काव्य: प्रतिभा चौहान

प्रतिभा चौहान
एक खतरनाक बात

वे बच्चे
जिनके खो गए हैं खिलौने
बन रहे हैं संस्कार और सेहत विहीन
बदल रही है धीरे धीरे
उनकी इच्छाएँ, शौक, और आदतें
खेल और खिलौने
रंग-बिरंगी तितलियों
प्यारी मछलियों
हवाओं और नदियों!
मैं चाहती हूँ
तुम जाओ और जगाओ उनके बचपन को
इस दुनिया के करोड़ों बच्चों में भर दो खिलखिलाहट
मुझे इन सूनी गलियों से गुजरते हुए
यह कहना है
इन गलियों में खेलते हुए बच्चों की खुशगवार किलकारियाँ
खिलंदड़पन की गूँजती आवाजों को
सूना हो जाने से पहले
या सारे मैदानों बाग-बगीचे आँगनों के खत्म हो जाने से पहले
मेरी मानो
तुम बच्चे क्यों नहीं बन जाते
मासूमियत को बचाने के लिए
मेरी चिंता
आने वाले समय के लिए वाजिब है
पृथ्वी पर सबसे खतरनाक समय तब आएगा
जब दुनिया से बचपन खत्म हो जाएगा।
***


जीवन का सही अर्थ

एक जीवन को सही सही अर्थ देने में
लग जाते हैं
कई वर्ष
कभी कभी तो सम्पूर्ण जीवन भी
हिकारत से देखे जाने वाले लोग 
पहले ही समझ लेते हैं
आसान रास्तों में बिछी हुई राहें

आओ बैठो
पीपल की छाँव में
और डुबो दो अपने सारे दुख सुख और लाचारियाँ

मेरे हिस्से की छाँह लेकर भी
तुम कर सको तो करो
अपने समग्र दुख दर्द के लिए
कोई दर्द निवारक इंतजाम

यही होगा मेरे जीवन का सही अर्थ।
***


अपना घर

अपने घर जाने वाली पिछड़े इलाकों की लड़कियाँ
देखती हैं किसी खास सुबह के वक्त
डरावने स्वप्न

उनके सच होने  के डर से
छुपाती हैं अपने दुख दर्द

वे गाँव की हर औरत की कहानियों को
सुनना चाहती हैं
एक महान श्रोता की तरह

हर बियाही गई लड़की के दुखों की थाह लेना चाहती हैं
तौलती हैं उनकी
दुख-दर्द की कहानियों को
अपने हृदय के भीतर कैद खुद के अस्तित्व से
सास ने किस तरह दिए ताने
किस तरह छोटी ननद ने दिए हैं दंश 

पीछे छूट गई
एक दुनिया 
चाहे अनचाहे खेल व खिलौने
कौन खेलता होगा अब उन्हें
क्या गुड्डे गुड़िया का ब्याह करने वाला कोई बचा है गाँव में

वे नहीं जानती
उनके जाने के बाद किस तरह बीती रातें उनके बिना
क्या अकुलाये होंगे बगल के चाचा ताऊ
या कोई सगी सहेली
या भाई का दोस्त
या उसकी गईया
जो उसके बिना दूध नहीं देती थी

खाना खाते वक्त वह हमेशा रही दौड़ती भागती
पिता की एक आवाज पर
देखो गइया खुल गई है लाली
दूसरे खेत में न घुस जाए
कहीं बछड़ा सारा दूध न पी ले

अब ससुराल आने पर कौन बांधता है गईया
कौन दौड़ता होगा बेवक्त उसके खुल जाने पर
लाली आ गई है अपने घर
जो जन्म जन्मांतर के लिए
घोषित है उसका घर
जिसके किसी भी सदस्य का रक्त
उसकी रगों में नहीं दौड़ता है
इस घर में नहीं जन्मी
न ही कराई है उसने यहाँ गुड्डे और गुड़ियों की शादियाँ
न संग न सहेली

एक घर

जहाँ मिलते हैं ताने
जहाँ मिलते हैं दुख दर्द
जहाँ कम खाना और ज्यादा काम होता है
जहाँ सहनशीलता की होती है परीक्षा
और मर्यादा की सीमा लांघने पर
कभी कभी मिलती है मौत

ये अपना घर है
यहाँ रहना ही होता है
हर लाली को अंतिम साँस तक।
***


कुछ इस तरह भी

बेखौफ़ होना भी है एक अहम सवाल है
वे डरते हैं
बाहरी दुनिया से
किरणों को मुट्ठी में भरकर
बचाते हैं
अपने हिस्से  का सूरज
जमी हुई जड़ों पर
उड़ेलते हैं स्नेह का जल
वे जानते हैं
जिंदा रहने की कला
करते  हैं अपना सर्वस्व निछावर
साँसों को बचाए रखने के लिए ...
धड़कनें
जो जीवित रहने की सनदें हैं
सहेजते हैं जंगल की देह में
बचाते हैं किसी भी बुरी नजर से
और
आँखों में बचाए रखते हैं
पानी और स्वाभिमान
क्योंकि
वे जानते हैं
अपनी आत्मा और उसे जुड़ी हुई साँसों की डोर को

जो सीधे जंगल की ओर जाती है ...

सर्वश्रेष्ठ होने का दंभ
जिनकी आवाजें
परकोटों के ऊपरी गुंबद तक
कभी न पहुँच सकीं
वे उस इलाके के
बहादुर लोग थे

बड़ी बड़ी दीवारों में बड़े दरवाजे
और सुरक्षा के वास्ते उनके बड़े सिपहसालार के मध्य
कैद थे कुछ डरे हुए लोग
जो सड़कों पर चल रहे लोगों से भी डरते थे
चलते थे बच बच कर आदमियों से ही
शाम होने के बाद...

जबकि
जंगल में बेटियाँ
नहीं डरती थीं जंगली और खतरनाक जानवरों से भी
वे रहती थीं उनके बीच
जो निडर और दरवाजे रहित थे
उनकी चमकती हुई आँखें
अँधेरों में मुस्कुराती थीं

जबकि
बड़े लोगों के दिल काँप उठते थे
अँधेरों के नाम पर
उनकी बहादुरी बसती थी
सिर्फ उजालों की मजलिस में
शेष सब डूब जाता था अंधरे के अलाप में
उन्हें उजालों से है सिर्फ वास्ता
चाहिए सिर्फ सूरज की किरणों का साथ
आखिर
कौन डराता है इंसान को?
***


भावनाओं का सरोवर

प्रेम के भीतर की
उदासियों को पढ़ना भी चाहिए
ठीक उसी तरह
जैसे प्रेम में पढ़ा जाता है प्रेम
एक संवेदना उतरती है गहराई में
किसी नदी के भीतर कुछ खोजती मीन सी
सिमट जाता है सूरज
अपनी समस्त किरणों को अपने हाथ में लेकर
डूबता है चंद्रमा भी
तारों के साथ
बादलों के मध्य चमकती हुई पतली लकीर की माफिक
खूबसूरत हैं किसी हृदय की गहरी संवेदनाएं
इसी नदी की तरह
जिसके आसपास जन्मती हैं
सभ्यताएँ
जीवन के उदय से लेकर अंत तक
प्रेम में जब जब पढ़ा गया सिर्फ प्रेम
बहुत ही अधूरा सा रहा भावनाओं का सरोवर।
***


एक कविता

एक कविता
पढ़ते ही दिल में उतर जाती है
मानसिक तंतुओं को देती है झकझोर
एक कविता उठती तूफान सी
जीवन में
करती सोचने को मजबूर
शब्दों ने अगर लगाई थोड़ी सी भी आग
चिंगारी चली जाएगी उड़ती हुई दूर तक
कविता को कविता ही रहने दो
न बनाओ किसी जुलूस का नारा
मत होने दो बर्बाद किसी का घर
अगर लिखो तो लिखो प्रेम
और समर्पण का सलीका
दे सको तो दो त्याग और बलिदान का सबक
लगाओ आग तो ऐसी कि जल सकें गरीबों के घर के चूल्हे
कर दो सारी कालिमाओं से मुक्त
किसी गुनहगार को गुनाह से पहले संभलने का मौका देते हुए
उजली रात की दूधिया नदी बनकर
मिटा दो सब दाग दिल के
वरना फेंक दो अपनी कलम
समुद्र की गहराई में। 
***


केरल की सत्तर वर्ष पुरानी इमारत ढहने पर

जर्जर अस्तित्व वाली
सत्तर वर्ष की बूढ़ी इमारत
ढहती है
चीत्कारों में गूंज
चार बेदाग मासूम जिंदगियों की
दब कर रह जाती है
उसकी ऊपरी साज सज्जा
सँवारते वक्त
इस बड़ी इमारत ने अपनी
उम्र पूरी करते वक्त
आगाह किया था अपनी खोखली जड़ों के बारे में
नजरअंदाजी की हद
अपने अंतिम पड़ाव पर थी
ठीक उसी तरह
जैसे एक मनुष्य की पूरी हो जाती है उम्र
उम्र के बाद जीवन के अंश नहीं बचते
खोखली जड़ें का भी साथ नहीं देती हैं समय समाप्त होने के बाद। 
***


कवि थोड़ी सी संवेदना बचाता है अपनी कलम से

कवि वही है
जो था हजारों साल पहले
कवि कुछ नहीं मिटाता न ही कुछ बनाता है
एक कण भी नहीं
एक क्षण भी नहीं
वह भरता है गागर में सागर
मनुष्यता बचाते हुए
थोड़ा सी संवेदना बचाता है अपनी कलम से
थोड़ा सा दर्पण दिखाता है
आँख पर पट्टी बंधे लोगों को
भले ही वह रहे किसी धूप या छाँवभरे स्थान पर
अथवा खारे समुद्र के मध्य
या सात पहाड़ियों के पीछे
या गहन अरण्य के मध्य जड़ों के नीचे
पर कहते हैं न
जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि
समझ ही लेता है दुखियों के दर्द
सताये हुए लोगों की आह
वह जानता है गुस्से की हद
और वह यह भी जानता है
कि भारी चट्टान के नीचे दबकर कराहने वाले व्यक्ति का दर्द कैसा होता है
भले वह कभी नहीं गुजरा उस पीड़ा से
पर उसकी लेखनी समझती है
वही लेखनी

जो जिंदा रहती है कवि के साथ-साथ जीवन के साथ और जीवन के बाद । 
***


हथियारों का इस्तेमाल

आप नहीं जानते,
सही सही
हथियारों का इस्तेमाल
क्या महज बारूद से ही बनते हैं हथियार?
क्या एक लंबी चुप्पी में नहीं बह रहा होता है कोई धधकता हुआ लावा
भीतर ही भीतर
इतिहास गवाह है
बड़े-बड़े युद्ध लड़े गए हैं अहिंसक आधारों से
प्रकृति भी मौन रहते हुए तोड़ती है अपनी चुप्पी
एक समय के बाद
सिखाती है हद में रहना
आपको प्रकृति से सीखना चाहिए
और समय पर करना चाहिए वार
और आना चाहिए चुप रहना
और कहना
सुलगते हुए मन छीने गए अधिकार
और कभी कभी शब्द भी किसी हथियार से कम नहीं होते
बेचैन भटकते हुए तुम
जो करते हो इन बेखौफ़ हथियारों का इस्तेमाल
देखो दुनिया की तरफ 
कितनी बेचैनी भर देती है तुम्हारी सोच 
बेचैन भटकने से बेहतर है
आवाजों को निकालो बाहर और करो इनका इस्तेमाल हथियारों की तरह
लेकिन विवेक को बचाते हुए।
***

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