी चित्रण करते हैं, उनका लेखन चमत्कृत करता है।

भोजपुरी, हिन्दी व स्थानीय बोली से युक्त संवाद बोलना, गाली-गलौज करना और दांव-पेंच चलते रहना शिव कुमार यादव के पात्र खूब करते हैं। गाँव, टोला-मुहल्ला, हरियाली और गंदगी का चित्रण कहानी को यथार्थ से जोड़ता है। जातिगत तौर पर सामाजिक चित्रण और जातियों का बार-बार नाम लेना कहानी को कमजोर करता है या विद्वेष की संभावना बढ़ाता है। कुछ लोग किसी फैशन की तरह ऐसा करते हैं। बड़े रचनाकार को इससे बचना चाहिए। 'हवा' कहानी में सामाजिक ताने-बाने की खूब हवा बह रही है।  चुनाव की बिसात बिछी हुई है, सारे समीकरण साधे जा रहे हैं और बाहुबल-बुद्धिबल का खेल चल रहा है। कहानी में भय है, व्यंग्य है, उलाहना, उत्साह और संघर्ष है। सारे चरित्र कहानी में फिट बैठे हैं और बिम्ब अद्भुत प्रभाव डालते हैं। हनुमान सिंह चाणक्य हैं और काली चन्द्रगुप्त। काली ने जितनी बार दलदल से निकलने की कोशिश की, उतनी ही बार और नीचे धंसता गया। दबंग सुखी-बहू के सामने काली कमजोर उम्मीदवार है। वह चुनाव हार गया। पत्नी, पुत्र, पिता और भाई की नजरों से गिर गया, गिर गया अपनी जाति के लोगों के बीच, गिर गया अहीर टोली, कुर्मी टोली, कोइरी टोली, मुसहर टोली, चमटोली के बीच। पूरी चमटोली धू-धू कर जल उठी। पुलिस काली को पकड़ ले गयी और जमानत करवाने वही लोग आये जिन्होंने चुनाव लड़वाया था। गाँव की राजनीति को लेकर 'हवा' जोरदार कहानी है।

उनकी कहानियों मे किसान हैं, गरीबी है, संघर्ष है, सूखा, बाढ़ है और संवेदनाओं, दुखों से भरा जीवन है। 'रामऔतार की भैंस' कहानी में सूखा ऐसा पड़ा है कि धरती में दरार ही दरार है। गाँवों में ऐसे-ऐसे चरित्र यादव जी खोज निकालते हैं और अपनी कहानी का ताना-बाना बुन देते हैं कि कोई भी चमत्कृत होकर रह जाए। गाँव में रामऔतार है, उसका परिवार है, उसकी भैंस है, बेटी है, पढ़ना चाहती है। रामऔतार शादी कर देना चाहता है, दहेज के लिए पैसा नहीं है। शिव कुमार जी की भाव-प्रवणता देखिए, लिखते हैं-जैसे-जैसे रात से चाँदनी गायब होती गई, अंधेरा उसके भीतर और बाहर घना होता गया। जमीन को बंधक से बचाने के लिए उपाय की तलाश में जुट गया। गाँव में छोटे और मझोले किसान को कभी ऋण से मुक्ति नहीं मिलती, सारे दुख घेरे रहते हैं। कर्ज में डूबता जाता है किसान, सेठ साहूकार, दलाल मौज करते हैं। रामऔतार का सब बिक गया। अंत में भैंस खरीद लाया, बच्चा देने वाली है। वह समझ गया, बिना अर्थ का जीवन निरर्थक है। भैंस मर गई, खेत साहूकार का हो गया  और रामऔतार का सब कुछ छिन गया, जीवन भी, मृत्यु भी।

'बुद्ध की मोहब्बत' किसी वाद के विरोध में भटकाव की कहानी है। घटनाएं घटती हैं, जीवन नाना मोड़-चौराहों से गुजरता है और अर्थ-अनर्थ होता रहता है। जमाने से ऐसे चित्र गढ़े जाते रहे हैं और सामाजिक ढांचे को तोड़ा जाता रहा है। जाति-सूचक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। यह कोई नई बात नहीं है, सनातन के सामने बुद्ध को खड़ा किया जाता है। कहानी के कथ्य-कथानक, उनका प्रवाह रोचक है, सहमत-असहमत हुआ जा सकता है। ऐसे प्रसंगों पर बहुत सावधानी से गहरे चिंतन की जरुरत है। शिव कुमार जी प्रबुद्ध लेखक हैं, उनके चिंतन को नमन और ऐसी मार्मिक व भावपूर्ण कहानी लिखने के लिए बधाई भी।'नचनिया' कहानी की शुरुआत दार्शनिकता के साथ होती है, कहानीकार का दार्शनिक चिंतन प्रभाव शाली है। गोपाल 'नचनिया जाति' का है और उसका 'नाचना' ही धर्म है। कहानीकार को गाँव-जवार की सामाजिक व्यवस्था का रेशा-रेशा मालूम है और उनकी हर कहानी इसका सबूत है। पांडेपुर का चैत-महोत्सव ही है, हर जाति, हर धर्म के लोग एक हो जाते हैं। उनकी सोच एवं विचारों से प्रगतिशीलता एवं सामाजिकता की नदी बह उठती है। गोपाल की प्रसिद्धि चरम पर पहुँच गई। धन कमाया और गँवा दिया। गोपाल रानीगंज आ गया, नाचना शुरु किया, नौकरी की और एक दिन पंडिताइन को लेकर भाग गया।

शिव कुमार जी अपने पात्रों के भीतर की पीड़ा, अन्तर्द्वन्द व शोक-सन्ताप को समझते हैं और समझाना चाहते हैं। बड़ी बेबाकी से एक-एक रेशा उधेड़ते हैं और सब कुछ खोलकर रख देते हैं। भाषाओं का मिश्रित स्वरूप उनकी ताकत है और पात्रों के मनोभाव खूब अर्थवान होकर उभरते हैं। मुहावरे, शैली और अलंकार उनकी साहित्यिक पकड़ प्रमाणित करते हैं। वैचारिक टकराव  दिखता है और भीतर जड़ जमा चुकी चेतना का विस्फोट होता है। 'दोष मुक्त' कहानी की नायिका सरिता प्रेम कर बैठी है, वह भी मोहन कहार से और उसके घर रहने लगी है। जातिवादी सोच की आँधी चलती है और सब कुछ स्वाहा हो जाता है। शिव कुमार जी गहराई से ऐसे मुद्दे उठाते हैं और समाज व्यवस्था का चित्र खींचते हैं। उनके चिंतन में बहुत कुछ है, सहमति-असहमति हो सकती है परन्तु कहानी बड़ा संदेश देती है। गाँव के दहशत, भय के माहौल का चित्रण शिव कुमार जी पूरी सच्चाई के साथ करते हैं और अद्भुत बिम्बों का चयन करते हैं। गाँव में विद्वेष है और प्रेम का बिहँसता आकर्षण भी। कथाकार, मन का तनिक रसिक है, वैसे चित्र जीवन्त हो उठते हैं जब कोई प्रेम का दृश्य उभरता है। घर में बंटवारा भी एक मुद्दा होता है। 'मीठा जहर' कहानी में भगेलू जिसे पुत्र की तरह अमावस और पत्नी ने पाला-पोसा है, उसके चलते ही ऐसे हालात पैदा हुए हैं। अमावस-बहू यादों में खो जाती है। शिव कुमार जी का चित्र देखिए-भगेलू बाँस की कोंपल की तरह कोमल और अमावस-बहू चहकती, फुदकती गौरैये की तरह चंचल। भगेलू के मन में प्रेम का मीठा जहर घुलता गया। वह जिद्द करने लगा। भाई, भाई का दुश्मन बन चुका था। अमावस न जाने कहाँ गुम हो गया, भाई और पत्नी को छोड़कर। उनकी कहानियों में ऐसे प्रसंग खूब जगह पाते हैं और उनका मन जुड़ी संवेदनाओं में डूबता-उतराता रहता है।

वे प्रकृति का अद्भुत चित्रण करते हैं, पाठकों का मन मोह लेते हैं और भीतर की खुमारी किन्हीं चरित्रों में डालकर रस लेते हैं। बसंत का मौसम है, कहानी है 'खेत, खलिहान और प्रेम'। भौजाइयों के मन का गीत-संगीत उनकी लेखनी में उतर आता है, लिखते हैं, "का रे विरहिणी--फिरू से उँगुरी काटि लिहलू?" वे प्रेम भरा संवाद लिखने में बढ़कर हैं और विरह की पीड़ा भी। तुलसी भैया के विरह में भाभी के दिन कट रहे हैं। बच्चों का मुँह देखकर जीवित हैं वरना कब का मर चुकी होतीं। उसने काशी की राह पकड़ी और नाना प्रपंचों में उलझती रहीं, बचती रहीं। अचानक सुखद दृश्य उभरा, तुलसी ने खींचकर बचा लिया। वह तो जलती चिता में छलाँग लगाने वाली थीं। वे अपनी काशी यानी अपने गाँव लौट आये। शिव कुमार जी विरह, संवेदना, पीड़ा, दुख का जीवन्त वर्णन करते हैं और प्रेम में डूबते है, पाठकों को भी डुबाते हैं। 'मरकहा' कहानी बहुत कुछ कहती है। बबुआन, भदई, गंगा तिवारी, मास्टर-मास्टराइन और मरकहा बैलों की जोड़ी के बीच रची-बसी कहानी मार्मिक और संवेदनाओं से भरी हुई है। शिव कुमार जी गाँव की राजनीति, एक-दूसरे के बीच के सम्बन्ध, ईर्ष्या, द्वेष को खूब समझते हैं। वैसी ही भाषा बोलते हैं और उनके संवाद सच की कथा सुनाते हैं। वे लोगों का मनोविज्ञान जानते हैं और उसी के सहारे कहानियाँ बुनते रहते हैं। मौसम और प्रकृति का जीवन्त वर्णन उनके साहित्य को गरिमा और सुखद अनुभूतियों से भर देता है। उनके लेखन में भाषा का संस्कार उभरता है, शैली चमत्कृत करती है और कहावतें, मुहावरे अलग प्रभाव डालते हैं। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है, शिव कुमार जी गाँव को, वहाँ की भाषा को, राजनीति को, जातिगत समीकरण को, प्रेम-आकर्षण को और ईर्ष्या-द्वेष को खूब गहराई से समझते हैं। उनका दृश्य चित्रण चमत्कृत करता है और पाठकों को बाँधे रहता है।

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