आख़िरी नज़र (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: बलूची
लेखक: वहीद ज़हीर
अनुवाद: देवी नागरानी

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


वहीद ज़हीर
मामा गिलू एक अरसे से नींद को तरस रहा था। सच में चौकीदारी नींद की दुश्मन होती है। उतार की तरफ़ लुढ़कने वाला पत्थर भी आख़िर एक जगह पर आकर रुकता है। हाँ, बिलकुल उसी तरह सोच भी लुढ़कने वाले पत्थर की तरह कहीं न कहीं जाकर रुक जाती है। कुत्ते की चौकीदारी उस की प्रकृति है और उसकी निष्ठा की पहचान भी। लेकिन आदमी के लिये आदमी की चौकीदारी एक मजबूरी है। समय सृष्टि का सबसे बड़ा चौकीदार है। आज उसे लग रहा है जैसे वक़्त भी बुढ़ा चुका है क्योंकि उसकी रफ़्तार बहुत तेज़ हो चुकी है उस बूढ़े की तरह जो उम्र का आखिरी पड़ाव बहुत तेज़ी से तय करता है। गोया उसके बुढ़ापे ने वक़्त के चेहरे पर भी झुर्रियाँ डाल दी हैं - मामा गिलू ने सोचा। 
मामा गिलू अपनी अंधी पत्नी राजी और नौजवान बेटी लाली की ज़रूरतें पूरी करने के लिये चौकीदारी करता था। दिन में वह चिलम के कश लगाता रहता, या फिर सो रहा होता। लाली जवानी की दहलीज़ पर क़दम रख चुकी थी और उड़ती हुई तितलियों की उड़ान से परिचित हो चुकी थी। उसके लिये एक दो रिश्ते आए मगर मामा गिलू ने यह कहकर टाल दिया कि बच्ची अभी कम-उम्र है। वैसे भी उसे अपने और अपनी अंधी पत्नी के लिये सहारे की ज़रूरत थी। रात की चौकीदारी के बाद जब घर लौटता तो यह देखकर उसे धक्का-सा लगा - रंग ज़र्द हो गया कि रात मेरे घर में कोई आया है। आंगन में जूतों के निशान और इत्र की ख़ुशबू फैली हुई है। औरत ज़ात पर उसका शक हमेशा की तरह आज भी क़ायम था, बल्कि आज तो उसने अपने शक को यक़ीन में बदलता हुआ महसूस किया। जब कभी वह अपनी पत्नी को औरतों की मक्कारी के बारे में अपने विचार बताता तो पत्नी फ़ौरन बोल पड़ती ‘शुक्र है कि मैं अंधी हूँ।‘ 
‘मेरी पत्नी के अंधेपन ने किसी अजनबी के लिये मेरे घर का द्वार खोल दिया है’, मामा गिलू ने सोचा। वह गुस्से के आलम में अपनी पत्नी के कमरे में आया, ‘रात घर में कोई आया था?’
‘नहीं तो’, पत्नी ने धीमे लहज़े में कहा। 
‘हाँ तुम तो अंधी हो, तुम्हें क्या मालूम।’ मामा गिलू की यह बात सुनकर राजी की बेनूर आँखें तेज़ी से अपने स्याह दायरे में इधर-उधर फैलने और सिकुड़ने लगीं, यूँ लग रहा था जैसे गुस्से से उसकी आँखें बाहर निकल आएंगी।  
 ‘तो फिर आज एक अंधी से क्यों पूछा जा रहा हैं?’ पत्नी के आख़िरी जुमले पर वह गुस्से में कमरे से बाहर निकला ताकि लाली से पूछ सके मगर लाली उस वक़्त सो रही थी। वह जीवन में पहली बार औरत को औरत समझकर उसके हर चलन को मक्कारी मानने लगा था। उस वक़्त उसकी हालत बिलकुल उस बच्चे जैसी थी जो अपने मुँह से ज़मीन पर गिरे हुई लालीपॉप को देखते हुए सोचता है कि वह उसे साफ़ करके वापस मुँह में रख सकता है, मगर उसे ख़याल आता है- किसी ने देख लिया होगा और फिर गुस्से में आकर लालीपॉप को जूते के नीचे रौंद कर आगे बढ़ जाता है। मामा गिलू सोच रहा था क्या मैं भी ऐसा कर सकूँगा? नहीं, नहीं, हर्गिज़ नहीं, यह मेरी इज्ज़त का सवाल है। दूसरे दिन मामा गिलू शाम को ही घर से निकला लेकिन वह अपनी ड्यूटी पर नहीं गया बल्कि घर से कुछ दूरी पर वृक्षों के झ़ुंड में बैठ कर उसने आँखें अपने घर के दरवाज़े पर टिका दीं। उसे चौकीदारी करके पंद्रह साल हो गए थे मगर आज उसने सही मायने में चौकीदारी के बोझ को महसूस किया। उसने मजबूरी की दीवार तोड़कर अपनी इज़्ज़त की दीवार बचाने की ठान ली। 
उस वक़्त उसके ज़हन में सोचों का एक सैलाब उमड़ आया था। अगर वह अजनबी नौज़वान आया तो मैं उसका क़त्ल करूँगा, उसके बाद लाली का ख़ून भी तो करना होगा, यही दस्तूर है ग़ैरत का... पर मैं अपनी बेटी का क़त्ल कैसे करूँगा? काश मेरा कोई बेटा होता तो वह आज यह फर्ज़ निभा भी चुका होता। बहन पर भाई का फर्ज़ और बेटी पर बाप का कर्ज़ उस बिल्ली की तरह है जो रात-दिन चूहों की ताक में रहती है। उस वक़्त उसका वहम हर राहगीर के साथ उसके दरवाज़े तक सफ़र करता और जब राहगीर आगे निकल जाता तो वह एक लम्बी सांस लेकर रह जाता। रात भर की बेचैनी और बेख़याली ने उसे गूंगा कर दिया।  
सुबह होते ही वह आँखे मलता हुआ घर में दाख़िल हुआ। एक पल के लिये वह सकते में आ गया। कल के निशाना से कुछ अलग से निशान आज भी थे। एक पल के लिये उसे लगा जैसे कोई डफली बजाकर उसे जगा रहा हो। उसे चक्कर आने लगे, एकदम से उसके ज़ेहन के परदे पर फ़िल्म चलने लगी, जिसमें उसे कई नौजवानों के चरित्र पर शक हुआ। हो न हो यहाँ बाबुल आता होगा, क्योंकि उसका मिलना-जुलना लड़कियों से बहुत है। क्यों न जाकर उसे मार डालूँ... ! मगर बिना किसी सबूत के? उस वक़्त उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। कमरे में दाख़िल हुआ तो बेटी यूँ सोई हुई थी जैसे कोई फरिश्ता हो। सुना था कि इन्सान बुढ़ापे में अपमानित होता है, मैं भी तो वाक़ई अपमानित हो रहा हूँ, मगर कब तक? 
आज वह दिनभर घर से बाहर रहा कि शायद किसी होटल, खोखे या कहीं फुटपाथ पर, नौजवान उसकी बेटी का ज़िक्र कर रहे हों। हर आदमी को अपनी ओर देखता देखकर वह और ज़्यादा गुमान से भर जाता। आज उसने अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ करवा ली थी, ताकि उसके हाथों की कँपकँपी कुल्हाड़ी की धार में छुप जाए। अब वह पिछली रात की तरह घर से निकला और उसी पेड़ के नीचे बैठ गया। अंधेरा गहरा हुआ और वह धीरे-धीरे बिना किसी आवाज़ किये बिना पिछली दीवार चढ़कर अपने घर की छत पर आ बैठा और हमलावार बिल्ली की तरह वातावरण की जाँच-पड़ताल करने लगा। 
अचानक उसने देखा, लाली अपनी चारपाई से उठकर इधर-उधर देखने के बाद कमरे में दाख़िल हुई। अब तो मामा गिलू का जिस्म बहुत तेज़ी से काँप रहा था। उसके पसीने छूट रहे थे और वह ज़्यादा चौकन्ना हो गया। दूसरे ही पल लाली के कमरे से निकलते हुए साए के साथ वह भी धीरे से छत पर आगे खिसकने लगा और फिर... धड़ाम से घुटनों के बल गिरा, सिर्फ़ इतना देख सका कि लाली ने मर्दाना जूते पहन रखे थे!
***


लेखक परिचय: वहीद ज़हीर, जन्म: 3 जून 1921 कुवैटा में। बराहवी और उर्दू के कथाकार, बलूचिस्तान की हुकूमत से जुड़े हुए हैं। बराहवी में उनका कहानी संग्रह ‘शानज़ह’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था। पता: करीम साइकिल वर्क्स, प्रिंके रोड, क्वेटा (पाकिस्तान)।

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