कहानी: आँसुओं के गुच्छे

ऋतु त्यागी
"अभिमन्यु सारी रात सुजाता के घुटनों पर रोता रहा। सुजाता के हाथ कभी उसके बालों, कभी पीठ तो कभी माथे पर उभर आई, बेचैनियों को सहलाते रहे। वह एक बार फिर छूट कर आया था सुजाता के पास पर सुजाता किरचों को संभालने के मामले में अनाड़ी थी; कुछ टुकड़े रह ही जाते और उसके पाँव में बेसाख़्ता अड़ जाते। लाल गाढ़ा ख़ून रिसकर दूर तलक अपने निशान छोड़ जाता पर फिर भी वह हर बार अपने पाँव के साथ यह गुनाह कर जाती। दर्द की साझेदारी शायद उसकी सबसे कमज़ोर नस थी जो कोई भी आकर दबा देता।"

घुप्प अँधेरे में बैठी सुजाता गिरती हुई रात को देख रही थी, उसकी आँखों में काँच की तरह कुछ जमी हुई स्मृतियाँ चटककर एक रहस्यमय आकृति को उभार रही थी जो शायद अभिमन्यु था…”हाँ, हाँ, अभिमन्यु ही था।
अभिमन्यु, वही अभिमन्यु, जिसके चक्रव्यूह में वह भी फँस गई थी।”
 
इस अभिमन्यु की पत्नी यहाँ उत्तरा नहीं थी, अदिति थी। गाढ़े प्रेम में लिपटे दोनों के रिश्ते का बिखरना, उसके लिए आश्चर्य था। अदिति शायद अब और कहीं ठिकाना बना चुकी थी पर अभिमन्यु बार-बार उसे पुकारता अदिति नहीं लौटती जब लौटती तो बीच-बीच में अपनी झलक के साथ उसकी स्मृतियों को भी उलट-पुलट जाती। वह पूछता पर उसका उत्तर कितना सपाट होता:

"कभी-कभी गाढ़ा प्रेम ही जीवन की धमनियों को घात दे जाता है। मैं तुम्हारे साथ जो दहकते दिन बिता चुकी हूँ, अब ये शून्य में ढलकते दिन नहीं बिता सकती, तुम भी स्वतंत्र हो मेरी तरफ से।” 
अभिमन्यु कहीं फँस सा गया था। अदिति के पीछे-पीछे ना जाने कितने ही बरस चलता रहा?अदिति कभी-कभी हवा के झोंके की तरह लौटती पर फिर अभिमन्यु की सारी सुवास लेकर चली जाती…। कारण शायद, दोनों का दो विपरीत ध्रुवों की तरह का व्यवहार, एक उदास समन्दर तो दूसरी खिलखिलाती नदी की धारा।

और-और मैं कौन थी इनके बीच? अभिमन्यु की एक दोस्त सुजाता जिसके घुटने पर वह कभी-कभी अपना सिर रखकर रो लेता था। वह आँसुओं को, अपने भीतर ज़ब्त कर लेती पर अभिमन्यु अपने आँसुओं को उसके घुटनों पर छोड़ दिया करता था और वह चुपचाप उसके जाने के बाद दीवार पर अपने सिर के पिछले हिस्से को किसी गेंद की तरह मारकर धकेलने का प्रयास करती रहती।
 "वह मना क्यों नहीं कर देती? अभिमन्यु को कि अब उसके घुटने इन आँसुओं से कुछ से इस कदर गीले हो चुके हैं कि कहीं से धूप के कतरें मिल जाएँ तो वह ठीक से खड़ी हो सके, अब और नहीं…” 
वह किसी निर्णय पर पहुँचना चाहती थी। पर नहीं पहुँच पा रही थी फिर हमेशा की तरह दिन गुजरने लगे और अभिमन्यु नहीं आया। एक, दो, तीन इस बार पूरा महीना, मोबाइल की तमाम कॉल्स, मैसेज पर कोई ख़बर नहीं। वह डर गई थी इस बात से कि वह क्यों नहीं आया? या कि वह उसका मनचाहा उपयोग कर गया, पता नहीं क्या हुआ था उसे?

पहली बार अभिमन्यु को उसने अपने ऑफिस में देखा था। दरम्याने कद का, किसी नदी के रेतीले किनारे पर रेत बटोरता, आकर्षक। उसकी शर्ट के रंगों में जैसे उसकी पसंद उतर आई थी, फिर वह भी कब उसके साथ नदी के किनारे जाकर रेत बटोरने लगी थी, कब अपने घुटनों को गीला कर बैठी…? हाँ प्रेम समझ बैठी थी, प्रेम कितनी ही परिभाषाओं वाला शब्द, पर उसने उसका एक ही अर्थ जाना था। समर्पण- तिहाई, आधे के शिल्प में नहीं पूरा शत-प्रतिशत।

कुछ समय पहले ही, अभिमन्यु का तबादला `मुस्कान इंटरप्राइजेज` के अकाउंट डिपार्टमेंट में हुआ था और सुजाता पिछले पाँच वर्षों से यहीं थी। काम के सिलसिले में दोनों की बातचीत होने लगी। सुजाता शब्दों को बड़े करीने से उसके सामने रखती पर वो एकदम से उनको गिराकर किसी फाइल के साथ या फिर कंप्यूटर से जूझने लगता। कम बोलने वाली सुजाता उसके भीतर के घुप्प अँधेरे से डरकर अपने आसपास टहलने लगती। वह समझ गई थी कि अभिमन्यु ख़ुद से टकराकर बिखर रहा था।
सुजाता का जीवन भी, कम ऊबड़खाबड़ नहीं था।

चार साल पहले हुई उसकी शादी आम शादियों जैसी नहीं थी।शादी से पहले हुई तय मुलाकातों में बहुत शालीन और भद्र से दिखने वाले साकेत की वास्तविकता से परिचय, हनीमून पर ही हो गया था। गोवा के मनोरम दृश्यों के बीच, दूसरे ही दिन साकेत का “थोड़ी देर में आता हूँ” कहकर शराब के नशे में धुत होकर लौटना फिर सारी रात उल्टियां करना, गालियाँ बकना सुजाता काँप गई थी। शालीन जीवनसाथी का स्वप्न भग्न होकर बिस्तर पर बेसुध पड़ा था और वह उबकाई लेती हुई, उसकी उल्टियाँ साफ़ कर रही थी। आँखों से पानी का सैलाब फूट पड़ा था। मम्मी बहुत याद आ रही थी। सुजाता सुबक पड़ी। साकेत के खर्राटों के बीच उसकी सिसकियाँ रतजगा करती रही। सुबह साकेत बिल्कुल सामान्य था जैसे कुछ हुआ ही ना हो, तबियत खराब होने का बहाना करके वह तीसरे दिन ही गोवा से लौट आई।

ससुराल के कायदे कानून और कमज़ोर धागों में कसकर लपेटने की, सास की चेष्टाएँ तब निष्फल हो गई जब साकेत दिन रात नशे में चूर रहने लगा। ऐसा नहीं था कि उसने कोशिशें ना की हों,की थी…। बहुत की थी। दया, नम्रता, सहानुभूति के कोमल तंतुओं से उसे सहलाना चाहा उसके दंभ को प्रवृत्ति समझकर स्नेह से कम करना चाहा। पर उस दिन की घटना…।
 उस दिन उनकी पहली वेडिंग एनिवर्सरी थी डिनर पर बाहर जाने का प्रोग्राम था। साकेत ऑफिस से आते ही शराब पीने लगा था।
"साकेत आज यह सब नहीं, " सुजाता ने अपने स्वर को नम्र रखने की भरसक कोशिश की पर स्वर में मन की झल्लाहट शामिल हो गई। साकेत जो अब तक कईं गिलास ख़ाली कर चुका था, अपनी लाल आँखों से उसे घूरने लगा। 
"रौब जमाती है। सा… ली" साकेत का स्वर फटकर उसके चारों तरफ बिखर गया, 
"साकेत। प्लीज़…” सुजाता थर्रा गई
“मैं बहुत कोशिश कर रही हूँ, रिश्ते को संभालने की और एक तुम। कम से कम आज तो यह सब मत करो…” सुजाता लगभग रो पड़ी।
शराब पीते ही साकेत का वास्तविक स्वरूप बाहर आ जाता। 
“साली, हराम, तू रोक लगाएगी मुझ पर साकेत का चेहरा वीभत्स हो उठा और उसने सुजाता के लंबे लहराते बालों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया,  

“साकेत…!” सुजाता चीख पड़ी 
सुजाता का चाँटा अचानक कसकर साकेत के गालों पर पड़ा। रोती हुई सुजाता दूसरे कमरे में पहुँच गई और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। साकेत बहुत देर तक गालियाँ बकता रहा। दरवाज़ा पीटता रहा और फिर शायद वही फ़र्श पर लुढ़क गया।उस दिन साकेत की मम्मी अपने दूसरे बेटे के पास गई हुई थी।वैसे उनके होने से भी क्या ही हो जाता? अपने मन से बीमार बेटे की शादी के लिए वे कितनी उतावली थी? हमारे देश और समाज में शादी को हर मर्ज़ की दवा क्यों समझा जाता है? सुजाता चीत्कार कर उठी, बेड पर पड़ी चादर को उसने खींचकर फ़र्श पर डाल दिया। और फिर उसके ऊपर जर्जर दीवार के जैसी ढह गई थी। 
उस दिन से  नौकरी और घर में से, ना नौकरी ठीक से हो पा रही थी और ना घर की बसावट ही। रोज छुट्टी, कितनी ही छुट्टियाँ। रात भर साकेत के साथ जूझती कभी उसके बीमार मन और कभी देह के ज्वार के साथ… पता नहीं क्यों एक साल भी टिकी रही उसके साथ?
प्रेम की चाहना। या भविष्य की आशंका। प्रेम क्या किसी को इतना दुर्बल बना देता है कि वह शोषण की व्यूह रचना को नहीं समझ पाता?

पिछले एक साल में वो कितनी ही बार, साकेत को छोड़कर मायके जा बैठी थी पर वह फिर उसके पास निरीह-सा चला आता था और वह न जाने क्यों फिर उसके साथ चली आती?
"कौन संभालेगा इसे?" शायद उसका प्रेम उसे इस लत और कुंठा से मुक्त कर सके। पर आज साकेत का यह वहशी व्यवहार, उधड़ी हुई चीजें सिली जा सकती हैं पर फटा हुआ तो पैबंद ही माँगता है ना! साकेत को ठीक करते-करते वह ना जाने कब उधड़ती चली गई? मम्मी पापा ने निर्णय उस पर छोड़ दिया था पर वही थी जो साकेत की भावनाओं की पकड़ से छूट नहीं पा रही थी। नशा उतरते ही साकेत अबोध बालक बनकर, उसकी गोद में सिर रख लेता और फूट-फूट कर रो पड़ता, प्रेम की दुहाई देता, एक दो दिन सब ठीक चलता, परियों की कहानी की तरह पर फिर सब कुछ धड़ाम सा गिर पड़ता…। 
 उस दिन उसके भीतर की नदी रात भर बहकर ख़ाली हो गई थी। सुबह निर्वात था, कमरे की दीवारों पर से रोशनी ने अँधेरे को तहकर अपने पैताने रख लिया था। दर्द के मारे उसका सिर चकरा रहा था। उठकर दरवाज़ा खोला। साकेत अभी भी खर्राटों से लबालब था। उस दिन वह मम्मी पापा के पास चली आई। साकेत कई बार आया, गिड़गिड़ाया पर… 
उसके भीतर की जगह को वह सिल नहीं पाया और फिर चार सालों के बाद अभिमन्यु…। वह फिर घिर गई थी। 
इस बार पूरा एक सप्ताह हो गया था अभिमन्यु को यहाँ से गये। उसने ढ़ेरों मैसेजेस फ़ोन कॉल्स किये पर कोई उत्तर नहीं… अंत में थककर वह शांत हो गई।

 अभिमन्यु उसे जब-जब मिला अपने कंधों पर उदासियों के भारी बोझ के साथ। अदिति को ढूँढता आ पहुँचा सुजाता के पास…, उसके स्वप्न घायल पक्षी की तरह पंख फड़फड़ाकर अपनी लाचारी को व्यक्त कर रहे थे और वह अपनी ज़िन्दगी में कुछ झाग उठाना चाहती था, जिसे फेंटने में वह लग गई। अदिति और अभिमन्यु का प्रेम ना जाने किस तरह का प्रेम था? आइंस्टाइन के रिलेटिविटी के सिद्धांत पर टिका हुआ, न्यूटन की ग्रेविटी पर नहीं…,दिक् काल के मुड़ाव की तरह ठीक एक चादर के बीच में रखी बॉल की तरह जिसमें लगता है जैसे बाल उसे खींच रही हो पर वहाँ आकर्षण धरती की चादर के मुड़ाव की वजह से था ऐसा ही कुछ अदिति और अभिमन्यु के रिश्ते में था…।
पर वह क्या थी उन दोनों के बीच। एक प्रश्नचिह्न, या साकेत और अदिति के रिश्ते का उत्तर।

बीते छह महीने में वह अपने बारे में सोचना भूल चुकी थी जब देखो, "अभिमन्यु, अभिमन्यु……!"
 उस दिन भी वह ऑफिस नहीं आया था सुजाता पता नहीं क्यों ऑफिस से छूटते ही उसके घर जा पहुँची? इच्छा तो पहले भी थी पर उस दिन कदम नहीं रुके। दरवाज़े की बेल पर सकुचाते हुए उँगली रखी, एकबारगी लौटना भी चाहा पर अभिमन्यु के चेहरे पर उतरे आँसुओं के गुच्छे की याद आते ही पलट गई। हल्के हाथ से डोर बेल बजाई। रात भर जागी आँखों वाला अभिमन्यु सामने था अस्तव्यस्त कपड़ों में।
"अरे तुम…" चौक गया वह। 
सुजाता को लगा जैसै उसका आना एक अचंभा हो अभिमन्यु के लिए लेकिन अब लौटना मुमकिन नहीं था।

"अंदर आने के लिए नहीं कहोगे।"
माहौल को हल्का करने की उसकी पस्त-सी कोशिश। 
"हाँ, हाँ, क्यों नहीं? आओ ना। "वह दरवाज़े के एक ओर खड़ा हो गया। वह ख़ुद को जैसे धकेलकर भीतर ले गई। भीतर प्रवेश करते ही सुजाता ने एक दृष्टि उसके घर पर डाली, छोटा सा अस्त-व्यस्त ड्राइंगरूम, चॉकलेटी कलर के पर्दे, ग्लास की टेबल पर समान का जख़ीरा, आधी बिछी आधी लटकी चादर शायद इसी पर वह लेटा था। सामने दीवार पर टँगा टीवी जिस पर बासी समाचार चल रहे थे। वह चादर को परे कर, सोफे पर ही धँस गई।

"आज ऑफिस क्यों नहीं आये? क्या तबीयत ठीक नहीं तुम्हारी?" सुजाता किसी तरह अपने आने को सामान्य बनाने की कोशिश कर रही थी।
"सिर में बहुत तेज दर्द था।"
 अभिमन्यु अपना सिर पकड़ कर बैठ गया।
"मैं तुम्हारे लिए चाय बनाता हूँ " अचानक उसने अपने सिर को झटका दिया और उठ खड़ा हुआ। 
"अरे नहीं तुम बैठो मैं बस तुम्हें देखने चली आई थी तुमने फ़ोन पिक नहीं किया इसलिए" सुजाता को पता नहीं अपने आने को लेकर ग्लानि-सी होने लगी। 
"ओह! मैंने साइलेंट मोड पर रखा हुआ" 
वह अपने मोबाइल को उठा कर देखने लगा। सुजाता देख रही थी उसे, वह दृश्य में होता हुआ भी दृश्य से बाहर था। वह उसे एकटक देख रही। फिर ना जाने क्या हुआ? वह धीरे से सोफे से उठी और उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई। अभिमन्यु ना जाने कौन-सी दुनिया में था। फिर कब सुजाता की उँगलियाँ अभिमन्यु के माथे पर छोटे-छोटे डग भरने लगीं? अभिमन्यु ने अपना सिर सोफे पर टिका दिया। सुजाता की उँगलियाँ किसी कुम्हार की उँगलियों की तरह, उसके माथे पर कुछ आकृतियों की गढ़न कर रही थी। अभिमन्यु फिर भावुक हो उठा और धीमे से सुजाता को अपने करीब खींच लिया। पर्वतों के पीछे झाँकते चाँद की तरह, अभिमन्यु का घर दिपदिपा रहा था। चिड़िया के किसी नन्हे बच्चे की तरह सुजाता की आँखें बंद हो गई। अभिमन्यु की देह में एक तिलस्मी सोता फूट पड़ा था। वे दोनों उस समय, हर उस जगह पहुँच जाना चाहते थे जहाँ आनंद का अनूठापन अपनी आख़िरी पायदान पर हो। पंचामृत चखकर हम सिद्धियों की तलाश में भटक रहे थे।
मन की बारहखड़ी को पढ़ते-पढ़ते देह के व्याकरण को समझ रहे थे पर अभिमन्यु बुदबुदा रहा था शायद प्रेम का कोई मंत्र!
"ओ अभिमन्यु…" 
मुझे लगा तुमने ठीक उस वक़्त मेरा नाम लिया था। ”सुजाता।” जब हम उस द्वार को भेद रहे थे जहाँ आनंद का सोता सुजाता के 'ता' पर नहीं बल्कि कमबख़्त अदिति के 'ति' पर अटक गया था और सुजाता 'ता' के द्वार पर ऐसे ठिठकी कि कुछ सुन ही नहीं पाई और अभिमन्यु अदिति के नाम की सिंफनी बजाता रहा,  उस दिन सुजाता अंदर से भरकर लौटी।
'काश! उस समय उसने 'त' वर्ण की सटीक मात्रा को ध्यान से सुना होता'! 

अगले दिन अभिमन्यु ऑफिस में था, चहकता हुआ। सुजाता फिर धोखे में थी। वह प्रेम की पाठशाला में बैठी, पहले व्याकरण फिर केमिस्ट्री को समझ रही थी और अभिमन्यु स्मृतियों के अभिलेखागार में पुरातत्व विज्ञान को समझने में व्यस्त था।

“अभिमन्यु, धनात्मक ऋणात्मक घनन के संकुचन का तीव्र आलोड़न…।”

अगले दिन वह अपनी सीट पर बैठी, कंप्यूटर की स्क्रीन के नीले रंग में एक फिगर ढूँढ रही थी पर उसकी आँखें बीच-बीच में सामने की सीट पर बैठे अभिमन्यु पर टिक जाती। वह खुश दिख रहा था, पर सुजाता को नहीं देख रहा था। क्या उसकी टकटकी को वह महसूस नहीं कर पा रहा था? सुजाता बेचैन थी कि सहसा वह उसकी टकटकी को तोड़कर अपनी सीट से उठा और उसकी ओर बढ़ने लगा। सुजाता अब सातवें आसमान पर तैरती मछली थी जो इंद्रधनुष का सातवाँ रंग, अपनी आँख के लिए चुनना चाहती थी। 

"सुजाता…।" उसने पुकारा 
वह सुनहरे रंग की तितली की तरह उड़ ही रही थी कि वह ऐन उसके सामने बैठ गया। उसकी शर्ट की कॉलर हमेशा की तरह थोड़ी उठी हुई थी। डार्क ब्लू कलर की शर्ट पर सफेद रंग की धारियाँ और क्रीमी पेंट। ,बिखरे बाल, आँखें समंदर में पड़ी सीप की तरह…, सुजाता किसी जादू की गिरफ़्त में थी और उड़कर उसके उठे कॉलर पर बैठना चाहती थी। उसे सुनना चाहती थी… उसे सुनना था। वह क्या कहना चाहता है क्या वही जिसे सुनने के लिए सुजाता उतावली थी?
"सुजाता कल अदिति का मैसेज आया था, देखो" उसने मोबाइल उसकी ओर बढ़ा दिया जिस पर व्हाट्सएप के मैसेज खुले हुए थे। 

"अदिति" 
सुजाता अचानक, पर्वत की सबसे ऊँची चोटी से गिरा दी गई थी। चोटी की बर्फ़ का गीलापन उसकी त्वचा पर फैल चुका था जिसमें वह बहुत देर तक भीगती रही। सुजाता की आँखों के पानी में मैसेज डबडबा रहा था। 
"अभिमन्यु मुझे एक ज़रूरी फाइल ढूँढनी है, मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ" सुजाता ने अपनी पीठ अभिमन्यु की ओर कर ली और फाइलों में अपनी आँखों के गीलेपन को सुखाने लगी।

उस दिन के बाद अभिमन्यु नहीं लौटा, सुजाता के तमाम इंतजार के बाद भी। सुजाता अभिमन्यु से मुक्ति की कामना करती पर कहाँ मुक्त हो पाई ? उसकी आँखों में एक उदास नदी आकर बैठ गई थी,जिसके पानी से वह कभी-कभी अपनी पलकें भिगो लेती। 
 
एक दिन सुजाता ने सुना था कि अदिति लौट आई है। जब उसने ये सुना था…, तब छन्न से कुछ चटका था उसके भीतर। सुजाता समझ गई थी कि उस दिन अभिमन्यु के घर में दो देह के आलोड़न के बीच अभिमन्यु के कंठ से एक आद्र शब्द ‘त’ टूटकर उसके कान में गिरा था। उस समय शायद उसकी मात्रा कहीं फिसलकर गिर गई थी। आज उसे वो मात्रा मिल गई थी,वो ‘त’ अब ‘ति’ में बदल रहा था। उस दिन अभिमन्यु ने ‘सुजाता’ को नहीं ‘अदिति’ को पुकारा था।
दरअसल वह गुंजाइशों में थी। उसके लिए प्रेम भी एक गुंजाइश ही था। जीने-मरने की तमाम गुंजाइशों के बीच उसने मैंने प्रेम को चुना था।

दिन सरक रहे थे। उसने अभिमन्यु की कत्थई स्मृतियों को खुला छोड़ दिया। वह कभी भी सुजाता के मन पर पड़े ताले को खोलती और उसमें प्रवेश करती। ऑफिस में भी सुजाता का सामने वाली सीट का सम्मोहन अभी कम नहीं हुआ था। अभिमन्यु वहाँ अब नहीं था ट्रांसफर लेकर दूसरी ब्रांच में जा चुका था, जाते हुए उसने मिलने का प्रयास भी किया था पर सुजाता छुट्टी लेकर कुछ दिनों के लिए बाहर चली गई थी। 

"अभिमन्यु! क्या तुमने उस समय अदिति को पुकारा था? वही अदिति जो तुम्हें बार-बार छोड़ कर चली जाती है। यह कहकर कि अब हम दोनों के बीच कुछ नहीं रहा, सब कुछ सूख चुका है पर मैं कौन थी? उन दोनों के बीच। नफरत और ईर्ष्या वह चाहकर भी नहीं कर सकती। अदिति पहले भी लौटी है…” सुजाता एक और खड़ी दोनों को रेत से खेलते देख रही थी, रेत के घरोंदें बनाते हुए।

“अब मैं नहीं देख पाऊँगी इस तरह इन दोनों को। मैं कंधा ढूँढ रही थी और अभिमन्यु घुटने”
सुजाता ने श्वास का एक गहरा कश लिया…।
भूलने और भुलाने की अंतहीन प्रक्रिया में सुजाता के मोबाइल पर अभिमन्यु का मैसेज ब्लिंक कर रहा था, 

"सुजाता! 
मैंने पिछले दिनों, तुम्हे बहुत मिस किया पर तुम्हें शायद मालूम नहीं कि अदिति मेरी ज़िंदगी से हमेशा के लिए जा चुकी है। मैं बस, तुमसे एक बार मिलना चाहता हूँ…बस एक बार…"

उसके मैसेज के अक्षरों की आकृतियाँ तथा प्यार की इमोजी कसैले धुएँ का बादल बनकर उड़ने लगी, अपनी राख होती आँखों के बिखरने से पहले सुजाता ने मोबाइल उठाया और अभिमन्यु का नंबर ब्लॉक कर दिया।

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