अनोखी शैली में लिखे संस्मरण: फिरोजाबाद से मेलबॉर्न वाया मथुरा

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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समीक्ष्य पुस्तक: फिरोजाबाद से मेलबॉर्न वाया मथुरा
लेखक: डॉ. अशोक बंसल
पृष्ठ: 112
मूल्य: ₹ 200 रुपये
प्रकाशन वर्ष: जनवरी 2023      
प्रकाशक: इनटैक, वृन्दावन रोड, मथुरा   

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में पल-पल और पग-पग पर निरन्तर कुछ न कुछ घटित होता रहता है। अनुभव और अनुभूतियों के फलस्वरूप ताउम्र स्मृतियों के सघन वन मनुष्य के स्मृति-पटल पर संचित होते रहते हैं जिनमें से कुछ विस्मृति के कोहरे में छुप जाते हैं तो कुछ किन्ही विशेष कारणों से सुरक्षित बने रहते हैं। ग्रामीण और शहरी परिवेश का आम आदमी, अवसर विशेष पर उन स्मृतियों को खगालकर, हमउम्रों के बीच उड़ेल देता है। किन्तु साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े मनुज को ईश्वर प्रदत्त अति संवेदनशीलता और भावुकता का वरदान उन स्मृतियों को कलमबद्ध करने के लिए प्रेरित करता हैं। और जब वह सब कुछ कलमबद्ध होकर पुस्तक रूप में आ जाता है तो वह सार्वजनिक रूप से सामाजिक चेतना का श्रोत बनता है।

अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर रहे डॉ. अशोक बंसल ने हिन्दी में भी कई पुस्तकें लिखकर हिन्दी साहित्य में श्रीवृद्धि की है। अपने यायावरी स्वभाव के कारण डॉ. अशोक बंसल ने देश-विदेश में घूमकर समाज, संस्कृति और इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की हैं। उनकी पैनी दृष्टि, अछूते विषयों को तलाशने में तथा उनकी लेखन प्रतिभा उनको सहज, सरल भाषा में प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त है।

सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘फिरोजाबाद टू मेलबॉर्न वाया मथुरा’ उनकी पाँचवीं पुस्तक है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के सात दशकों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। डॉ. अशोक बंसल का कहना है कि मेरे जीवन के सात दशक का अधिकांश समय मात्र तीन शहरों, फिरोजाबाद, मथुरा और मेलबॉर्न में ही व्यतीत हुआ। नए-नए लोगों से संवाद करने के अवसर खूब मिले। पुस्तक में मैंने अतीत की इन्ही मधुर स्मृतियों को उकेरने का प्रयास किया है। पुस्तक को तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। पहले खण्ड में फिरोजाबाद में व्यतीत किए गये समय की विशेष स्मृतियों, का उल्लेख किया गया है तो दूसरे खण्ड में मथुरा में व्यतीत किए समय की घटनाओं को। तीसरे खण्ड में मेलबॉर्न प्रवास की स्मृतियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है।

फिरोजाबाद में जन्म,स्वतंत्रता सेनानी पिता के सानिध्य में आदर्श, देशभक्ति का पाठ, 20-22 वर्ष की उम्र में भारत आन्दोलन में भागीदारी के कारण जेल की सजा, पिता जी के लेखन में देशभक्ति, साम्प्रदायिक सद्भाव व इंसानियत आदि का प्रभाव डॉ. अशोक बंसल के जीवन पर भी पड़ा। फिरोजाबाद के कांच उद्योग में हिन्दू-मुस्लिम एकता का उदाहरण, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात का संयोग, फिरोजाबाद के घर पर क्रान्तिकारी शिव वर्मा का आना-जाना, अनेक साहित्यकारों रमानाथ अवस्थी, नीरज जी, देवराज दिनेश, बलवीर सिंह रंग आदि का भी घर पर आना-जाना। फिरोजाबाद में ही बनारसीदास चतुर्वेदी जी द्वारा ‘फिजी में मेरे 21 साल’ पुस्तक का लेखन, बनारसीदास चतुर्वेदी जी के घर पर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी, मन्मथदास गुप्त, शिव वर्मा, पृथ्वी सिंह आजाद, आदि क्रा क्रान्तिकारियों से मुलाकात, शिक्षा के दौरान के मित्रों से छोटी-छोटी बातों का वर्णन इस खण्ड में किया गया है।

‘मथुरा में’ पुस्तक का दूसरा खण्ड है जिसमें डॉ. अशोक बंसल जी ने फिरोजाबाद से मथुरा आने, डैम्पियर नगर मौहल्ले में एक चतुर्वेदी परिवार के साथ रहने, मथुरा के बी.एस. ए. कॉलेज में अध्यापन कार्य शुरू करने से लेकर साढ़े इकतालीस साल तक नौकरी करने के खट्टे-मीठे अनुभवों की अभिव्यक्ति, अंग्रेजी कविताओं का पद्यानुवाद हिन्दी में करके विद्यार्थियों को पढ़ाने का दिलचस्प किस्सा, विद्यालय की प्रबन्ध समिति के खिलाफ शिक्षकों का जेहाद, बी.एस.ए. कॉलेज के इंजीनियरिंग विभाग की शुरुआत, छात्रों के बीच पनपती राजनीति, इंदिरागांधी की हत्या के बाद मथुरा की स्थिति, मथुरा में जनवादी लेखक सव्यसाची जी के साथ सम्पर्क, पूर्व प्रधानमंत्री अटलविहारी वाजपेयी जी से मथुरा में मुलाकात, अमृतलाल नागर जी की सुपुत्री डॉ. अचला नागर जी का आकाशवाणी मथुरा पर कार्यक्रम अधिकारी के रूप में स्मरण, स्वयं का पत्रकारिता के क्षेत्र में पूरी तरह उतरने के कारण और सफलता आदि का जिक्र सब कुछ विस्तार से दिया है।

डॉ. अशोक बंसल जी ने अपने जीवन की उस घटना का भी जिक्र किया है जो मथुरा में घटित हुई और जिसने उनकी नास्तिक सोच को आस्तिकता में बदल दिया। वह लिखते हैं-

बहरहाल, मैं दो माह तक अवसाद में रहा। ... मेरे शरीर में लगे छर्रों के निशान आज भी हैं। मैं क्यों बचा, कैसे बचा? जीवन क्या है? हम संसार में क्यों आये हैं? आदि सवाल मेरे मानस में लम्बे वक्त तक कौंधते रहे। मेरे ऊपर मेरे पिताजी का प्रभाव था। वे नास्तिक थे, अतः मैं भी सुबह-शाम पूजा में शरीक नहीं होता था। ... लेकिन इस घटना के बाद न जाने क्यों वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिर ‘श्री बाँके विहारीजी के मंदिर में अपनी पत्नी, बच्चों और मित्रों के साथ खुशी-खुशी जाने लगा।

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