आत्मकथा-अंश: याद आती हैं माँ की वे ममतालु आँखें

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


माँ को याद करता हूँ तो सबसे पहले उनकी आँखें याद आती हैं। वें आँखें जिनमें एक बच्चे का-सा भोलापन था और जानने-समझने की अनवरत जिज्ञासा। इसीलिए हम अपने तईं कोई साधारण-सी बात भी कहते, तो माँ की उत्सुक आँखें फैल जातीं। थोड़ी देर तक अपने ‘सामान्य ज्ञान’ से वे उसे समझने की कोशिश करतीं और फिर अगले ही पल चकित स्वर में कह उठती, “हच्छा...!”
इसीलिए माँ थीं तो जीवन में कोई बनावट नहीं थी, जीवन में कोई जटिलता या असहजता नहीं थी। जीवन में कोई डर नहीं था। माँ माँ थीं तो आस्था का समंदर भी। जीवन वहाँ ठाठें मारता। कुछ अरसा पहले ‘कथादेश’ में गार्सीया गाब्रिएल मार्केस का इंटरव्यू पढ़ रहा था, जिसका खूबसूरत अनुवाद मंगलेश डबराल ने किया है। उसमें खासकर स्त्रियों को लेकर उन्होंने कुछ अद्भुत बातें कही हैं। उन्हीं में से एक बात यह भी है कि ये स्त्रियाँ ही हैं जो जीवन को थामे रहती हैं। यह जीवन को थामे रहना क्या है और स्त्रियाँ यह काम कैसे करती हैं? इस पर गौर करते हुए मुझे माँ की याद आई। कैसे एक बारीक, बहुत बारीक और अदृश्य तार से उन्होंने हमारे पूरे घर को जोड़ा हुआ था और कैसे उस बारीक तार के न रहने पर बहुत कुछ तिनका-तिनका होकर बिखर गया! इसे याद करता हूँ तो फिर माँ का होना बहुत-बहुत याद आता है।
यों माँ को लेकर दुनिया की तमाम भाषाओं के साहित्य, खासकर लोक साहित्य में कुछ कम नहीं कहा गया। लंबी दाढ़ी और जिंदादिली से भरपूर हमारे घुमंतू साहित्यकार सत्यार्थी जी अकसर एक पुरानी कहावत दोहराया करते थे कि ईश्वर ने माँएँ बनाईं, क्योंकि वह सब जगह उपस्थित नहीं रह सकता था। मुझे लगता है कि माँ को लेकर इससे बड़ी कोई बात शायद ही कही जा सकती हो।
सच तो यह है कि मुझे ईश्वर पर भी भरोसा इसलिए है कि मैंने माँ को देखा है। लगता है, जिसने मेरी माँ को बनाया, वह सचमुच कुछ न कुछ होगा! वह सचमुच महान होगा! जीवन में विश्वास, आस्था, भद्रता और न जाने कौन-कौन सी अच्छी चीजें इसीलिए हैं क्योंकि माँ है और उसका होना हमारे पूरे जीवन में व्याप्त है, उसके न रहने पर भी!
सत्यार्थी जी के जिस विचार की ऊपर चर्चा की है, वह उनके उपन्यास ‘दूध-गाछ’ का तो केंद्रीय विचार या ‘सिगनेचर ट्यून’ ही है। एक और दिलचस्प बात यह है कि ‘दूध-गाछ’ उपन्यास में दूध-गाछ माँ के लिए ही आया है, यानी कि माँ जो ‘दूध का पेड़’ भी है—पूरी दुनिया को तृप्त करने के लिए उगा दूध का दरख्त! सचमुच यह कल्पना ही अनोखी है।
इस दुनिया में माँ का होना भी तो सचमुच ऐसा ही अनोखा है। माँ न होती तो यह दुनिया न इतनी खूबसूरत होती, न अनोखी और न इतने बारीक, परत-दर-परत रहस्यों से भरी!

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माँ की छवियाँ बचपन की उन निहायत मासूम और धुंधभरी परतों तक फैली हैं जब मुझे अपने और आसपास की शायद ही कोई चेतना रही हो। लेकिन माँ का होना तब भी महसूस होता था। माँ की बातें तब भी अच्छी लगती थीं। शायद इसलिए कि ये बातें सिर्फ बातें नहीं थीं। ये वो प्यारा-सा तिनकों का घोंसला थीं जिसमें सिर छिपाए-छिपाए, आसपास के ढेर सारे जंजालों से बचता हुआ, मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था।
माँ जब पड़ोसिनों और सहेलियों से बतिया रही होती थीं, तो मुझे अच्छी तरह याद है, एक नन्हे, उत्सुक बच्चे के रूप में मेरा घुसकर उस मंडली में बैठना और गौर से माँ की बातें सुनना। कुक्कू बचपन में मेरा घरेलू नाम था। प्यार से पुकारने का नाम। तो माँ और सहेलियाँ कई बार कटाक्षपूर्ण हँसी हँसते हुए बरज भी दिया करती थीं कि “ओए कुक्कू! तू क्या सुन रहा है? तुझको क्या समझ में आएँगी ये औरतों की बातें!”
और वे बातें क्या हुआ करती थीं, ‘नीं शाणिए, जद मेरा कुक्कू होया सी...!’ या ‘जिस वेले मेरा श्याम होया...!’ या मेरा ‘मेरा किशन, जगन हाले छोटा-ज्या सी...!’ और तब क्या-क्या संकट आए या क्या-क्या आश्चर्यजनक चीजें घटित हुईं, वही सब उन अकथ कहानियों का सार था जिन्हें ‘औरतों की बातें’ कहा जाता था। उन्हीं के बारे में माँ अपनी साथिन स्त्रियों से घंटों तक बतियाती रह सकती थीं और गरमी की लंबी-लंबी दोपहरियाँ और शामें सुख-दुख की इन सहज-सहज बातों के जाल में उलझकर कैसे उड़न-छू हो जाती थीं, यह आज भी मुझे किसी आश्चर्य की नाईं लगता है!
और इतनी ही आश्चर्य की बात यह भी लगती है कि मुझ एक नन्हे बच्चे को इन बातों में ऐसी क्या अकूत दिलचस्पी थी कि बातें समझ में आएँ या न आएँ, मगर वह खत्म होने में न आती थी। और मैं आँखें फैलाए हुए एकटक उन बातों को सुनता, बल्कि पीता था। मेरे लिए दिलचस्पी की बात यही थी कि वे माँ की बातें थीं! पर माँ और उनकी सहेलियाँ जब इतने गौर से मुझे बातें सुनते देखती थीं, तो हँसकर टोक दिया करती थीं, “चल-चल परे हट! तूँ की सुण रेया एँ!” (चलो-चलो, दूर हटो। तुम क्या सुन रहे हो!)
बहुत छुटपन की स्मृति। माँ सिर पर कपड़ों की बड़ी सी गठरी रखे, तालाब पर कपड़े धोने जा रही हैं और मैं साथ हूँ। माँ तालाब के किनारे पड़े पत्थर पर रगड़-रगड़कर कपड़े धो रही हैं और मैं खेतों की मेड़ पर उगे पीले-पीले सुंदर वनफूल तोड़ने और आसपास दौड़ लगाने में मगन हूँ। उन दिनों जानता कम था, लेकिन चीजें महसूस खूब होती थीं। मसलन सर्दियों की गुनगुनी धूप में दौड़ने-भागने और खेलने का सुख क्या है, यह खूब अच्छी तरह महसूस करता था और प्रकृति की अंतरंग सुंदरता को भी! मन तो उत्साह से भरा हुआ-सा पुकारता था, “अरे वाह, तालाब के आसपास के खेतों में सरसों क्या खूब लहक-लहककर उगी है! और सरसों के पीले-पीले फूल ही नहीं, उसकी गंध भी चारों ओर एक झालर-सी रचकर, आसपास के पूरे माहौल को मानो एक अद्भुत उत्सव में ढाल रही है।” 
याद है, उस दिन कोई चार बरस की उम्र में मैंने प्रकृति के अनंत विस्तार की अनुभूति की थी। लगा, मेरा हृदय फैलकर बहुत बड़ा हो गया है और उसमें बहुत कुछ समाता चला जा रहा है। यहाँ तक कि पूरा का पूरा तालाब, आसपास के लह-लह करते खेत और पीले फूलों वाली जंगली झाड़ियाँ भी। यह एक शिशु के मन में जनमी शायद पहली नन्ही कविता थी।
एक और पुराना लेकिन गहरा-गहरा-सा चित्र। माँ एक डोलू में गुड़ के शीरे में डुबोई हुई डोइयाँ (आटे की छोटी-छोटी टिकड़ियाँ) लिए, तालाब के पास ‘गुग्गा’ यानी ‘गोगा पीर’ या फिर कहिए ग्राम देवता को पूजने जा रही हैं और मैं साथ हूँ। पूजा के बाद गुड़ के शीरे में डूबी हुई डोइयाँ मिलती हैं और मुझे लगता है, इससे अधिक स्वादिष्ट चीज दुनिया में कोई और नहीं है। मैं माँगकर और डोइयाँ लेता हूँ। माँ मेरी कटोरी में ढेर सारा शीरा और दो-एक डोइयाँ रख देती है और मुझे लगता है, दुनिया सचमुच कितनी खूबसूरत और स्वाद भरी है!
याद आता है, माँ नहाते समय कुछ पंक्तियाँ दोहराया करती थीं। इनमें ये दो पंक्तियाँ जरूर होती थीं, “गंगे मल-मल नहाइए, स्त्री दा जनम कदी न पाइए...!” माँ बार-बार इन पंक्तियों को दोहराती थीं, मानो इन्हें बार-बार दोहराना ही उन्हें किसी ‘मुक्ति आश्वासन’ की तरह लगता हो। स्त्री का जीवन कष्टकारी है, पर उसे बदलने के बजाय बस प्रार्थना करनी चाहिए, शायद यही बस माँ के हिस्से का ‘सच’ रहा होगा! इस सच की सीमा हो सकती है पर इस सच को साकार करने की माँ की साधना की कोई सीमा नहीं थी।

[3]
यों माँ का जीवन दुख, निराशा या किसी किस्म की हीनता से मलिन न था। वे कमेरी थीं और हर दिन उत्साह से नए दिन का स्वागत करती थीं। याद आती है कोई आधी सदी से भी अधिक पुरानी सर्दियों की सुबह। हम लोग तब छोटे-छोटे थे। बड़ी भोर में उठकर, अभी हम बिस्तर पर ही होते थे कि माँ किसी चिड़िया की तरह धीमे-धीमे गुन-गुन करके एक गीत छेड़ देती थीं। और हम अनजाने ही उसे दोहराने लगते थे। सचमुच बड़ी मिठास थी इन गीत में और यह एक मीठी और उत्साह भरी भोर के स्वागत-गान सा लगता था—
उठ जाग सवेरे!
गुराँ दा ध्यान,
गंगा इश्नान।
हथ विच लोटा,
मोढे लोई,
राम जी दी गउआँ
सीता दी रसोई...!
(उठो, बड़ी सुबह-सवेरे उठ जाओ। गुरुओं का ध्यान और गंगा-स्नान करो। हाथ में लोटा और कंधे पर दुशाला। राम जी गउएँ चरा रहे हैं और माँ सीता रसोई तैयार कर रही हैं।)
गीत क्या था, मानो हिंदुस्तानी दांपत्य का आदर्श सामने रखा गया था। एक कर्मलीन जीवन का सीधा-सादा चित्र।...काफी लंबा गीत था। धीरे-धीरे बड़ी आरामदारी की-सी सहज, मंथर लय में आगे बढ़ता हुआ। और इसी में आगे चलकर एक पंक्ति आती थी जो मुझे बड़ी प्यारी लगती थी, “चिड़ियाँ वी चुनगुन लाया ई, उठ, जाग सवेरे!!” (चिड़ियों ने भी चुनगुन का राग छेड़ दिया है। बड़ी सुबह-सवेरे उठ जाओ।)
इसी तरह याद पड़ता है कि गायत्री मंत्र भी मुझे पहलेपहल माँ से ही सुनने को मिला। बल्कि सर्दियों की एक सुबह, माँ ने अपनी मीठी, खरखरी आवाज में मुझे यह मंत्र अच्छी तरह याद करा दिया था। आज जब कि नाना जी के असाधारण व्यक्तित्व के बारे में कश्मीरी भाईसाहब से काफी कुछ सुन चुका हूँ, मैं कल्पना कर सकता हूँ कि मेरे विद्वान नाना जी ने कैसे माँ को यह गायत्री मंत्र याद कराया होगा! और जब माँ से वही मंत्र किसी जादुई प्रभाव से मुझ तक आ गया तो मानो माँ के रूप में नाना जी ही वह मंत्र मुझे याद करा रहे थे! जीवन के विकास का यही तो शाश्वत मंत्र है। और यह जितना सीधा-सरल है, उतना ही रहस्यमय भी!

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माँ की सुनाई कहानियों की भी मुझे खूब अच्छी तरह याद है। इनमें एक तो ‘अधकू’ वाली कहानी थी, जिसका मुझ पर खासा असर पड़ा था। हालाँकि यह कहानी शायद जस की तस मुझे याद नहीं रह गई। इस कहानी को मैंने थोड़ा अलग रूप देकर अपनी बाल कहानियों की पुस्तक ‘इक्यावन बाल कहानियाँ’ में शामिल किया है। पिछले दिनों कश्मीरी भाईसाहब मेरी बाल कहानियों की किताब पढ़कर इस कहानी की चर्चा कर रहे थे, तो एकाएक उनकी बड़े जोरों की हँसी छूट गई। जाहिर है, इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते वे भी मेरी तरह अपने बचपन की सीढ़ियाँ उतरकर बचपन के जादुई संसार में चले गए होंगे! शायद यही असर होता है, बचपन में माँ से सुनी हुई कहानियाँ का।
इसी तरह माँ से सुनी कहानियों में एक थी सात कोठरियों वाली कहानी। राजकुमार से कहा जाता है कि वह इस महल की छह कोठरियाँ देख ले, लेकिन सातवीं नहीं। वरना वह मुसीबतों में फँस जाएगा। राजकुमार छह कोठरियाँ देखता है, लेकिन फिर सातवीं कोठरी देखने से भी खुद को रोक नहीं पाता। होने दो जो होता है, पर एक बार तो मैं देखकर रहूँगा कि क्या है सातवीं कोठरी में? वह सोचता है। जिद ठान लेता है। और सचमुच सातवीं कोठरी में प्रवेश के साथ ही मुश्किलें एक के बाद एक भयंकर आँधी, पानी, तूफान की तरह—या फिर एक भीषण पंजों वाले गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़ती हैं। पर वह हिम्मत नहीं हारता, बहादुरी से उन्हें झेलता है और आखिर एक दिन सफलता के ऊँचे शिखर पर खड़ा हुआ नजर आता है।...
माँ से यह कहानी सुनते हुए लगता था कि चाहे जो हो, मैं भी सातवीं कोठरी में जाकर देखूँगा कि वहाँ भला कौन-सा रहस्य छिपा हुआ है। फिर चाहे जिऊँ या मरूँ! तब चाहे न सोचा हो, पर अब कई बार मैं हैरान होकर सोचता हूँ—तो क्या साहित्य की दुनिया में आना वही सातवीं कोठरी में झाँकना है जिसमें रहस्य ही रहस्य भरे पड़े हैं और अपनी तरह के ‘खतरे’ भी? मैं हैरानी से सोचता हूँ और बड़े ताज्जुब से भर जाता हूँ कि एक ही कहानी अगर वह सचमुच जी लगाकर सुनी-सुनाई गई हो, तो कितने लोगों के लिए कितने भिन्न आशय खोल सकती है। बचपन में सुनी कहानियों की शायद यही ताकत भी है। हमारी माँएँ शायद इसी तरह सदियों से बुराई पर अच्छाई की विजय का मंत्र हमें पिलाती रही हैं! भले ही इसका महत्व बहुत ‘अंग्रेजी’ पढ़े समाजविज्ञानियों को अभी ठीक-ठीक समझ में न आया हो!
और मेरे लिए तो यह अतिरिक्त सुख की तरह है कि माँ अपनी सुनाई कहानियों में छिपी हुई हैं। जब चाहा, वहाँ जाकर उन्हें देख और सुन लिया।...
माँ की सुनाई कहानियों में दो-एक कहानियाँ ऐसी भी थीं जिनके जरिए माँ शायद अपने माँ होने या स्त्री होने की तकलीफ को हमारे साथ बाँटना चाहती थीं या कहिए कि एक किस्म का पाठ पढ़ाना चाहती थीं। इनमें एक कहानी में बेटा जो अब अच्छा कमाने-धमाने लगा है, बड़ा होने पर माँ के त्याग का मोल चुकाना चाहता है। वह बार-बार पूछता है, “बोल न माँ, मैं तेरे लिए क्या लाऊँ?” माँ चुप रहती है। बहुत पूछने पर हँसकर कह देती है, “रहने दे बेटा, क्यों तकलीफ झेलता है?” बेटे के बहुत जिद करने पर माँ आखिरकार कहती है कि अच्छा बेटा, समय आने पर कहूँगी। 
उसी रात को बेटा सोया तो माँ ने उसकी खाट पर लोटे से जरा-सा पानी डाल दिया। लड़का हड़बड़ाकर उठा। पूछा, “माँ...माँ, यह क्या?” माँ बोली, “पता नहीं बेटा, मुझसे कैसे गिर गया। खैर, तू परेशान न हो, सो जा!”
लड़के को नींद आई ही थी कि माँ ने फिर पानी गिरा दिया। अब तो वह बुरी तरह खीज उठा। चिल्लाकर बोला, “माँ, आज तू मुझे सोने देगी कि नहीं?” इस पर माँ ने बड़े ममतालु स्वर में कहा, “चैन से सो बेटे, पर एक बात याद रख। जब तू छोटा था तो रात में न जाने कितनी बार तू पेशाब करता था। पर मैं तुझे सूखे में सुलाती थी, खुद गीले में सो जाती थी। कभी गुस्सा नहीं आता था। पर तू तो बेटा, दो बार में ही परेशान हो गया। तो भला माँ का ऋण तू कैसे उतारेगा?”
कहानी सुनते हुए उस बेटे पर बड़ा गुस्सा आया था जो जरा सी देर में माँ पर झल्ला पड़ा था। मैंने सोचा, मैं तो ऐसा बेटा नहीं बनूँगा। पर क्या मैं सचमुच एक अच्छा बेटा बन सका? आज सोचता हूँ तो अपने ऊपर शर्म आती है।

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माँ की कई कहानियों में अद्भुत फैंटेसी भी थी। मसलन माँ की एक कहानी हजारों साल पहले की उस आश्चर्यजनक ‘अदिम’ दुनिया की कहानी थी जिसमें लोग अपने सिर को हँड़िया की तरह उतारकर गोद में रख लेते थे ओर जूएँ बीनते थे। खासकर स्त्रियों को चैन से जूएँ बीनने का अवसर मिल जाता था। धूप में बैठे-बैठे मजे में जूँएँ बीनते रहो। 
लेकिन फिर एक गड़बड़झाला हो गया। सचमुच अजीब गड़बड़झाला! हुआ यह है कि एक स्त्री ऐसा करते हुए, घरेलू व्यस्तताओं में अपने सिर को कहीं इधर-उधर रखकर भूल गई और दूसरे कामों में लग गई। पीछे से बंदर आया और उसके सिर को उठा ले गया। अब वह स्त्री यहाँ-वहाँ अपना सिर ढूँढ़ रही है, मगर सिर है कि मिल ही नहीं रहा। फिर पता चला कि सिर तो सामने पेड़ पर बैठे हुए बंदर के पास है जो बहुत मिन्नतें करने के बाद बमुश्किल उसे देने को राजी हुआ। उस दिन के बाद से भगवान ने अपनी सृष्टि में तब्दीली की और तब से सबके सिर पक्के जुड़े होने लगे।...माँ की भोली दुनिया का एक भोला सच!
अलबत्ता यह हँड़िया की तरह सिर को गोदी में रखकर जूएँ बीनने की कल्पना ऐसी मजेदार थी कि हँसते-हँसते हम लोटपोट हो जाते। और आज भी जब इस कल्पना के बारे में सोचता हूँ, तो हँसी आए बगैर नहीं रहती।
इसी तरह एक मजेदार कहानी थी ‘गिठमुठिए’ की। कल्पना का एक और अश्चर्यलोक! क्योंकि यह कहानी भी एक अद्भुत दुनिया में रहने वाले अद्भुत प्राणियों की थी। गिठमुठिए माने ऐसे लोग जो खड़े हों तो एक ‘गिठ’ यानी बालिस्त भर के हों ओर बैठें तो एक मुट्ठी भर के! ऐसे लोग पाताल से निकलकर धरती पर आते थे और फिर क्या-क्या न हो जाता था! मगर एक बात तय थी कि ये कोई बुरे लोग न थे। भले प्राणी थे जो मुसीबत में धरती के वासियों की मदद करने आते थे।
बाद में मैंने देशी-विदेशी परीकथाओं में बौनों के बारे में तमाम किस्से-कहानियाँ पढ़ीं। बहुत सी तो ग्रिम बंधुओं की परीकथाओं में भी हैं। बौनों को लेकर लिखी गई ज्यादातर परीकथाएँ बड़ी दिलचस्प है पर उनमें एक भी गिठमुठिए जैसी मजेदार नहीं है। हो सकता है, माँ ने भी यह कहानी बचपन में अपनी माँ से सुनी हो। इस लिहाज से परीकथाओं की भारतीय परंपरा भी एकदम नई तो नहीं है। और उसमें अगर लोककथाओं को भी जोड़ लिया जाए, तब तो यह परंपरा सदियों पुरानी ठहरती है।
ऐसा नहीं कि माँ की कहानियों में यथार्थ न हो, पर यथार्थ की उस अभिव्यक्ति में फैंटेसी घुली-मिली रहती थी। मुझे याद पड़ता है, माँ की एक हैरतअंगेज कहानी ‘भूख’ को लेकर थी और इसे वे गांधारी से जोड़ती थीं। महाभारत युद्ध में गांधारी के सौ पुत्र मारे गए थे। शोक के मारे उसका बुरा हाल था। गांधारी के बहुत रोने-पीटने के बाद, कृष्ण ने उसे दिलासा देते हुए शोक का परित्याग करने और कुछ खा लेने के लिए कहा। पर गांधारी नहीं मानी। आखिर कृष्ण समझा-बुझाकर चले गए। युद्ध के मैदान में अकेली गांधारी रह गई। आधी रात के समय गांधरी को जोर से भूख लगी। रोते-रोते उसका ध्यान सामने झाड़ पर लगे एक बेर पर गया। उसने सोचा, “रोने के लिए अभी रात पड़ी है। एक बेर ही खा लूँ तो थोड़ी जान आए।” सोचकर उसने बेर को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो बेर ऊँचा हो गया।
जब किसी भी तरह से बेर पकड़ाई में नहीं आया तो गांधारी ने सोचा, “एक बेटे के शव पर चढ़कर पकड़ूँ तो शायद बेर हाथ में आ जाएगा।” 
उसे शर्म भी लगी, पर अब तक भूख बहुत तेज लग चुकी थी। फिर उसने सोचा, “रात का समय है। मुझे भला कौन देखेगा?” तो बेटे के शव को घसीटकर वह बेर के नीचे लाई। उस पर खड़े होकर बेर को पकड़ना चाहा, पर बेर तब तक और ऊपर उठ चुका था। ऐसे ही एक-एक कर गांधारी ने एक के ऊपर एक अपने सौ बेटों के शवों को रखा और बेर को पकड़ने की कोशिश की। बेर तो पकड़ में नहीं आया, पर सामने से कृष्ण आते नजर आ गए। पास आकर बोले, “गांधारी, यह क्या?” 
गांधारी शर्मिंदा होकर बोली, “कृष्ण, तुम ठीक कहते थे। जब तक जीना है, इस भूख से तो जीत पाना मुश्किल है। कोई रोग हो, शोक हो, वह अपनी जगह है, पर भूख तो इस देह का धर्म है। वह रोग-शोक कुछ नहीं देखती!”

[6]
यह कहानी मैंने बहुत खोजी, पर महाभारत के किसी नए-पुराने संस्करण में नहीं है। किसी पुराण वगैरह में भी नहीं।...पर यह कहानी माँ के लोकवेद में थी, और लोकवेद की कहानियाँ ऐसी होती हैं कि पढ़कर आप भीतर तक हिल जाएँ!
इसी बात से याद आया, लोकमाता यानी सत्यार्थी जी की पत्नी अपने निराले अंदाज में कहती थीं, “मौतों भुक्ख बुरी, राती खादी सवेरे फेर खड़ी...!” 
(भूख तो मृत्यु से भी बुरी है। रात उसे खाया, सुबह वह फिर सामने आकर खड़ी हो गई!) 
स्त्रियाँ शायद जीवन के रोजमर्रा के इस यथार्थ को कहीं अधिक गहराई से जानती हैं। इसीलिए सत्यार्थी जी जब झुँझलाकर उन्हें टोकते थे कि तुम क्या हर वक्त रोटी और पैसे की चर्चा लेकर बैठ जाती हो तो वे कहती थीं, “एक दिन भी बगैर खाए गुजारा चलता है क्या? और अगर जेब में बस के लिए किराए के लिए रुपया न हो, तो क्या कोई बस का कंडक्टर आपको बस में भी बैठने देगा? फिर कहाँ से होगी आपकी घुमक्कड़ी, यार-दोस्तों से मिलना, साहित्य के किस्से-कहानियाँ और गपशप...?”
माँ पैसे से बहुत ज्यादा आक्रांत तो न थीं—और धन के मामले में लालची वे हरगिज न थीं, पर इतना तो जरूर जानती थीं कि पैसे और रोटी से बहुत दूर जाकर जिंदगी चल नहीं सकती। वे धार्मिक स्वभाव की थीं। उनका धार्मिक होना उन्हें पैसे के लोभ से बचाता था, पर पैसे से विरक्ति भी वहाँ न थी। कह सकते हैं कि पैसा दान देकर अपने धन को ‘सकारथ’ कर लेने वाला सहज ‘धार्मिकपना’ उनमें था। यानी पैसा सही रीति से कमाओ और कमाने के बाद उसका एक हिस्सा उन्हें जरूर दो, जो सच्चे धार्मिक गुरु, साधु-संन्यासी या फिर जरूरतमंद लोग हैं। यह था पैसे को लेकर माँ के हिस्से का सच, जिसे लेकर उनके मन में कोई दुविधा अंत तक नहीं थी। पैसे की हाय-हाय या उसके लिए बावला होने की यहाँ दरकार न थी। बल्कि ऐसा लोभ या उतावलापन यहाँ बुरी चीज थी।
याद पड़ता है, जगन भाई साहब जो इंजीनियर हैं और शिकोहाबाद में हिंद लैंप्स बल्ब फैक्टरी में डिप्टी जनरल मैनेजर थे, उनकी शुरुआती दौर में ही एर्नाकुलम में किसी बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर नियुक्ति हो गई थी। सब कुछ तय था। बस, उस प्रस्ताव को मंजूर करने के बाद सामान बाँधा जाना और प्रस्थान करना था। उन्होंने शायद रेलवे रिजर्वेशन भी करा लिया था। पर माँ बेचैन थीं। उन्होंने जगन भाईसाहब से पूछा, “यहाँ तुम्हें किस तरह की परेशानी है, जिसके लिए घर से इतनी दूर जाना तुम्हें जरूरी लग रहा है?” 
भाईसाहब के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। और वहाँ तनखा ज्यादा मिलेगी या फलाँ-ढिकाँ मिलेगा, यह माँ के निकट इतना निरर्थक था कि उन्हें समझाया ही नहीं जा सकता था। यहाँ उनका एक ही सिद्धांत था कि कमाओ, लेकिन संतोष भी रखना सीखो। बहुत पैसा आ जाएगा, तो क्या हो जाएगा?
आज के वक्त में माँ की बात शायद उतनी प्रासंगिक न रही हो, या वैसा न समझा जाए। उनके पोते-पोतियाँ और नाती-धेवते आज दूर देशों में हैं। पर माँ ने हमेशा यही चाहा कि पास रहो, एक-दूसरे के साथ सुख-दुख बाँटो और अनावश्यक लालसाएँ छोड़ दो। संतोष भरा जीवन जियो।
मैं कह नहीं सकता कि माँ की बातें आज की बदली हुई दुनिया में कितनी सही हैं, कितनी नहीं। पर मैं इतना जरूर कहूँगा कि माँ एकदम गलत भी नहीं थीं। आज बहुतेरे लोगों की पूरी जिंदगी एक अंधी भागदौड़ और हाय-हाय में बीतती है। उससे सचमुच हासिल क्या होता है? घर वीरान हो रहे हैं और वहाँ की चहकन खत्म हो रही है। खाली-खाली घर और उनमें रह रहे दो-एक अशक्त जन। पूरे घर में बजता सन्नाटा, इसलिए कि जिनमें जिंदगी और जिंदादिली है, वे तो परदेस कूच कर गए। बहुत-बहुत धन्यवाद मोबाइल, इंटरनेट और वेब कैमरे को, जिसने थोड़ा-बहुत ही सही, पर घर के अहसास को बचाया हुआ है। हालाँकि कभी-कभी मैं सोचता हूँ, आदमी को जिंदगी जीने के लिए आखिर कितना चाहिए? और फिर जो कुछ हासिल करने के लिए हम बाहर जाते हैं, उसके बदले खोते कितना हैं—इसका भी क्या कोई हिसाब लगाया जा सकता है?
मुझे याद पड़ता है, एक बार पूर्व और पश्चिम के जीने और सोच-विचार के ढंग की भिन्नताओं की चर्चा करते हुए, स्वामी विवेकानंद एक बड़े फर्क की ओर भगिनी निवेदिता का ध्यान खींचा था। उन्होंने कहा था, “सनातनियों का सारा आदर्श समर्पण है, तुम्हारा (पाश्चात्य) आदर्श संघर्ष है। फलतः हम लोग जीवन का आनंद ले सकते हैं, तुम लोग कदापि नहीं। तुम हमेशा अपनी दशा को और अच्छे में परिवर्तित करने के लिए सचेष्ट रहते हो, और उसके करोड़वें अंश मात्र का परिवर्तन संपन्न होने से पहले ही मर जाते हो।...”
आज जबकि पश्चिमी ढंग का रहन-सहन ही हम पर तारी हो गया है, तब माँ को और उनके समय को याद करना कहीं न कहीं हिंदुस्तानियत की जड़ों की तलाश भी लगता है मुझे। और यह समझ में आता है कि कितना कुछ हमने खो दिया है, और जो कुछ खोया, वह कितना मूल्यवान था। 

[7]
हाँ, याद आया कि माँ जिनकी उँगली पकड़कर मैंने दुनिया देखी, वे अनपढ़ थीं, पर वे गीता पढ़ लेती थीं। गुरुमुखी लिपि में लिखी हुई गीता, जिसकी भाषा पंजाबी नहीं, हिंदी थी। शायद नाना जी ने प्रयत्न करके उन्हें गीता पढ़ना सिखा दिया था। मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी हुई गीता माँ उँगली रख-रखकर पढ़ती थीं थोड़े ऊँचे सुर में, “तब कृष्ण ने कहा, हे अर्जुन, मेरी बात ध्यान लगाकर सुन।” कुछ-कुछ उसी तरह, जैसे कच्ची या पहली जमात के बच्चे स्वर को खींच-खींचकर अपना पाठ पढ़ते हैं। पर इससे उनके बोलने में एक अजब लय और आकर्षण पैदा हो जाता था। बचपन में मैंने माँ को अकसर इसी तरह सुबह-सुबह गीता पाठ करते देखा। 
बाद में या तो वह गीता की प्रति जीर्ण हो गई या कोई और वजह रही होगी, जिससे माँ का गीता-पाठ कम हो गया। लेकिन उनका धार्मिक भाव तो जरा भी कम नहीं हुआ। और वे व्रत पर व्रत इतने रखती थीं कि किसी-किसी हफ्ते तो मैंने उन्हें सात में से चार-चार, पाँच-पाँच दिन व्रत रखते देखा! कुछ तो नियमित रखे जाने वाले व्रत थे और कुछ बीच-बीच में आने वाले विशेष व्रत। उन्हें शायद यही संस्कार मिला था कि स्त्री को परिवार की हित-कामना के लिए खुद को गला देना चाहिए। 
व्रत केवल व्रत नहीं था, उनकी तपस्या थी। और माँ ही नहीं, उस पीढ़ी की ज्यादातर स्त्रियों की शायद यही जीवन आस्था थी। उन्हें लगता था, अपने परिवार के हित के लिए वे शायद इसी तरह खुद को होम कर सकती हैं। और यही ईश्वर को भी प्रसन्न रखने का साधन था उनके हाथ में, जिससे दुनिया में संतोष और सुख-शांति रहे।

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यहीं बचपन के उन तिथि-त्योहारों की बात की जा सकती है जिनमें माँ को नित नए रूपों में देखने का अवसर मिलता था। इनमें एक ‘नवान्न’ का पर्व था, जिसमें नए अन्न की रोटी या शायद पराँठा बनता था। उसमें घी डालकर चूरी बना ली जाती। अब माँ आसपास सब बेटों को बिठा लेती थी। हाथ में चूरी का एक ग्रास लिए, एक-एक कर हम सब भाइयों से पूछती थी, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?”
हम लोग ‘हाँ’ कहते, पर कभी-कभी माँ को तंग करने के लिए ‘न’ भी बोल देते थे। तो फिर माँ को फिर से यही सब सिलसिला शुरू करना पड़ता ओर यों माँ उस चूरी का एक-एक ग्रास खातीं और माँ के खाने के बाद फिर हमें भी वही सब मिलता। मगर इस पर्व की खासियत यह थी कि माँ भी हमारे साथ एकदम बच्ची बन जाती थीं और हम कितना भी तंग करें, उनके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आती थी। हम हँसते थे और माँ भी हमारे साथ बिल्कुल बच्ची बनकर हँसती रहती थीं। जैसे यह भी खो-खो जैसा कोई खेल हो।
इस उत्सव के पीछे की भावना क्या रही होगी? लगता है, यह कृषि व्यवस्था का पर्व है। घर में नया अन्न आया है। उसे अच्छी तरह धोकर, सुखाकर खाने के लिए तैयार कर लिया गया है। उसकी रोटियाँ बनकर सामने पड़ी हैं। पर नया अन्न है, तो पता नहीं कि वह कैसा हो? उसमें तनिक विषैलापन या कोई और नुकसानदायक वस्तु भी हो सकती है, जिसका हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता हो। इसलिए वह नया अन्न घर में आए और उसकी रोटियाँ पकें तो पहले बच्चे न खाएँ। घर के बड़ों को पहले उसे चखकर देखना चाहिए कि यह निरापद है कि नहीं। और अगर उसके खाने पर कोई नुकसान नहीं होता तो फिर घर के बाकी लोग भी खाएँ। 
माँ बड़ी थीं, घर और रसोई की रानी थीं, इसलिए नवान्न की शुरुआत वे खुद से करती थीं। और खाने से पहले वे हम सबको सतर्क भी करती थीं, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?” ताकि अगर उन्हें कोई नुकसान भी होता है तो घर के सदस्य इससे वाकिफ रहें और समय पर उपचार करके उन्हें बचाया जा सके।
पर यह तो आज सोचता हूँ। उस समय तो नवान्न हम सब भाइयों के लिए एक मजेदार खेल ही था, और माँ हमारे साथ यह खेल खेलती हुई सचमुच बड़ी मोहक लगती थीं।
इसी तरह नवरात्रों के समय माँ का उत्साह देखते ही बनता था। माँ ‘खेतरी’ (घर के आले में जौ बोना, प्रतीकात्मक खेती) बड़े शौक से बीजती थीं। उसके लिए श्याम भैया खासकर खेतों से मिट्टी लाते थे। माँ ने खेतरी बोने के लिए एक अलग आला बनवा रखा था। जौ बोए जाते थे और जिस बरस माँ की यह छोटी सी खेती खूब जोरों से लहलहाती, माँ की खुशी और उमंग का क्या ठिकाना! सुबह कथा होती, आरती होती। उसमें माँ देवी माँ की बहुत सी आरतियाँ और भजन गातीं। पर मुझे उनमें एक ही पसंद था जिसमें माँ के साथ-साथ दोहराना मुझे अच्छा लगता, “नीं मैया, तेरा काँगड़ा घर चंगा...!”
इस आरती में आगे एक पंक्ति आती थी जो मुझे बड़ी पसंद थी, “नंगी-नंगी पैरीं राजा अकबर वी आया, सोने दा छतर चढ़ंदा...!” (नंगे पैरों राजा अकबर भी यहाँ आया और उसने सोने का छत्र चढ़ाया। अरी माँ, तेरा काँगड़ा वाला घर बड़ा अच्छा है!) इस आरती की हर पंक्ति के तुकांत को मैं इतना रस लेकर और इतने मजे में, बल्कि कहना चाहिए, थोड़े शरारती अंदाज में दोहराता कि गाते-गाते माँ की हँसी छूट जाती और संग-संग मैं भी जोरों से हँस पड़ता। यानी भक्ति में भी थोड़ा खिलंदड़ापन आ जाता और उसकी गंभीरता थोड़ी कम हो जाती। पर मेरी उदार विचारों की माँ को इसमें कोई आपत्ति न थी।
इसी तरह होई या अहोई भी माँ का प्रिय त्योहार था। मेरा खयाल है, उत्तर प्रदेश में इसे अहोई माता का त्योहार कहते हैं और पंजाब में होई का। और यह संतानों की कल्याण कामना का त्योहार है! बहरहाल उस दिन भी गुड़ का शीरा और डोइयाँ बनतीं। हम बच्चे कुंडा खड़काते हुए जोर-जोर से चिल्लाते, “होई...होई...होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई...!” फिर माँ के पुकारने पर हम दौड़कर जाते और वहाँ गुड़ के शीरे में डूबी डोइयाँ खाने के बाद, लौटकर फिर चिल्लाना शुरू कर देते, “होई...होई...होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई...!”
दुद्ध-पुत्तर क्या है, यह भला कौन जानता था? हाँ, गुड़ में डूबी आटे की डोइयाँ घर भर में—और साथ ही हमारे दिलों में भी आनंद और उल्लास भर देतीं। खेल में लीन हम बच्चे तब शायद इन चीजों को ज्यादा नहीं महसूस कर पाते थे। पर बच्चों के इस खेल के साथ ही घर भर में कैसा आनंद लहलहा उठता है, इसे वे स्त्रियाँ खूब अच्छी तरह समझती थीं और उनके खुशी से दमकते चेहरों पर महसूस किया जा सकता था। 
और करवा चौथ का तो नजारा ही कुछ और था। सुबह-सुबह बड़े अँधेरे ही खासी चहल-पहल से हम बच्चों की नींद खुलती। उठकर देखते तो साथ वाले कमरे में बढ़िया-बढ़िया पकवानों से सजी थालियाँ लिए भाभियाँ। खूब हँसती, बातें करती और साथ-साथ थोड़ा-बहुत खाती हुई। उनके बीच माँ, मानो किसी राजमहिषी के-से गौरव से भरी हुई नजर आतीं। 
मैं अचानक वहाँ पहुँचकर मजाक करते हुए कहता, “अच्छा, तो चोरी-चोरी खाया जा रहा है!” इस पर भाभियों सहित माँ खूब जोरों से हँसतीं। और कहतीं, “अच्छा चल, तू भी खा ले...!”
शाम को करवाचौथ व्रत की कथा होती तो आस-पड़ोस की स्त्रियाँ सज-धजकर हमारे घर आतीं और माँ की कथा शुरू होती। उस कथा की कोई और बात तो मुझे याद नहीं। बस, एक लाइन जरूर याद है, जो मुझे तब अपनी विचित्र ध्वन्यात्मकता के कारण बहुत आकर्षित करती थी कि “जेहड़ी राणी हाई, ओह गोली हो गई ते जेहड़ी गोली हाई, ओह राणी हो गई...!” (यानी जो रानी थी, वह दासी बन गई और जो दासी थी, वह रानी बन बैठी!) इन शब्दों में पता नहीं ध्वन्यात्मकता का कैसा जादू है कि आज भी इन्हें दोहराते ही मानो माँ और घेरे में बैठी स्त्रियों का पूरा ‘कथा-संसार’ भीतर-बाहर से मेरे आगे खुल पड़ता है।

[9]
कुछ और भी छोटे-मोटे व्रत-त्योहार थे। इनमें एक ठेठ देशी किस्म का त्योहार बासी खाने का भी था जिसे ‘बेवड़े’ या ऐसा ही कुछ कहा जाता था। मेरा खयाल है, उसी को कहीं-कहीं ‘बासड़े’ भी कहते है और यह होली के कुछ ही रोज बाद आता है। और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसी को कहीं-कहीं शीतला माता के व्रत या त्योहार के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन त्योहार होता, उससे एक रात पहले आलू के ढेर सारे पराँठे बनाकर रख लिए जाते और अगले दिन हम वही खाते। उस दिन चूल्हा सुलगाने और गरम खाने की मनाही थी। क्यों भला? यानी इसके पीछे असली बात या विश्वास क्या था? इसे मैं आज तक नहीं जान पाया। हालाँकि एक मित्र ने पिछले दिनों बड़े आत्मविश्वास के साथ समझाया, कि “भाई, बेवड़े पर्व में एक प्रतीकार्थ है कि आज तुम बासी खाना खा लो, पर यह बासी खाना खाने का आखिरी दिन है। इसके बाद बासी खाना बंद। आगे से ऋतु-परिवर्तन के कारण ताजा बनाकर ही खाना चाहिए।” 
यह व्याख्या सही है या गलत, नहीं कह सकता। मगर इतनी बात तय है कि पुरानी बहुत सी चीजों का प्रतीकात्मक मतलब तो है ही। उनसे नए और पुराने वक्तों की तुलना करने का आनंद भी हमारे हाथ आ जाता है। 
बात त्योहारों की चल रही थी। उसी सिलसिले में याद आया, शुरू में शिवरात्रि भी हमारे परिवार में खूब जोर-शोर से मनाई जाती थी। शाम के समय आँगन में उपलों की आग सुलगाई जाती। उसके चारों ओर पानी छिड़कते हुए हम लोग परिक्रमा करते। माँ उस आँच पर मोटे-मोटे ‘रोट’ सेकतीं। नमकीन भी, मीठे भी। और वे कई दिनों तक मीठी और नमकीन लस्सी के साथ खाए जाते। मुझे याद है, मीठी लस्सी के साथ नमकीन रोट और नमकीन लस्सी के साथ मीठे रोट खाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।
यहीं यह दर्ज करना भी शायद अप्रासंगिक नहीं कि माँ शिवभक्त थीं और उन्होंने ही मेरा नाम शिवचंद्र प्रकाश रखा था। हालाँकि इतना लंबा नाम चला नहीं और स्कूल में दाखिले के समय हैड मास्टर साहब ने खुद-ब-खुद छोटा करके उसे चंद्रप्रकाश बना दिया। पर यह बात मन में पुलक भरती है कि इस नाम में माँ की छुअन है और मेरे नाम में जुड़ा चंद्र असल में शिव के मस्तक में जड़ा चंद्रमा है। 
त्योहार के दिन माँ की बनाई चीजों और खाने में पता नहीं कैसे, अनोखा रस आ जाता। यों माँ कोई असाधारण पाक-कलाशास्त्री न थीं, पर उनकी बनाई चीजों में बड़ा रस होता था। माँ के बनाए खाने की बात करें तो माँ आलू और मूली के पराँठे खूब अच्छे बनाती थीं। मक्के और बाजरे की खूब घी से तर रोटी तो शायद वैसी कोई बना ही सकता। उसे हम लोग रोटी नहीं, ‘ढोढा’ कहा करते थे। यानी मक्के का ढोढा, बाजरे का ढोढा...वगैरह-वगैरह। सर्दी के दिनों में ऐसी चीजें हमारे लिए किसी अनमोल नेमत से कम न थीं और इनके आगे पाँच तारा होटल तो छोड़िए, स्वर्ग के पकवान भी हम छोड़ सकते थे। और सर्दियों में माँ के हाथ की बनाई गुड़ और आटे की पिन्नियों के लिए तो आज भी तरसता हूँ। दुनिया की अच्छी से अच्छी मिठाई से वे मुझे ज्यादा स्वाद भरी लगती थीं। 

[10]
माँ ने याद नहीं पड़ता कि कभी पीटा हो। बल्कि पीटना तो दूर, याद नहीं पड़ता कि माँ ने कभी हलके से भी डाँटा हो। माँ को न जाने कैसा यह अजब-सा विश्वास था अपनी संतानों को लेकर कि मेरे बेटे या बेटियाँ गलत नहीं हो सकते! या वे कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते।...
एक छोटी सी घटना याद आ रही है—और वह होली के मौके की है। हुआ यह कि होली को मुश्किल से एक-दो दिन बाकी थे। हम सब बच्चे अपनी-अपनी पिचकारियाँ लिए मोरचों पर डटे थे। हमारे घर के सामने खुला मैदान है, जिसके चारों सिरों से चार गलियाँ निकलती हैं। यानी कोई कहीं से भी इनमें से निकलकर आ सकता था या जा सकता था। और हमारी चौकन्नी निगाहें इन चारों छोरों पर थीं। इतने में एक सज्जन ड्राईक्लीन किए हुए बढ़िया कोट-पैंट, टाई पहने हुए निकले। रोब-रुतबे और घमंड की साकार मूर्ति! अब उन पर कौन रंग डाले? सभी बच्चे डर रहे थे तो मैंने बीड़ा उठाया। मैं उस छोटे से बालदल का नायक जो ठहरा! मैं चुपके-चुपके उनके पीछे गया और फिर एकाएक अपनी पिचकारी से उन्हें छींटमछींट कर दिया। 
पता लगा तो वे कोट-पेंटधारी महाशय गुस्से में फनफनाते हुए मेरे पीछे दौड़े। मैं तब छोटा सा था। दुबला-पतला और एकदम चुस्त। लिहाजा एकाएक उछलकर घर के अंदर! अब मैं सुरक्षित घेरे में था। वे सज्जन भी तेजी से घर में आना चाहते थे कि हमारे चबूतरे पर धड़ाम से गिरे।...चबूतरे पर काफी गीला रंग बिखरा हुआ था। लिहाजा जितना हमने लगाया, उससे ज्यादा रंग खुद-ब-खुद लग गया। 
अब तो उनका गुस्सा और भी बुलंद। अदर आकर उन्होंने शिकायत की। माँ ने कहा, “मैं डाँटूँगी इन्हें, पर ये तो छोटे बच्चे हैं। बेटा, तू बता, तूने कौन-सी समझदारी की कि होली से एक दिन पहले यह सूट पहनकर चला आया?... तू तो इनसे भी गया-बीता है!” 
सुनकर उनका पारा उतरा, शर्मिंदा हुए। बाद में माँ ने हमें समझाया कि ऐसा नहीं करते। पर दूसरों के आगे अपने बच्चों को किसी शेरनी की तरह वे बचाती थीं! और धीमे से सीख भी देती जातीं कि देखो, मुझे तुम्हारी वजह से कहीं नीचा न देखना पड़े!
अलबत्ता माँ का यह विश्वास जाने-अनजाने हमें बहुत ताकत, बहुत बल देता था और आज भी देता है। लगता था कि माँ का चाहे हम पर यह भोला विश्वास ही है, पर हमें इस विश्वास को झूठा नहीं होने देना, खुद को भटकने नहीं देना।
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