समीक्षा: उम्मीद का उत्सव रचतीं ऋतु त्यागी की कविताएँ

समीक्षक: मोनू सिंह

मुझे पतंग हो जाना है  (कविता संग्रह)
कवयित्री: ऋतु त्यागी
प्रकाशक: पुस्तकनामा, नई दिल्ली
प्रथम संस्करण: 2022; पृष्ठ: 119; मूल्य: ₹ 200.00 रुपये


‘मुझे पंतग हो जाना है’ ऋतु त्यागी का तीसरा  काव्य संग्रह हैं, जो इसी वर्ष पुस्तकनामा से प्रकाशित हुआ है। इस काव्य संग्रह में एक सौ एक कविताएँ संग्रहित हैं। ये कविताएँ समकालीन कविता में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराती हैं। अपने काव्य और शिल्प की महीन बुनावट के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं। ये कविताएँ समकालीन जीवन का संवेदनात्मक भाष्य रचती हैं। इन कविताओं का स्वर वैविध्यमयी है किन्तु फिर भी सर्वाधिक कविताएँ स्त्री जीवन की विड़म्बनाओं, समस्याओं, विद्रूपताओं और उनकी प्रेमिल और कोमल दुनिया की थाह लेती हैं। इन कविताओं को पढ़कर आप आगे नहीं बढ़ सकते और न इन्हें पढ़कर शीघ्रता से विस्मृत कर सकते हैं, भले ही कविता की पंक्तियाँ या उनका क्रम आप भूल जाएँ किन्तु उनकी अनुभूति और बिम्ब आपकी संवेदनात्मक बुद्धि और ज्ञानात्मक मेधा को दीर्घाविधि तक जागृत किए रहते हैं। ये अपने शिल्प में बिल्कुल ताजी और सुगठित कविताएँ हैं। शमशेर बहादुर सिंह ने एक बार कहा था कि नयी बात पुराने शिल्प या पुराने बिम्बों में नहीं कही जा सकती, नवीन यथार्थ बोध को अभिव्यक्त करने के लिए पुराना शिल्प नाकाफी सिद्ध होता है। शमशेर बहादुर सिंह का यह कथन इन कविताओं के सन्दर्भ में अक्षरशः सत्य है। ये नई प्रकार की कविताएँ हैं, ये कविता की पुरानी और पारंपरिक केंचुल छोड़कर नए का संधान रचती हैं, ये अपने विन्यास में अत्यधिक सुगठित हैं। शब्दों को बहुत ही सजगता से बरता गया है, हर प्रकार के झोल को हटाकर फालतू शब्दों को अलग कर जतन से रचा हुआ शिल्प इन कविताओं की अन्यतम विशेषता है। इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ अपने आकार में लघु हैं किंतु अपने उद्देश्य में उतनी ही बड़ी हैं। अरूण शीतांश ने काव्य संग्रह की भूमिका में बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है। ‘बड़े मयार की छोटी कविताएँ ऋतु की पहचान हैं, जो इस संग्रह में शामिल हैं।’ संग्रह की दूसरी कविता ‘सन्नाटा-टप्प-से’ देखें-
ऋतु त्यागी
"एक कलाई/मुड़ रही है . . ./हथेलियों में
दुबक गई हैं/प्रार्थनाएँ/धूल से अँटा है गगन
अचानक/एक मनुष्य/ईश्वर हो जाता है।
सन्नाटा/टप्प . . . से/गेंद की तरह लुढ़कता है।"
इस कविता में कितनी सूक्ष्म अभिव्यंजना विन्यस्त है। एक पंक्ति में मात्र एक-एक शब्द समकालीन जीवन के संश्लिष्ट विद्रूप को उधेड़ता हुआ अर्थ को सम्प्रेषित कर रहा है। हमारे समय का बिल्कुल सटीक बिम्ब समूचा गगन धूल-धूसरित है। सच और झूठ का निर्णय करना भी कठिन है, सभी के पास अपने-अपने सच हैं। इस धूल-धूसरित गगन में अचानक से कोई मनुष्य महान बन जाए, पूज्यनीय बन जाए, देवत्व में रूपान्तरित हो जाए तो क्या आश्चर्य?
इन कविताओं का शिल्प और कथ्य नवीन, मौलिक एवं यथार्थ का गहरा संस्पर्श लिए हुए हैं किन्तु ऐसा नहीं है कि शिल्प की गढ़न में भाव पीछे छूट गए हों, अपितु नवीन शिल्प में भाव और भी अधिक सघनता से मुखरित हुए हैं। इन कविताओं का अर्थ धीरे-धीरे किसी जादू की तरह खुलता है और फिर किसी मद्यम संगीत की तरह ये आपकी चेतना और स्नायुतन्त्र को झंकृत किए रहते है। ‘पर भीड़ में सब अकेले हैं’ कविता में वर्तमान समय की गहरी शिनाख्त है-
"भीड़ दे रही है/बड़े-बड़े वक्तव्य/भीड़ को तथ्यों में
दिलचस्पी नहीं है/उसे पास कुछ/निजी गाँठे हैं
गाँठे कतई ठोस नहीं हैं/कलई की तरह/वह कहीं भी
खुल जाती हैं/पर भीड़ में सब अकेले हैं।"
इस कविता को पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की कविताएँ याद आती हैं, कबीर याद आते हैं। अशोक वाजपेयी ने एक बातचीत के दौरान कहा था कि "बड़ा कवि है, जिसे पढ़ते हुए बड़े कवि याद आएँ, जो अपनी परंपरा और आधुनिकता को साथ लेकर चलें।"
रघुवीर सहाय की कविताओं में लोकतन्त्र को भीड़तन्त्र में रूपान्तरित होने और भीड़ में भी आदमी के अकेले पड़ते जाने की स्थितियाँ हैं। ‘रामदास’ को भीड़ में हत्यारा अकेला मारकर चला जाता है। यह कविता रघुवीर सहाय के ‘रामदास’ की अगली कड़ी है, जहाँ भीड़ बड़े-बड़े वक्तव्य दे रही है, भीड़ की सच्चाई में दिलचस्पी बिल्कुल नहीं है। लोकतन्त्र के भीड़तन्त्र में परिणत होते जाने की पीड़ा का मार्मिक आख्यान कविता रचती है। कबीर ने भी अपने एक पद में कहा है-
"बोलत-बोलत कासो बोलिए भाई/बोलत ही सब तत्व नसाई।"
हमारे समय में बोला बहुत जा रहा है। यह युग अपने सभी पूर्व युगों की अपेक्षा अधिक वाचाल है, लेकिन क्या बोला जा रहा है? उसके क्या निहितार्थ हैं। बोलते-बोलते तत्व ही नष्ट हो गया। ऋतु त्यागी भी भीड़ की इसी वाचालता पर व्यंग्य करती हैं। कहने के लिए हम सभी भीड़ के हिस्से हैं लेकिन नितान्त अकेले हैं। ये कविताएँ हमारे समय की विड़म्बनाओं को उजागर करती हैं, यहाँ एक विड़म्बना दूसरी विड़म्बना में अन्तग्रंर्थित है। ये कविताएँ सतही नहीं है, न ही अमिधा के माध्यम से इन कविताओं तक पहुँचा जा सकता है। ये अर्थ की कई संश्लिष्ट भाव-भंगिमाएँ लिए हुए हैं।
ऋतु त्यागी की कविताएँ गहन जीवन-राग की कविताएँ हैं। ये नैराश्य की नहीं उजास की कविताएँ हैं। कवयित्री का जीवन में बहुत गहरा विश्वास है। वे पाठक को आध्यात्मिक झुटपुटे में ले जाकर इस संसार को नश्वर, मिथ्या या माया बताकर पलायन का संदेश नहीं देती अपितु ये जीवन से प्रेम करना सिखाती हैं। सकारात्मकता इन कविताओं का उत्स है। कवयित्री ने संग्रह के आरम्भ में ही अपना मन्तव्य स्पष्ट कर दिया है-
"उन सभी को/जिनके जीवन की पहली पंक्ति की
मात्रा फिसलकर कहीं गिर गयी थी।"
ये उम्मीद की कविताएँ हैं, आस्था की कविताएँ हैं। इन कविताओं के अन्दर जीवन संगीत निरन्तर बहता रहता है। कवयित्री मृत्यु के सम्मुख भी जीवन के एक कतरे को भी छोड़ने को तैयार नहीं है, भले ही मृत्यु आपके द्वार पर आकर ठकठका रही हो-
"जब मृत्यु ठकठकायेगी/मेरे द्वार का बायाँ हिस्सा/बाँया हिस्सा...?
(वहाँ उष्म धड़कनों का बास जो है)/तब भी मैं अपने बिस्तर के उस कोने पर
तकिए से पीठ सटाए बैठी होऊँगी/सामने की हल्की भूरी दीवार पर
अपनी पनीली दृष्टि से जीवन का/तापमान माप रही होऊँगी
जहाँ जीवन की संभावनाएँ हमेशा/कविताओं से निकलकर
फिर जीवन पर टिक जाती हैं।"
ये कविताएँ मृत्युबोध नहीं जीवन बोध रचती हैं और यह जीवन मात्र कविताओं तक न सीमित रहकर जीवन में फलीभूत हो जाएँ। ये कविताएँ राजनीति से भी बचकर नहीं चलती अपितु बहुत ही संश्लिष्ट रूप से सत्ता की अमानवीयता पर तंज करती हैं। इन कविताओं के बिम्ब इतने आत्मीय और प्रेमिल हैं कि ये विरोधाभासी और अमानवीय सत्ता के चेहरे को बहुत इंटेस (सघनता) तरीके से उजागर कर देते हैं। ‘तुम्हारी पीठ पर’ नामक कविता का एक टुकड़ा देखें-
"तुम्हारी पीठ पर/बैठा नहीं होगा/शायद कभी कोई बच्चा!
तुम्हारे मन में उगा नहीं होगा/कभी कोई पेड़!/ . . . . .
तुम्हें लील गई है अमानवीयता/अपनी शिराओं में बहते रक्त का
देखना कभी रंग/सत्ता के रंग से वह भिन्न नहीं होगा।"
बच्चा और पेड़ का बिम्ब अमानवीयता स्थितियेां की कितनी सटीक व्यंजना करता है। 
संग्रह में संकलित ‘जानेमन’, ‘स्त्री निःशब्द बहती है’, ‘उसके भीतर एक आदिम जंगल है’, ‘याद रखना स्त्री’ आदि कविताएँ स्त्री जीवन के विविध पहलुओं को बहुत ही सूक्ष्म ढंग से व्यंजित करती हैं। समकालीन कविता की दुनिया में ये कविताएँ अपनी गहन संवेदनाएँ, चुस्त शिल्प और नूतन बिम्बों से अलग से पहचान बनाएँगी। ये कविताएँ पाठकों की चेतना को बौद्धिक और संवेदनात्मक स्तर पर समृद्ध करेंगी।
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डॉ. मोनू सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
चौधरी चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय, छपरौली, बागपत

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