जीवन उत्सव और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

उत्सव मनुष्य के जीवन को आकर्षक और अर्थपूर्ण बनाते हैं। उत्सव के अवसर का हर व्यक्ति हक़दार है लेकिन इस उत्सव के भीतर के रंग उन्हीं लोगों के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं जिन्होंने जीवन को अर्थपूर्ण बना डाला है। जीवन को अर्थपूर्ण बनाना भी एक कला है। दुनिया में बहुसंख्यक लोग अपनी संस्कृति से, विरासत से मिले उत्सव को जी लेते हैं लेकिन जीवनोत्सव तो उनका होता है जिन्हें जीवन और उत्सव की खूबसूरती का एहसास होता है। दरअसल, ऐसे लोग हर पल को उत्सव के रूप में ही जीने लगते हैं। ऐसे में उत्सव की लत भी लग सकती है और इस लत के आगोश में आने के बाद व्यक्ति अपने जीवन को उत्सव बनाने के चक्कर में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हिंसा के मार्ग पर भी चल देता है। किसी हिंसा से प्राप्त अपने जीवन का जीवनोत्सव तब उत्सव नहीं होता बल्कि तब तो वह अभिशाप बन जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लत से ऐसी बुरी स्थिति में व्यक्ति पहुँच जाता है कि उसे अच्छे-बुरे का अंतर ही नहीं समझ आता। 
हिंसा से प्राप्त कोई भी खुशी खुशी नहीं होती, वह तो पीड़ा से निकली एक व्यथा है किंतु काश! इसका एहसास उसे भी होता जो दूसरों को दुःख देकर अपने उत्सव पर इतरा रहा होता है। विश्व के हर भूभाग पर बहुतायत का सुख दूसरों को पीड़ा देकर निर्धारित हो रहा है। इसमें यदि पीड़ित के आत्म को समझने की कोशिश भी हो जाती तो इतने तरह के अतिक्रमण करने से मनुष्य बचते। समस्त सभ्यताओं में ऐसी बुराइयों की कोई कमी नहीं है। यह बुराइयाँ हमारे सामाजिक राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर अनेक चुनौतियों को खड़ा करती हैं और बड़े पैमाने पर इससे मानवाधिकारों के हनन की प्रत्याशा होती है। 
हिंसा इसलिए इसका माध्यम बन जाती है क्योंकि बिना अतिक्रमण के बिना अतिरिक्त सुख मिलता ही नहीं है। असामान्य सुख की अभिलाषा रखने वाले लोग दूसरे का सुख छीनकर अपने सुख का विस्तार करते हैं। विस्तारवाद की यह एक हिंसक अवस्था होती है। विस्तार में ही लोग अपने उत्सव का विस्तार मानते हैं और हिंसा की बुनियाद पर विस्तार का यदि हम अवलोकन करें तो विभिन्न इलाकों में आदिवासीजन के सुख को छीनकर पूंजीवादी व्यवस्था को उदाहरण के रूप में हम देख सकते हैं। देशज सभ्यता के बरक्स विकासवादियों के उत्पीड़न का एक बड़ा उदाहरण हमारे पास है। चिंताजनक यह है कि उत्पीड़ितों के साथ हिंसक गतिविधियां सतत बनी हुई हैं। ऐसे में जीवनोत्सव सबका तो हो नहीं सकता। गांधी जी जरूर आशावादी थे और उनका मानना था कि अहिंसा मनुष्य का एक सकारात्मक गुण है। वह कहते थे-अहिंसा की कसौटी यह है कि अहिंसक संघर्ष में कोई विद्वेष नहीं रहता और अंत में शत्रु मित्र बन जाते हैं। यह पढ़कर अच्छा लगेगा लेकिन यह एक सकारात्मक सोच हो सकती है लेकिन जरा इस पर विचार करें कि इस हिंसा और अहिंसा के बीच की जो खाई है, उसमें कितना अधिक विध्वंस का उत्पादन होता है और कितने बड़े पैमाने पर इसका असर मनुष्य जीवन पर पड़ता है।
यदि दूसरा उदाहरण हम खोजें तो लिप्साओं ने ज्यादा हिंसा का उत्पादन किया। लालच और लोभ में मनुष्य अपने सुख को ढूंढता रहा है लेकिन इसके एवज में वह बड़े पैमाने पर अतिक्रमण भी करता रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। विस्तार की मानसिकताएं लोभ और लालच के उदर से जन्मी हैं। व्यापक स्तर पर लिप्साएँ इसलिए हिंसा की जड़ मानी गईं। आज़ जितने भी तरीके के युद्ध या बर्चस्व की राजनीति को हम देख रहे हैं उसकी भी स्थितियां लिप्सा और लोभ है, ऐसा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्तिपूर्ण बात न होगी। 
अब स्थितियां ज्यादा चिंतनीय इसलिए हो गई हैं क्योंकि अब मनुष्य जानबूझकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से नहीं चूक रहा है। वह तो प्रकृति पर अतिक्रमण करके विस्तारवाद में भरोसा जताते हुए मनुष्य और मनुष्येतर सबके साथ हिंसा करने पर उतारू हो गया है। सोचिए जब प्रकृति ही हमारी सुरक्षित नहीं होगी, उसे ही हम सिकोड़कर अपने सुख का उत्सव खोजने लगेंगे तो इस सभ्यता का क्या होगा? इस पर से तो यही समझ आने लगा है कि मनुष्य की विद्रूप सोच ने अब सभ्यता के साथ ही हिंसक रूप अपना लिया है। यदि प्रकृति और प्राकृतिक चीजें समाप्त होने लगेंगे तो जीवनोत्सव भी सिकुड़ जाएगा, शायद इस बात का पूर्णतया एहसास नहीं है। यदि है भी तो यह भ्रम है कृत्रिम बौद्धिक संपदा से हम कुछ भी करके जीवन और जीवनोत्सव को बनाए रखेंगे, तो यह तो सबसे भयानक भ्रम है। सभ्यतागत विकास जो प्राकृतिक रूप से होता है उसमें जीवन के सतत बने रहने की प्रत्याशा ज्यादा होती है लेकिन कृत्रिमता से यह ज्यादा टिकाऊ और सतत बना रहेगा, यह मेरी दृष्टि से एक कोरी कल्पना के सिवा और कुछ भी नहीं है। प्रकृति को दरअसल समझते हुए उसके अनुकूल जीवन को साधना ठीक था। प्रकृति अपने ह्रास हुए को पुनर्जीवित कर लेती है लेकिन यदि मनुष्य जाति के लोग प्रकृति का ह्रास करेंगे तो उसकी भी भरपाई वह कर ही लेगी, ऐसा नहीं है। पृथ्वी के गरम होने पर कोहराम तो मचा है, क्यों संतुलन नहीं हो पा रहा है आखिर? इसका यही कारण है कि मनुष्य अपने जीवन उत्सव को प्रमुखता देता गया और पृथ्वी पर उपभोग और विलासिता को चरम पर पहुंचा दिया, ऐसे में पृथ्वी गर्म नहीं होगी, तो और क्या होगा?
पर्यावरणीय चिंता आज़ की प्रमुख चिंता है। हमारा जलवायु के साथ जो संतुलन खोने लगा है वह जीवनोत्सव के सौंदर्य को बिगाड़ देगा। हम नानाप्रकार के विसंगतियों और समस्याओं से घिर चुके हैं। जलवायु परिवर्तन पर हर वर्ष 5 जून से लेकर जुलाई महीने तक चिंता की जाती है। विडंबना यही है कि यह केवल हमारी चिंताएँ हैं। यदि किसी भी वर्ष दुनिया भर के लोग जलवायु संकट पर होने वाले सम्मेलन में आकर यह कहे हों कि हमने ओजोन होल को कम किया है। गैस उत्सर्जन में बड़े बदलाव इस वर्ष आ चुके हैं या फिर ऐसा की पृथ्वी का तापमान विगत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष कम है तो खुशी की लहर होती लेकिन ऐसा नहीं है। हमारी भौतिकवादी सोच हमारे जीवन का संकट बनते जा रही है और हम हैं कि इतरा भी रहे हैं, अपनी बेवकूफियों पर। यह मनुष्य की कृत्रिम हँसी है। यह मनुष्य का जानबूझकर अपने ही सामने की जा रही कृत्रिमता एक प्रकार की हिंसा है। इस हिंसा का मूल्य यह पीढ़ी तो चुका रही है, आने वाली पीढ़ी ज्यादा चुकाएगी, इसमें कोई दो मत नहीं है।
डर इस बात का है कि जीवन के उत्सव को कृत्रिम रूप देने में हिंसा का आदी बनता मनुष्य अपने होने का अस्तित्व ही न समाप्त कर दे क्योंकि वह हिंसा बहुलता में कर रहा है। अपने आसपास के मनुष्य बिरादरी के साथ हिंसा कर रहा है और जब उसका ज्यादा दिमाग विस्तार के लिए आगे बढ़ने के लिए कुछ अधिक लोभ और लिप्साग्रस्त होने लग रहा है तो वह प्रकृति का भी नुकसान करने से खुद को रोक नहीं पा रहा है। यह सब मनुष्य के जीवनोत्सव के सौंदर्य को कम करने का एक उपक्रम है। यह किसी भी दशा में मनुष्य के हित में नहीं है। यह हिंसा के लिए उसका उद्यम है। 
अहिंसा अपनाने और उसे जीवन का अंग बनाने से इसमें निश्चय ही मनुष्य के जीवनोत्सव को हम बचा सकते हैं। इस दिशा में बढ़ने की कोशिश न करके मनुष्य हमेशा अपने विनाश के रास्ते पर बढ़ा है। इससे उसके जीवन का सौंदर्यबोध बार-बार खंडित और विकृत हुआ है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सोच में छोटी-छोटी बातों और बिंदुओं पर विचार करें। ऐसे पहलुओं को विचार के केंद्र में रखें जो हमारे लिए आज़ घातक बनती जा रही हैं। जीवन के उत्सव और उसके साथ हिंसा और अहिंसा के द्वैध के साथ बहते जीवन में भटकाव के कितने बड़े पहलू हैं इसे इस विषय पर सोचते हुए किसी को अब समझ आएगा। हमारी एक सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम इग्नोर करने के आदी होते जा रहे हैं। खास और गौण करके जिसे हम ज्यादा अहमियत नहीं देते, एक दिन हमारे लिए वही विषय चुनौती बन जाता है। ऐसे में हम फिर जीवन के अच्छे आगत को रोक देते हैं और एक अनिश्चय की ओर बढ़ जाते हैं जो हमारे जीवन के आनंद को दुःख में बदल देते हैं। इसलिए आज़ यह भी विचार करने का वक़्त है कि हम छोटी-बड़ी सभी विषयों को गंभीरता से लें। जीवन में अतिक्रमण करके अपने जीवन को बेहतर बना लेने के भ्रम में दूसरों के साथ हिंसा न करें। इससे बचाव ही हमारे जीवन के सौंदर्य को बढ़ा सकता है और वह जीवन ही मनुष्यता के लिए, प्रकृति के लिए हितकारी बन सकता है। विचार करके तो देखिए!
लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के ओएसडी रह चुके हैं और सेतु संपादक मण्डल के सम्मानित सदस्य व अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं।

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