मनुष्य जीवन के तीन पड़ावों को रेखांकित करती कहानियाँ

समीक्षक: मजीद शेख

सहायक प्राध्यापक एवं शोध निर्देशक,
हिंदी विभाग, प्रतिष्ठान महाविद्यालय, पैठण, जिला-औरंगाबाद-431107 (महाराष्ट्र)
चलभाष: 09765944586
ईमेल- majidmshaikh@gmail.com

हायऽऽऽ चिमी (कहानी संग्रह)
लेखक: किशोर दिवसे
प्रथम संस्करण 2022 
ISBN 978-93-91034-65-8
प्रकाशक: सुधीर वत्स अनुज्ञा बुक्स दिल्ली 
आवरण पृष्ठ: अनिता दुबे, पुणे
मूल्य: ₹ 250.00 रुपये

किशोर दिवसे
मनुष्य जाति का विकास मोटे तौर पर विश्व, पृथ्वी, प्रथम जीव, जीव-धारी प्राणी, डायनासोर, मनुष्य सदृश प्राणी, मानव जाति के पूर्वज और फिर मनुष्य जाति की उत्पत्ति माना जाता है। मनुष्य ने प्रकृति से सतत संघर्ष करते हुए आरंभिक जीवन का अवलोकन किया हैं। प्रकृति की सर्जनशीलता ने मनुष्य में जिज्ञासा विकसित की और फिर उसने धीरे-धीरे अपने विवेक सम्मत बुध्दि से ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म और साहित्य आदि को जानना-समझना आरंभ किया।
        जिज्ञासा की प्रवृत्ति ने मनुष्य को अनुसंधाता बनाया। रोजमर्रा के जीवन में निर्माण हुए प्रश्नों का समाधान खोजना जीवंतता का लक्षण माना जाता हैं। अपूर्णता की चाहत ने आदिम युग से लेकर आज-तक मनुष्य को निरंतर प्रयत्नशील और चिंतनशील बनाए रखा हैं। ज्ञान के अधिक विस्तार ने अंतरिक्ष, विश्व, पृथ्वी, प्रकृति, जीव-प्राणी और मनुष्य की उत्पत्ति और मृत्यु आदि को लेकर सतत चिंतन-मनन की प्रक्रिया ने इसमें एक नया ऊर्जावान वैज्ञानिक दृष्टिकोण निर्माण किया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण मनुष्य में जब विकसित हुआ तो वह आत्मनिर्भर भी बनता गया। आत्मनिर्भर मनुष्य जब स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व आदि मूल्यों को लेकर सोचने लगा तो वह मनुष्य केंद्रित बनता गया। और संवेदनशील सर्जक मानवीय सरोकार को लेकर अधिक गंभीर बनते गए। मानवीय-मूल्य स्थापित करने हेतु इन्होंने अधिक सक्षमता के साथ कलम चलाना आरंभ किया। आखिर प्रश्न उपस्थित होता हैं कि मानवीय-मूल्य क्या हैं? मानवीय-मूल्य अर्थात् अपने देश के संविधान का स्वीकार करना यानी बने-बनाए अनुशासनों का पूरी शिद्दत से अनुपालन करना रहा हैं।
डॉ. मजीद शेख
          व्यक्तित्व के विकास पर परिवेश का प्रभाव अधिकतर मात्रा में रहता हैं। परिवेश का प्रभाव शिक्षित-अशिक्षित दोनों भी बराबर दिखाई देता हैं। चूंकि युगीन परिवेश से निर्मित स्वानुभव सर्जक के लेखनधर्मिता में ऊजागर होते हैं। सर्जक स्वानुभव के सरोकार से ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म और साहित्य आदि को अपनी क्षमता के अनुरुप आत्मसात कर मानवीय-मूल्यों को परिभाषित करने लगता हैं। साहित्य-सर्जना में सर्जक अपनी मेधावी शक्ति का दायरा बनाकर इन काल्पनिक पात्रों के माध्यम से पाठक-श्रोता से रूबरू होने का प्रयास करता हैं। अर्थात् ये पात्र सर्जक की अंतरात्मा की आवाज बनकर उभरते हैं।
        हिंदी के धारा-प्रवाह हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और उर्दू भाषा पर अधिकार रखनेवाले सफल अनुवादक, स्तंभ लेखक, आकाशवाणी के यशस्वी वार्ताकार और संवेदनशील सर्जक किशोर दिवसे का 'हायऽऽऽ चिमी' कहानी-संग्रह है। इस कहानी संग्रह में मुख्य रुप से तीन प्रथमा, मध्यमा और अतलांत नामक पड़ाव दिखाई देते हैं। ये कहानियाँ मनुष्य जीवन के तीन पड़ावों को यानी मनोदशाओं को रेखांकित करती हैं। अर्थात् इन कहानियों को जीवन का आरंभ, मध्य और अंत के रुप में भी देखा जा सकता है।
        प्रथमा में – 'अंधविश्वास' , 'खूबसूरत भिखारन', ' वह कीड़ेनुमा आदमी', 'आय का दूसरा ज़रिया' और 'मुकी' कहानियाँ आती हैं। सुनयना की मृत्यु के माध्यम से 'अंधविश्वास' कहानी में अंधविश्वासी-प्रवृत्ति का पर्दाफाश किया गया है। 'खूबसूरत भिखारन' कहानी में स्त्री की स्थिति और मनोदशा को चित्रित करने का व्यंग्यात्मक प्रयास किया हैं। औरत शिक्षित-अशिक्षित दोनों भी 'अबला' होती हैं, वे पूरी तरह से सबल और सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उठाया गया साहसिक कदम इस कहानी में देखने का मिलता हैं।-अकर्मण्य, निष्क्रिय और नपुंसक पति के साथ जीवन व्यतीत कर रही भारतीय नारी के त्रासद मनोदशा का सुंदर चित्रांकण 'वह कीडेनुमा आदमी' कहानी में देखने को मिलता हैं। जीवन-यापन करते समय अक्सर देखने को मिलता हैं कि आर्थिक-संपन्न परिवार की स्थिति को लेकर यानी इनके आर्थिक उत्पाद के स्रोत को लेकर काफी गंभीर चर्चाएं होते रहती हैं। 'आय का दूसरा ज़रिया' इस कहानी में प्रो.कनक कुपरेती के माध्यम से इस पर बड़ी शालीनता से प्रकाश डाला गया हैं। प्रो. कनक कुपरेती की आर्थिक संपन्नता से उद्विग्न होकर इनके सहयोगी उनके आर्थिक उत्पाद के स्रोत को लेकर रुग्ण मानसिकता से ग्रस्त दिखाई देते हैं। 'मुकी' के साथ पाशविक शारीरिक संबंध रखने के बावजूद सजा की हकदार केवल 'मुकी' होती है, 'अंबर' नहीं? बेचारी 'मुकी' के साथ नाइंसाफ हुआ है। कहानीकार 'मुकी' कहानी में पूरी शिद्दत के साथ इसके पीछे खड़ा दिखाई देता है। स्त्री-पुरुष में जो भेद दिखाई देता हैं, इस पर चिंतन-मनन के लिए यह कहानी विवश करती है।
        मध्यमा में – ' जिंदगी के कैनवास पर बनते अल्प और पूर्ण विराम', 'सुखांतिका', 'जूही के फूल ', 'उजियारे की पंद्रहवीं रात ' और 'मृत्यु संकेतक हीरा' आदि कहानियाँ आती हैं। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य सोचने के लिए विवश करना है, मशीनी-याँत्रिक मनुष्य बनाना कतई नहीं। कार्य के प्रति लगन, निष्ठा और आस्था होनी चाहिए। अपितु कार्य को आराधना समझना चाहिए।-अर्थ की अधिक लालसा मनुष्य को पशु बना देती हैं। और बुध्दिजीवी मनुष्य जैसा दिखाई देता हैं, भीतर से बिल्कुल वैसा नहीं होता। युगीन संदर्भ में बनावटी रुप में जीवन व्यतीत करना इसकी विवशता बनते जा रही हैं। उपर्युक्त इन सभी संदर्भो को 'जिंदगी के कैनवास पर बनते अल्प और पूर्ण विराम' कहानी में प्रकाश डाला गया हैं।
         वर्तमान समय में बढ़ती अतिरिक्त मांग का बड़ा सटीक विवेचन ‘सुखांतिका' कहानी में हुआ है। अतिरिक्त मांग की मानसिकता कभी-कभार आत्महत्या करने के लिए उकसाती हैं, परंतु पंछियों की स्वच्छंद-मुक्तता और स्वतंत्रता को देखकर विचारों में परिवर्तन होता हैं, प्रस्तुत कहानी में इसे बखूबी देखा जा सकता हैं। दिव्यांग पुत्र की माँ अपने कलाकारी में अति व्यस्त रहती हैं और इसका विपरीत परिणाम 'साकेत' की मनोदशा पर पड़ता हैं। 'जुही के फूल' कहानी में इसका सुंदर विवेचन देखने को मिलता हैं। पहले पति फिर एकलौते बेटे की मृत्यु के पश्चात् ‘माँ’ की मानसिक मनोदशा को बड़े भावुक ढंग से 'उजियारे की पंद्रहवीं रात' कहानी में अभिव्यक्त किया गया हैं। ये कहानी ईसाई दर्शन को संवेदनशील तरीके से समझने का एक सकारात्मक नज़रिया देती हैं। 'मृत्यु संकेतक हीरा' कहानी में मृत्यु-बोध का चित्रण फंतासी शैली में किया गया है।
       अतलांत में- 'बारह पन्ने' , 'हायऽऽऽ चिमी' , 'खग्रास', 'एक्ट ऑफ गॉड: बेआवाज लाठी', ' हर्षुला ' आदि कहानियाँ हैं। कवि-कर्म में दृढ़ निष्ठा और ईमानदारी, अहिंसा में अड़िग विश्वास के कारण हिंसक नक्सलियों में हुए हृदय-परिवर्तन और आत्म-समर्पण को बड़े नाटकीय ढंग से 'बारह पन्ने' कहानी में दर्शाया गया है। आधुनिक भारतवर्ष का दिग्दर्शन कराती 'हायऽऽऽ चिमी' एक सशक्त कहानी हैं। इस कहानी में एक साथ दो पीढ़ियों के जनरेशन गैप को चित्रित किया गया हैं। यानी इस कहानी में भारत और इंडिया का दर्शन होता है। लगभग सभी दृष्टियों से यह एक सफल कहानी है। स्त्री-पुरुष संबंधों पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन 'खग्रास' कहानी में हुआ हैं। नारी को मां, बहन, पत्नी और दोस्त आदि पृथक-पृथक रुपों में देखने का नज़रिया विकसित करती सुंदर कहानी है। पराई-स्त्री में ‘माँ’ का अक्स देखना कहानी की अपनी विशेषता रही है। भारतीय परिवार में विवाहित-स्त्री अपने वैवाहिक जीवन में अन्य स्त्री की दखलंदाजी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती। परिणाम स्वरुप वह आत्महत्या भी कर सकती हैं। पाश्चात्य परिवार की संकल्पना इस संदर्भ में ज्यादा बेहतर है। 
      ‘एक्ट ऑफ गॉड: बेआवाज लाठी' प्रस्तुत कहानी में इसका ब्यौरा देखने को मिलता हैं। परंपरागत परिवार, लिव इन रिलेशनशिप में साथ-साथ रहनेवाला परिवार यानी तीन पीढ़ियों के परिवार का लेखा-जोखा इस कहानी में देखने को मिलता हैं। अर्थात् 'जैसा कर्म वैसा फल' का संदेश देना कहानी का मुख्य लक्ष्य रहा हैं। 'हर्षुला' बेहद अलग कहानी हैं। सभ्य समाज ट्रांसजेंडर या समलैंगिकों को हिकारत यानी तिरस्कृत दृष्टि से देखता हैं। हर्षुला (Best Beautician Award), सोफिया (Best Runner Up Award) इन दोनों ने भी जीवन में काफी संघर्ष करते हुए लगन और निष्ठा से एक मकाम हासिल किया हैं। परंतु सभ्य समाज में भी अब इन्हें प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना चाहिए इस प्रकार की अपेक्षा कहानीकार करते हैं। आधुनिक भारत में विज्ञान हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बनना चाहिए। विज्ञान की माध्यम से संवेदना, मानवता, धर्म, महिला, तीसरी दुनिया यानी थर्ड जेंडर आदि को नये सिरे से देखने की महती आवश्यकता हैं। युवाओं में कौशल विकास विकसित कराके गाँवों को मुख्यधारा में लाने हेतु हिंदी भाषा के माध्यम से महानगरों से जोड़ना अनिवार्य हैं। युगीन संदर्भ में यह चिंतन प्रासंगिक हैं। 
          कुल मिलाकर कहा जा सकता हैं कि कहानीकार किशोर दिवसे के 'हायऽऽऽ चिमी' कहानी संग्रह का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अंधविश्वास-पाखंड और दुःख से मुक्ति का रास्ता दिखाना, नारी का सम्मान बढ़ाना, सभ्य समाज में ट्रांसजेंडर या समलैंगिकों की प्रतिष्ठा बढ़ाना, युवाओं में कौशल विकास विकसित करना तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण आत्मसात करने हेतु प्रेरित करना आदि रहा है। कहानीकार ने भाषा के स्तर पर हिंदी-अंग्रेजी, हिंदी-मराठी और हिंदी-उर्दू आदि तीनों रुपों के मिश्रित-शैली का प्रयोग किया है। वैश्वीकरण में इस प्रकार के मिश्रित-शैली की आवश्यकता भी है। हमें विश्वास है कि कहानीकार का यह प्रयास निश्चित रुप से सफल और यशस्वी रहेगा। उनकी सृजनधर्मिता में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रगतिशील चिंतन की यह यात्रा निरंतर गतिशील रहें, इसी कामना के साथ …
हार्दिक बधाई-अभिनंदन!

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