ग़ज़लों में समकालीन भावबोध की व्यापक अभिव्यक्ति: नहीं कहूँगा मैं रात को दिन

समीक्षक: अरुण कुमार निषाद 


नहीं कहूँगा रात को दिन (ग़ज़ल संग्रह)
रचनाकार: लक्ष्मी नारायण पाण्डेय 
प्रकाशक: सन्दर्भ प्रकाशन भोपाल म.प्र
संस्करण: प्रथम, 2022 ई.
मूल्य: ₹ 350 रुपये
पृष्ठ: 112  

डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय जी हिन्दी, संस्कृत, बुन्देली और भोजपुरी के काव्य जगत में बरसों से सक्रिय हैं। विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों में इनकी रचनाएँ बराबर छपती रही हैं। 'नहीं कहूँगा रात को दिन' डॉ. पाण्डेय जी का नवीन प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह है। हाल ही में यह सन्दर्भ प्रकाशन भोपाल (मध्य प्रदेश) से आया है। डॉ. पाण्डेय जी की ग़ज़लें सलीक़े से कही गयी ख़ूबसूरत ग़ज़लें होती हैं। इनकी ग़ज़लों में भरपूर ग़ज़लियत के साथ-साथ समकालीन भावबोध भी व्यापकता के साथ मिलता है। प्रस्तुत संग्रह की ग़ज़लें भी इन्हीं विशेषताओं से लैस, सरोकार सम्पन्न ग़ज़लें हैं।

इस संग्रह की ग़ज़लों को पढ़ते हुए मेरा पहला ध्यान इनके समकालीन कथ्य पर गया। डॉ. पाण्डेय जी का जागरूक ग़ज़लकार वर्तमान समय के विभिन्न विमर्शों के साथ ही हमारे समय की कई समस्याओं पर भी बेबाकी से अपनी बात रखता नज़र आता है। चाहे वर्तमान में पनपती नफ़रत की भावना हो या सियासत का अनिश्चित स्वभाव, सामाजिक विसंगतियाँ हों अथवा व्यक्तिगत स्वार्थ; डॉ. पाण्डेय जी खुलकर अपनी ग़ज़लों में इन सब पर प्रहार करते हैं।

लक्ष्मी नारायण पाण्डेय
अर्थहीन आज शान्तिमन्त्र, सूक्तियों का सार लापता
द्वार तक पसर गया है डर, राजा को पता ही नहीं॥ पृष्ठ 33

किसी किताब के पन्ने में नहीं लिक्खा है
जिन्दगी ने ही बताया है हाल रोटी का॥
सत्ता को सियासत को चेतावनी है यह
मेरा अंदेशा है कि उठता उबाल रोटी का॥ पृष्ठ 37

तुमने भी किया कमाल यार
हँस-हंसकर किया हलाल यार ॥

चिकने उजले-उजले चेहरे
मन के मैले मुखड़े बाबू।
रंग चेहरे का बदलता है अब
मौसमी हो गया आदमी॥ पृष्ठ 21

आशा और उम्मीद हर एक दौर में आदमी का एक बड़ा हथियार रहे हैं। हमने पत्थरों के बीच भी अंकुरण होते देखा है। हिन्दी के महान कवि रहीम ने भी समय आने पर काम होने की बात कह उम्मीद और धैर्य के साथ बने रहने की सलाह दी है। सच भी है कि जिसने धैर्य धारण कर लिया, उसने ख़ुद को पर्वत कर लिया यानी अब उसे मुश्किलों के कितने ही चक्रवात नहीं हिला पाएंगे। आशा, धैर्य और उम्मीद की सलाह हमें हमारे परिवेश में हर समय मिली है और शायद इसीलिए मिली है कि हम यह याद रखें कि हर अँधेरी रात के बाद सवेरा होता ही है। डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय जी अपने समय के विसंगत से दु:खी और निराश तो होते हैं लेकिन इसी उम्मीद के सहारे ख़ुद को और आम जनमानस को मायूस होने से बचाए रखते हैं।

अरुण कुमार निषाद
है तिमिर माना सघन, छट जाएगा
देख लेना तुम उजाला आएगा॥
आज हो चाहे नहीं  उम्मीद के माफिक
हौसला रख कल तुम्हारा आएगा॥ पृष्ठ 16

हौसला टूटने नहीं देना
उम्र का क्या वो तो ढलनी है॥ पृष्ठ 29

राह की यह धुंध तो छट जायेगी तुम देखना
आयेगी कल सुबह ये आसार मुझको चाहिए॥ पृष्ठ 41

उलझन है तो हल निकलेगा
आज नहीं, तो कल निकलेगा॥ पृष्ठ 64

कविता में अपनी बात रखने का अंदाज़ बहुत महत्त्वपूर्ण अंग होता है। ग़ज़ल में इसका और ज़्यादा महत्त्व है। हज़ारों-लाखों सृजकों के बीच अपनी बात कहने का ढंग ही एक रचनाकार को ख़ास बनाता है। डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय जी के पास कहीं-कहीं अपनी विशिष्ट शैली के दर्शन होते हैं। इनके पास परम्परागत कहन के इतर अपना एक विशिष्ट अंदाज़ मिलता है। ये किसी भी संवेदना को शेर करते समय बात को घुमाने की बजाय सीधा और साफ़-साफ़ कहना पसंद करते हैं। लेकिन ऐसा ये अपने अंदाज़ में करते हैं और ऐसा करते हुए ये अन्य रचनाकारों से अलग खड़े होते हैं।

इक बिजूका के जैसा जरा
आजकल हो गया आदमी॥ पृष्ठ 21

जीवन कहाँ किताबों में है
बाहर बिखरा है, देखो तो॥ पृष्ठ 39

कारकों का नवीनीकरण हो गया
कर्म अपभ्रंश का अनुकरण हो गया॥ पृष्ठ 43
तिनका-तिनका हमेशा जुटाता रहा
इस तरह नीड़ अपना बनाता रहा॥ पृष्ठ 40

अपने दौर की विसंगतियों से टकराना, उनके कारणों की पहचान कर सवाल खड़े करना तथा समाज को उनसे सचेत करना डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय जी की ग़ज़लों का हासिल है। इसके साथ ही अपने समकालीन जीवन पर नज़र बनाए रखना भी इनकी ग़ज़लों का सकारात्मक पक्ष है।

हमने लोगों से सुना है
कागजों पर पुल बना है॥ पृष्ठ 51

बढ़ती हुई घोर सांप्रदायिकता और टूटती-बिखरती भाईचारे की भावना को व्यक्त करते हुए डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय के ये अशआर बेहद पुरअसर बन पड़े हैं। वे कहते हैं:

खून के धब्बे न हों, लाशों की न कोई खबर
एक दिन ऐसा हरेक अखबार मुझको चाहिए॥ पृष्ठ 41

इसी प्रकार इतनी ही गहरी वेदना, दर्द, पीड़ा और कसक को अपने शेर में शामिल करते हुए शायर डॉ. पाण्डेय जी कहते हैं:

दर्द में कोई गीत गाकर जब हँसोगे
सिरफिरा तुमको पुकारा जाएगा॥ पृष्ठ 17
प्रश्न जीने का जरा उलझा है
वक्त उसका जवाब है प्यारे॥ पृष्ठ 45

इक इक सपने पर होती है,
जिन्दगी यूँ की तमाम बन्धु॥ पृष्ठ 47

वेदना की वेदिका में
स्वयं का हंसकर हवन है॥ पृष्ठ 48

'नहीं कहूँगा रात को दिन' के शायर को कोमल संवेदना का शायर कहना ग़ैर वाजिब भी नहीं। इस शायर को प्रेम का रंग सबसे ज़्यादा पसंद है। डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय कहते हैं कि:

प्रेम तो बीएस मरु धरा पर
सघन घन का आगमन है॥ पृष्ठ 48
प्रेम के नवगीत का इक
अनकहा सा अन्तरा बन॥ पृष्ठ 63

इस तरह अनुरक्त हूँ मैं
बिन तेरे अभिशप्त हूँ मैं॥
तुम प्रणय के देवता हो
और भावुक भक्त हूँ मैं॥ पृष्ठ 68

आज की पत्रकारिता जगत की ग़ैर जवाबदेही हम सब से छिपी नहीं है बल्कि यूँ कहें कि वर्तमान समय में लोकतंत्र की प्रतिष्ठा में लांछन लगने के लिए सबसे अधिक अगर कोई तत्व ज़िम्मेदार है तो वह है पत्रकारिता। ऐसे में डॉ. पाण्डेय जी का यह शेर लगभग हम सबकी बात कहता जान पड़ता है-

नयी रोशनी आने के पथ सारे कब से बन्द हो गये
तमस और सूरज दोनों के, बीच नये अनुबन्ध हो गये॥ पृष्ठ 38

नमकमिर्च मत लगा जरा
जो जैसा है,वैसा लिख॥
सीना ठोंक बोल सच तू
जिन्दा है तो जिन्दा दिख॥ पृष्ठ 111

नाग निकले हैं बिलों से
बीन का टूटा सिरा है॥ पृष्ठ 62

हमारे राष्ट्रीय परिदृश्य में एक चीज़, जो अमन पसंद लोगों को सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली है, वह है विषैली मानसिकता। इंसान की इंसान के ख़िलाफ़ जिस तरह की ज़हर उगलती भावनाएँ नज़र आ रही हैं, वह हैरान करने वाला है। यह ज़हर चाहे जाति-धर्म के नाम पर हो या क्षेत्रवाद के नाम पर हर कहीं शिकार हो रहा है तो वह है इंसानियत। यहाँ सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात है कि इस दम तोड़ती इंसानियत की ज़िम्मेदार राजनीति है। वह राजनीति जिसका जन्म ही राज्य की जनता का हित सोचने के लिए हुआ है। राजनीति चाहे सत्ता के उच्च प्रतिष्ठानों में हो या निम्न स्तर की सस्थाओं में, अगर अपने मूल उद्देश्य से भटकती है तो बहुत बिगाड़ करती है, यह हम आज़ादी के बाद लगातार देखते आ रहे हैं।

जो भी हैं सम्बन्ध पावन भाव, श्रद्धा, प्रेम के
रक्त से नहला धुलाकर ही निभाया जाएगा॥ पृष्ठ 35

कौन है सच बोलता हो राजसता के खिलाफ
देख लेना नाम तब अपना पुकारा जाएगा॥ पृष्ठ 36

रंग-रूप-भाषा –ग्रन्थों में
सबको देखा यहाँ विभाजित॥ पृष्ठ 48

राजनीति के इशारों पर क्या-क्या होता है, यह वे अच्छी तरह जानते हैं लेकिन जब इंसाफ़ तक बिकने लग जाए तो हैरानी बनती है। यह शेर उनकी हैरानी ही है, जो सवाल की तरह खड़ी होती है-

सजे धजे बगुले बैठे हैं, राजसभा में सम्मानित
लौटे हंस हुए अपमानित, कौवे गोपीचन्द हो गए॥
राजनीति तो रंग रंगीली रपटीली इक मंडी है।
छल प्रपंच रचने में देखो सबके सब पाबन्द हो गए॥ पृष्ठ 38

मैंने पूछा राम का रहमान का क्या खून अलग
आप बोले चुप रहो तुम धर्म की यह भर्त्सना है॥ पृष्ठ 19

तमाम उम्र जो कांटों की फसल बोता रहा \
सुना है आजकल खिलता गुलाब मांगे हैं॥ पृष्ठ 18

करनी में पलते छल प्रपंच।
कथनी है ललितललाभ बन्धु॥ पृष्ठ 47

सियासतदारों के थोथे नारे, भाषणबाजी और आश्वासनों की गूँज को सुनने से नकारते हुए अवाम का समवेत स्वर चहुँदिस गूँजता है:

यूँ तो यहाँ सबको है खबर, राजा को पता ही नहीं
आदमी को आदमी से डर, राजा को पता ही नहीं॥ पृष्ठ 33

आजकल सिद्धान्त तो संभाषणों में शेष हैं।
चरण पूजित हैं, प्रदूषित आचरण हैं॥ पृष्ठ 52

प्रश्न रोटी का यहाँ पर
पूछना एकदम मना है॥ पृष्ठ 61

ये तो थीं कुछ प्रयोगात्मक ग़ज़लें, जिन्होंने मुझे बाँधा और ऐसा बाँधा कि लगा आस-पास कोई इत्र की शीशी खुली छूट गयी। साथ ही इस संग्रह की कई और ग़ज़लें लेखक के गहरे विचारों व सधे भावों के हस्ताक्षर के प्रमाण हैं। मसलन-

चन्द साँसों की रवानी जिन्दगी यह
तुम इसे सपनों की रानी ख रहे हो॥ पृष्ठ 22

बात इतनी ही समझनी है
जैसी करनी है वैसी भरनी है॥ पृष्ठ 29

एक आह, एक कराह, एक उदासी समेटे इस ग़ज़ल में नमी-सी नज़र आती है और नमी होनी भी चाहिए। बिना नमी के कविताई व शेरियत के अहसास मर जाते हैं। एक शेर और देखें-

जिन्दा रहते मर कर देख
ऐसा तो कुछ करके देख॥ पृष्ठ 30

भीड़ में भी अकेले रहने का
हमको हासिल ख़िताब है प्यारे॥ पृष्ठ 46

पीड़ा पीकर भी हँसते हैं 
कुछ ऐसा अपना हाल यार॥ पृष्ठ 59  

एक छोटी बहर की ग़ज़ल, जो बहुत गहरी, जीवन दर्शन की बात कह जाती है- 

फलसफा जिन्दगी का इतना है
सुरमयी शाम जैसे ढलना है॥ पृष्ठ 14

दुनिया फानी बस चन्द रोज
फिर क्यों इतना छलछन्द यार॥ पृष्ठ 56

जीवन बीएस इतना समझा
सुनो भोर का तारा है॥ पृष्ठ 59

जीवन क्या है, एक समर है
कदम-कदम पर अगर-मगर है॥ पृष्ठ 92

इन तमाम ग़ज़लों के साथ-साथ इस संग्रह की बहुत सारी ग़ज़लें हैं, जो पाठकों द्वारा बहुत-बहुत पसंद की जाएंगी, लेखकों द्वारा सराही जाएंगी, समीक्षकों द्वारा भी फिर-फिर उद्धृत की जाएंगी। कहा जा सकता है कि यह संग्रह अपने समय के लेखन, अपने समय की ग़ज़लों का संग्रह है। बेहतरीन ग़ज़ल संग्रह के लिए डॉ. लक्ष्मी नारायण पाण्डेय जी को बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ। हमें इनके आगामी प्रकाशन की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी। 
 

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