समीक्षा 'द्रोणोच्छ्वास' - देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' का श्रेष्ठ प्रबन्ध-काव्य

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: द्रोणोच्छ्वास (प्रबन्ध-काव्य)
लेखक: डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप'
मूल्य: ₹ 75/-
प्रकाशक: साधना प्रकाशन, अयोध्या

डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' सनातन, वैदिक साहित्य को लेकर अलख जगाए हुए है, हिन्दी व संस्कृत भाषाओं में विपुल साहित्य रचा है, सर्वाधिक आनंद का विषय है, आज भी वे सृजन में लगे हुए हैं और अपने तरीके से संसार को आलोकित, प्रकाशित कर रहे हैं। उनका जन्म 10 जून 1939 को हुआ और  उन्होंने हिन्दी व संस्कृत से एम ए किया है। ‘तुलसी के काव्य में श्रृंगार' विषय पर उनकी पीएचडी पूरी हुई है। सन 1960 से उनका अध्यापन व साहित्य लेखन शुरु है और आज भी अनवरत चल रहा है। वेद मर्मज्ञ डॉ. दीप ने संस्कृत व हिन्दी में महाकाव्य, खण्ड-काव्य, कहानी, कविता, उपन्यास, वेद, बालगीत, गीता, योग, वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस आदि से जुड़ा साहित्य लिखा है। इसके साथ ही वेद-मंत्रों की व्याख्या का यूट्यूब के माध्यम से उनके द्वारा प्रसारण होता है। उनका उद्देश्य है, जन-मानस में संस्कृत भाषा और सनातन वैदिक साहित्य का प्रचार-प्रसार करना। ईश्वर उन्हें शक्ति दे, वे अपने उद्देश्य में सफल हों और सम्पूर्ण विश्व में जन-जन तक उनकी साधना का श्रीफल पहुँचे।

उनका संस्कृत में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परम वीर चन्द्रशेखर आजाद पर लिखा महाकाव्य भी है जिसे चौखम्बा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। बिहारी सतसई सुधा, वेदविभा (लघु), ऋचाओं के दर्पण में, गीता ज्ञान दीपिका, मेघदूतम्, वेदविभा (वृहद्), पातञ्जलयोगदर्शनम्, वाल्मिकिरामायण की धर्मभूमि, भागवत रहस्य बोध, गुरु वशिष्ठ, द्रोणोच्छवास, श्रीरामदूताञ्जनेय, गीतिधारा, क्रान्तिकेशरी, निर्झरिणी, बालगीतगुञ्जनम्, जयतुभारतम्, तुलसी की श्रृंगार योजना, शौर्यवैभवम् और काव्यकादम्बिनी जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना उन्होंने की है। उनका अत्यन्त महत्वपूर्ण कृत्य है-चारों वेदों का भाष्य। संभवतया किसी एक व्यक्ति द्वारा किया हुआ यह दुर्लभ प्रयास है। इस उम्र में भी अनेक ग्रंथ सृजन के क्रम में हैं। ईश्वर उन्हें सुदीर्घ जीवन दे ताकि देश-विश्व को उनके ज्ञान का लाभ मिलता रहे। उनके कृत्य और व्यक्तित्व पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं, यह क्रम सतत जारी है और अनेक शोधार्थियों को डाक्टरेट की उपाधि मिली है। डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' को देश ने अनेक सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित/ पुरस्कृत किया है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह सामान्य उपलब्धि नहीं है। अनेक संस्थान उनसे परामर्श लेते हैं और देश-दुनिया की सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं ने उन्हें छापा है। इस तरह सुदीर्घ काल से पाठक उनके ज्ञान से लाभान्वित होते रहे हैं और भविष्य में होते रहेंगे।

'द्रोणोच्छ्वास' पुस्तक में अनेक विद्वानों की शुभाशंसाएं सम्मिलित हुई हैं। डॉ. सूर्यप्रकाश दीक्षित जी लिखते हैं-"यह काव्य विषयवस्तु की दृष्टि से नया है। चरित्रों की परिकल्पना, उद्देश्य की महत्ता और भाषा की प्रौढ़ता से मैं प्रभावित हुआ। इस प्रकार की रचनाएँ समकालीन लेखन में विरल ही हैं।" डॉ. रमाशंकर तिवारी ने लिखा है-"आचार्य द्रोण का स्थान प्राचीन भारतीय शौर्य के इतिहास में अप्रतिम रहा है। शस्त्र एवं शास्त्र दोनों के  मञ्जुल समन्वय में द्रोण का पूर्ण व्यक्तित्व भासमान् बनता है।" "भाषा-शैली साहित्यिकता के सौन्दर्य से समन्वित है। प्रायः तत्सम पदावली का विनियोग किया गया है जो कवि के चिर-परिचित साहित्यिक संस्कार का उन्मीलक है।" सत्यनारायण द्विवेदी 'श्रीश' जी लिखते हैं-"यह प्रबन्ध-काव्य 'द्रोणोच्छ्वास' सात उच्छ्वासों में विस्तृत है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है 'कुरुक्षेत्र' जैसी बेबाकी और 'कामायनी' जैसी व्यञ्जना। भाषा प्रौढ़ प्राञ्जल है। उक्तियों में चोखापन है और कथोपकथन अपेक्षित कसाव से युक्त है।" उन्होंने आगे लिखा है, "महाभारत के ऐतिहासिक तथ्य से हटकर द्रोण विषयक दुष्प्रचार द्वारा समाज में जातीय तनाव उत्पन्न करने वाले कुचक्रियों को कवि ने मुँहतोड़ उत्तर दिया है और शासन तथा समाज को क्रीत तथा उपेक्षित प्रतिभा के दुष्परिणामों के प्रति सचेत किया है। कथानक का यह उपयोग अभिनव है और वर्तमान सन्दर्भ में अत्यन्त सार्थक है।"

विजय कुमार तिवारी
'द्रोणोच्छ्वास' प्रबन्ध काव्य के प्राक्कथन में स्वयं डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' ने आचार्य द्रोण को लेकर बड़ी सार्थक भूमिका, विवेचना लिखी है। वे प्राचीन भारत की दिव्य विभूतियों में से एक हैं, शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत हैं, पितामह भीष्म के बाद उन्हें ही कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया गया, महाभारत युद्ध के समय उनकी आयु लगभग चार सौ वर्ष थी, अत्यधिक तप-साधना में रत रहने के कारण उन्हें घोर दरिद्रता का जीवन जीना पड़ा, महाराज द्रूपद के वचनों से अपमानित होना पड़ा, हस्तिनापुर का राज्याश्रय लेना पड़ा, उसी द्रूपद से जीते गये राज्य का आधा लौटाकर उदारता का परिचय दिया, जिस अर्जुन को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाया, उन्हीं के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए, इस तरह आचार्य द्रोण का महान व्यक्तित्व अति प्रभावशाली है। डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' ने अपने तर्कों से महाभारत कालीन नाना आरोपित, लोक प्रचलित गलत प्रसंगों पर प्रश्न उठाया है और खण्डन किया है। उन्होंने अपने प्राक्कथन में अत्यन्त महत्वपूर्ण बात लिखी है, "किसी भी महापुरुष का मूल्यांकन उसकी समग्रता में करना उचित है। महापुरुष मानव मात्र से सम्बन्धित होते हैं। किसी वर्ग विशेष से जोड़कर नाम मात्र से बिचकना मानवता के प्रति अपराध है। उनका परिसीमन कथमपि उचित नहीं।" उन्होंने द्रोण के चरित्र को प्रबन्ध-काव्य में चित्रित करने के पीछे लिखा है, "सत् के प्रतिष्ठापन और असद के उच्छेदन का जितना अवकाश प्रबन्ध काव्य में रहता है, उतना मुक्तक में नहीं। रचनाकार जब अतीत को वर्णन का विषय बनाता है, वर्तमान स्वतः पार्श्व में खड़ा हो जाता है। अतीत वर्तमान में अपनी पहचान बनाने लगता है।" अंत में उन्होंने लिखा है, "प्रस्तुत प्रबन्ध में एक आयुधजीवी की हुंकार और विपन्न, विवश बुद्धिजीवी की चीत्कार है।"

प्रबन्ध काव्य के प्रथम उच्छ्वास में डॉ. देवीसहाय पाण्डेय जी शुरु करते हैं-

वीर भूमि भारत पर छाया चन्द्र-वंश का शासन,
अति सक्षम संरक्षण देता भीषण भीष्म-हुताशन।

भारत सदा से वीरों की भूमि रही है। महाभारत काल में चन्द्र-वंशी राजा-महाराजाओं का शासन था। प्रजा को महपराक्रमी भीष्म का अति सक्षम संरक्षण प्राप्त था। प्रतिभा-सम्पन्न राजकुमारों को देख-देखकर वे बहुत सुखी थे और चक्रवर्ती साम्राज्य बनाने का स्वप्न उनकी आँखों में था। यह कवि की प्रतिभा ही है, चंद शब्दों में उन्होंने बड़े दृश्य की भूमिका रच दी है। उनका भाषा-कौशल, शब्द सामर्थ्य, प्रभावशाली काव्य-शैली और चमत्कृत करता विषय सब कुछ अद्भुत है।

हस्तिनापुर के विस्तृत प्रांगण में सभी राजकुमार कन्दुक का खेल उत्साह व जोश के साथ खेल रहे हैं।  भीम के प्रहार से कन्दुक कूप में जा गिरा। विपक्षी राजकुमारों ने भीम को ललकारा। युधिष्ठिर कौरव कुमारों की छल-नीति समझ गये, उन्होंने भीम को रोका, बोले, 'पहले बुद्धि का प्रयोग करो, जो इस तरह उतावलापन दिखाता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। जरा दृष्टि गड़ाकर देखो, जीर्ण-शीर्ण इस भग्न कूप में सूखे तल पर फण फैलाए विषधर पड़े हुए हैं।' लाचार होकर, हार मान सभी कुमार घर जाने को उद्यत होने लगे, तभी पीछे से आवाज आती है, "कैसे क्षत्रिय कुमार हो, हार मानकर लौट रहे हो?" यहाँ कवि ने आगन्तुक के व्यक्तित्व, शरीर सौष्ठव, ओज-तेज, जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, तरकश-तीर, जनेऊ-समिधा सहित भव्य विन्यास का दृश्य चित्रित करते हुए अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया है। आगन्तुक ने कहा-‘यह अत्यन्त छोटी राई के बराबर समस्या है’। साथ ही अपनी ओजपूर्ण वाणी से नाना उद्धरणों द्वारा वीरता व शौर्य की कथाएँ सुना डाली और बोले-'किसी धनुर्धर के लिए यह साधारण कला-कौतुक है।‘ उन्होंने गेंद कूप से क्षण भर में निकाल दिया। बहुत पूछने पर उस आगन्तुक ने अपना परिचय दिया-"ब्राह्मण साधक हूँ, जग में मैं द्रोण कहा जाता हूँ। परशुराम का शिष्य हूँ, धनुर्विद्या जानता हूँ, मेरा परिचय यही है और आप सभी के हित की कामना करता हूँ।‘’ पाण्डव कुमार अर्जुन आगे बढ़कर पूरी श्रद्धा के साथ द्रोण के चरणों में गिर पड़े और उन्होंने अर्जुन को धरती का सबसे बड़ा धनुर्धर होने का आशीर्वाद दिया। युधिष्ठिर ने भीष्म को सूचना दी और वे कृपाचार्य को साथ लेकर आए। उस दृश्य के लिए डॉ. देवीसहाय पाण्डेय जी लिखते हैं-
"हुआ प्रतीत कि कुरुकुल का सौभाग्य देह धर आया।"

इस मिलन का मार्मिक चित्र कवि ने खींचा है।

द्वितीय उच्छ्वास में द्रोण विस्तार से अपनी आपबीती सुना रहे हैं। पिता भरद्वाज महातपस्वी थे, उन्होंने धन-संग्रह की कभी लालसा नहीं की। मैंने भी तप शुरु कर दिया। पिता ने मुझे शास्त्रों में पारंगत बना दिया था। मन में विचार आया कि शस्त्र ही शास्त्रों की रक्षा कर सकते हैं। मैंने गुरु परशुराम से शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की। कवि ने अपने काव्य में अलंकार, मुहावरों, प्रकृति चित्रण और बिंबों की भरमार से चमत्कृत किया है। गुरु-आश्रम, गुरु का तप और शिष्य के साथ उनका संवाद कवि दीप ने अद्भुत तरीके से लिखा है। यहाँ शिक्षा के साथ, शस्त्र प्रयोग के लिए उचित धैर्य की बात की गई है और नैतिकता पर नाना उदाहरणों के साथ बल दिया गया है। क्षत्रिय और ब्राह्मण के व्यवहार-कर्तव्य की चर्चा हुई है। गुरुवर द्रोण से कहते हैं-'तपबल से अपना स्वर्ग सजाना उचित नहीं है बल्कि जन-हित का चिन्तन होना चाहिए।' द्रोण अपनी कथा सुना रहे है-घर आकर गुरु के आदेशानुसार आश्रम का जीवन शुरु किया, साध्वी कृपी से वैदिक-विधान से विवाह किया और अश्वत्थामा पुत्र हुआ। निर्धनता से अश्वत्थामा दुखी रहता था और उसके सखा उसका उपहास करते थे। धनी बालक अश्वत्थामा को ललचाकर दुग्धपान कर रहे थे। वह दुखी होकर बोला-'जब तक मुझे वह पेय नहीं मिलेगा, मैं भोजन व स्नान नहीं करूँगा।‘

कवि ने बड़े ही मार्मिक तरीके से द्रोण की गरीबी का चित्रण किया है। उन्होंने अनेक नीति वचनों का उल्लेख करते हुए कहा-‘जो बच्चे के लिए दूध व वस्त्र की व्यवस्था नहीं कर सकता उसे पिता बनने का कोई हक नहीं है। माँगना भी एक कला है, उन्हें वह भी नहीं आती। मुझे मित्र द्रूपद का ध्यान आया जो कहा करता था, जब पिता के बाद पांचाल देश का राजा बनूँगा, तुम्हें राजा बनाकर तुम्हारे प्रतिनिधि के तौर पर शासन करूँगा।‘ कृपी ने भी सहमति जताई, जिस भूखण्ड पर विद्वानों की पहचान न हो उसे छोड़ ही देना चाहिए। द्रोण ने जन्मभूमि को शीश झुकाकर नमन किया और चल पड़े। कृपाचार्य यह प्रसंग सुनकर विह्वल हो उठे। यहाँ कवि ने समाज में व्याप्त भ्रष्ट व्यवहार का चित्र खींचा है। द्रोण अपनी आपबीती सुना रहे हैं, बोले- जब पांचाल की सीमा में पहुँचा तो सुखद जानकारी मिली, द्रूपद ही राजसिंहासन पर विराजमान है। तृतीय उच्छ्वास में द्रूपद के तिरस्कार पूर्ण व्यवहार और कटु वचनों का विस्तार से जीवन्त दृश्य प्रस्तुत किया गया है।

चतुर्थ उच्छ्वास में कवि की काव्य कला धरती, आकाश, तारावलियाँ, घोर अंधकार और भीतर की पीड़ा का मार्मिक दृश्य प्रस्तुत करती है। ऐसे शब्द-सौष्ठव विरल हैं और सारे बिंब जीवन्त दृश्य चित्रित कर रहे हैं। द्रोण कहते हैं, यह कैसी माया है, रसों में केवल कटुरस ही मेरे हिस्से में है। मेरी प्रतिभा पर विष-बादल बरस रहे हैं। कवि के व्यंग्यात्मक प्रश्नों को देखिए-

दारिद्र्य दिया विद्वानों को, मूर्खों को धन-भंडार दिया,
अति तिरस्कार पुण्याशय को पापाशय को सत्कार दिया।

द्रोण का मन चीत्कार कर रहा है, कवि ने उनकी मनःस्थिति को खूब भाव-शब्दों से जीवित किया है। द्रोण के प्रश्न, उनकी विह्वलता, द्रूपद के अपमान से व्यथित मन सब कुछ बहुत मार्मिकता के साथ लिखा है। उनके पास वह हृदय है जो द्रोण के हृदय की पीड़ा समझता है। बाहर मौसम भयानक हो उठा है, बिजली चमक रही है और वज्रपात हो रहा है। भीतर कोई ज्वाला धधक रही है। युद्ध की विभीषिका की कल्पना भयावह है। रक्त की नदियाँ बहेंगी और सर्वत्र महा नाश दिखाई देगा। द्रोण उच्छ्वसित होते हैं, कहते हैं-जो भी होगा उसका जिम्मेदार शासन और समाज होगा। अब तक मैंने सहन किया है, अब नहीं करूँगा। अपने पौरुष से दुष्टों का संहार करूँगा। द्रोण इसका कारण बताते हैं-"पौरुष-उष्मा से हीन पुरुष को मान नहीं मिल पाता है।" यहाँ का रहस्य समझ गया हूँ, अब मुझे टेढ़ा बनकर अपना लक्ष्य साधना है। जिसने मुझे तिनका समझा है, उसे तिनके की तरह उड़ाऊँगा, धनुष-वाण से उसके कुल का रक्त बहाऊँगा। वह मित्रता के नाम पर कलंक है, मानवता और राजकुल का कलंक है। यदि भारद्वाज का पुत्र हूँ और गुरु परशुराम का शिष्य हूँ तो दुराचारी द्रूपद के हाथों से उसका साम्राज्य छिनूँगा। द्रोण कृपाचार्य से कहते हैं- "मैंने धनुष पर वाण संधान किया, उसी क्षण आप और पितामह भीष्म का ध्यान आया। मेरी उन्मत्तता शांत हुई और मैंने हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया।"

इस सम्पूर्ण प्रबन्ध काव्य में डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' ने मनुष्य का जीवन-दर्शन विस्तार से समझाया है। जीवन की गति, काल की गति और ईश्वरीय विधान का चित्रण हर किसी को शिक्षित करने वाला है। पंचम उच्छ्वास में कवि ने लिखा है, एक समय था, द्रोण को भीख भी नहीं मिल रही थी और आज स्वयं भीष्म उनका स्वागत कर रहे हैं। भीष्म कहते हैं-'आप नहीं आये हैं, हमारा सौभाग्य आया है। मैं तो स्वयं सुयोग्य महान पुरुष की तलाश में था, आप जैसा श्रेष्ठ पुरुष कहाँ मिलने वाला है। यह तो भरत-वंश पर ईश्वर की अहेतुकी कृपा है। भीष्म कहते हैं-'मैं निरंतर भरत-वंश का गौरवमय इतिहास बनते और सम्पूर्ण पृथ्वी पर उसकी विजय पताका फहराते देखना चाहता हूँ।' द्रोण ने दान की व्यवस्था की, गौशालाएँ खोली ताकि कोई बालक दूध के लिए न रोये। द्रोण-कर्ण और द्रोण-एकलव्य प्रसंग मार्मिक संवेदनाओं के साथ चित्रित हुआ है और द्रोण के चरित्र की गहन सच्चाई उभरी है। 

कवि दीप जी लिखते हैं-सामान्य घाव तो कुछ दिनों में भर जाते हैं परन्तु अपमान का घाव कभी नहीं भरता। द्रूपद के कटुवचन द्रोण को व्यथित करते रहते हैं। उधर नदी में स्नान करते समय द्रोण को मगरमछ ने पकड़ लिया और अर्जुन ने  अपने तीर संधान से उसे चीर डाला। गुरु शिष्यों की एकाग्रता की परीक्षा लेना चाहते हैं। पेड़ पर एक कृत्रिम पक्षी बैठाया गया और सबसे पूछा गया, तीर संधान से पहले क्या-क्या दिखाई दे रहा है। युधिष्ठिर सहित सभी कुमारों ने जैसा देखा, बता दिया। अंत में विनत भाव से अर्जुन ने कहा-मुझे तो केवल उसकी आँख दिखाई दे रही है। गुरु प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्रह्मास्त्र देते हुए अर्जुन के सामने एक शर्त रख दी, चाहे अवरोध कैसा भी हो, कभी विचलित मत होना। भले सामने द्रोणाचार्य ही क्यों न हों, कर्तव्य से कभी पीछे मत हटना। पार्थ ने गुरु-आदेश पाकर द्रूपद पर आक्रमण किया और बंदी बना लाया। द्रोण के सामने सिर झुकाए द्रूपद खड़े थे। द्रोण ने आधा राज्य लौटा दिया और कहा अब तो हम बराबर के स्तर पर मित्र हैं। द्रूपद बहुत दुखी रहने लगे। उन्होंने यज्ञ करवाया और धृष्टद्युम्न नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो द्रोण की हत्या करेगा। द्रूपद ने पुत्र को शिक्षा के लिए द्रोण के पास भेजा। भीष्म ने रोकना चाहा, बोले-यज्ञ से पैदा हुआ यह वही बालक है जो आपके प्राणों का संहार करने वाला है। कवि दीप की संवाद शैली में यह काव्य अद्भुत है, कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान देने वाला है। द्रोण भीष्म के सामने ब्राह्मणोचित तथ्य कहते हैं, कर्तव्य को श्रेष्ठ बताते हैं और आग्रह करते हैं कि चिन्ता रहित होकर हे पितामह! आप अनुमति दें। 

'द्रोणोच्छ्वास' प्रबन्ध काव्य का सप्तम खण्ड विस्तृत और द्रोण के जीवन की अनेक कथाओं को समेटे हुए है। युद्ध में सेना राजा के आदेश पर सैनिकों को मारती है। कवि इसे नाहक मानता है और सेना पर हुए व्यय को जनहित में लगाने का विचार रखता है। यह चिन्तन का एक पक्ष है। सेना न हो तो पड़ोसी आक्रमण कर सकते हैं। सीमाओं की रक्षा के लिए सेना आवश्यक है। महाभारत युद्ध टल नहीं पाया। कवि दीप ने युद्ध भूमि का विचलित करने वाला यथार्थ, वीभत्स दृश्य चित्रित किया है। साथ ही नैतिकता, मानवता का संदेश भी देते चलते हैं। द्रोण जिधर बढ़ जाते, पाण्डव सेना मे हाहाकार मच जाता था। उनके युद्ध कौशल और आक्रामकता का अद्भुत दृश्य लिखा है कवि ने। यह स्पष्ट हो गया, जब तक आचार्य जीवित हैं, पाण्डवों के लिए युद्ध जीतना असम्भव है। अश्वत्थामा हाथी के मरने का प्रचार करवाया गया। स्वयं युधिष्ठिर ने ऊँची आवाज में यह समाचार द्रोण को सुनाया। द्रोण इस दुख से विचलित हो युद्ध से विरत हुए और प्राण-वायु के निष्कासन हेतु पद्मासन में बैठ गए। अर्जुन उनके चरणों पर गिर पड़े। द्रोण-अर्जुन संवाद में कवि ने प्रश्न, उत्तर के साथ-साथ बहुत से रहस्यों का वर्णन किया है। द्रोण युधिष्ठिर के कृत्य को राजनीतिक योजना बताते हैं, भीष्म के मौन पर भी प्रश्न खड़ा करते हैं और द्रोपदी चीरहरण, एकलव्य प्रसंग आदि घटनाओं में स्वयं के कृत्यों पर पश्चाताप करते हैं। आचार्य द्रोण युधिष्ठिर के विजयी होने की भविष्यवाणी करते हैं और राजा के कर्तव्य के बारे में बताते हैं। अंत मे ब्रह्मलोक से दिव्य विमान आया और द्रोण की आत्मा परमज्योति से मिलने चल पड़ी।

इस तरह कवि डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' द्वारा रचित प्रबन्ध काव्य 'द्रोणोच्छ्वास" महाभारत काल पर आधारित महत्वपूर्ण ग्रंथ है। कवि ने द्रोण के चरित्र का बड़ी बेबाकी से उज्ज्वल पक्ष लिखा है और हर दृष्टि से श्रेष्ठ बताया है। कहीं भी द्रोण कमजोर नहीं दिखते हैं। उनमें शौर्य है, वीरता है, चिन्तन-शक्ति और संकल्प है। वैसे ही काव्य लेखन में कवि के पास भाषा है, शैली है, शब्द-सामर्थ्य है और उन्होंने साधना करते हुए द्रोण के उच्छ्वासों को यथार्थतः समझा और अभिव्यक्त किया है। कवि को समाज का, राजा का व सब के कर्तव्यों का खूब ज्ञान है और उन्होंने विस्तार से इसकी चर्चा करते हुए अपने प्रबन्ध-काव्य को श्रेष्ठ स्वरूप प्रदान किया है। ऐसे ग्रंथ पढ़े जाने चाहिए और इनका खूब प्रचार-प्रसार होना चाहिए। ऐसे श्रेष्ठ लेखन के लिए डॉ. देवीसहाय पाण्डेय 'दीप' जी के प्रति मैं हृदय से बधाई देता हूँ और प्रणाम करता हूँ।

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